कुछ कविताएँ: विजय सिंह नाहटा

पहाड़ी बस्ती के आदमी का बयान

पहाड़ी ढलानों के नीचे
बस्ती है कोहरे से ढकी हुई
इन्हीं लोगों के बीच विचरण
के लिए मुझे तय किया गया होगा
बंधा हूँ बहुत से दुनियावी रिश्तों से
बिद्ध हूँ --
कीलें ठुकी है चेतना के भीतर
छोटा सा आकाश मुझे दिया गया बतौर चुनौती में
छोटे-छोटे सवाल छोटे छोटे सत्य साध कर
संवारता हूँ पृथ्वी पर अदद छोटा सा भूगोल
छोटे दुखों में भविष्य के स्वप्न की तरह तैरता हूँ
सांझ को पंख समेटे लौट आता हूँ
इन्हीं पगडंडियों पर
थोड़ा सा ही सही
भले छोटी सी परिधि में भर सका उजास
-- बना सका जीने लायक यह जीवन।
***



कवि के नाते

विस्मय से देखता हूँ
इस पृथ्वी को
आश्चर्य में डूबा हुआ
गोया पहले पहल शुरू की
मैंने ही यह पदयात्रा
जैसे कि खोले हैं बंद कपाट
क्षितिज के
सन्नाटे में घिरा हुआ
रहता हूँ निःशब्द
शब्द के भार से चटख ना जाये देह
दरक ना जाये इसका सौन्दर्य
साधे रहता हूँ चुप्पी
सुन्दरता जिसमें सबका हिस्सा है घुला हुआ
सहेज कर चाहता हूँ रखना
मौन एक पुल जो इस समय अदृश्य हमें जोड़ता
महज, दृश्य की आभा मे नहीं
उसके उद्गम के भीतर झाँकता हूँ
बहता हूँ चिर प्रवाह में
--- होता हूँ कृतज्ञ और खाली।
***



पढता हूँ सूरज

जबकि नहीं पलट पाता काल के तमाम पृष्ठ
अनादि और अनंत तक नहीं पहुँच पाती मेरी दृष्टि
यही कि मैं पढता हूँ सूरज के विराट चेहरे को
चश्मदीद जो रहता आया काल के हर पड़ाव का
उत्कीर्ण है हर क्षण की महान गाथाएँ
दफ्न है समय का अचूक क्रिया कलाप
क्षण के हर गोपन को उदघाटित करता वह
***



नयी संभावना में

इस पृथ्वी पर मैंने कोई अतिरिक्त अपेक्षा नहीं पाली
वह कब से है तैनात?
मै करता हूँ महसूस उसकी दीप्ति --
अखंड प्रेम जो पसरा हुआ क्षितिज तक
--- चैतन्य बोध उसका मुझे रह रह लुभाता है
और पहुँचती है अनाम किरणों की छुअन
----- मुझ अकिंचन तक।
--- मनुष्यता के सिवा
कोई और स्वप्न देखना
होता एक किस्म का रचनात्मक अपराध।
जैसे किसी बंद गवाक्ष के यकायक खुलने पर
आर पार झाँक कर मैंने देखा लहलहाता जीवन
सबको समकालीन कहा - माना -गुना
और विदा किया प्रेम पूर्वक
---यों फिर मिलेंगे जिन्दगी के किसी मोड़ पर
बिना किसी शोरगुल के
अपेक्षा विहीन; किसी प्रिय एकांत तट पर।
इस विराट दुनिया के फैले हुए किनारों तक
कभी न कभी कारित नहीं कर सका
चेतन अचेतन, चराचर के प्रति
बेवजह उपेक्षा भाव लादे रहने का संगीन जुर्म
इस ब्रहमांड में; लगभग कृतज्ञ रहा
जो राह में मिला उसे ही दाय समझा।
कई बार कुहासे में झाँकती एक किरण के शौर्य ने
मरूथल में फूटती एक हरी पत्ती के उल्लास ने
पहाड़ पर चढते गिरते चींटी दल के पौरुष ने
मुझे लौटाया है फिर फिर जीवन अनुराग में
लगभग पराजित हो चुकी मेरी शख्सियत के पाँव
चट्टानवत रोपे हैं समरांगण में।
मैंने अपेक्षा नहीं पाली अंतहीन ऊंचाइयों की
कदाचित् उपेक्षा नहीं की पैरों से लिपटी जड़ों की
अपेक्षा नहीं की उम्मीद से कहीं अधिक ईश्वर हो जाने की
पर उपेक्षा नहीं बरती एक मनुष्य में मनुष्य होकर जीने की
मैंने सबका दिल से अभिवादन किया
जिन्होंने विकट समय में पैरवी की अनंत जीवन की
सलामत रहा येन केन अस्मिता का दीया
अनाम लोगों की कर्मठता का
उजास सोख कर।
अपेक्षा और उपेक्षा के इस अंतहीन खेल में
निःस्पृह बना रहा
साबुत निकल आया बाहर
इन्द्रियजित विजेता की तरह
और;
इस समय दुनिया का सबसे खुशकिस्मत
देहधारी साबित हुआ।
अब, मुक्ति के विराट द्वार खुल रहे
सुबह के आलोक में
और, मुझे होना होगा
पुनः एक नयी संभावना में दाखिल।
***



यही एक सौन्दर्य है

भूख मंडराती मेरे सिर के ऊपर
अपने श्रम से धकेलता हूँ
आज और कल जितना अन्न है
मेरे खलिहानों में
परसों की है चिंता
यह खेल रोज खेलता हूँ
रोज खोदता हूँ कुएँ
बुझाता हूँ प्यास
यह अनादि संघर्ष मिला हुआ दाय में
पर, श्रम का उत्ताप है मेरी भुजाओं में
नहीं सोता हूँ खाली पेट
यही एक सौन्दर्य है
जिसे रह रह भोगता हूँ।
***



मायने

शहर के बड़े अस्पताल में
यह रोजमर्रा की तरह
एक मृत्यु थी--- ठोस और ठहरी हुई
गाँव की गलियों में पहुँचने तक
बदल गई हाहाकार में
शहर में अखबार के किसी कॉलम में
वह एक खबर भर हुई
गाँव पहुँचकर हुई जिंदगी भर का सामान।
रात गये जब सियार बोलते हैं
अलसुबह जब डूबता है तारा
अरूण सबेरा ताकता कातर नयन
यूँ कुछ याद बनी रहती धुंधले मौसम की
तब तलक एक फैसले से गुजर चुका होता ईश्वर
आती जब दबे पाँव सनसनी की तरह एक खबर
शताब्दियों तक दर्ज रहती जो
गाँव के साझा दुःख में।
***



रोके न रूकेगा

देखो! बाहर सनसनी है
एक गिरती हुई पत्ती की खङखङाहट
सुनती है साफ
-- इसे महसूस करो
बर्फ गिर रही रात से
कहीं कोई शोर गूँजता
बज उठा तूर्य ----
कुछ लोग आ रहे जुलूस की शक्ल में, लामबन्द
कहीं हो रहा सङक पर लयबद्ध मार्चपास्ट
-- इसे उत्सव की तरह होने दो
कुछ लोग झिंझोड़ देना चाहते
युगों से जमी उदासी को
हवा में गूंजती जय ध्वनियाँ
इतिहास के इस क्षण
भविष्य की पुख्ता नींव रखने को आतुर
देखो! कुछ लोग चाहते बदलना
जड़ों से क्षितिज तक
इस विचार को श्वास की तरह
आवाजाही करने दो
जैसे कि हम रीते हैं ---
उतने न हुए न्याय की तराजू पर
कसौटियों पर कसे जाकर पाक साफ
आधे अधूरे
जितने भी हुए अंततः भरपूर न हुए।
सत्य के पैमानों पर
--- इस निर्वात को अनुताप से भरने दो
देखो! कुछ सपने कसमसा कर
फूट रहे आत्मा की भूमि से
देखो इस पल को
पूरी आभा में निहारो
सूरज को देखो
जैसे कि रोके न रूकेगा
युग के रथ का पहिया
किसी जड़वत चट्टान से
खिसककर लुढ़क आएगा
बदलाव का पत्थर झरे पत्तों सा
और छा जायेगा --- ढाँप ही लेगा
ऊबङखाबङ वन प्रान्तर
वही, वही सबसे ज्वलंत होगा
एक वृत्तान्त
उस पर खुदे होंगे
वसंत और पतझड़ के
कालजयी आख्यान
अरे ओ! कालपुरूष
इसे स्मृति के जल पर ही
क्यों न;
कथा विकथा अपनी कहने दो
-- लहर लहर
दो लहराने
***



खोज लेना मुझे

अपने जाने के बाद खोज लेना मुझे
जंगल की खामोशी में
वहीं मिलूँगा
लाखों गीतों की घुमड़ती स्वर लहरियों में
जो झकझोरती रहेगी हवा संग मेरी आत्मा को
एक टहनी सा हिलाती-डुलाती स्मृति मेरा स्वत्व
इन्ही रेतीले धोरों की अनबुझी प्यास में मिलूँगा
जल फुहार सा
ठहरी दरिया की लहरों के फूटते संगीत में
रहूँगा अपने समय को गाता हुआ
इन्हीं मौसमी हवाओं में लाखों गीत लिए
झिलमिलाता हुआ मिलूँगा
तुम्हें
इसी धूप में
इसी सरजमीं पर
प्रेम में पकता हुआ समय
---- एक मुकम्मल अदृश्य
आत्मीय और सघन
दीप्त औ 'पावन।



जयपुर राजस्थान भारत
मोबाइल नंबर 7850873701

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