कविताएँ: केशव शरण

सृजन से सम्पन्न

सिर्फ़ तन से क्यों, 
सिर्फ़ मन से क्यों, 
सिर्फ़ धन से क्यों, 
सिर्फ़ सृजन से क्यों?

मैं सम्पन्न रहूँ तो
सबसे क्यों नहीं रहूँ?

हर चीज़ से विपन्न!
ना बाबा, ना!!

कम से कम
सृजन से तो सम्पन्न
रहने दो, 
कलात्मक तरीक़ों से सहने दो
विपन्नताओं की दारुण व्यथाएँ!

मैं दुखांतों से बचूँ न बचूँ
लेकिन सुखांत तो रचूँ
***


दुनिया में वापस

मैं एक दिन के लिए मरकर 
दुनिया में वापस आ जाता
मेरी ख़्वाहिश बढ़ती थी
जैसे पेड़ पर बेल चढ़ती थी
जब वसंत था गदराता

दुनिया में वापस आ जाता
मैं एक दिन के लिए
मुहब्बत में मरकर

सोचता यही था
हुआ यही
मगर अब मेरा मन नहीं था
दुनिया में वापस आने का
***


मैं देख रहा था
(वरिष्ठ साथी और शायर मेयार सनेही के लिए)

वे
मेरी बग़ल में
मेरा कंधा थामे खड़े थे
और मैं देख रहा था
वे उस ताबूत में भी पड़े थे
जो क़ब्र में उतारा जा रहा था

मेरे कंधे से उनका हाथ सरका
और मैंने देखा
क़ब्र ढंक गयी है
और एक पौधा 
उस पर लहरा रहा है
***


कविता हर बार एक नये रूप में

दिन बीतते-बीतते
रात होते-होते
मैं अपनी कविता को
ढूँढने लगता हूँ 
जो मिलती है
हर बार मुझे
एक नये रूप में

रात जाते-जाते भी
वह मिल जाती है तो
उसी की चमक फैली होती है
 सुबह की धूप में
***


बजे बजे बाग़ीचा

सुबह दस बजे के बाग़ीचे से
मैं पाँच बजे के बाग़ीचे में प्रवेश कर रहा हूँ

दस बजे का बाग़ीचा जितना सुंदर था
ग्यारह बजे का बाग़ीचा भी उतना ही ख़ूबसूरत था
उतना ही सुरम्य था बारह बजे का बाग़ीचा
उतना ही सुहाना था एक बजे का बाग़ीचा
उतना ही मनोहर था दो बजे का बाग़ीचा
उतना ही नयनाभिराम था तीन बजे का बाग़ीचा
उतना ही आकर्षक था चार बजे का बाग़ीचा
उतना ही दिलकश है पाँच बजे का बाग़ीचा
छह बजे का बाग़ीचा भी क्या कम होगा
पर छह बजे के बाग़ीचे से मैं बाहर आ जाऊंगा
सात बजे का बाग़ीचा कैसा होगा
चांद और तारे ही बता पायेंगे
***


फिर हम

पहले हम
दूर-दूर थे
फिर हम
अगल-बग़ल हुए
फिर आमने-सामने
फिर समा गये
एक-दूसरे में

फिर हम
दूर-दूर हैं
***


सोने की चिड़ियाँ

सोने की चिड़ियाँ 
भूखी हैं
दाने नहीं हैं
देश के पास

सोने की चिड़ियों का
शिकार हो रहा है जमकर

जगह ख़ाली हो रही है
जैसे-जैसे
डाल-डाल पर
दिखायी दे रहे हैं उल्लू
***


सिकन्दर

सिकन्दर
जीतता हुआ
आगे बढ़ता जा रहा है
अभी कई प्रदेश बाक़ी हैं
उसका ध्यान
सिर्फ़ अपनी आगामी जीत पर है

सिकन्दर
मुड़कर नहीं देख रहा है
उसके द्वारा जीते हुए प्रदेशों में
प्रजा का क्या हाल है
मचा वहाँ
क्या बवाल है

जानता है सिकन्दर
अगर उसने मुड़कर देखा
पत्थर हो जायेगा वह
***


नदी और भैंसें

मैं
भैंसों को देख रहा हूँ
और नदी को

दोनों का रंग एक है

भैंसें नहलाने के लिए लायी गयी हैं
वे पशुपालन के आदिकाल से
लायी जाती रही हैं नदी के पास
नहलाने के लिए
वे दूर से पानी देखकर दौड़ पड़ती थीं
और छलांग लगाकर लगती थीं मड़िया मारने
तब नदी इनके रंग की नहीं थी
नदी का अपना रंग था

ये अपने रंग की नदी में
हिचक-हिचककर उतर रही हैं
और बिल्कुल स्थिर बैठ जा रहीं
मगर उनकी पीठ पर बैठने के लिए
मौजूद एक बगुला नहीं!
***


पर क्या कर सकता मैं

न माथा पटक रहा हूँ
न छाती पीट रहा हूँ
न अपने को आँसुओं से नहला रहा हूँ

मैं गीता के श्लोकों से
ख़ुद को बहला रहा हूँ

पहाड़ टूट गिरा है
धरती फट गयी है
ढह गया है आकाश

किसी तरह से
स्वयं को संभाल रहा हूँ
पर क्या कर सकता हूँ मैं
सन्नाटे और एकाकीपन का
जो मेरे अंदर
समाये जा रहे हैं
***


मार दिये जाते हैं

बदतर ज़िंदगी 
बदतर तरीके से
जीते रहते हैं लोग

थोड़े-से लोगों के पास
बेहतर ज़िंदगी होती है
मगर वे भी उसे
बदतर तरीक़ों से ही
जीते रहते हैं

ज़िंदगी जैसी भी हो
गिनती के लोग हैं
जो जीते हैं उसे
बेहतर तरीक़ों से

इन्हीं का यह अभ्यास
पहुँचना चाहिए सबके पास
तो ये मार दिये जाते हैं
***


तबाह

मैंने अपने को
चोर बना लिया
और अपनी चोरियाँ
बचाने में लगा हूँ

मैंने अपने को
चापलूस बना लिया
और अपनी चापलूसियाँ
बचाने में लगा हूँ

मैंने अपने को झूठा बनाया क्यों
कि हमेशा अपने झूठों को बचाने में लगा हूँ

मैंने क्यों बनाया
अपने को कायर और क्रूर
मैंने क्यों बनाया
अपने को मतलबी, मक्कार और मजबूर

आदमी था मैं
क्यों लगा मुझे
मैं आदमीयत बचाने में
तबाह हो जाऊंगा?

मैं तबाह नहीं तो
और क्या हूँ?

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