मेघदूतम् और महाकवि कालिदास की पर्यावरणीय चेतना

प्रियंका कुमारी

टी0 जी0 टी0 संस्कृत, झारखण्ड सरकार

महाकवि कालिदास रचित मघदूतम् एक सफलतम रचना है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि कालिदास की अन्य रचनाएँ न होती, केवल अकेला मेघदूत ही होता तो भी उनकी कीत्र्ति में कोई अन्तर न पड़ता। मेघदूतम् संस्कृत साहित्य के प्रथम गीति-काव्य के रूप में प्रसिद्ध एवं प्रचलित है। कालिदास की कल्पना की ऊँची उड़ान और परिपक्व कला का यह एक ऐसा नमूना है, जिसकी टक्कर का विश्व में दूसरा नहीं। मन्दाक्रान्ता छन्द में लिखा हुआ 121 पद्यों का यह छोटा-सा काव्य सार्वकालिक है। इसके दो भाग हैं - पूर्व मेघ और उत्तर मेघ। इसकी कथा वस्तु कवि कल्पित है। यह प्रिया के वियोग में व्यथित किसी यक्ष की  कहानी है, जो संसार के समस्त काव्य-प्रेमियों को स्वाभाविक विरह गीत प्रतीत होता है।
           मेघदूतम् में कवि ने पर्यावरण को सदैव मृदु प्राकृतिक स्वरूप में देखना चाहा है। कवि जो चाहता है, वह उसके काव्य में दिखाई देता है। पर्यावरण का प्रभाव जन सामान्य पर पड़ता है। मानव का दायित्व है कि वह विश्व कल्याण के लिए प्रकृति की रक्षा करे, पर्यावरण को संरक्षित करे क्योंकि संतुलित पर्यावरण के बिना उसका अस्तिŸव ही नहीं रहेगा।
   सात्विक प्रवृति और उदात्त चिन्तन के कारण कालिदास ने मेघदूतम् में भारतीय संस्कृति के प्राण तत्त्व को सुरक्षित किया है। यहाँ सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का सामंजस्य है। अन्तर्जगत् व बाह्य पर्यावरण  का मोहक प्रस्तुतीकरण किया है। यहाँ आत्मा को तृप्त करने वाले रसायन, मन को प्रसन्न करने वाले वासन्ती पुष्प, नेत्रों को उद्दीप्त  करने वाले वृक्षादि, जीवन को धन्य करने वाला स्वर्ग और धरा का अलौकिक स्वरूप उपलब्ध है। कालिदास भारत की आत्मा के प्रतिनिधि कवि हैं।  प्राचीन भारतीय सभ्यता के प्रस्तोता हैं, वैदिक संस्कृति के अमर गायक हैं, पौराणिक मान्यताओं का मनन करने वाले हैं, शिव तत्त्व का सार जानने वाले हैं, स्वयं को पृथिवी की संतति समझने वाले है, इसलिए ये सारे भाव इनके काव्य में सहज दर्शनीय हैं। मेघदूतम् में बाह्य पर्यावरण के साथ अन्तः पर्यावरण का भी सूक्ष्म विश्लेषण है। मानव का आध्यात्मिक चिंतन उसे भौतिक जगत में कर्म हेतु प्रवृत्त करता है। अतः भौतिक पर्यावरण शुद्धि के लिये आध्यात्मिक अर्थात् आत्म शुद्धि आवश्यक है। अन्तः शुद्धि और बाह्यशुद्धि का अनन्य सम्बन्ध है। इसके लिये अहिंसा का व्यवहार और अनेकान्त का विचार परमावश्यक है। कालिदास वैदिक-सिद्धांत एवं आचार को मानते हैं जो तन शुद्धि, मन शुद्धि और पर्यावरण शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जिन्हें वर्तमान पर्यावरणीय समस्याओं के सन्दर्भ में समझना होगा। इन्हें अपने आचरण में समाहित करना आज की महती आवश्कता है।
   मेघदूतम् में कवि ने अपने प्रिय प्रकृति व पर्यावरण के प्रायः सभी घटकों को प्रस्तुत किया है। अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, औषधि एवं वनस्पति आदि सब शिवस्वरूप हैं अर्थात् कल्याण कारक है, इसका उपदेश किया है। प्रत्युपकार की इच्छा के बिना सदा ये हमारी सहायता करते हैं इसलिए देवतुल्य हैं। इसके अधिकांश पद्यों में पर्यावरणीय तŸवों को स्मरण किया है और सन्देश दिया है कि प्रकृति के विरुद्ध आचरण नहीं करना चाहिए। पूर्वमेघ में तो वाह्य प्रकृति का सुन्दरतम स्वरूप चित्रित हुआ है। एक ओर जहाँ गन्धवती, गम्भीरा, चर्मण्वती, रेवा, जाह्नवी, मन्दाकिनी, यमुना, देवगंगा, सरस्वती जैसी नदियाँ हैं तो दूसरी ओर अलका, अवन्ती, विदिशा, कुरूक्षेत्र व उज्जयिनी उदात्त स्वरूपधारी नगर। कहीं रामगिरि, आम्रकूट, देवगिरि, नीचैर्गिरि जैसे पर्वत व पठार दिखाई देते हैं तो कहीं विस्तृत हिमालय, विन्ध्य व कैलास। कहीं रामगिरि का पवित्र जलयुक्त सरोवर है तो कहीं हंसों का प्रिय जगत् प्रसिद्ध मानसरोवर। आश्रम, पर्वत, मेघ, नदियाँ, झरने, उद्यान, सघन व छायेदार वृक्ष, लताएँ, बेंत, कमलनाल, कुकुरमुत्ता, पुष्पावली, चातक, बलाका, मिट्टी की खुशबु, जामुन के वन, केसर, कदम्ब, हिरण, मोर, कपोत, गज, जूही की कली, शिलागृह, सरकण्डे का वन, यज्ञधूम, चमरी गाय, देवदारू, शरभ, कस्तूरी मृग, वन गूलर,  कुन्द, कुटज, लोध्र, कुरबक, शिरीष, कदम्ब, भ्रमर, चाँदनी, अरविन्द, अशोक, आम्र, नीलोत्पल, नवमल्लिका, इक्षुदण्ड, कल्पवृक्ष, रतिफल, मन्दार, रत्नदीप, विमानाग्रभूमि, चन्द्रकान्त मणि, बैभ्राज, अश्व, गज, दिग्गज, बालमन्दार, माधवी, बकुल, शंख, पद्म, जुगनू, बिम्बफल, हिरणी, चकवी, पद्मिनी, शुक-सारिका, मछली, कदलीस्तभ, वनदेवी आदि। क्या नहीं है मेघदूत में जिस पर कवि की दृष्टि न गई हो।
       कालिदास ने मूलतः मानवीय दृष्टिकोण से परिवेश का निरीक्षण किया है। मेघदूतम् के प्रत्येक पद्य में अपने इसी निरीक्षण का सम्यक् निरूपण कर मानव और उसके परिवेश के पारस्परिक सम्बन्धों का काव्यमय विलास प्रस्तुत किया है। मानव और पर्यावरण के सम्बन्धों के विविध आयामों को दिखाया है। कालिदास की पर्यावरणीय दृष्टि का सर्वाधिक सूक्ष्म एवं प्रामाणिक परिचय मेघदूत में मिलता है।
    कालिदास का मेघदूतम् प्रकृति प्रेम व सूक्ष्म पर्यावरणीय चिन्तन का सर्वोत्तम ग्रन्थ है। इसके प्रायः प्रत्येक पद्य में प्रकृति की आशा भरी आत्मा की वेदना का चित्रण है। संयत, गम्भीर और प्रशान्त व्याकुलता पद-पद पर दर्शनीय है। मेघदूतम् में कवि ने प्रकृति और मानव को एक नवीन एवं मौलिक रूप से परस्पर जोड़ दिया है। मानव जीवन तथा प्राकृतिक जीवन के संग्रन्थन को एक आवश्यकता और अद्वितीय आनन्द के रूप में प्रस्तुत कर कवि ने अपने सूक्ष्म पर्यावरण चिन्तन का परिचय दिया है।
    मेघदूतम् में कालिदास ने अपने प्रकृति प्रेम तथा पर्यावरण चिन्तन को न केवल हृदयग्राही बनाया है अपितु सर्वात्मना रसाप्लावित कर उसमें निमग्न कर देने वाला भी बनाया है। प्रकृति एवं पर्यावरण के मूल तत्त्व पृथिवी, जल, वायु, अग्नि, आकाश ही नहीं वन, पशु-पक्षी, आश्रम, नदियाँ, पर्वत-पहाड़ का निपुण चित्रण व्यंजना शैली में करते हुए यह सन्देश दिया है कि - जनानां हितम् प्रकृतिसंरक्षणे निहितम्। 
कालिदास को मेघ अत्यधिक प्रिय है। मेघ के बिना पर्यावरण की कल्पना नहीं की जा सकती है और पर्यावरण के बिना जीवन असंभव है। मेघ को ही काव्य का आधार बनाकर लिखा गया है - ‘मेघदूतम्’। मेघ से प्राणिमात्र परिचित है। पशु-पक्षी से लेकर राज-राज कुबेर के अनुचर यक्ष तक उसका स्वागत और सम्मान करते हैं। स्थूल और सूक्ष्म, दृश्य और अदृश्य सभी पदार्थ मेघ के आगमन से प्रभावित होते हैं। महाकवि ने मेघ को साधु, सौम्य, सुभग और आयुष्मान् कहा है। उसका संचय त्याग के लिए है इसलिए वह ‘परोपकारिन्’ भी है। प्रजापालन में प्रजापति, नीलाम्बर से विष्णु तथा महेश की समता रखता है। मेघ की आयु सृष्टिकाल के समान सनातन है। प्रजा की सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों में उसका भाग है। वह अमर ब्रह्मचारी है इसलिए पुरातन होते हुए भी नित्य युवा है। प्रतिवर्ष वह अपना काया कल्प स्वतः कर लेता है। जीवन-जल को धारण करने के कारण वह जीमूत है। जल का सर्वत्र वहन करने से वह अम्बुवाह या वारिवाह है। जल का अपने अन्दर मेहन करने से वह मेघ है। अपनी प्रियतमा सौदामिनी से सदा संयुक्त रहने से वह तडित्वान् है। वह अर्धनारीश्वर शिव के समान अपनी प्रियतमा विद्युत् को गोद में बिठाये देश-विदेश घूमता रहता है। यह विद्युत् ही वर्षा करती है। कवि कालिदास ने वायु के प्रहार को सहन करने के कारण मेघ को ‘घन’ कहा है। उसके अन्दर जलराशि भरी है, अतः वह ‘स्तम्भितान्तर्जलौघः’ भी है। जल की एक संज्ञा ‘वृष’ भी है। वृषहीन पुरूष को पुरूषार्थ के अयोग्य माना गया है। अनन्त वृषशक्तिमान् मेघ को ही सोपान बनाकर भगवान् शिव मणितट या मणिपर्वत पर आरोहण करते हैं। जल-वृष की एक संज्ञा इन्द्र भी हैं। बलाकामिथुन गर्भाधान हेतु मेघ की सेवा करते हैं। इसलिए इन्द्र के प्रधान पुरूष की एक संज्ञा ‘बलाहक’ भी है। इन्द्र को कालिदास ने कुमारसंभवम् में भी वृषा की संज्ञा दी है तथा मेघ को वृषन्धि कहा है। ‘यास्क’ मेघ के पर्यायों में वराह का उल्लेख करते हैं। कालिदास ने भी मेघ को इस रूप में देखा है। उन्होंने मेघ को जीमूत, जलमुच् और प्रकृति-पुरूष तथा मघोनः भी कहा है।
      कालिदास ने मन्दार, कल्प, देवदार आदि वृक्षों को बार बार अपने काव्यों में स्मरण किया है। मेघदूतम् में मन्दार वृक्ष, मन्दार पुष्प, बाल मन्दार  आदि कहकर इसके प्रति अपना अनुराग प्रकट किया है। बाल मन्दार को तो कृतकतनय कहकर पुत्र के समान महत्त्व दिया है। भारतीय साहित्य परम्परा में पाँच वृक्षों को श्रेष्ठ वृक्ष अर्थात् देव वृक्ष का स्थान प्राप्त है। ‘‘पंचैते देवतरवो मन्दारः पारिजातकः। सन्तानः कल्पवृक्षश्च पुंसि वा हरिचन्दनम्।।’’ कहकर अमर कोश में देवदार, मन्दार, पारिजात, कल्पवृक्ष और हरिचन्दन को देवतरु माना गया है। कालिदास ने इन पाँचों वृक्षों का वर्णन अपने काव्यों में यथा स्थान करके इस वृक्षों के पर्यावरणीय उपयोगिता पर बल दिया है। यथा मेघदूतम् में  -
1. मन्दाराणामनुतटरुहां छायया वारितोष्णाः। (2/6) 
2. गत्युत्कम्पादलकपतितैर्यत्र मन्दारपुष्पैः (2/11)
3. तस्योपान्ते कृतकतनयः कान्तया वर्धितो मे हस्तप्राप्यस्तबकनमितो बालमन्दारवृक्षः। (2/15)
4. एकः सूते सकलमबलामण्डनं कल्पवृक्षः। (2/12)
5. तं चेद्वायौ सरति सरलस्कन्धसंघट्टजन्मा बाधेतोल्काक्षपितचमरीबालभारो दावाग्निः।  (1/56)
6. भित्वा सद्यः किसलयपुटान्देवदारुद्रुमाणां ये तत्क्षीरस्रुतिसुरभयो हक्षिणेन प्रवृत्त। (2/47)

        कालिदास प्रकृति व पर्यावरण के कवि हैं। इनके मेघदूतम् में प्रकृति के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। विभिन्न ऋतुओं में पाए जाने वाले पुष्पों का एक जगह वर्णन प्रकृति-चित्रण का अनूठा निदर्शन है। ग्रीष्म और शरद् में कमल, हेमन्त में कुन्द, शिशिर में लोध्र, वसन्त में कुरबक, ग्रीष्म में ही शिरीष तथा वर्षा ऋतु में कदम्ब के पुष्प विकसित होते हैं। कालिदास ने मोहक पर्यावरण और अतिशय अनुराग के कारण समृद्धि की पराकाष्ठा को प्राप्त नगर की स्त्रियों के श्रृंगार के लिए पुष्पाभूषणों का प्रयोग दिखा कर अपनी पर्यावरण चिन्तन को मूर्त रूप दिया है।  यह पद्य द्रष्टव्य है -
"हस्ते लीलाकमलमलके बालकुन्दानुबिद्धं                                                 नीतालोध्र प्रसवरजसा पाण्डुतामानने श्रीः।                                                       चूडापाशे नवकुरबकं चारू कर्णे शिरीषं                                                             सीमन्ते च त्वदुपगमजं यत्र नीपं वधूनाम्।।"(2/2)
     मेघदूतम् में कवि ने विभिन्न शब्द-शक्तियों के द्वारा अपनी बात को पाठकों के समक्ष रखा है। व्यंजना में कालिदास की कोई सानी नहीं।  सम्पूर्ण मेघदूतम् व्यंजना शक्ति से विदग्ध है। इससे न केवल काव्य सौन्दर्य में निखार आया है अपितु सर्वत्र कवि का प्रकृतिप्रेम और पर्यावरण चिन्तन प्रस्फुटित हुआ है।  यह उदाहरण द्रष्टव्य है - 
"श्यामास्वङ्गं चकितहरिणीप्रेक्षणे दृष्टिपातं                                                                                                                                                                                                                                                                 
                 वक्त्रच्छायां शशिनि शिखिनां बर्हभारेषु केशान्। 
 उत्पश्यामि प्रतनुषु नदीवीचिषु भ्रूविलासान्                                                                                                      
               हन्तैकस्मिन् क्वचिदपि न ते चण्डी सादृश्यमस्ति।।"(2/44)
         
    यहाँ व्यंजना के माध्यम से प्रकृति प्रेमी कालिदास ने प्रियंगुलता, हिरणी, मयूर, नदियों के तरंग आदि को अत्यन्त अनुरागात्मक भाव से व्यक्त कर अपने पर्यावरण प्रेम को प्रदर्शित किया है।          
कृषि को मेघ के अधीन कहते हुए भारतीय संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को एक साथ प्रस्तुत कर पर्यावरणीय चिन्तन को दर्शाया है -
त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति भ्रूविलासानभिज्ञैः
     प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोलनैः पीयमानः।
सद्यः सीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारूह्य मालं
                 कि´्चित्पश्चाद् व्रज लधुगतिर्भूय एवोत्तरेण।। (1/16)
  
   अन्ततः कहा जा सकता है कि - महाकवि कालिदास ने प्रकृति और पर्यावरण के साथ तादात्म्य की स्थापना की है। वह प्रकृति को सजीव तथा मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण मानते हैं। पर्यावरण को अनुकूल व सुखद देखना चाहते हैं। कवि के अनुसार मानव की तरह प्रकृति भी सुख-दुःख का अनुभव करती है। इस तरह मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे के लिए पूरक का कार्य करते हैं। प्रकृति और मानव जब तक एक दूसरे के लिए पूरक का कार्य करेंगे तभी तक विश्व में सौम्य पर्यावरण सम्भव है। क्योंकि पर्यावरण तथा मानव का अन्तः सम्बन्ध ज्ञान और व्यावहारिक उपयोग में सन्निहित होता है।

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