कविता: ठौर की तलाश

- जावेद आलम ख़ान


उड़ते हुए दिन सा उदास
झरते हुए अंधेरे सा बदरंग
बेतरतीबी को कंधे पर उठाए
आसमान से ताकता जीवन
ठौर की तलाश में भटकता पखेरू है

घोंसले जैसे अजगर बन चुके हैं
संबंधों के जाल उसे डराते है
कि अब हर जंगल उसका कत्लगाह है
और भटकना उसकी नियति
जैसे अभिशाप बन गई हो उसकी ही गति

किसी फूल के आमंत्रण में
उसकी आँखें सदियों से भीग जाना चाहती हैं
मगर चाह हर बार भाग्य के मंदिर की देहरी पर
सर पटककर वापस आ जाती है
जैसे कोई अभिशापित नदी
आँखों में संगम का सपना पाले
समुद्र के मुहाने से वापस होकर
उल्टी दिशा में बहने को मजबूर कर दी गई हो

काश कोई प्रलयंकारी सूर्य उसे सुखाकर
इस शाप से मुक्ति दे दे
और यह सोचकर
मैं देखने लगता हूँ चढ़ते हुए सूरज का ताप
भयंकर ताप में समुद्र से उठती भाप
बरसते बादल
पोखरों में इकट्ठा हुआ जल
महज इतना ही समझ पाया हूँ देखकर
कि जीवन इसी नवीनता का नाम है
जो आशाओं में पलता है
आशंकाओं में जलता है।

जन्म: 15 मार्च 1980
शिक्षा: एम. ए. हिंदी , एम. एड.
सम्प्रति: शिक्षा निदेशालय दिल्ली के अधीन टी जी टी हिंदी
पता: ए 2 फर्स्ट फ्लोर , त्यागी विहार, नांगलोई , दिल्ली - 110041
चलभाष: +91 913 639 7400

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