कहानी: गहना

धन्यकुमार बिराजदार

- धन्यकुमार बिराजदार


सच्चा सुख कहाँ है? सुख की प्राप्ति के लिए आवश्यक साधना की चर्चा तो बहुत सुनी थी। लोग सुख की प्राप्ति हेतु दर-दर भटकते हैं पर सुख तो मृगजल की तरह है। मैंने अमीरों-पूञ्जीपतियों के साथ मठों-मंदिरों में रहने वालों की सुख की असफल गाथा सुनी है। पर सच्चा सुख तो सुमन में देखा है। सुमन अर्थात नाम को सार्थक करने वाली अकिंचन सुमन में.... 
   दिनेश के पिता ने जिंदगी में शराब पीने और पत्नी की पिटाई को मानो व्रत ही मान रखा था, सुबह उठते ही देशी दारू के लिए रुपये की माँग, रुपये न देने पर उतना नहीं मारता जितना नशे में मारता! रुपये न देती तो भी मार, देती तो भी मार खाने के सिवा कुछ भी नहीं था पत्नी के जीवन में। नशे में जमीन के साथ खुद भी चला गया था। अगला ठोकर खाए पिछला बुध पाए कहावत की तरह कड़ी मेहनत करने वाला दिनेश शराब से दूर ही रहता। उसके कई मजदूर मित्र रोज शाम चौराहे पर नशे में बातचीत करते नजर आते, कई तो काम से छुट्टी लेते ही संध्या करने मदिरालय चले जाते और प्रसाद ग्रहण कर झूमते हुए घर जाते नजर आते। दिनेश ने उन्हें कई बार समझाया था पर भैंस के आगे बीन बजाय भैंस खड़ी पगुराय वाली बात थी। पिता ने पूञ्जी के रूप में फूटी कौड़ी भी नहीं रखी थी, मरते समय शराब से दूर रहने का मूलमंत्र दिया था। उसी पूञ्जी के बल पर दिनेश विधवा माँ के साथ दिन काट रहा था। 
     करने वालों के लिए हजारों काम हैं, बस करने की इच्छा हो। दिनेश ने पहली बार जो मास्टर से मार खाई, दुबारा स्कूल का नाम तक नहीं लिया था। परंतु चार दीवारों के बाहर वह बहुत कुछ पढ़ता रहा, उसकी आँखें गवाह हैं! पर आँखों के गवाह होने से सरकारी या निजी प्रतिष्ठानों में नौकरी नहीं मिलती, सो मन मारकर मजदूरी करता रहा। कारण उसके पास न मिडिल का प्रमाण पत्र था न ही मैट्रिक का! माँ के साथ दिनेश भी खेत में मजदूरी करता रहा। माँ ने रिश्तेदारों में ही अनपढ़ सुमन को बहू के रूप में लाना तय किया था। शादी में बहू के लिए रत्ती भर सोना न खरीदते वे सास-ससुर कैसे! फिर तो दिनेश की माँ ही सुमन के लिए सास भी थी और ससुर भी। नथुनी, कर्ण फूल जैसे छोटे गहनों के लिए भी कम-से-कम आधा तोला तो सोना चाहिए। कड़ी मेहनत करते समय लू लगने से चल बसी, घर में आने वाली बहू के लिए गहने खरीद नहीं सकी। तय किया रिश्ते को तोड़ना पाप मानते हुए सुमन के माता-पिता ने उसके हाथ पीले कर दिए। तिलक के बाद टूटते रिश्ते को कलंक मानते हैं। "कलमुँही की सगाई हुई तो सास को निगल दिया। अब घर में कदम रखेगी तो सत्यानाश ही कर डालेगी।" कहते हुए बेटी के साथ माँ-बाप का मुँह भी देखना पसंद नहीं करेंगे; यही सोचते हुए कि दूसरा कौन ब्याहेगा, सुमन की विदाई की थी। 
     दिनेश भी सुमन के साथ छोटे-से कमरे में गुजारा करता रहा। माँ का विचार करते हुए गाँव में रहा करता था। अब पत्नी को लेकर शहर में काम करता तो दो-चार पैसे ज्यादा मिलते थे। वैसे उसके मित्र कल कारखानों में काम करने के लिए जाते थे। एक दिन वह भी मित्रों के साथ कारखाने में चला गया। कड़ी मेहनत के साथ वेतन भी अच्छा था, दिन भर भट्टी के सामने काम करना पड़ता था। इंडस्ट्रियल एरिया में तीन शिफ्टों में काम होता है। हाँ, कोई चाहते तो दो शिफ्ट में काम कर सकते थे। दिनेश भी पत्नी को लेकर शहर चला गया और कारखाने में काम करता रहा। सुमन भी दोपहर तक चार-आठ घरों में चौका बर्तन करती थी। दोपहर घर लौटती, थोड़ी देर आराम करती, फिर घर में ही होटल के लिए रोटियाँ सेंककर देती। पति सप्ताह में कभी-कभार लगातार दो शिफ्ट करता। अकेले सुमन ऊब जाती। मायके में भी खटना ही लिखा था। सोचती- "पड़ोसी गौरी की तरह पढ़ाई करती तो आज मैं भी या तो डॉक्टर बनती यह टीचर। पर माँ उपले थापने से छुट्टी देती तब पढ़ाई करती न!" उसका सोचना सही था, टोकरी लेकर मवेशियों के पीछे पड़ना, उनका गोबर इकट्ठा करना उसका नित्यकर्म बना हुआ था। फिर विद्यालय कैसे जाती। लेकिन पड़ोसियों के घर घंटे भर टीवी देखने जाती तो उनके वैभव की चर्चा अपनी माँ के साथ करती। बचपन याद आता तो रुआंसा बन जाती।.... पति के घर लौटते वक्त रुदन ठीक नहीं, सो हाथ मुँह धोकर बैठ जाती। थका-मांदा पति के आते ही चाय बनती तो दोनों थोड़ी देर के लिए बातचीत करते।
     "कितने दिन तक भट्टी के सामने बैठकर काम करोगे? पैसे देखते हो कि सेहत? "
     "जिंदगी भर थोड़े ही भट्टी के सामने काम करूँगा। बस और दो-चार महीने काम करूँगा, दो-चार रुपये जमा होते ही खुद कोई छोटा-मोटा धंधा शुरू करते हैं।"
     "धंधा शुरू करने के लिए बड़ी पूंजी लगती है! कभी शक्ल देखी है अपनी आईने में !" हँसते हुए सुमन ने कहा।
     "तुम्हारी सूरत सामने होने पर आईना देखने की जरूरत कहाँ पड़ती है मुझे!" वह भी चुटकी लेता, फिर दोनों क्षणभर हँसते रहते। 
      देखते-देखते पूरा साल बीत गया और दोनों चर्चा करते रहें। तय किया कि लोहे के कारखाने में भट्टी के सामने बैठकर काम करने के बदले किसी ठेले पर ही काम करें। काम चाहे कितना भी छोटा हो, इमानदारी से करने में ही बड़प्पन होता है। शर्म क्यों करें, शर्म तो गोरख धंधा करने, चोरी करने या किसी का गला काटने वालों को आए। ठेले पर काम करते-करते कुछ सीख ले तो खुद का नाश्ते का ठेला भी शुरू कर सकते हैं। सुमन तो होटल के लिए रोटी सेंकती थी दोपहर में। उसने तो समोसा, कचोरी बनाना भी सीख लिया था। आवश्यकता के अनुसार होटल वाले सामग्री लाकर देते और वह मजदूरी पर बनाकर देती। फिर क्या था, दिनेश ठेले पर काम करने लगा। सुबह पाँच बजे घर से निकलता। शुरुआत में मालिक ने उसे प्लेट उठाने और धोने का काम दिया। वह कुछ न बोलता, बस उसे काम सीखना था। कभी-कभी कारीगर के हाथ में काम करता, उसके छुट्टी लेने पर खुद कारीगरी का काम करता। दोपहर के बाद घर लौटते समय मालिक बचा कुचा नाश्ता नौकरों को दिया करता। दिनेश नाश्ता घर ले आता और पत्नी के साथ खा लेता। 
     सब कुछ ठीक चल रहा था, पर अचानक शहर में कोरोना महामारी की चर्चा शुरू हुई। दुनिया के कई देशों के साथ कोरोना ने भारत को भी अपनी चपेट में लेना शुरू किया तो कर्फ्यू की चर्चा होती रही। बाद में जनता कर्फ्यू के साथ अचानक लॉकडाउन की घोषणा की गई तो मजदूरों-कारीगरों में भगदड़ मच गई। सरकारी नौकरों को तो घर बैठे-बैठे एक तारीख को वेतन मिलता, पर गरीबों का क्या! अचानक हुई पूर्णबंदी के कारण दिनेश के सामने कई प्रश्न खड़े हो गए। वह न गाँव जा सकता था और न ही शहर में घर का किराया दे सकता था। यद्यपि सरकार ने किराये के लिए जबरदस्ती न करने की बात की थी, फिर भी घर मालिक के बहाने सुनकर वह निरुत्तर होता। वह कोई पंजीकृत मजदूर भी नहीं था, जिन्हें सरकार सहायता करती। फिर भी डूबते को तिनके के सहारे की तरह सुमन ने सब कुछ संभालना शुरू किया। वह रोज चौका बर्तन करने जाती। उसी की कमाई पर घर चलता रहा। लॉकडाउन में सुमन को व्यापारी के संयुक्त परिवार ने चौका बर्तन के लिए काम पर बुलाया। वह रोज मास्क पहनकर काम के लिए जाती। पूर्णबंदी के कारण घर बैठे अमीर खाने के सिवा क्या काम करेंगे! सुमन पंद्रह-बीस लोगों का खाना बनाती, कभी कचोरी-समोसा, कभी ढोकला बनाती। काम करते-करते वह घर की औरतों की आपसी बातचीत सुनती तो दंग रह जाती। 
     "लॉकडाउन के बाद तो बढ़िया टूर पर जाएंगे आठ-दस दिनों के लिए।" 
     "फिर आठ दिन का खाना ?"
     "खाने की क्या चिंता है! यह बाई है न, साथ में ले जाएंगे इसे, ईमानदारी से काम करती है।" सुमन की ओर देखते हुए कोई स्त्री कहती तो वह मन ही मन खुश हो जाती। 
     दूसरे घर में भी इसी तरह की चर्चा सुनने में आती। बाजार बंद होने पर भी कोई ऑनलाइन स्विमसूट खरीदने की बात करते तो कोई कसरत के उपकरण का ऑनलाइन आर्डर देते, कहीं किसी घर में कुत्ते के लिए पेडिग्री, ब्रेड, टोस्ट, बिस्कुट ऑनलाइन मँगवाया जाता। सुनती तो सुमन दंग रह जाती। सोचती -"इन्हें गरीबों की कहाँ चिंता है, जब देखो तब मस्ती, जिम की ही चर्चा। लॉकडाउन में गरीबों को मजदूरी नहीं मिलती लेकिन इनके मुँह में ऑनलाइन खरीदने, घूमने की चर्चा, दूसरा कोई विषय ही नहीं। गरीब क्यों न जले इनपर!" फिर भी शांति से काम कर घर की ओर निकली। घर में कदम रखते ही चकित हुई। पति ने घर के सामने झाड़ू मारा था, खुद बर्तन माँजकर रखे थे। वह लेटा था। सुमन को लगा शायद खा कर सो गया होगा। खुद भी कुछ खाकर अनाज साफ करती रही। अचानक उसे पति की सिसकियाँ भरने की आवाज सुनाई दी। देखती तो क्या वास्तव में वह रो रहा था। सूप बाजू रखकर उसने पति को उठाते हुए पूछा, "क्या हो गया है अचानक, तबीयत तो ठीक है न!"
    दिनेश ने कुछ कहा नहीं पर सुमन को अपने सीने से लगा लिया। 
    "यह क्या हुआ है तुम्हें, इस तरह सिसकियाँ भरने का कारण तो बताओ। कुछ तकलीफ हो तो डॉक्टर के पास जाएंगे।" 
    "नहीं सुमन, मुझे कुछ नहीं हुआ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।" 
    "फिर इस तरह तुम्हारा रोना ?" 
    "मुझे माफ कर दे सुमन, मैं पति के लायक नहीं रहा!" कहते हुए दोनों हाथ जोड़ता रहा। 
    सुमन ने उसे अपनी बांहों में भरते हुए कहा , "तुम्हें मेरी कसम है, कुछ तकलीफ हो तो जरूर बताना। लॉकडाउन में रात के समय डॉक्टर घर के दरवाजे तक नहीं खोलते।" सुमन के मन में संदेह था, पति के कोरोना पॉजिटिव होने का। उसे अतीत याद आता रहा, गाँव में पूञ्जी के नाम से कुछ था भी नहीं। यदि कुछ भला-बुरा हो जाए तो शहर में दो-चार लाख से कम बिल नहीं होता। एक तो गरीबों की ओर किसी का ध्यान नहीं। पैसे ने मनुष्य को गुलाम बनाया है, मोबाइल ने मनुष्य को मनुष्य से दूर किया है, उसे अकेलेपन का शाप दिया है, कोरोना ने उसपर कहर बरपाया। संदेह के कारण लॉकडाउन में अकेलेपन के शिकार लोग किसी से मिलना भी नहीं चाहते। आखिर प्रवासी मजदूर परिवार में एक दूसरे का आधार है कौन? पति-पत्नी ही, यदि कुछ भला बुरा हो जाए तो....। वह सोचती रही। 
   "सुमन! तुझे याद है, मैंने वादा किया था, जन्मदिन के अवसर पर गहने खरीदने का। पर मैं वादा पूर्ण नहीं कर सका। आज तो घर भी तू ही चला रही है और मैं निठल्ला बैठे खा रहा हूँ। इस लॉकडाउन में सारे उद्योग-व्यापार बंद हैं। मजदूरों को काम से निकाल दिया गया है। हाथ में काम नहीं है। तुझे दिन-रात खटते देखता हूँ, सोचा आज तो मैं घर में स्वच्छता करूँ। गहने नहीं खरीद सका इसका मुझे खेद है। मुझे माफ कर दे सुमन!" 
    "इसमें माफ करने की बात ही क्या है! मैं तो भूल ही गई थी कि आज मेरा जन्मदिन है। देखो न, अनपढ़ होने का भी कभी-कभी फायदा होता है। मैंने तो कभी नकली गहनों का विचार भी नहीं किया है। नथूनी, टीका जैसे गहनों को मैं कभी असली मानती ही नहीं हूँ।"
    "सुमन! यह तू क्या कह रही है। मैंने तेरे लिए नकली गहने नहीं, असली गहने खरीदने का वादा किया था। "
     "तो फिर, मैं भी वही कह रही हूँ कि वह गहने मेरे लिए असली नहीं हैं।" 
    "फिर असली गहने कौन से हैं जो तू चाहती है?" 
    "मेरे लिए तो असली गहने मेरे राजकुमार हैं, राजकुमार दिनेश!" कहते हुए पति के हाथ अपने हाथों में लेकर चूमती रही। 
    "सुमन! यह क्या कह रही है ?" 
    "मेरा दिनू राजा! जीवन में सुख गहनों में नहीं है, सुख है खुश रहने में, जैसी भी परिस्थिति है उसमें खुश रहना। बात किसी के कमाने न कमाने की नहीं है, बात प्यार से जिंदगी बिताने की है तथा परिस्थिति से समझौता करने की है। कभी-कभी बढ़ती अपेक्षा मनुष्य को निराशा की खाई में धकेल देती है, जहाँ गिरने से वह कभी उभर नहीं सकता। मैं जानती हूँ कि मनुष्य के लिए गहने प्राण प्रिय हैं। चाहे पुरुष हो या स्त्री, प्रत्येक का जेवर पहनने का विचार भी स्वाभाविक है। इसमें किसी का दोष नहीं है। मैं यह भी भलीभांति जानती हूँ कि अलंकार ही मनुष्य के लिए सब कुछ नहीं है। घर में सोना होने पर भी चोरों के भय से नकली गहने पहनकर घूमने वालों को देखा है। यहाँ तक कि नकली गहनों को ही असली गहना मान कर पीछे पड़ने वाले और दिनदहाड़े जान मार कर गहने चुराने वालों की खबरें भी सुनने में आती हैं। पिछले सप्ताह ही चोरों ने किसी के घर में चुराया सोना नकली होने पर पोटली वापिस घर के सामने फेंककर कार को क्षतिग्रस्त किया। जिसके घर में जरूरत से ज्यादा गहने हो वे चैन की नींद सो भी नहीं पाते। अब तुम ही बताओ कि सुख किसमें है! अगर सही बात कहूँ तो पति-पत्नी के लिए सोना ही सब कुछ नहीं है, जीवन को स्वर्णिम बनाना ही बड़ी बात है। अब मैं नकली नहीं, तुम्हें ही असली गहने के रूप में स्वीकार करती हूँ।" 
    "सुमन! तेरा नाम ही सुमन नहीं है, मन भी सुमन है।" कहते हुए दिनेश ने डिबिया से मिश्री ली और पत्नी का मुँह मीठा कर दिया। बस, दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बहते रहे। ....दोनों ने सुखी होने का अर्थ समझ लिया था!
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