तीन कविताएँ

- प्रेरणा चतुर्वेदी

1. पिता

संतान के जीवन में पिता एक छत
पिता एक दीवार है,
बिना पिता ए दुनियावालों!
जीवन निराधार है।

ब्रह्मा सी करें सृष्टि रचना
विष्णु सा दें जीवनदान,
शिव समान संतान के
करें संघर्षों का करें विषपान।

बरगद सी छाँव हैं पिता आप
तुलसी सा पावन माना है,
मेरे लिए निभाए जो फर्ज आपने
मुझे वह कर्ज चुकाना है।
***


2. सच और झूठ

वह कहते रहे
सभा में चिल्ला कर कि
हम 'सच' कहते हैं,
और सच का स्वर कभी
धीमा नहीं होता।
सच कभी शर्मिंदा नहीं होता
और उनका चिल्ला कर कहा गया ,
झूठ 'सच' बना क्योंकि
झूठ सच के खाँचे में
ढालकर बोला जा रहा था।
इसीलिए न तो वह धीमा था
और न ही खुद पर शर्मिंदा।
***


3. नमस्कार

दोनों हाथ जोड़कर
सर झुका कर
विनम्रता पूर्वक किया गया
नमस्कार!
मेरे लिए एक ढाल की तरह है।
जिसका इस्तेमाल मैं
ऊँचे लोगों, पहलवान और
ताकतवर लोगों की
टेढ़ी नजर से
बचने के लिए करता हूँ।

मेरी नसों में बिजली
औ' रगों में खून दौड़ता है,
किंतु मजबूरी में, मैं
इस कुसंस्कारी समाज में
अपने संस्कारों को वहन करता हूँ।

इस लोकतंत्र में हम आजाद हैं
आजादी है अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता की
मगर सच्चाई के विस्फोट से बचने
औ' नरमुंडों के
विरोधी स्वर से डरकर
मैं भाषायी नाव में बैठकर
उनका हमख्याल होता हूँ।

इस रक्तरंजित माहौल में
दूसरों के बजाय मैं,
बिना शस्त्र के
स्वयं से युद्ध लड़ता हूँ।

मेरे लिए हर सुबह
दोमुँहे विषधर और भेड़ियों से
मुठभेड़ की बात है,
जबकि थकी हुई हारी जिंदगी
मेरे लिए शांति से
सोने की रात है।

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