डायरी: अर्थ अपने-अपने

आर बी भण्डारकर

आर बी भण्डारकर

8 जुलाई 2021

रात्रि का प्रथम प्रहर है, घड़ी में 9 बज रहे हैं।मैं आज की डायरी लिखने का उपक्रम कर रहा हूँ। आज का दिन बहुत व्यस्त रहा, सो दिन में डायरी लिख ही नहीं सका।

यद्यपि बरसात का मौसम है पर आज आसमान साफ है। शाम को पौत्री द्वय मिट्ठू जी, पीहू जी और दौहित्र ओम भैया जी के साथ छत पर घूमने गया था। इन नन्हे मित्रों के आग्रह पर हम सब लोग कुछ देर छत पर चटाई बिछा कर बैठे भी थे। उस समय मेरे इन तीन मित्रों ने आकाश, बादल, चंद्रमा और तारों के सम्बंध में इतने प्रश्न किये कि मुझे लगा कि इस परीक्षा में मैं अनुत्तीर्ण होने ही वाला हूँ पर बच गया; बच्चे बहल भी जल्दी जाते हैं न!

अनंत आकाश, उमड़ते-घुमड़ते, श्वेत, श्याम, धूसर बादल सब वर्णनातीत से। ...चाँद और तारे; सभी के लिए आकर्षक। बच्चों के लिए यह चंदा मामा हैं, कवियों के लिए नायिका का मुखमंडल। यही चाँद-तारे भूगोल वेत्ताओं, ज्योतिषज्ञों के लिए ग्रह, नक्षत्र, साहित्यकारों के सुंदरता के सर्वाधिक प्रिय उपमान होते हैं तो अंतरिक्ष विज्ञानियों के लिए जिज्ञासा और अनुसंधान के अनोखे आकर्षण और न जाने क्या क्या?

अभी आधा-पौन घण्टे पहले ही हम सब छत पर से लौटे हैं। बच्चे अपनी दादी, बुआ, अपनी अपनी मम्मा के पास चले जाते हैं। मैं अपने बैठक सह लेखनकक्ष में आकर डायरी लिखने में लगा हूँ।

लिखते-लिखते याद आया - काफी पुरानी बात है। गर्मियों के दिन थे, स्कूल की छुट्टियाँ हो गयी थीं, मैं अपने परम् मित्र के साथ उसके गाँव गया था। दिन भर खेले-कूदे - गुल्ली-डंडा खेला, छुवा-छुअउवल खेला, नीम के पेड़ की डाली पर झूले भी। भोजन के उपरांत रात में सब लोग आँगन में खुले आसमान के नीचे चारपाइयों पर लेटे। मित्र ने अपनी अइया (दादी) से कहानी सुनाने का आग्रह किया तो दादी ने हम लोगों को पहले लिड़इया (सियार) की कहानी "तोय परी है पट्टा की, मोय परी सरपट्टा की" फिर लुखरिया (लोमड़ी) की कहानी "खाऊँ तेरी खीचड़ी, खुजाउ मेरी पूँछड़ी" सुनाई। बहुत मजा आया। फिर अइया बोली कि "सुनौअल कहानी तौ हुइ गईं अब बुझौअल होंन दे।"

मित्र ने कहा-"हउ अइया, बूझौ?"

मैं आश्चर्य चकित हो कभी अइया का मुँह ताकता तो कभी मित्र का।

तभी अइया बोलीं, "बताव, आधी रोटी मनन मिथौरी?"

मैं सोचने लगा, अइया यह क्या पूछ रही हैं।

मित्र ने बताया कि अइया अपने कथन के बारे में पूछ रहीं हैं कि "आधी रोटी मनन मिथौरी" का आशय क्या है?

मित्र ने इशारे में अइया के प्रश्न का उत्तर मुझे बता दिया और कहा कि अइया को उत्तर बता दो। मैंने उससे कहा कि मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगा, उत्तर तुम्हीं बता दो।

मित्र, "अइया हम बताएँ उत्तर?"

अइया, "काये? तुमाए सलाई (मित्र) ने हारी मान लई का?"

मित्र, "हउ।"

अइया, "तौ बताउ?"

मित्र, "चन्दरमा और तरइयाँ।"

अइया, "सही बताया तुमने।"

सब लोग खूब हँसे।

आज सोचता हूँ - ओह! चन्दरमा और तारे गाँवों में, किसानों और गरीबों के लिए "रोटी" के भी प्रतीक हैं। मुझे स्मरण नहीं आ रहा है कि किसी कवि ने ऐसा सोचा हो।

अपनी अपनी सोच के मुताबिक अर्थ लेने के इस प्रसंग का जिक्र हुआ तो ऐसा ही एक प्रसंग और याद आ गया।

यह भी पुरानी बात है। मैं माध्यमिक या उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में रहा होऊँगा। तब विद्यालय के किसी एक कार्यक्रम में बहुत ही सहज स्वभाव वाले राजा साहब मछण्ड श्री रघुवीर सिंह जी (अब स्वर्गीय) ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने सम्बोधन में एक प्रेरक प्रसंग सुनाया था।

"चार यात्री किसी जंगल से गुज़र रहे थे कि उन्हें तीतर की आवाज़ सुनाई दी। एक यात्री बोला, बताओ तीतर क्या कह रहा है। एक यात्री जो पहलवानी का शौकीन था, बोला, "तीतर कह रहा है- 'दण्ड मुगदर कसरत।'" (अर्थात् कसरत का समय है दण्ड, मुगदर लेकर कसरत करो)। दूसरा यात्री जो शिकार का शौकीन था, तपाक से बोला, "यह नहीं कह रहा है; तीतर कह रहा है- 'दाल-रोटी ढक रख।'" (दाल और रोटी ढक कर रख दो, शिकार का समय है, शिकार करो)। तीसरा यात्री जो भक्तवृत्ति का था, बोला, "अरे भाई, ऐसा कुछ नहीं कह रहा है, तीतर कह रहा है-'सीता राम दशरथ।'" (हर समय ईश्वर का नाम लेते रहो)।

चौथे यात्री का कथन मुझे ठीक से स्मरण नहीं पर शायद उसका कथन था, "बंद करौ चक चक।"- अर्थात व्यर्थ के अंदाजे बंद करो और आगे बढ़ो।

व्याकरणाचार्यों ने भी कहा है कि अभिप्राय की दृष्टि से अर्थ दो प्रकार के होते हैं- वक्ता को अभिप्रेत अर्थ और श्रोता को अभिप्रेत अर्थ। कहने वाला जिस आशय से कहे यह आवश्यक नहीं कि सुनने वाला उसी आशय से ग्रहण करे।

गोस्वामी तुलसीदास जी की हर श्वास में भगवान राम बसे थे। भगवान राम के माध्यम से अपने अपने अर्थ के बारे में उन्होंने बहुत ही भाव पूर्ण कथन किया है-

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

सच है, कोई भी तत्त्व, घटक, कथन, आलम्बन (object)आपको वैसा ही दिखेगा, उसी तरह का समझ में आएगा जैसे कि भाव आपके मन मे स्थायी रूप से रचे-बसे हैं।

अचेतन से चेतन में आये इन प्रसंगों से मैं चमत्कृत हूँ। सबकी सोच के अपने-अपने दायरे, अपने-अपने मानक और अपने-अपने आदर्श हैं। और ये सब उपजते हैं, पनपते हैं, दृढ़ होते हैं परिवेश से।

अहा , कितना विविधता भरा है मानव जीवन!
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मिथौरी = मूंग की दाल की बड़ियाँ)
मनन = बहुत सारी।
चन्दरमा = चंद्रमा।
तरइयां = तारे

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