विदेशी धरती पर देशी धानी रंग - ‘‘केसरिया बालम’’

पुस्तक: केसरिया बालम (उपन्यास)
लेखिका: डॉ. हंसा दीप
प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी-322201, राजस्थान
मूल्य: ₹ 250.00

समीक्षक: बीना चौधरी


डॉ. हंसा दीप का तीसरा उपन्यास ‘‘केसरिया बालम’’ विदेश में पसरे देशी धानी रंग की कहानी है। नायिका धानी भारत में राजस्थान के ठेठ गाँव के संस्कारों में पली है। उसने अपने माँ-बाबासा के प्यार की शीतल छाया और उन्मुक्त वातावरण में एक विशेष भावुक प्रेम भरा व्यक्तित्व पाया। वही धानी विवाह के बाद विदेश जाकर अपने व्यक्तित्व की सुवास चारों ओर बिखेरती है। पति और उसके प्रेम से युक्त घर संसार को अपनी संपूर्ण दुनिया समझने वाली धानी जब बाहर की दुनिया में कदम रखती है तो वहाँ भी प्रेम, परिश्रम और अपनेपन से बरबस ही सबको अपना बना लेती है। उसका सहज परिश्रमी निश्छल व्यवहार सबको अपने स्नेह की डोर में बाँध लेता है।
प्रेम का जज्बा उसके अपने परिवार को पूर्णता प्रदान करता है। परिश्रम से वह अपने कार्य स्थल पर प्रगति करती है और सेवा से वह अपने बिखरे परिवार को फिर से नए रूप में पा जाती है। केसरिया बालम के इस कथ्य को लेखिका ने गहन मनोवैज्ञानिक, मानवीय और आँचलिक पुट देकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। शृंगारिकता के साथ, अलंकृत और प्रभावी भाषा शैली ने इसे सशक्त और सटीक रचना में तबदील किया है।

‘समर्पण लो सेवा का सार, सजल संसृति का यह पतवार’ प्रसाद की ये पंक्तियाँ इस उपन्यास की नायिका धानी के व्यक्तित्व के रेशे-रेशे में समाई हुई है। ‘इस देने में कुछ और नहीं, केवल उत्सर्ग छलकता है। मैं दे दूँ और न कुछ लूँ इतना ही सरल झलकता है’- प्रसाद की इन पंक्तियों को डॉ. हंसा दीप ने धानी के रूप में साकार किया है। प्रेम का ढाई अक्षर जितना सहज और कोमल है उतना ही गंभीरता और दृढ़ता देता है। सहज और तन्मय प्रेम किसी व्यक्तित्व को दृढ़ता देकर और उदात्त बना देता है, जबकि अहं से युक्त प्रेम विकृत और पतनशील बना देता है। प्रेम में अहं का आना नीचे ही गिराता है, सहजता सरलता सब समाप्त हो जाती है।

बीना चौधरी
इस उपन्यास की खासियत यह है कि लेखिका अपने विविध चरित्रों के माध्यम से पारिवारिक मूल्य व संस्कार आज की युवा पीढ़ी को देना चाहती है। युवा पीढ़ी प्रेम करे तो निस्वार्थ हो, समर्पण के साथ हो, परन्तु यदि कहीं स्वयं के साथ अत्याचार हो रहा हो, तो उसका प्रतिकार भी हो लेकिन दुश्मनी की भावना के साथ नहीं वरन् प्रेम से सुधारवादी भाव लेकर। वर्तमान समय में स्त्रीविमर्श का आशय उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण से ही लिया जा रहा है जो कि एकांगी पक्ष है। वस्तुतः चारित्रिक और नैतिक प्रबलता भी हो तो स्त्री अधिक सशक्त हो सकती है। और यदि उसमें भारतीय नारी के सेवा व समर्पण रूप को भी समाविष्ट कर दिया जाये तो उसका स्वरूप अप्रतिम हो जाता है। यही रूप इस उपन्यास के स्त्रीविमर्श का है जहाँ धानी के रूप में स्त्री अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण रखती है, आर्थिक रूप से निर्भर है और प्रेम, समर्पण तथा सेवा के माध्यम से अपने परिवार को एक रूप प्रदान करती है। लेखिका ने उसकी बेटी के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार का दिशा दर्शन भी दिया है।

कुल मिलाकर इस उपन्यास की यह सकारात्मकता आज की नितांत आवश्यकता है। विविध मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण उपन्यास के ताने-बाने को एक विशेष स्वरूप प्रदान करते हैं, जैसे- “किसी असहाय, गरीब की मदद करके बहुत संतुष्टि मिलती है; धानी अपना अतिरिक्त समय निकालकर बचा हुआ खाना फूडबैंक पहुँचाती है, जिससे उसे राहत और संतोष मिलता है।” “मन की दुविधा को तो हटाया जा सकता है, पर जब किसी के मन में भूसा भरा हो तो उसे क्या कहा जाए?” “इंसान को लगता है कि वह अपना गम भूलने के लिये पीता है पर सच तो यह है कि पीकर वह अपने गम को और ज्यादा याद करता है।” “जब शारीरिक प्रताड़ना की शिकार स्त्री के मुकदमे में कोर्ट में एक बहस होती है तब कोई नहीं जानता कि पीड़ित को उससे और अधिक पीड़ा मिलती है।”

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ ही मानवतावादी दृष्टिकोण उपन्यास के हर मोड़ पर पसरा है जैसे - बेकरी में बचा हुआ खाना फेंकने के बजाय फूडबैंक को देने जाना, माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति का उपयोग अस्पताल में कमरे बनवाकर परोपकार के कामों में लगाना, अलग-अलग देशों से आए सहकर्मियों के नाम अपनत्व और मैत्री की भावना से पारिवारिक वातावरण बनाना। इसी तारतम्य में लेखिका ने सिद्ध किया है कि जीवन के माधुर्य की चाबी कठोर परिश्रम, अपनापन और स्नेहमयी मुस्कान है।

विदेशी वातावरण और भारतीय वातावरण का तुलनात्मक रूप प्रस्तुत करते हुए भी सहज प्रेम व अपनत्व का संदेश है। राजस्थानी अंचल की संस्कृति को भी बखूबी प्रस्तुत करते हुए वहाँ के वैवाहिक रीति रिवाजों के साथ कुछ लोकगीतों का प्रयोग उपन्यास में माधुर्य की वृष्टि करता है। यही नहीं इसी के साथ कनाड़ा व अमेरिका की संस्कृति, वहाँ के स्कूल की बहुसांस्कृतिक गतिविधि की झलक भी है। लेखिका ने केसरिया भात की भीनी-भीनी खुशबू के साथ राजस्थानी शक्करपारे बनाने की विधि देकर हर घर में उसे पहुँचाने की कोशिश की है।

उपन्यास के भावनात्मक विन्यास में शृंगारिकता का पुट कथानक को रससिक्त करता है। ठेठ राजस्थानी कहावतें और अंलकृत भाषा शैली इसे सरस अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं- “बड़ी होती बेटी अपने पिता के हृदय में एक पौधे सी उगने लगती है शायद।” “ठीक वैसे ही जैसे रंगों से भरे तालाब में किसी चिड़िया ने डुबकी लगा दी हो।” “धरती सा बन खुद भीगते रहना और बाली का अनन्त आकाश के बीच अनन्त बादल सा निरंतर बरसते रहना।”

अनेक स्थलों पर अलंकार से भाषा सध गई है- ममता के सागर में डुबकियाँ लगाना, मन की चिमनी से निराशाओं का धुआँ उठना, दूध की तरह फटना आदि। ठेठ राजस्थानी भाषा में रंगी कहावतें भी अपना सरस प्रभाव देती है- “दीये के नीचे अंधेरा होवे है पर औरों को तो उजाला ही मिले है उससे।“ ‘कैसी गुणवत्ता है मिट्टी की, जिस आकार में ढालो उसमें ढल जावे, लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व को बचाकर ही रखे। बेटियाँ भी तो वैसी ही होवे हैं मिट्टी जैसी, पराए घर में जाकर वैसी ही ढल जावें।”

इन देशी प्रयोगों द्वारा आञ्चलिकता की मीठी फुहारें शीतल करती हैं। वातावरण एवं पात्रानुकूल अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग प्रभावशाली है। इनके साथ ही विशिष्ट शब्दावली भाषा में विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करती है जैसे - कुँवारी कल्पनाएँ, कल्पनाओं का अनुवाद, सुरमयी स्वर आदि। यह उपन्यास पूर्वदीप्ति पद्धति याने फ्लेश बैक शैली में लिखा गया है।

उपन्यास के अंत में कोविड-19 का प्रभावकारी उल्लेख और कथाक्रम से उसका तालमेल बैठाना प्रभावशाली बन पड़ा है। भविष्य में आने वाली पीढ़ियाँ इसमें इतिहास के तत्व पाएंगी और यह ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाएगा। लेखिका को हार्दिक शुभकामनाएँ।

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समीक्षक: डॉ. बीना चौधरी
75, विकास नगर 14/2, नीमच 458-441 (मध्य प्रदेश)

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