अभिव्यक्ति और अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।

एक नन्हा सा शिशु जब अपने अधरों पर मुस्कान बिखेरता है, तो सहज ही किसी व्यक्ति को क्या बोध होता है? वस्तुतः इस विहंगम दृश्य को प्रथमतः जो देखता है, उसके भीतर का आनंद अप्रतिम होता है। उसके भीतर बच्चे की मुस्कान के साथ अंतस में उत्पन्न हो रही खुशी को कदाचित कोई माप सकता है, क्योंकि वास्तव में, यह अभिव्यक्ति तो अहिंसक और प्रेम पर आधारित है। इसी प्रकार एक चिड़िया अपने बच्चे को दाना चुगा रही हो, उसे भी देख लोग अभिभूत होते हैं। यह दोनों तस्वीरें एक संवेदनशील और प्राणियों से प्रेम करने वाले व्यक्ति के लिए आनंद की विषय हैं। लेकिन, जिसे देखकर व्यक्ति आनंदित हो रहा है, उसे इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि उसे देख कोई आनंदित हो रहा है। किंतु, यह एक अभिव्यक्ति है जिससे व्यक्ति कुछ सुखद अनुभूति कर आनंदित होता है। यह एक प्राकृतिक--नेचुरल अभिव्यक्ति है। सहज अभिव्यक्ति किसी के भी सुख का कारण बनती है। इसके अब दूसरे पक्ष पर विचार करें कि अभिव्यक्तियाँ आनंद से कब दुःख में परिवर्तित हो जाती हैं? मुझे लगता है कि मनुष्य के कृत्रिम बनने की अवस्था में अभिव्यक्तियाँ दुखद हो जाती हैं। मनुष्य यदि सहज रहे तो ऐसी स्थितियाँ आएंगी ही नहीं। यह इसलिए हम कह पा रहे हैं क्योंकि जो श्रेष्ठ ऋषि, मुनि या तपस्वी लोग या संत हमें मिलते हैं वे भी सहज से सहज हो जाते हैं। उनका संसर्ग तो मिले। सवाल यह है कि फिर क्या बीच का इंसान असहज जीवन ज्यादा जीता है और अपने लिए और दूसरों के लिए उसके आचरण या उसकी अभिव्यक्तियाँ दुःख का कारण बन जाती हैं? बहुधा, यह देख गया है कि तृष्णा और आडंबर दुःख की जननी हैं और मनुष्य के असहज व्यवहार इन्हीं से उपजते हैं जो जीवन को नरक बना देते हैं।

अहिंसक अभिव्यक्ति मनुष्य के सहजबोध का हिस्सा होती है। इसीलिए, एक समय प्रकृति में असहज चीजें अपना अस्तित्व खो देती हैं। अहिंसक चीजें टिकाऊ होती हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि अहिंसक व्यवहार, क्रियाशीलता में व्यक्ति भावप्रवण होकर निर्विकार भाव से मनुष्योचित या प्राणी-प्रकृति हितकारी अचार-विचार व व्यवहार करता है। मनुष्य के भीतर प्रेम की श्रेष्ठ संकल्पना अहिंसक वृत्तियों से ही देखी गई हैं। यह मनुष्य की वृत्तियाँ मनुष्य को उदात्त बनाती हैं जिससे मनुष्य दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखता है और उसमें दया की असीम संवेदना जागृत होती हैं। दया और उदारता मनुष्य के अच्छे गुणों की जीवन शैली हैं। किंतु विडंबना यह है कि इस शैली का अभाव है। इस अभाव की वजह से मनुष्य सही दिशा में न सोच पाता है, और न ही कुछ ऐसा कर पाता है जिससे उसके गुणों को लंबे समय तक स्मरण रखा जाए। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दुनिया में किंचित लोग ही अपनी छवि सबके मानस पटल पर छोड़ पाते हैं। अभिव्यक्तियों में हिंसा का आधिक्य किसी भी सभ्यता के पतन का कारण बनता है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक इंसान में एक अभिव्यक्तिपूर्ण व्यक्ति मौजूद होता है। अभिव्यक्ति तो मनुष्य और पेड़-पौधे भी करते हैं, किंतु मनुष्य और अन्य में अंतर यह है कि मनुष्य की अभिव्यक्ति दूसरे मनुष्य और प्रकृति को ज्यादा प्रभावित करती हैं। वे मारक भी होती हैं और पोषक भी। इन अभिव्यक्तियों का मनोवैज्ञानिक असर होता है। फर्ज़ करें कि कोई पर्वत भी कुछ व्यक्त कर रहा है जैसे उसकी दृढ़ता उससे व्यक्त हो रही है। यह दृढ़ता मनुष्य में भी विद्यमान होती है, किंतु अंतर यह है कि मनुष्य ऊंच-नीच के भाव व्यक्त कर सकता है, अवसर आने पर और उसका प्रभाव भी होगा किंतु पर्वत नहीं ऐसा करते। यह बहुत ही अच्छा उदाहरण है समझने के लिए। मनुष्य के जुबान से निकली ध्वनि कब हिंसक हो सकती है, और दूसरे के लिए पीड़ादायक हो सकती है यह मनुष्य की अभिव्यक्तियाँ ही भावबोध कराती हैं।

अभिव्यक्ति की सार्वभौमिक भाषा भी होती है लेकिन विडंबना यह है कि इन सार्वभौमिक भाषाओं को अभिव्यक्त ज्यादातर लोग नहीं करते। करुणा, प्रेम और दया, सहृदयता, परोपकार और सहिष्णुता, सेवा-सुश्रुषा, सहयोग और समर्पण यदि हमारे अभिव्यक्ति के सार्वभौमिक मूल्य बन जाएं तो हिंसा को कोई जगह नहीं मिलेगी। सार्वभौमिक भाषाओँ के भी अपने मूल्य होते हैं लेकिन उनकी अभिव्यक्ति उस मात्रा में ही हो रही है जितना हम नकारात्मक अभिव्यक्ति के बारे में कल्पना कर सकते हैं, अपितु कहीं ज्यादा हो रही है, नहीं तो जीवन की जो निरंतरता है, सातत्यता है वह बचे ही नहीं।

अभिव्यक्ति के सार्वभौमिक क्रियाएं तो सार्वभौम ही हैं। जैसे सुख, दुःख, भय, घृणा, क्रोध, अवमानना और आश्चर्य तो सभी जगह के मनुष्यों में सार्वभौम रूप से विद्यमान हैं। इसमें सुख का आधार तो प्रेम है और दूसरी अभिव्यक्तियाँ अन्य-बोध के साथ ज्यादा रहे हैं, इसलिए हम पाते हैं कि सार्वभौमिक रूप से संघर्ष हमें ज्यादा देखने को मिलते हैं क्योंकि जो अवयव या स्वाभाव ज्यादा लोगों में मिलेंगे वह दिखेगा ज्यादा। लेकिन इसमें हर प्राणी को सुख की चाहत होती है और उसका आधार प्रेम है। प्रेम का आधार तो करुणा और दया है। इसलिए इनकी तासीर ऐसी है कि इनसे कोई मुक्त होकर अन्य स्वभाव को अतंतः स्वीकार नहीं कर पाता इसलिए अभिव्यक्ति के सार्वभौमिकता भी वही लोगों द्वारा अभिमंत्रित या स्वीकृत की जाती रही जिसमें सबसे ज्यादा प्रसन्नता हो। जब हम गतिशील और भावनात्मक होते हैं तो हममें प्रेम का प्राकट्य होता है।

इस प्रकार अभिव्यक्ति केवल लोगों की बातचीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती है अपितु कई मनोवैज्ञानिक इस पर अपने-अपने तरीके से विचार करते हैं। कलावादी लोग अभिव्यक्तियों को कलाओं में खोजते हैं किन्तु युद्धक्षेत्र में योद्धा किसी लड़ाकू सैनिक के कौशल को अभिव्यक्ति मानता है, कोई नृत्य या संगीत का व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति और अपने संगतकार या अभिनेता की अभिव्यक्ति के साथ तादात्म्य बनाता है किन्तु सार्वभौमिक अभिव्यक्ति के मूल्य लोककल्याणकारी और सर्वजनहिताय होते हैं, इसे विशुद्ध अहिंसक अभिव्यक्ति के रूप में हम लेते हैं। सैनिक तो युद्ध क्षेत्र में अपनी विजय पर केन्द्रित चेष्ठा करेगा और इसका हिस्सा बनते हुए किसी भी दशा में की जा रही हिंसा पर विचार नहीं करेगा तो उसकी अभिव्यक्ति को तो हम हिंसक अभिव्यक्ति ही कहेंगे। किसी भी प्रकार की हिंसा कभी अहिंसक होने की दावा करे तो वह तो कोई भी उस रूप में स्वीकार नहीं करेगा।

अहिंसा की अभिव्यक्ति हमारे सामान्य व्यवहार में आनी चाहिए। यह व्यवहार केवल मनुष्य तक नहीं अपितु प्रकृति के प्रति हमारे लगाव और अन्य जीवों के प्रति हमारे व्यवहार अहिंसक अभिव्यक्ति करते हैं। पेड़ लगाना भी अहिंसक अभिव्यक्ति है। किसी घोसले से गिरे गौरैया के बच्चों को घोसले में पहुंचा दें, अहिंसक कार्य संपन्न हो गया। किसी रुग्ण व्यक्ति को चिकित्सालय पहुँचा दिया गया या उस रुग्ण व्यक्ति को चिकित्सा के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ दिया गया तो वह अहिंसक प्रवृत्ति के रूप में ही लिया जाएगा। गाँधी जी ने परचुरे कुटी में कुष्ठ रोगी की सेवा करके वह अपने हिस्से की करुणा को प्रकट कर रहे थे। अहिंसक व्यवहार प्रदर्शित कर रहे थे। क्रोध को शांत कर लेना भी अहिंसक अभिव्यक्ति है। इस प्रकार हमारे जीवन के नानाप्रकार के व्यवहार जो अहिंसक अभिव्यक्ति के उदहारण हो सकते हैं, उसे कदाचित मनुष्य-योनि में आने वाले लोग जीवन का हिस्सा बनाएं तो हमारे अहिंसक अभिव्यक्तियों के एक से बढ़कर एक उदाहरण बनते जाएंगे। मनुष्य को अभिव्यक्ति और अभिव्यक्त करने का सबसे अधिक अवसर मिला है। वह इसको अपने जीवन का उपहार माने तो हिंसा की राह पर जाएगा ही नहीं। मनुष्य की सहजता, विनम्रता, करुणा, प्रेम, सहिष्णुता, उदारता आदि विनयशील अभिव्यक्ति के लिए अचूक निर्णय हो सकते हैं किन्तु वह इसे सहज भाव से स्वीकार करे और अपने जीवन में उतारे, तभी यह संभव है।

अभिव्यक्ति का आत्मवत होना और दूसरों के लिए की गई अभिव्यक्ति हिंसक न हों इसके लिए मनुष्य यदि प्रयास करे तो उसका आत्मसाक्षात्कार भी हो जाता है। इस प्रकार नैतिक और मूल्यगत होने का माध्यम भी अभिव्यक्तियाँ ही बनती हैं। इस अभिव्यक्ति के विषय में राजेश जोशी ने लिखा था अंधेरे में' को मात्र कवि की खोई हुई परम अभिव्यक्ति की खोज आख्यान नहीं माना जाना चाहिए। वह व्यक्ति और एक पूरे समाज की खोई हुई परम अभिव्यक्ति, जो वस्तुतः एक-दूसरे से अभिन्न है और एक के बिना दूसरे को पाया ही नहीं जा सकता, को पाने और उसके रास्ते में आने वाले व्यवधानों और संघर्षों का महा-आख्यान भी है। मुक्तिबोध ने लिखा था-अनखोजी निज समृद्धि का वह परम उत्कर्ष/परम अभिव्यक्ति/मैं उसका शिष्य हूँ/वह मेरी गुरु है/गुरु है!

शास्त्रों को मनुष्य की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। यह बात अलग है कि शास्त्र अहिंसक अभिव्यक्तियों को रेखांकित करते हुए हिंसा के विभिन्न आख्यानों को कहते हैं। यह तो मनुष्य का दायित्व है कि वह अहिंसक सभ्यता के प्रति आग्रही हो। हमारे धर्म, संस्कृति, मान्यताएँ और इतिहास हमारी अभिव्यक्तियों के भंडार हैं। इन सब में गहरे उतरकर जब हम अभिव्यक्तियों का विश्लेषण करेंगे तो हम अभिव्यक्तियों के मर्म और अहिंसक अभिव्यक्तियों की अच्छाइयों को समझ सकते हैं। किसी पुनीत जीवन को अभिव्यक्त करने के अनेक द्वार हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हमारी अभिव्यक्तियाँ दूसरों की पीड़ा का कारण न बनें। इसके लिए हमारी प्रज्ञा और सही गुरु हमारे मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। जिनके गुरु अच्छे मिले उन्होंने इस भूमंडल पर अपना इतिहास बहुत ही सात्विक तरीके से रचा है। उनकी अभिव्यक्तियाँ वरेण्य रही हैं और उसे आत्मसात कर बहुत से लोगों ने अपने जीवन को नए तरीके से सृजित भी किया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन जीने के साथ प्रत्येक पल अपना और अपनी अभिव्यक्तियों का मूल्यांकन करें। यह मूल्यांकन किसी व्यक्ति, संस्था, राज्य सभी को करना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो हम एक स्वस्थ और प्रसन्नचित प्रकृति एवं वातावरण को नए सिरे से परिभाषित कर सकेंगे।
पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
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