काव्य, प्रभा मुजुमदार

प्रभा मुजुमदार
प्रतीक्षा

मैं सूखी तप्त 
दहकती, 
आकुल धरती-सी, 
इंतजार करती हूँ 
बारिश की बूंदों का। 

देह पर उभर आई 
असंख्य दरारों को 
से दरकती,
मृतप्राय परतों,
पथरीली, कंटीली, रूखी सतहों पर
अमृत का लेप लगाने। 

यादों के मुर्झाए पीलेपन को
हरियाली से जगाने, 
रुके-थमें-सूख गए आँसू 
बारिश की बूंदों संग बह जाने......

बंजर मिट्टी में
सौंधेपन का अहसास महकाने, 
सूखे दरख्त में फूंट आई 
नई  कोंपलों का उत्सव मनाने 
इन्द्रधनुषी पंखों के सहारे 
स्वप्न लोक में विचरने....

आसमान की ओर ताकती हूँ 
बदलियों से करती हूँ मनुहार 
हवा की खुशबू में 
दिशा की पहचान ढूंढती हूँ 
बादलों की गड़गड़ाहट में 
आहट सुनती हूँ  
दमकती बिजलियों की तेजी  में
उजास ढूंढती हूँ। 
 


प्रतीक्षा

पलक पाँवड़े बिछा कर 
प्रतीक्षा करती हैं आँखे 
न मालूम कितने युगों से
आगत की अनिश्चितता तक। 

कभी पथरा जाती हैं आँखें
इंतजार की घड़ियाँ 
लंबी, अंतहीन सी.... 
मन का उद्वेग 
आंसुओं में बहता है। 
चिंता, आशंका, बैचेनी के साथ,
उपेक्षा का दंश 
भीगी संवेदनाओं को
चट्टानों सा सख्त कर देता है, 
उत्साह उमंगों के झरने में  
जम जाती हैं बर्फीली परतें। 

एक अरसे के बाद
मद्धिम पड़ जाती है
अपनेपन की आँच। 
खत्म हो जाती हैं जिज्ञासाएँ, 
यादों की पगडंडियों में 
कुलांचे भर कर
फिर फिर उसी अहसास को जीने की आकांक्षा 
वर्तमान की जरूरतों 
हालत के दबावों को स्वीकार कर लेती है, 
ओढ़ी व्यस्तता और 
निर्विकारता का जामा पहन लेती है। 

इतना सब होने के बाद भी 
कहाँ खत्म होती है प्रतीक्षा 
बार बार, कितनी बार 
कोई झुठला सकता है 
अपने को।

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