व्यंग्य: तीन सौ चौंसठ दिन अंग्रेजी दिवस

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


भारत की आत्मा की भाषा है हिंदी। पिछले दिनों हिंदी प्रेमी इसका एक दिवसीय श्राद्ध मना कर अपने धंधे लग गए। अब धरतीपंथी कह रहे हैं कि आज अंग्रेजी दिवस है। पातालपंथियों ने कहा है, अंग्रेजी दिवस तो कल भी था तो आकाशपंथी क्यों चुप रहें, वे ट्वीट पर ट्वीट कर रहे हैं कि अंग्रेजी दिवस कल भी रहेगा। हिंदी टीवी चैनलों पर इसी का घमासान मचा है, एक दिन हिंदी दिवस, शेष तीन सौ चौंसठ दिन अंग्रेजी दिवस।

गांधी जी ने कहा था अंग्रेजों भारत छोड़ो, आज्ञाकारी अंग्रेज भारत छोड़ गए। वे अपनी भाषा और संस्कृति यहीं छोड़ गए, छद्म लाट साहबी संस्कृति। उन लाट साहबों से पुरस्कारों की चिंदी पाकर हिंदीसेवी बहुत खुश हैं। हजारों बहुरूपियों को हिंदी-रत्न, हिंदी-भूषण, हिंदी-भक्षक जैसी रायबहादुर उपाधियाँ शाल और लिफाफे के साथ मिल गई हैं। अब पूरे साल उन्हें हिंदी सेवा के बहाने पुरस्कारदाताओं की सेवा के नए जुगाड़ बिठाने हैं। दूसरी और सरकारी संस्थाओं के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष अपनी हिंदी कुर्सी से इतनी मजबूती से चिपके हुए हैं कि उन्हें नीचे खींचने वाले पसीने-पसीने होकर फर्श पर बैठ गए हैं। बुड्ढा कब सिधारे और कब वे हिंदी नाम की चुनरिया ओढ़ लें। आपको हिंदी के जादुई आँकड़ों वाले और दिन दूने, रात-चौगुने होने वाले करिश्मों की हकीकत जाननी हो तो किसी भी बड़े अधिकारी, महान्यायाधीश या सुख्यात कंपनी के मुखिया की टेबल पर पड़ी कुछ फाइलें खोल लीजिए। उनके दस्तखत और सील-सिक्के हिंदी में जरूर मिल जाएँगे पर बाकी मजमून गरिमामयी अंग्रेजी में ही होगा। कहने को हिंदी राजभाषा है, पर आचरण में बादभाषा है। बाद-भाषा मतलब अंग्रेजी के बाद। देश अपना, सरकार अपनी, भाषा पराई। देश स्वतंत्र, राजभाषा गुलाम। संविधान अपना, उसके व्याख्याकार विदेशी जबान बोलने वाले। यह कैसा जनतंत्र है जहाँ एक प्रतिशत अंग्रेजी मानसिकता वाले, शेष निन्यानबे प्रतिशत जनता पर राज करते हैं। सच कहूँ तो भारत में हिंदी शोषितों के आंदोलनों की भाषा है, नारों की भाषा है, भीड़ इकट्ठा करने की भाषा है। इसके उलट अंग्रेजी सत्ता की भाषा है, श्रेष्ठि वर्ग की भाषा है, भीड़ को भेड़ बनाए रखने वाले हुक्म की भाषा है। समर्थ देश की असमर्थ जनता और वंचित राजभाषा।

भारत में हिंदी देवी की तरह प्रतिष्ठित है पर उस मंदिर के कपाट बंद है। ये कपाट ढोल, ढमाकों और श्राद्धोत्सव के साथ साल में एक दिन खुलते हैं। शाम को झंडा उतरता है और हिंदी भी अपने जीर्ण पिटारे में बंद हो जाती है। पिटारे पर अंग्रेजीदां अधिकारी कुंडली मारकर बैठे हैं। वे फूँफकार कर कहते हैं “अंग्रेजी नहीं तो भारत खंड-खंड हो जाएगा। अंग्रेजी हमारी संपर्क भाषा है, हमारे मौलिक सोच की भाषा है।” ‘हमारे’ के इस अर्थ में जनता नहीं है। बस बड़े और उनके डिप्टी, नौकरशाह हैं। वे जनता का दुख-दर्द अंग्रेजी में समझ सकते हैं परंतु जनता हिंदी में चीखे-चिल्लाये भी तो वे नहीं समझ पाते। महँगी स्कूलों में पढ़े ये लोग तभी कमा सकते हैं जब उनकी अंग्रेजी राज की भाषा हो, राज करने की भाषा हो, भले नाम की राजभाषा हिंदी रहे। जिस दकियानुसी संस्कृति में गौरवर्णी लोगों का खून राजसी माना जाता है वहाँ अंग्रेजीभाषियों को भी बुद्धिमान माना जाता है। मानने का यह पैमाना बनाने वाले लोग भी वे ही हैं जो सत्ता की कुर्सी से चिपके खड़े  हैं। एक दिन हिंदी दिवस मनता है तो हिंदी विरोधियों को लगता है कि हिंदी उन पर थोपी जा रही है। शेष तीन सौ चौंसठ दिन अंग्रेजी जो दौड़ती रहती है, कोई नहीं कहता कि उसे भारत की जनता पर थोपा जा रहा है। इस गुलाम मानसिकता से ग्रस्त कौन है हम सब जानते हैं, पर जय हो कथित हिंदी सेवियों की। वे गली-मोहल्ले से लेकर अंतरराष्ट्रीय कचरा पुरस्कार कबाड़ने में लगे हैं। हिंदी का एक मौलिक वाक्य सही लिख पाना वे नहीं सीख पाए, किंतु पुरस्कारदाताओं की जय-जयकार करने में वे पारंगत हैं। उनकी झूठी कीर्ति की खुशबू उनके पीठ फेरते ही वातावरण में सड़ांध मारने लगती है। उनकी बुराइयाँ बखानने के लिए उनका विरोधी होना जरूरी नहीं है, किसी से भी पूछ लीजिए। कागजी महिमा बटोरने वाले ऐसे लोग जब अगाध कवि-सम्मेलनों, अविरत व्याख्यानमालाओं, और अखंड महिमा-पाठ के विश्व रिकॉर्ड बनाने के करतबों से ऊपर उठेंगे तो चिंदी-चिंदी हिंदी मजबूत बनेगी।

हम दिवस मना कर वास्तविक ध्येय की बलि चढ़ा देते हैं। हम एक दिन हिंदी दिवस मनाते हैं ताकि अगले हिंदी दिवस तक हिंदी नेपथ्य में रहे। इसलिए यदि हम सचमुच हिंदी प्रेमी हैं और दिवस ही मनाना है तो किसी एक दिन इंगलिश डे मना लें। फिर, शेष तीन सौ चौंसठ दिन हिंदी में काम और हिंदी का काम होने की शुरुआत हो सकेगी।
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