इतिहास की भूलों की ओर इशारा करता काव्य संग्रह: प्रताप महान

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक: प्रताप महान (काव्य संग्रह)
लेखक: विनोद बब्बर
पृष्ठ: 104
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2017
प्रकाशक: अरावली प्रकाशन, पोस्ट-वीरपुर, हिम्मतनगर, (गुजरात)


राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत/ सम्मानित, राष्ट्रवादी विचारधारा के पोषक, प्रखर चिंतक, मनीषी, 18 वर्ष से राष्ट्र किंकर के संपादन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार श्री विनोद बब्बर जी अनेक भाषा एवं बोलियों के जानकार, हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के प्रबल पक्षधर तथा पूर्वोत्तर भारत में लिपि रहित बोलियों को देवनागरी लिपि से जोड़ने के अभियान में गत दो दशक से अधिक सक्रिय भूमिका निभाते आ रहे बब्बर जी ने अब तक 18 देशों की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं की हैं, इनकी प्रकाशित 37 पुस्तकों में से 8 पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है साथ ही देश के 5 विश्वविद्यालयों में इनके साहित्य पर शोध कार्य हो चुके हैं। इनकी पुस्तक-‘प्रताप महान’ पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला। इस पुस्तक को विद्वान रचनाकार ने महाराणा प्रताप की 17वीं पीढ़ी कारोई के वर्तमान महाराज श्रीयुत् श्री शिवदान सिंह जी को समर्पित किया है।

पुस्तक में अलग-अलग शीर्षकों से 21 पद्य रचनाओं को समाहित किया गया है। पहली रचना का शीर्षक -‘माटी है बलिदान की’ रखा गया है जिसमें मेवाड़ के कण-कण में वीर जवानों के शौर्य और स्वाभिमान की गाथा लिखी हुई है तो अपने ही राष्ट्र के प्रति गद्दारी करने वालों का भी इसमें उल्लेख मिलता है। यहाँ बप्पा रावल, सांगा, झाला और राणाप्रताप के शौर्य के गुणगान के साथ ही साथ महाराणाप्रताप के अश्व की वफादारी का भी उल्लेख किया गया है। रानी पद्मावती के जौहर, मीरा की भक्तिभावना और श्रीनाथ जी के प्राकट्य, सभी का उल्लेख राष्ट्रवादी रचनाकार श्री विनोद बब्बर जी ने अपनी लेखनी से संग्रह की प्रथम कविता- ‘माटी है बलिदान की’ में समाहित कर दिया है-
इस धरती का कण-कण गाता
गाथा वीर जवानों की
रेत के टीले कहें कहानी
शोणितमय बलिदानों की। (पृष्ठ-19)

संग्रह की दूसरी रचना का शीर्षक ‘प्रणाम’ है जिसमें प्रखर मनीषी श्री विनोद बब्बर जी ने अपने अन्तस की गहराई से वीरों को, वीरों के शौर्य को, शौर्यभूमि चित्तौड़, उदयपुर और अरावली को महाराणाप्रताप के अश्व चेतक को तथा हल्दीघाटी आदि सभी को नमन करते हुए अपनी शृद्धान्जलि अर्पित की है-
 
वीरों की चिर शौर्य धरा को
अपना शीश नवाता हूँ
यशोगान को गा-गाकर
निशदिन मैं हर्षाता हूँ। (पृष्ठ-21)

‘गाथा वीर प्रताप की’ तथा ‘सुन लो तुम गौरव गाथा’ संग्रह की तीसरी और चौथी रचना हैं जिनमें श्री विनोद बब्बर जी ने राणा प्रताप के जीवन चरित्र की वास्तविक तस्वीर दिखाकर नई पीढ़ी में ओज उत्पन्न करके उन्हें जाग्रत करने का प्रयास किया है-
अकबर ने किए उपाय सभी, पर सारे ही बेकार हुए
पद,रुतवा,धन,दौलत विवेक, के पासे सभी लाचार हुए 
शाही दरवार हुआ भौचक, पर वीर बांकुरा रुका नहीं
गर्वीले मानी का मस्तक, शत्रु के सम्मुख झुका नहीं
उस महावीर बलिदानी की, जय कीर्ति सुनाने आया हूँ
उठो! शिवा राणा के पुत्रों, मैं तुम्हें जगाने आया हूँ। (पृष्ठ-24)

विनोद बब्बर
 ‘सुन लो तुम गौरव गाथा’ संग्रह की चौथी रचना है। विषम परिस्थितियों में राणाप्रताप का साथ देने वालों का, झाला के बलिदान का और राणा प्रताप के अश्व चेतक के रण कौशल का इस रचना में इस तरह उल्लेख किया गया है कि पढ़ने वाले के सामने साक्षात दृश्य उपस्थित होकर उसके रोंगटे खड़े कर देता हैं तो देश के प्रति गद्दारी करने वालों को इसमें धिक्कारा भी है। अपनी माटी, अपने देश के प्रति वफादार न रहकर अकबर के पक्ष में लड़ने वालों की प्रताड़ना करते हुए राष्ट्रवादी कवि श्री विनोद बब्बर जी ने लिखा है-

माँ की लोरी, संस्कारों को, बिल्कुल भुला दिया तुमने?
तुम पर जो गर्व किया करती, उस माँ को लजा दिया तुमने।
बहनों की इज्जत कोे अरि की बाहों में झुला दिया तुमने
ले जन्म सिंह कुल में तुमने, गीदड़ सा बना लिया तुमने। (पृष्ठ-32)

चाणक्य नीति विश्व विख्यात है। इस संग्रह की पांचवी रचना ‘वीर की कूटनीति’ के माध्यम से बब्बर जी ने राणा प्रताप की कूटनीति और उनका साथ देने वाली बालिका के शौर्य का चित्रण किया है तो ‘शक्ति विद्रोही’ रचना में अपने ही भाई प्रतापसिंह के विरुद्ध शक्ति सिंह के कुविचारों का प्राकट्य किया गया है। मानसिंह द्वारा अकबर के साथ मिल जाना मेवाड़ को कलंकित कर गया। वह राणा प्रताप के सामने भी अकबर के साथ मिलाप करने का प्रस्ताव लेकर पहुंचा तो राणा प्रताप ने उसे बहुत दुत्कारा। इसी भाव को प्रकट किया गया है संग्रह की अगली रचना-‘मानसिंह को करारा जबाव’ तथा ‘स्वाभिमानी प्रताप’ में-

तुझे मुबारक शानोशौकत, गज रथ औ बग्गी घोड़े
मद की मदिरा मनभर पीकर, हो ले जितना भी चौड़े।
लेकिन राजभवन के राग से, वतन तराने हैं अच्छे
गुलामी की जूठन से ये, सूखे दाने हैं अच्छे। (पृष्ठ-60)

राणाप्रताप से फटकार खाने के बाद मानसिंह ने अकबर को सब ज्यों का त्यों बता दिया फलस्वरूप पन्द्रह सौ छिहत्तर के 18 जून को हल्दीघाटी के युद्ध की तैयारी और युद्ध की विभीषिका का वर्णन सरस्वती पुत्र श्री विनोद बब्बर जी ने युद्ध की तैयारी’ तथा ‘हल्दीघाटी का महासमर’ और ‘घमासान’ शीर्षक रचनाओं में करते हुए समरक्षेत्र का साक्षात लोमहर्षक दृश्य उपस्थित कर दिया है जो पाठक के मस्तिष्क को झनझनाते हुए वीर रस में सराबोर कर देता है-

चम चम चम चमक रहे भाले, तलवारें चलती छपक-छपक
अरि-दल का छेदन करते थे, किरपाल कटारी लपक-लपक।
पैदल-पैदल से लड़ते थे, भिड़ गये सवार सवारों से,
घोड़े हाथी-सैनिक दल, बचते वीरों के वारों से।
कुछ रुण्ड-मुण्ड गिरते भू पर, कुछ घायल गिरे तड़पते थे
कुछ चिल्लाते मारो-मारो, कुछ छिपते, गिरते-भगते थे। (पृष्ठ-74)

दिनेश पाठक ‘शशि’
 रचना-‘शक्ति-संवाद’ में मेवाड़ की रक्षा का संकल्प, ‘संकट सके साथी भामाशाह’ में महाराणा की संन्तान चम्पा-सुन्दर के घोर अभावों में पलते हुए भी देश-भक्ति की बातें करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाने के दृश्य को उनके तोतले संवादों के माध्यम से कहलवाकर राष्ट्रवादी रचनाकार श्री विनोद बब्बर जी ने अपने काव्य कौशल की पराकाष्ठा का परिचय दिया है। राणा प्रताप के इस संकट काल में भामाशाह की दानशीलता और त्याग की पराकाष्ठा का वर्णन भी इस रचना में कवि ने किया है।

‘नरवीरों को प्रणाम’ रचना के माध्यम से रचनाकार ने अपनी माटी पर मर मिटने वालों को प्रणाम कर श्रद्धान्जलि अर्पित की है।

मृत्युपूर्व राणाप्रताप की अपने राष्ट्र के प्रति चिंता का होना स्वाभाविक था क्योंकि अमर सिंह अभी शासन चलाने के लिए पूर्ण योग्य नहीं था। मंत्री, सामंतों और सरदारों के द्वारा इस जिम्मेदारी का भार उठाने के संकल्प ने राणा प्रताप को संबल प्रदान किया जिसका उल्लेख ‘अस्ताचल की ओर’ रचना में किया गया है तो ‘मेरे प्रताप’ रचना में राष्ट्र के प्रति नत रचनाकार ने अपने राष्ट्र पर गर्व करते हुए विभिन्न स्थलों जैसे हल्दीघाटी, यूरोप, आस्ट्रिया, मॉरिशस, विनायक पीठ आदि स्थानों की अपनी यात्रा और वहाँ पर राणाप्रताप तथा उनके अश्व चेतक आदि की विशाल मूर्तियों को देखकर असीम प्रसन्नता का अनुभव किया जिसे उन्होंने ‘मेरे प्रताप’ शीर्षक से कलमबद्ध किया है-

यूरुप-यात्रा के समय, हुआ बहुत हैरान
आस्ट्रिया क्रिस्टल म्युजियम, चेतक की थी शान।
मॉरीशस में भी सुना, था प्रताप का नाम
हर भारतवंशी करे, नितप्रति नमन प्रणाम। ( पृष्ठ-96)

‘समय शिला पर लिखा’ रचना के अन्तर्गत उन सबका उल्लेख किया गया है जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया। पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर राणा के पुत्र की रक्षा करके अपना कर्तव्य निभाया तो एक अश्व होते हुए भी चेतक ने मनुष्य की भाँति अपनी स्वामिभक्ति का चरम सीमा तक पालन किया। वीर जवानों ने जिन्होंने राणा प्रताप का साथ दिया, सभी के प्रति श्रद्धा सुमन रचनाकार ने अर्पित किए हैं।
संग्रह ‘प्रताप महान’ की 18वीं रचना ‘चेतक’ में रचनाकार ने राणा प्रताप के अश्व चेतक के रंग-रूप, गुण, चाल, बुद्धिमत्ता, शौर्य और जोश तथा शक्ति आदि का बहुत ही अद्भुत वर्णन किया है साथ ही हल्दीघाटी में बनाये गये चेतक के सुन्दर मंदिर का भी उल्लेख किया गया है-
हृदय फाड़कर रोया राणा, चेतक ने प्राण गँवाया था
हल्दीघाटी में वीर अश्व का, सुन्दर मंदिर बनवाया था। ( पृष्ठ-101)

अन्त में राष्ट्रवादी चिंतक, मनीषी बब्बर जी ने संग्रह की 19 वीं रचना में राणा प्रताप को नमन किया है।
 20वीं रचना में रचनाकार ने चाटुकारों को लताड़ा है। उन्होंने इस बात पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया है कि मुगलकाल के इतिहासकारों ने भारतीय राष्ट्रीयता की विवेचना निष्पक्ष होकर नहीं की। उन्होंने मुगलों की चापलूसी करते हुए तथ्यहीन, मनमानी विवेचना की।

पुस्तक की भूमिका लिखते हुए आचार्य डॉ. गौरांगशरण देवाचार्य जी ने भी इस प्रश्न को उठाते हुए लिखा है कि-
"क्या भारत का राष्ट्रीय पुरुष अकबर है जो छल-कपट तथा दूसरों पर आक्रमण कर उसे जीत लेने के पागलपन से युक्त था या हेमू जैसा साहसी व्यक्ति, जिसने विदेशी शासन को देश से उखाड़ फेंकने तथा दिल्ली पर स्वदेशी शासन पुनः स्थापित करने का प्रयत्न किया?
क्या राष्ट्र का प्रतिनिधि गोंडवाना की रानी पर अकारण आक्रमण करने वाला अकबर है या शत्रु द्वारा पकड़े जाने व अपमानित होने की आशंका से स्वयं छुरा घोंप कर बलिदान देने वाली रानी?
क्या राष्ट्र का प्रेरक, चित्तौड़ में 30,000 हिन्दुओं का नरसंहार करने वाला अकबर है या महाराणा प्रताप का संघर्षमय जीवन, जिन्होंने मुगलों की अजेय सेनाओं को नष्ट कर दिया था।"

अन्त में विद्वान रचनाकार, साहित्यकार, वरिष्ठ पत्रकार, राष्ट्रीय चेतना के संवाहक श्री विनोद बब्बर जी ने संग्रह की 21वीं रचना के माध्यम से मेवाड़ की धरती का गुणगान खुले दिल से करते हुए उस धरती की एक-एक विशेषता का उल्लेख इस रचना में किया है। निज परिवार की बजाय सम्पूर्ण राष्ट्र को अपना परिवार समझने वाले संत साहित्यकार ने हिन्द और हिन्दी की सेवा में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। भारतीय संस्कृति के उदात्त गुणों से देश की युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए प्रयासरत श्री विनोद बब्बर जी ने चरित्रनायक राणा प्रताप के सभी विशिष्ट गुणों को इस संग्रह में प्रस्तुत कर अपने लेखकीय दायित्व का पूर्ण रूपेण निर्वहन किया है।
104 पृष्ठीय इस पुस्तक में यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री राम जिस प्रकार आतताइयों से पृथ्वी को मुक्त करने के लिए अवतरित हुए थे राणा प्रताप भी दुष्ट, आक्रमणकारी और आतताई यवनों से राष्ट्र की रक्षा के लिए अवतरित हुए अतः चाटुकार इतिहासकारों ने जो आतताइयों को महिमामंडित किया है उस इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है जिसमें राष्ट्र के लिए बलिदान होने वाले सच्चे राष्ट्रभक्तों का उल्लेख किये जाने की आवश्यकता है।

 पुस्तक का आवरण नाम के अनुरूप है। मुद्रण साफ-सुथरा, त्रुटिहीन है। पुस्तक राष्ट्रीय विचारधारा के पाठकों को निश्चित रूप से चाटुकार इतिहासकारों की भूलों को सुधारने के लिए प्रेरित करेगी।

1 comment :

  1. अद्भुत, आकर्षक, संग्रहणीय
    आदरणीय विनोद बब्बर जी व समीक्षक डॉ दिनेश पाठक'शशि' जी को हार्दिक बधाई।

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