साहित्यिक विमर्श का नया दौर: ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ में अभिव्यक्त किन्नर समाज

सविता शर्मा
सविता शर्मा

शोधार्थी, पीएच.डी. (हिंदी), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली 
ईमेल savita3590@gmail.com

                      चित्रा मुद्गल के हाल में प्रकाशित उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स  नं० 203 नाला सोपारा‘ से पहले तीन उपन्यास प्रकाशित हो चुके है उन तीनों ही उपन्यासों में लेखिका ने समाज, व्यवस्था, राजनीति और रिश्तों की जटिल बुनावट को गहनता से विश्लेषित किया है ‘पोस्ट बॉक्स  नं० 203 नाला सोपारा‘ उपन्यास में लीक से हटकर लेखिका ने समाज के ऐसे अनछुए विषय को चुना है, जिसकी संवेदना तथा यथार्थ व्यंजना की सूध कम ही रचनाकरों ने ली है
                    उपन्यास को पढ़ते समय लेखिका की विस्तृत दृष्टि का परिचय मिलता है उन्होंनें विभिन्न कोणों से इस विषय पर विचार किया है, जिसका उदाहरण हम विनोद के बहुआयामी बर्ताव में देख सकते हैं वह अगर एक तरफ अपने घर-परिवार से शिकायत करता है, समाज की मानसिकता को झिंझोड़ता है, अपने वर्ग के प्रति राजनीतिक संवेदन-शून्यता पर सवाल उठाता है, तो अपने समुदाय के मानसिक अनुकूलन की भी तहों में जाने और उसे बदलने के लिए प्रेरित भी करता है इस संदर्भ में विनोद का यह वाक्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है - ‘‘किन्नरों के धड़ के नीचे लिंग न सही, धड़ के ऊपर मस्तिक भी नहीं है, यह कैसे सोच लिया आपने?”1
                      विनोद को चंपाबाई को दे देने के बाद परिवार के लोगों ने समाज से झूठ बोलने के लिए कई कहानियाँ खुद ही गढ़ ली है किंतु फिर भी कुछ लोगों से न बच पाने के भय के कारण घर बदल लिया विनोद की बा से पता चलता है कि पास-पड़ोस की चेमी गोइयों से बचते और ढेरों असुविधाजनक सवालों से पीछा छुड़ाने के लिए पिता-पप्पा यही उचित समझते हैं कि कालबादेवी वाला अपना पुराना निजी मकान बेचकर कहीं और रहा जाये वस्तुतः इस बदलाव का ही विकल्प नाला सोपारा है इस स्थान परिवर्तन की एक गहरी प्रतीक व्यंजना है - एक समृद्ध और सम्मानित बस्ती से नाले जैसे घृणित माहौल में पहुँचना यह व्यंजना परिवार के दूसरे लोगों पर जितनी लागू होती है, उससे कहीं अधिक स्वयं विनोद उर्फ बिन्नी के जीवन पर लागू होती है शायद यही कारण है कि लेखिका ने उपन्यास का नाम नाला सोपारा के नाम पर रखा, क्योंकि नाला सोपारा की ही तरह सब परिवार की जिंदगी में भी जैसे खुशियों की गिरावट आई थी
                    नाला सोपारा में किन्नर समाज की व्यथा का तो वर्णन है ही साथ ही किन्नर शब्द को लेकर जो विवाद है उसकी भी विस्तृत व्याख्या की है जैसे कभी महात्मा गाँधी ने अछूतों के लिए एक सम्मान सूचक शब्द ‘हरिजन‘ का उपयोग किया था, इसी सम्मान की चाश्नी में लपेटकर इन्हें ‘किन्नर‘ कहा जाने लगा है विनोद की भी यही व्यथा है वह कहता भी है कि हिजड़े शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं लोग तो उसकी जगह किन्नर कह देने से क्या वह व्यथा समाप्त हो जाती है? -
           ‘‘बा, बा, बा... तर्क है उसका सुनने में किन्नर शब्द भले गाली न लगे मगर अपने निहतार्थ में वह उतना ही क्रूर और मर्मान्तक है, जितना हिजड़ा ... जिस दिन चंपाबाई को सुपुर्द कर दिया गया, कसाईखाने के कपाट खुल गये गाली हो गया मैं हिजड़ा, हिजड़ा, हिजड़ा गालियों की गाली किन्नर कह देने भर से नासूर छटक जाएंगे देह से?”2
           यही नहीं बल्कि जो ये किन्नर शब्द दिया भी गया है, समाज के द्वारा उसमें भी विवाद की स्थिति बनी हुई है उपन्यास में एक संवाद ऐसा ही है जहाँ इस शब्द की व्याख्या की गई है -
           ‘‘ध्यान रहे विनोद जी किन्नर शब्द से बचें किन्नौर के होते है किन्नर अंग्रेजी पढ़े-लिखे वंचितों के लिए किन्नर शब्द के उपयोग पर आपत्ति प्रकट की है नये शब्द की शुरूआत होगी, इस्तेमाल की आदत पड़ जाएगी लोगों  को3  उपन्यास में विनोद के माध्यम से जहाँ एक ओर किन्नर का अपने ही समाज से संघर्ष का पक्ष दिखाया गया है तो वहीं दूसरी ओर परिवार व समाज से भी समाज में किस प्रकार एक बच्चे को उसकी माँ से दूर कर दिया जाता है और वो भी केवल एक जननांग दोष के कारण, इस पर गहरी चोट लेखिका ने की है विनोद अपने समाज से संघर्ष करता है और कहता है -
           ‘‘बात-बात पर ताली पीटना मेरी स्वाभाविक प्रकृति नहीं है स्त्रैण लक्षण मुझमें कभी नहीं रहे अब भी नहीं है और जो लक्षण मुझमें नहीं है, उन्हें सिर्फ इसलिए स्वीकारूँ की मेरी बिरादरी के शेष सभी, उन हाव-भावों को अपना चुके है?” 4
           तो वहीं परिवार पर भी वह प्रश्न उठाता है - ‘‘मेरी सुरक्षा के लिए कोई कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की? मनसुख भाई जैसे पुलिस अधीक्षक पप्पा के गहरे दोस्त के रहते हुए? वो अपने आप मुझे बचाने के लिए तो आ नहीं सकते थे मेरे आंगिक दोष की बात पप्पा ने उनसे बाँटी जो नहीं होगी वरना वह मुझे बचाने जरूर आ जाते5
           समाज में इन लिंग दोषी लोगों के लिए कोई जगह ही नहीं हमारी तथाकथित सोसाइटी तथा सभ्य लोगों के समाज में ऐसे लोग रहेंगे तो हमारे बच्चों पर इसका क्या असर पड़ेगा? बगैर यह परवाह किए कि ये लिंग दोषी लोग भी तो किसी के बच्चे है समाज को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता जिस कारण इन लोगो का सारा बचपन मानों गायब ही हो जाता है और जीवन की यह अंधेरी जिंदगी को काटते-काटते न जाने कब इनके बचपन में ही परिपक्वता आ जाती है? ऐसा ही एक दृश्य नाला सोपारा में तब दिखता है जब विनोद उर्फ बिन्नी भाषण देने के लिए किन्नरों की सभा में जाता है और उसे वहाँ उन बूढ़े किन्नरों में मानों सभी बच्चे ही दिखते हैं ऐसे बच्चे जिनका बचपना कभी आया ही नहीं है -
           ‘‘खचाखच भरे हाल की आधी से अधिक सीटों पर किसी दैत्य की कलाइयों की कांटे उगी मजबूत पकड़ में कैद चीखते, पुकारते छूट भागने को छटपटाते, पछाड़े खाते मासूम बच्चे बैठे हुए दिखाई पड़े उन मासूम, निर्दोष, पवित्र, बच्चों के चेहरे जो लांछना और उपहासों की कीलों से बिंधे हुए अपनी खो गयी मासूमियत को सख्त चट्टान से हो आए बदरंग खुद के जवान, प्रौढ़ और बूढ़े चेहरों में खोज रहे थे6
           इन सब दंशों के बीच बिन्नी कम से कम इतना तो खुश नसीब है कि वह अपनी बा से पत्राचार ही कर पा रहा है, बाकियों को तो जाने यह भी नसीब है या नहीं इन पत्रों के माध्यम से माँ-बेटे के रिश्ते में सादगी के साथ गहराई, प्रेम व एक-दूसरे को समझनें की परिपक्वता बखूबी लेखिका ने हर पन्ने पर उकेरी है जबकि बाकी बेटों के साथ बा यह रिश्ता शायद ऐसा नहीं है यही कारण है कि शिकायत करते हुए बिन्नी, बा से प्रश्न भी करता है और फिर थोड़ी देर बाद खुद ही उसका उत्तर समझ भी जाता है -
           ‘‘चिट्ठी खोलकर तकलीफ हुई इतने बड़े लिफाफे में इतनी छोटी-सी चिट्ठी तेरे बाजू में दर्द था क्या बा मोटा भाई और सेजल भाभी के घर लौटनें का समय हो गया था? मानता हूँ चिट्ठी लिखने के लिए एकांत की जरूरत होती है उस पर भी तू अकेली होती है तो तेरे कंधों पर मनों काम लदे हुए तुझे खाली नहीं रहने देते‘‘ 7
           तो वहीं बा का भी हाल कुछ ऐसा ही है वह लिखती है - ‘‘तुझे यह सब कतई नही लिखना चाहती थी लिख गयी हूँ तो शायद यही सोचकर जो मेरे नजदीक है, मन्नत से पाई पहलौठी की संतान, वह मुझसे कितनी दूर है जो दूर है वह सबसे करीब‘‘ 8
           साथ ही कृत्रिम बनाए किन्नरों की समस्याँ पर भी उपन्यास पर विचार किया गया है किन्नरों  के साथ-साथ स्त्री की दशा पर भी उपन्यास पर अत्यंत व्यंग्यात्मक लहज़े में चर्चा है स्त्री के मनोविज्ञान का जो वर्णन लेखिका ने बा के माध्यम से किया है वह केवल बा का ही नहीं बल्कि उनके माध्यम से प्रत्येक स्त्री के मन में चलने वाले द्वंद्व का वर्णन है
           ‘‘द्वंद्व को भी मन के अदेखे कोने-अंतरों में उठने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए उठ भी आते है तो क्या किसी नतीजे से जुड़ पाने को साहस कहाँ जुटा पाते हैं इसलिए कि स्त्री के अंतप्रकोष्ठों का वातावरण ओरों की भंगिमाओं ओर भृकुटियों से निर्मित होता है संज्ञाविहीन होती है, स्त्री उसके नाम नहीं होते मुखौटे होते है गुहारने और हस्ताक्षर करने भर के लिए ... स्त्री खुद भ्रम में है‘‘9
           विनोद उर्फ बिन्नी यह भली-भाँति जानता है कि किन्नरों की दशा को सुधारने का एक मात्र जरिया शिक्षा है, क्योंकि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे समाज की सोच बदलेगी, सोच बदलेगी तो लोग इन हाशिए के वर्गों के लिए भी संवेदना रखेंगे और संवेदना होने पर ही संभव है कि इन किन्नरों के माता-पिता इन्हें पैदा होते ही नरक की तरह जीवन व्यतीत करने के लिए अपने से दूर नहीं करेंगे, यह सब शिक्षा के माध्यम से ही संभव है न कि केवल कानून भर बना दिये जाने से विनोद कहता भी है -
           ‘‘जरूरत है सोच बदलने की संवेदनशील बनाने की सोच बदलेगी, तभी जब अभिभावक अपने लिंग दोषी बच्चों को कलंक मान किन्नरों के हवाले नहीं करेंगे उन्हें घूरे में नहीं फेंकेंगे ट्रान्सजेंडर के खांचे में नहीं ढकेलेंगे यह पहचान जब उन्हें किन्नरों के रूप में जीने नहीं दे रही, समाज में तो, सरकारी मान्यता मिल जाने के बाद जीने देगी? किन्नरों के रूप में समाज ने उन्हें उस खांचे में सदियों पूर्व ढकेल कर रखा हुआ है उसी रूप में उन्हें आरक्षित करके सरकार अभिभावकों को अपराधमुक्त कर खुली छूट दे रही है पैदा होते ही वह लिंग दोषी बच्चों को ट्रांसजेंडर जमात के हवाले कर दें छुट्टी पा ले अपनी जिम्मेदारी से10
           विनोद यह जानता है शिक्षा ही उनके कल्याण का माध्यम है जिस कारण वह बार-बार शिक्षा पर बल देता हुआ कहता है - ‘‘पढ़ाई ही हमारी मुक्ति का रास्ता है, कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया है हमारे लिए‘‘ 11
           किंतु वह यह भी जानता है कि भारत जैसे देश में जहाँ शिक्षा प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, वहाँ शिक्षा प्राप्त करना इतना आसान भी नहीं है और तो और स्कूल-कॉलेजों में प्रवेश के लिए उनके फार्म में इन किन्नरों के लिए लिंग निर्धारण का कॉलम ही नहीं है विनोद इग्नू से पढ़ना चाहता है किंतु जब फार्म देखता है तो - ‘‘मेल, फीमेल के खाने में तो मेल ही टिक करूंगा बा सरकार भी अजीब है न बा‘‘12
           हालांकि कानून ने इनके लिए (किन्नरों) भी सभी शिक्षा संस्थानों, नौकरियों आदि में तृतीय लिंग का अधिकार दिया है, किंतु देखना यह है कि यह बात समाज कितना और स्वयं यह किन्नर कितना स्वीकारते हैं क्योंकि किन्नरों में भी हीन भावना इस तरह घर कर गई है कि वह भी यह मान बैठे है कि यह सब उनके लिए नहीं यह बात विनोद के इस कथन से समझी जा सकती है - ‘‘ कोशिश में हूँ बा उनसे छिपाकर कोई बड़ा काम सीख सकूं ताकि किसी भी रूप में उन पर निर्भर न रहूँ अधूरी शिक्षा आड़े आ जाती है गाड़ियां मजबूरी में धोता हूँ कहीं और भाग सकता नहीं एक बार भागा था, बा पड़ोस के बेकरी वाले हामिद मियां के आश्वासन पर सोचा था, दिल्ली से अलीगढ़ दूर है नहीं ढूंढ पाएंगे लेकिन गलत-फहमी में था एक सुबह पाया, बेकरी का शटर उठाया ही था कि दल के सरदार तितलीबाई को प्रेत सा सामने खड़ा पाया‘‘ 13
           विनोद तो यहाँ तक कहता है कि यदि समाज में सचमुच समानता लानी है, तो किन्नरों को ‘0‘ अदर्स की श्रेणी से बाहर निकाल कर उसी प्रकार देखना चाहिए जैसे बाकी अन्य पिछड़े या हाशिए के वर्गों को यह प्रश्न सच में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि किन्नरों की मुख्य लड़ाई उनके मनुष्य माने जाने की लड़ाई है दरअसल विनोद का पूरा संघर्ष यही है कि किन्नरों को भी मनुष्य माना जाए जैसे बाकी पिछड़े वर्गों को माना जाता है वह कहता भी है -
           ‘‘जहाँ सरकार ने अनुसूचित जनजाति को रखा है पिछड़ा वर्ग को रखा है विकलांग को रखा है और बहुतों को रखा है‘ ‘ये सब समाज के घोर वंचित वर्ग है लिंग दोषी नहीं बाकायदा स्त्री-पुरूष है‘ ‘लिंग दोषी सभी लिंग से स्त्री-पुरूष नहीं है तो क्या मनुष्य नहीं है?किन्नर बिरादरी का संघर्ष उन्हें मनुष्य माने जाने का संघर्ष है फिर ‘0‘ अदर्स में उन्हें क्यों ढकेला जा रहा है0‘ अदर्स को खत्म कर देना चाहिए, सरकार को देखिए, मेरा मानना यह है, अपना लिंग उन्हें चुनने की स्वतंत्रता दीजिए ... उन्हें अलग से इस रूप में चिह्नित करना घोर अमानवीय कृत्य है किन्नर चाहे जिस भी वर्ग की संतान हो, चाहे जिस जाति - बिरादरी, समुदाय से संबंधित हो, उसी जाति-वर्ग के अनुसार उन्हें अपना सामान्य जीवन जीने की सुविधा मिलनी चाहिए अगर वे आरक्षित श्रेणी के माता-पिता की संताने हैं तो वे उस आरक्षित श्रेणी को प्राप्त होने वाली सुविधाओं की हकदार है समर्थ माता-पिता के समक्ष उनके समुचित भरण-पोषण की दिक्कत है ही नहीं उन्हें जरूरत है तो जागरूकता की‘‘14
           किन्नरों की व्यथा के साथ-साथ लेखिका ने राजनीति पर भी कटाक्ष किया है राजनेता किस प्रकार संवेदनशून्य हो गए है कि उन्हें अपनी राजनीति के आगे किसी की पीड़ा, संवेदना तथा व्यथा कुछ नहीं दिखता दिखता है तो केवल कोई अवसर ऐसा अवसर जो उनकी राजनीति के लिए फायदेमंद हो और ज्यादा से ज्यादा वोट मिले हमारे राजनेता ये भली-भाँति जानते हैं कि वोट मिलते हैं तो केवल संवेदनशील मुद्दों के दम पर, जिसके लिये वे या तो पुराने मुद्दे उखाड़ते हैं या नए मुद्दे बना लेते हैं इसके अलावा जनता से उन्हें कोई सरोकार नहीं विधायक तथा तिवारी जी के माध्यम से यह बात समझी जा सकती है जहाँ वे यह तक कह जाते हैं कि - ‘‘दुर्भाग्य से मैं ब्राह्मण हूँ और सौभाग्य के धनी, तुम किन्नर‘‘ 15  यही नहीं साथ ही अवसरवादिता ऐसी कि जिसमें कोई चूक होने की गुंजाइश ही न रहे – “हिजड़ों को कोई हिजड़ा ही सम्बोधित करे कि उनके लिए आरक्षण की मांग क्यों होनी चाहिए और उसे राजनीतिक मुद्दा क्यों बनाया जाना चाहिए, उसका असर प्रभावी होगा16
           लोकतंत्र की जो नीव थी - जनता, उसकी व्यथा तथा उसके मत से किसी राजनीतिज्ञ को कोई फर्क नहीं पड़ता वोट चाहिए तो चाहे कोई जिंदा हो या मुर्दा, कोई वोट देने जाए या नहीं, सबका हल है इन राजनेताओं के पास वोटर कार्ड का किस प्रकार हर साल दुरूपयोग चुनाव में ये लोग करते व कराते हैं इस पर गहरा कटाक्ष करते हुए विनोद कहता है - ‘‘बना हुआ है, वह भी फर्जी नाम से देखा, गया कभी मैं वोट डालने?बैठा रहूँ, फर्क क्या पड़ता है वोट मेरे नाम का सरदार डलवा ही देते है नाखून से स्याही उड़ाने का गुर उनसे ज्यादा किसे आता है ‘‘17
           यही नहीं बल्कि धर्म भी कम पीछे नहीं है इन हाशिए के लोगों की दुर्दशा करने में धर्मांध लोग धर्म के ठेकेदारों के कहे पर चलते हैं और दूर कर देते हैं सभी धर्मों  के मूल उद्देश्य से उन हाशिए के लोगांे को जिन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है सभी धर्म का मूल मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देना है किंतु यह धर्मांध लोग क्या जाने? उन्हें तो केवल अपनी दुकान चलाने से मतलब है धर्म पर भी लेखिका ने अपनी नज़र दौड़ाई है और अपने इस वाक्य से धर्म की बखिया उधेड़ कर रख दी है - ‘‘लिंग-पूजक समाज लिंगविहीनों को कैसे बरदाश्त करेगा? माता-पिता दोषी है, मगर उससे ज्यादा दोषी है, क्रूर, निष्ठुर, पाखंड़ी, धर्म-विश्लेषकों की धर्मान्धता‘‘ 18
           विनोद यह बात अच्छी तरह जानता है जिस कारण वह अपने वर्ग को सम्बोधित करते हुए कहता है - ‘‘नहीं जानते कौन लोग करते हैं आपका इस्तेमाल? वो, जो आपको इंसान नहीं समझते आपके जीने-मरने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता अंधेरे के बावजूद वो आपकी मैयत को कन्धा देने नहीं पहुँचते आंसू नहीं बहाते रूढ़ि नियति की है जीवित रहते धिक्कार की चप्पलों से वे आपको पीटेंगे मरणोपरांत वे आपको अपनी ही बिरादरी से पिटवाएंगे जिनके नवजात शिशुओं को ढूंढ-ढ़ांढ नाच-गाने आशीषने पहुँचते है आप, उन्हीं के घर दूसरे रोज पहुँचकर देखिए? घर का दरवाजा आपके मुंह पर भेड़ दिया जाएगा‘‘19
           उपन्यास में किन्नरों की यौन समस्याएँ, यौन शोषण तथा सामान्य जन की तरह भावनाओं और आकर्षण पर भी विचार किया गया है फिर चाहे वह किन्नर तथा स्त्री प्रेम हो (बिन्नी व ज्योत्सना के माध्यम से) या किन्नर तथा किन्नर के प्रति आकर्षण भाव (पूनम जोशी द्वारा बिन्नी के प्रति) किन्नरों में भी सामान्य लड़के-लड़कियों की तरह भावनाएँ होती है विनोद कहता है ‘‘तेरी झल्लाहट की परवाह न करते हुए फोन पर हम अक्सर होमवर्क की बातें किया करते थे स्कूल की लड़कियों के बारे में भी‘’20  इसके अलावा पूनम जोशी के साथ घटित दुष्कर्म की घटना से तो आँखे खुली की खुली ही रह जाती हैं जो समाज के दोहरे चरित्र पर भी एक प्रश्न-चिह्न लगाता है
           किन्नर बच्चे के मन में स्वयं को लेकर भी कई प्रश्न उमड़ते रहते हैं वह स्वयं द्वंद्व में रहता है कि वह अन्य बच्चों की तरह क्यों नहीं है? ऐसा ही प्रश्न विनोद भी अपनी बा से करता है - ‘‘मेरे नुन्नू क्यों नहीं है, बा?‘‘ 21 यह सब आसान नहीं न ही बच्चे के लिए और न ही उसकी बा के लिए जिस कारण कई बार दोनों ही आत्मधिक्कार के भाव से भी भर जाते हैं विनोद का आत्मधिक्कार - ‘‘उचाट मन धिक्कार से भरा विधि की विडम्बना के नाम पर झेलने का बूता नहीं बचा कब तक लड़े कोई अपने से, अपनों से…. कैसे जन्मूं यह तो नहीं चुन पाया मौत चुन सकता हूँ22  माँ का आत्मधिक्कार, उसे यह ग्लानि हमेशा बनी रहती है कि क्यों उसने अपने बच्चे को किन्नरों को सौंप दिया - ‘‘मेरी मुट्ठी में पूरी ताकत से जकड़ी हुई तेरी बिलखती हुई मुट्ठी को, जो मुझसे अलग न होने के लिए हाथ-पांव पटकती गिड़गिड़ा रही थी, मैंने ही तो उसे धोखा दिया था अपनी मुट्ठी को शिथिल कर….‘‘23
           जिसके परिवार में कोई किन्नर जन्म ले चुका होता है उस परिवार में फिर किसी नए बच्चे के जन्म के समय परिवारजन की क्या मनोस्थिति होती है? उसे बड़ी ही बारीकी से उपन्यास में उठाया गया है मोटा भाई की स्थिति वैसी ही है - ‘‘बच्चे के वजन को लेकर सोनोग्राफिस्ट ने हल्की सी चिंता जताई थी सुनकर तेरा मोटा भाई एकदम से चिंतित हो उठा उससे अजीबोगरीब सवाल करने लगा लड़का हो या लड़की, उसे दोनों स्वीकार है मगर वह जरा गौर से देखकर बताए, उसका जननांग ठीक से विकसित हो रहा है न कोई नुक्स तो नहीं नुक्स हो तो उन्हें स्पष्ट बता दिया जाए बच्चा गिरवा देंगे वह अभी समय है बच्चे के विषय में उन्हें निर्णय लेने का पूरा अधिकार है‘‘24
           परिवार की इस मनोस्थिति का बड़ा कारण समाज तथा उस बच्चे का स्वयं दर्द भरा जीवन भी है किंतु परिवार से भिन्न माँ की दशा कुछ और ही होती है उसे अपने सभी बच्चे प्रिय है फिर चाहे वह लड़का-लड़की हो या किन्नर विनोद के जाने के बाद उसकी माँ की मनोदशा भी अजीब हो गई है - ‘‘मै तेरे पापा की चुप्पी को लेकर सोचती हूँ दीकरा मेरे चेहरे पर नदारद उत्साह ने शायद उनसे चुगली कर दी है मेरी मनः स्थिति की कि वे मुझसे कोई भी ऐसा सवाल न पूछें जो मेरी दुखती रग को कुरेद दे‘‘25
           इतने असहनीय जीवन को विनोद और बा दोनों ही जिए जा रहे है किंतु फिर भी विनोद की पीड़ा कही अधिक है, क्योंकि वह एकदम अकेला ऐसी जगह रहने में विवश है, जो उसकी है ही नहीं न वहाँ के तौर-तरीके, व वैसी भावनात्मकता जैसे किसी परिवार में होती है सब उसे वो बनानें की कोशिश करते हैं, जो वह नहीं बनना चाहता किंतु इन सबसे जूझते हुए वह हार नहीं मानता है और वह नाच-गाने से परे आत्मसम्मान भरे जीवन को जीने की चाह बनाए रखता है, न केवल अपने लिए बल्कि अपने जैसे तमाम लोगो के लिए जो उसकी तरह जीवन जीने को अभिशप्त है यही उसकी लड़ाई है समाज से वह कहता है - ‘‘सामान्य मनुष्यों के बीच में सामान्य मनुष्य के रूप में ही पहचाने जाने की ख्वाहिश रखता हूँ‘‘ 26
           वह लगातार समाज पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही स्वयं किन्नर समाज पर भी कटाक्ष करता है इनके गुरूओं की गद्दी की चाह तथा उसके लिए कुछ भी कर गुजरने की हद पर भी वार करता है विनोद किन्नर समाज को भी ललकारता हुआ कहता है जो आज दशा है उसके लिए जितना समाज जिम्मेदार है, उतना वे खुद भी वह व्यंग्यात्मक शैली में कहता है - ‘‘असामाजिक तत्वों के हाथ की कठपुतली बनने में जितनी भूमिका किन्नरों के संदर्भ में सामाजिक बहिष्कार-तिरस्कार की रही है, उससे कम उनके पथभ्रष्ट निरंकुश सरदारों और गुरूओं की नहीं ऊपर से विकल्पहीनता की कुंठा ने उन्हें आंधी का तिनका बना दिया‘‘27
           सब कुछ के बावजूद उपन्यासकार यह संदेश दे पाने में सफल हो पाई हैं कि समस्या का कोई रचनात्मक समाधान सामाजिक, मानवीय और भावनात्मक ही हो सकता है यही वस्तुतः ऐसा समाधान भी हो सकता है, जो किसी राजनीतिक पाखंड से मुक्त हो यानी उसमें तिवारी के फोन पर विनोद को दिए गए वक्तव्य की तरह कथनी और करनी के बीच कैसी भी फांक न हो उपन्यास में कई जगह लेखिका नें ऐसे समाधान की ओर इशारा भी किया है, जिसका चरम उपन्यास के अंत में होता है बिन्नी उर्फ विनोद कहता भी है - ‘‘किसी अभिभावक को पुकार लगानी होगा बा सड़ी-गली मान्यताओं को फाड़कर फेंक देना होगा जला देना होगा जला देना होगा भस्म कर देना होगा दुस्साहस करना होगा मात्र साहस भर पर्याप्त नहीं जननांग दोषी औलाद से क्षमा मांगते हुए सार्वजनिक रूप से घोषित करते हुए मेरे बेटे, मेरी बेटी, जहाँ भी हो, जैसे भी हो, अपने घर लौट आओ घर तुम्हारा इंतजार कर रहा है हम अपनी अमानवीय भूल का परिष्कार करना चाहते हैं अपने बच्चे की घर वापसी चाहते हैं28
           हालांकि उपन्यास की कई सीमाएँ भी हैं जो पाठक को पढ़ते हुए कई बार खटकती भी हैं जैसे - कथा और पात्रों के विकास एवं संवादों वाले ये पत्र पहली दृष्टि में ही वैसे सहज और स्वाभाविक न लगकर, कृत्रिम और आरोपित होने का बोध देने लगते हैं तो संबोधन और पारिवारिक प्रसंगों में व्यक्त की जाने वाली सारी चिंता के बावजूद ये पत्र पाठको का विश्वास अर्जित कर पाने में असफल रहते हैं और साथ ही ये पत्र केवल बिन्नी के हैं बा के भी यदि कुछ पत्र होते तो शायद उपन्यास और मजबूत हो पाता है किंतु इन सभी कमियों के बावजूद लेखिका अपने उद्देश्य में सफल रही है, जो है किन्नर को भी मनुष्य मानकर सभी अभिभावकों से एक अपील की, कि वे अपने ऐसे बच्चों की घर वापसी करें
 
 संदर्भ
1. पोस्ट बॉक्स नं203 नाला सोपारा‘, चित्रा मुद्गल (सामाजिक पेपरेवैक्स, नई दिल्ली 2016) पृष्ठ सं० 193
2. वही पृष्ठ सं० 42
3.  वही पृष्ठ सं० 172
4. वही पृष्ठ सं० 910
5.  वही पृष्ठ सं० 11
6.  वही पृष्ठ सं० 183
7.  वही पृष्ठ सं० 20
8.  वही पृष्ठ सं० 24
9.  वही पृष्ठ सं० 73
10.  वही पृष्ठ सं० 112
11. वही पृष्ठ सं० 110
12.  वही पृष्ठ सं० 46
13.  वही पृष्ठ सं० 26
14.  वही पृष्ठ सं० 195196
15. वही पृष्ठ सं० 155
16. वही पृष्ठ सं० 158    
17.  वही पृष्ठ सं० 111
18. वही पृष्ठ सं० 153
19.  वही पृष्ठ सं० 186187
20.  वही पृष्ठ सं० 31
21.  वही पृष्ठ सं० 13
22.  वही पृष्ठ सं० 33
23. वही पृष्ठ सं० 21
24. वही पृष्ठ सं० 22
25.  वही पृष्ठ सं० 70
26. वही पृष्ठ सं० 113
27. वही पृष्ठ सं० 86
28. वही पृष्ठ सं० 177

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