वृद्ध विमर्श की अधिरोहिणी कहानी ‛अग्निदाह’

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237


स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य के चर्चित एवं मेधावी प्रतिभा के धनी लेखक डॉ. दिलीप मेहरा जी का जन्म 27 दिसंबर 1968 में वीरपुर गुजरात में हुआ। एम.ए. के दौरान गुजरात यूनिवर्सिटी में समग्र हिंदी में प्रथम वर्ग में उत्तीर्ण होने पर स्वर्ण पदक प्राप्त किया। गुजरात यूनिवर्सिटी में एमफिल की पढ़ाई पूर्ण की। एम.एस. यूनिवर्सिटी बडौदा से पीएचडी की उपाधि ग्रहण की। दिलीप जी के पिता कालिदास जी मेहरा तथा माता मंजुला बहन है। संप्रति में दिलीप जी ‛साहित्य वीथिका’ पत्रिका के प्रधान संपादक तथा सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद में स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में आचार्य पद पर आसीन है। इक्कीस आलोचना ग्रंथ तथा संपादित पुस्तकों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले डॉ. दिलीप जी को अब तक सात से अधिक पुरस्कार एवं उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है। ‛मकान पुराण ’ कहानी संग्रह लेखक के अनुभवों का ऐसा दस्तावेज है जिसे पढ़ते समय पाठक संपूर्ण मानव जाति की संवेदनाओ से आप्लावित हो जाता है। 

हिंदी साहित्य के अंतर्गत आधुनिक काल में स्त्री विमर्श, किसान विमर्श, दलित विमर्श, किन्नर विमर्श, बाल विमर्श सभी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं किंतु, वृद्ध विमर्श साहित्य का महत्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि यह हर समाज हर जाति तथा हर मनुष्य का मुद्दा है। डॉ हरे कृष्ण तिवारी के शब्दों में “कहा जाता है साहित्य समाज का दर्पण है स्वाभाविक है समाज में वृद्धों की जैसी स्थिति रही है उसका यथार्थ चित्रण साहित्य में देखने को मिले।”1

हाल ही में ‛अक्षरार्थ’ सांझा कहानी संग्रह में प्रकाशित डॉ. दिलीप जी द्वारा रचित ‛अग्निदाह’ कहानी इस दृष्टि से वृद्ध विमर्श के धरातल का ना सिर्फ यथार्थ प्रस्तुत करती है बल्कि, उसे एक कदम आगे बढ़ाने का प्रयास करती है। अब तक के वृद्ध विमर्श इतिहास से जुड़ी कहानियाँ वृद्ध पात्रों को अपनी नियति पर छोड़ देती थी। जहाँ माता-पिता कभी वृद्ध आश्रम में तो कभी अपने ही घर में अनेकों शारीरिक तथा मानसिक यातना को सहते हुए देखे जा सकते हैं। किंतु दिलीप जी द्वारा रचित कहानी अग्निदाह इस संदर्भ में यथार्थ के अधिक निकट है कारण कि, यहाँ वृद्ध पात्र मनसुखलाल अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता है। यह आवाज सिर्फ मनसुखलाल की आवाज नहीं है अपितु संपूर्ण वृद्ध पीढ़ी की आवाज है। आत्महत्या के बाद मिली सुसाइड नोट के ये शब्द स्थिति को पाठक के सामने रखते हैं, “इस जीवन से तंग आकर दुनिया छोड़कर जा रहा हूँ, मेरा नम्र निवेदन है कि मेरी लाश बेटों को ना दी जाये। अगर मेरी लड़की मिताली आती है तो उसे अग्निदाह का अधिकार देता हूँ। पुलिस से मेरा निवेदन है कि मेरी बेटी अगर नहीं पहुँच पाती है तो मेरी लाश को आवारा लाश की तरह जला दिया जाय, परंतु मेरे पुत्रों को ना दी जाये।”2 

सच भी तो है उन पुत्रों को अग्नि दाह करने का हक भी क्या है जो जीते जी माता-पिता को अपने घर में जगह नहीं दे पाए भगवान के घर में उन्हें किस अधिकार से भेज सकते हैं। संत कबीर साहब कहते हैं 
“सादू खोज पुरानी बानी, 
धरम हते पाताल पठै दये,पाप भये अगमानी।
जियत न पूंछै बाप मतारी मरे मे तरपन ठानी।।”3

जीते जी जिन्होंने अपने माता-पिता का अनादर किया है वह कैसे भला उनकी मृत्योपरांत किसी अधिकार की उम्मीद कर सकते हैं। 

आज बाजारवादी व्यवस्था भारतीय संस्कृति में इतनी गहराई तक पैंठ गई है कि, वस्तु ही नहीं मनुष्य को भी उपयोगिता वादी सिद्धांत के आधार पर आँका और मापा जाता है।शर्मनाक स्थिति तब होती है जब माता-पिता की तुलना भी इसी दृष्टि से की जाती है। आलोच्य कहानी में आर्थिक स्थिति के नाम पर माता-पिता को पुत्रों द्वारा अलग कर दिया जाता है माता को रमेश तथा पिता को अमृत के पास रहना पड़ता है। आश्चर्य है, जिन बच्चों की शिक्षा दीक्षा पूरी करने तथा उन्हें समाज में अपने लिए स्थान बनवाने में जो माता-पिता अपना संपूर्ण यौवन होम कर देते हैं, बच्चे जीवन के अंतिम क्षणों में महंगाई के नाम पर उन्हें साथ रहने के सुख से भी वंचित कर देते हैं। वृद्धावस्था ऐसी अवस्था है जिसमें, मनुष्य रूग्ण तथा निशक्त हो जाता है। आशा की निगाहों से अपनों में अपनापन ढूंढता है। ऐसे में अपने जीवनसाथी से अलग हो जाना वास्तव में बहुत कष्टदायी है।वृद्ध पात्र मनसुखलाल तथा उसकी पत्नी उषा के दुखों का मर्मात्मक चित्रण करने के साथ ही कहानी आगे बढ़ती है। मनसुखलाल की पुत्रवधू रमेश की पत्नी अम्बा द्वारा अपनी सास के प्रति किया जाने वाला व्यवहार अत्यंत दुखदायी है। “अंबा उषा से नौकरानी से भी ज्यादा काम लेती थी तब जाकर उसे खाना मिलता था।” 4 स्त्री जाति को अतीत से चली आ रही परंपरा के अनुसार पुरुष की तुलना में अधिक सहन शक्ति होती है। अतः वह परिस्थितियों के साथ समझौता कर लेती है। किंतु दूसरी ओर अम्बा का अनुकरण करती हुई, अमृत की पत्नी सुनयना भी अपने ससुर मनसुखलाल से घर के काम में हाथ बटाने का प्रस्ताव रखती है। किंतु यह प्रस्ताव वास्तव में प्रस्ताव ना हो कर मनसुखलाल के लिए बहू-बेटे द्वारा दिया गया हुक्म साबित होता है “मनसुखलाल ने पूरे घर का झाड़ू-पोंछा करने का काम प्रारंभ कर दिया। बुढ़ापे में मनसुखलाल को काम होता नहीं था, फिर भी वे काम करते रहते थे... बीपी की वजह से काम करते-करते उनकी साँस फूल जाती थी।” 5 

 आज माता-पिता की यह स्थिति है कि, “परिवार में बहू-बेटों द्वारा अक्सर उन्हें अपमानित होना पड़ता है। उन्हें वही करना पड़ता है वैसे ही चलना पड़ता है जैसे उनके बहू-बेटे कहते हैं.... कुल मिलाकर उनके साथ नौकरो जैसा व्यवहार किया जाता है।”6

कहानी में आने वाला एक वाक्य पाठक को बहुत गहराई से सोचने के लिए मजबूर कर देता है। वह है, मनसुखलाल द्वारा कहा गया वाक्य “पहली बार मनसुखलाल को एहसास हुआ कि क्यों उसने इस संसार में जन्म लिया?”7 आधुनिकता की अंधी दौड़ में कब मनुष्य का लक्ष्य परमार्थ से स्वार्थ बन गया, अनुमान से परे है। हमारी भारतीय संस्कृति जीवन का अंतिम लक्ष्य अध्यात्म को बताती है। जहाँ चित् देह के बंधन से ऊपर उठकर संपूर्ण सृष्टि में अपनी ही आत्मा का दर्शन करता है। बदलते हुए समय के साथ यह दृष्टि चर-अचर जगत से सीमित होकर समाज जाति तथा परिवार तक सिमट कर रह गई है और जब उसी परिवार में अपनापन नहीं मिलता तो हमें अध्यात्म याद आ जाता है। जो कि हमारी मूल में अदृष्ट भाव से हमेशा से व्याप्त है।उसी परमात्मा की खोज में शायद मनसुखलाल रोज मंदिर जाने लगे थे। किंतु यहाँ मनसुखलाल का सामना बूढ़ी काकी की रूपा से नहीं था जो किसी भी तरह परमात्मा से डरती हो तथा पश्चाताप अनुभव करें। यहाँ तो मनसुखलाल को नास्तिक बहू सुनयना का सामना करना था। जिसके नैनो पर लोभ लालच की पट्टी बंधी थी। एक दिन उसने मनसुखलाल को टोक ही दिया “घर का झाड़ू-पोंछा बाकी है और आप सुबह सुबह रोज मंदिर चले जाते हो? मंदिर जाने का याद रहता है तो झाड़ू-पोंछा करने का याद क्यों नहीं रहता?”8 इस प्रकार मनसुखलाल के साथ होने वाले नौकरों जैसे व्यवहार का चित्रण करती हुई कहानी आगे बढ़ती है। रोज झाड़ू-पोंछा तथा घर के अन्य कामों को निपटाने के बाद थका-टूटा, बीमार और पसीने से सरोबार मनसुखलाल पंखा भी चालू करता है तो, बहू फालतू खर्च के नाम पर वह भी बंद करती है। किंतु स्वयं कूलर चला कर सो जाती है। यहाँ तक कि खाना प्राप्त करने के लिए उन्हें इस उम्र में रोज पचास रुपए कमा के देने की शर्त रखी जाती है। मनसुखलाल अपनी स्थिति से परेशान हो जाते हैं तथा उनके आर्त स्वर फूट पड़ते हैं, “हे भगवान! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा, जो ये दिन देखने के लिए जिंदा रखा। तू बता भगवान कि मैंने कौन-सा पाप किया है, जिसकी यह सजा आज मैं भुगत रहा हूँ। हे ईश्वर! तू मुझे शीघ्र तेरे पास बुला ले। मैं अब इस नर्क में नहीं रह सकता।” 9

मनसुखलाल की स्थिति अत्यंत दयनीय है। यहाँ हर वृद्ध पात्र की तरह मनसुखलाल कि मायूसी और निराशा को देखा जा सकता है, जो अपने ही घर में अपने ही घर वालों से कोई आशा नहीं रखता। आशा तो क्या अपनी आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाता। अंततः वृद्ध मनसुखलाल वही कार्य करता करता है जिसकी पाठक को आशंका थी। वह है आत्महत्या।

सच में देखा भी जाए तो,आज वृद्धों के पास यही तीन रास्ते हैं पहला-अपनी नियति से समझौता कर वृद्ध आश्रम चला जाए, दूसरा- अपने ही घर में नौकर के समान उपेक्षित होकर जीवन व्यतीत करें, तीसरा आत्महत्या कर ले। “आज की युवा पीढ़ी वैश्वीकरण के उपभोक्तावादी विकास रथ पर सवार सरपट भागते हुए सब कुछ पीछे तोड़ती छोड़ती जा रही है तो दूसरी तरफ बुजुर्ग पीढ़ी नितांत अकेला रह कुंठित हताश निराश हो अवसाद ग्रस्त जीवन जीने को विवश है। ”10

किंतु मनसुखलाल की आत्महत्या के साथ यह कहानी समाप्त नहीं होती जैसे कि आज तक हर वृद्ध विमर्श से जुड़ी कहानी समाप्त होती है। ‛अग्निदाह’ कहानी यथार्थ के धरातल पर सत्य से टकराने का साहस पूर्ण कार्य करती है। जिसमें लेखक वृद्ध पात्र मनसुखलाल को सुसाइड नोट के माध्यम से पुनः जिंदा कर देता है। ऐसा सुसाइड नोट जिसमें बहू-बेटे द्वारा किये हुए अत्याचारों का संपूर्ण ब्यौरा है। आज तक किसी कहानी में इस प्रकार के शिकायत पत्र बनाम अधिकार पत्र को नहीं लिखा होगा जैसा कि लेखक ने पात्र मनसुखलाल द्वारा लिखवाया है।

माता-पिता स्नेह की मूरत होते हैं। जो हमारे सभी अक्षम्य अपराधों को भी क्षमा करते आऐ है और आज भी कर देते हैं। किंतु उनके साथ बच्चों के द्वारा किया गया इतना कृतघ्नतापूर्ण व्यवहार किस हद तक जायज़ है। जब कोई अपराध सभी हदें पार कर दे तो उसका निराकरण ढूंढना ही समाज के हित में होता है। लेखक चाहता तो पात्र मनसुखलाल द्वारा जीते जी अपने पुत्रों के सामने अधिकार की मांग को रखवा सकता था। किंतु यह मात्र एक अकल्पित कल्पना बनकर रह जाती। सच तो यह है कि सुसाइड नोट लिखा गया है अपनी पत्नी की चिंताजनक स्थिति को लेकर। स्पष्ट है अपने लिए तो आज भी पिता सीधे-सीधे नहीं लड़ सकता। अधिकारों को लेकर भी नहीं सम्मान को लेकर भी नहीं।किंतु वह नहीं चाहता कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नी बहू के यहाँ नौकरों के समान जीवन व्यतीत करें। अपनी सभी चिंताओं को समाप्त करने का एकमात्र रास्ता मनसुखलाल को पुत्री मिताली में दिखाई देता है। अतः अग्निदाह का अधिकार भी वह मिताली को ही देता है। जो आगे जाकर अपने पिता के साथ किये हुए अत्याचार का बदला लेने का मोर्चा संभालती है। वह पुलिस में एफ आई आर दर्ज कराती है और माता को अपने साथ सूरत ले जाती है।

चिंतन का विषय यह है कि आज ना जाने कितने मनसुखलाल हैं, जो इस तरह या तो घुट घुट कर जी रहे हैं या तो मरने को मजबूर है उन सभी की आवाज में यह सुसाइड नोट वक्त से पहले संपूर्ण युवा पीढ़ी के दिलों तक पहुँच जाए और कहीं से आकर कोई मिताली अपने माता-पिता के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़े तथा उनका खोया हुआ सम्मान लौटा सके। यही कहानी का अंतिम उद्देश्य भी है आज की भटकती हुई युवा पीढ़ी हर बार सिर्फ और सिर्फ अधिकारों की मांग करती है। पैतृक संपत्ति में अधिकार, स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार, सभी मर्यादाओं को तोड़ कर अपने नए रास्ते बनाने का अधिकार। किंतु वह कभी पलटकर यह नहीं देखती कि उसकी कुछ कर्तव्यभूमिका भी है। यह कर्तव्य जो दो पीढ़ियों के अधिकार है। उनके अधिकार जिनमें पहली पीढ़ी बच्चों की है तथा दूसरी पीढ़ी वृद्धों की। यदि समय के साथ इस विचार पर चिंतन ना किया जाएगा तो आज जो परिवार संयुक्त से एकल परिवार की यात्रा तक पहुँच चुका है कल वहाँ परिवार का नाम भी नष्ट हो जाएगा। रह जाएगा तो सिर्फ एकाकीपन। जिस पश्चिमी संस्कृति का नाम लेकर आधुनिक युवा पीढ़ी भ्रमित होती है। सच तो यह है कि वहाँ भी वृद्धों का इतना अपमान नहीं होता जितना हमारे द्वारा किया जाता है। आज का निर्णय हमारा कल का भाग्य तय करता है। युवा भी एक दिन वृद्ध होगा। सारांशतः ‛अग्निदाह’ कहानी आज तक वृद्ध विमर्श से जुड़ी सभी कहानियों के लिए एक अधिरोहिणी सिद्ध होती है। कहानी अपने मूल उद्देश्य को पाठक के हृदय में उतारने में पूर्णतया सफल हुई है। भाषा शैली की दृष्टि से देखा जाए तो गुजराती भाषा के प्रभाव के साथ भाषा सहज प्रवाह मान होकर संपूर्ण कहानी के भाव को पाठक के हृदय तक पहुँचाने में समर्थ सिद्ध हुई है।


संदर्भ ग्रंथ सूची
1. संपादक डॉ. शिवचंद्र सिंह,
 ‛साहित्येतिहास में वृद्ध विमर्श’, दिशा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस, संस्करण 2017, पृष्ठ संख्या 278
2. संपादक सुशील राकेश, साझा कहानी संग्रह ‛अक्षरार्थ’, दीक्षा प्रकाशन, संस्करण 2021, पृष्ठ संख्या 51
3. कबीर - hindiwaterportal.org
4. संपादक सुशील राकेश, साझा कहानी संग्रह ‛अक्षरार्थ’, संस्करण 2021, पृष्ठ संख्या 46
5. वही, पृष्ठ संख्या 46, 47
6. डॉ. कुमुद सिंह, ‛वृद्ध महिलाओं का समाजशास्त्र’, उत्कर्ष पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, संस्करण 2018, पृष्ठ 21
7. संपादक सुशील राकेश, साझा कहानी संग्रह ‛अक्षरार्थ’, संस्करण 2021, पृष्ठ संख्या 47
8. संपादक सुशील राकेश, साझा कहानी संग्रह ‛अक्षरार्थ’, संस्करण 2021, पृष्ठ संख्या 47, 48
9 वही पृष्ठ संख्या 49
10. संपादक शिवचंद्र सिंह,
 ‛साहित्येतिहास में वृद्ध विमर्श’, दिशा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस, संस्करण 2017, संपादकीय


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