कविता: फिर से

सुधीर केवलिया
थमा था जिस मकाँ पर हमारी
मुलाकातों का सिलसिला कभी
वह मकाँ आज भी है वहाँ
नहीं छूना चाहता अब कुछ भी वहाँ
डरता हूँ कहीं बिखर न जाए छूने से
हमारी यादों के रंग वहाँ 
यहाँ अंदर की शुष्क फ़ज़ा में
बाहर हो रही बारिश की नमी भी 
नहीं कर पा रही है
हमारे अतीत की याद को ताजा 
महसूस करने की कोशिश करता हूँ
हमारे रिश्तों की नमी को
वहाँ पड़े सूख चुके फूलों में  
उन अंगुलियों के स्पर्श को
उसकी मौजूदगी की खुशबू से 
महकते हुए मकाँ को
अरसे से बन्द पड़ी घड़ी की सुइयाँ
आज भी बता रही हैं वह वक़्त
जब वक़्त थम गया था मेरे जीवन में
बेताब हैं ये सुइयाँ चलने के लिए फिर से 
आने के बाद मेरे यहाँ फिर से
जानता हूँ मेरे अकेले के होने से
नहीं चल सकती है घड़ी की दोनों सुइयाँ
अरसे बाद मेरी शुष्क आँखों में
आ जाती है नमी
नाकाफ़ी रही जो बनाए रखने में
हमारे रिश्ते में नमी को
हवा के तेज झोंके और बारिश का पानी
आज तक नहीं मिटा पाए हैं मकाँ पर
तुम्हारे कदमों के निशान
यहाँ आकर महसूस करने लगता हूँ
अपने भीतर के वीराने में 
एक अजीब सी आहट के साथ टीस
एक रुमाल आज भी पड़ा है वहाँ
जिसे तुम भूल गई थी कभी
उड़ने लगता है हवा के तेज झोंके में
मेरे आस पास
समेटकर उसे तरीके से रख देता हूँ
तुम्हारे कदमों के निशान पर फिर से
इस उम्मीद में कि कभी तो लेकर आएंगे 
तुम्हारे अपने कदम तुम यहाँ फिर से
चलने लगेगा वक़्त और महक उठेगी
फ़ज़ा यहाँ की 
गुलजार हो जाएगा चमन 
मेरी ज़िंदगी का फिर से...

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