मानव की मानसिक स्थिति, सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों के बदलते समीकरण और मानवता को सर्वोच्च सिद्ध करता एक उत्कृष्ट उपन्यास: प्रश्नों के घेरे

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक: 
प्रश्नों के घेरे (उपन्यास)
लेखिका: सुश्री उषा शर्मा
पृष्ठ: 160
मूल्य: ₹ 300.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
प्रकाशक: जवाहर पुस्तकालय, सदर, मथुरा-281001


हिन्दी साहित्य की कहानी, कविता, व्यंग्य, बाल कहानी एवं उपन्यास आदि विविध विधाओं में तथा अंग्रेजी साहित्य में उपन्यास विधा में साधिकार लेखनी चलाने वाली, शिक्षाविद् एवं विदुषी, प्रतिभाशाली साहित्यकार उषा शर्मा  ने अपनी लेखनी से सृजित  कृतियों से हिन्दी साहित्य में श्रीवृद्धि की है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से वर्ष-2021 की उत्कृष्ट कृति के रूप में प्रकाशन अनुदान से प्रकाशित उनका  उपन्यास ‘‘ प्रश्नों के घेरे ’’ मानव की मानसिक स्थिति, सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों के बदलते समीकरण और मानवता को सर्वोच्च सिद्ध करता एक उत्कृष्ट उपन्यास है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
उनके पाँच उपन्यास हिन्दी में तथा तीन उपन्यास अंग्ग्रेजी में (जिनमें से एक उपन्यास यू.एस.ए.से) प्रकाशित हुए हैं। उनके एक उपन्यास (?) को सबसे छोटा शीर्षक के लिए इण्डिया ग्लोबल वर्ल्ड रिकॉर्ड तथा इण्डिया बुक रिकॉर्ड में भी दर्ज किया जा चुका है।

उपन्यास वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा है। साहित्य के जितने रूपविधान हो सकते हैं उनमें उपन्यास का रूप विधान सबसे लचीला होता है और वह परिस्थिति के अनुसार कोई भी रूप धारण कर ले सकता है। ‘‘मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है।’’ ऐसा कथा-सम्राट मुशी प्रेमचंद जी का मानना है। वे उपन्यास को मानव जीवन का चित्र मात्र समझते हैं।                               


मानव चरित्र पर प्रकाश डालने में निपुण सुश्री उषा शर्मा का पाँचवाँ उपन्यास ‘‘प्रश्नों के घेरे’’ है जिसमें नारी जाति के जीवन से सम्बन्धित अनेक उलझनों, बन्धनों, समस्याओं के प्रति प्रश्नों को रेखांकित किया गया है और यह प्रश्न भी कि नारी के ही जीवन में यह सब क्यों?

‘‘क्या दादी, यहाँ सबको बुरा लगेगा यहाँ कुछ मत कहो। वहाँ सबको बुरा लगेगा वहाँ कुछ मत कहना। क्या दादी लड़की की जिन्दगी ऐसी क्यों होती है? क्यों वह बस चुप रहती है? क्यों बड़ों की आज्ञा मानना ही उनका कर्तव्य होता है? क्यों कर्तव्य में बॅधी होती है वह? क्यों शान्त रहना पड़ता है? उन्हें यही कहा जाता है कि बस शान्त रहो, सब कुछ सहो, क्यों दादी क्यों?.( पृष्ट-17)

मानव जीवन भी एक विचित्र पहेली है। सभी चेहरे जो मुस्कराते नजर आते हैं उनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका हृदय असीम त्रासदियों से अन्दर ही अन्दर युद्धरत होता है। जिस प्रकार उदर की क्षुधा को तृप्त करने के लिए भोजन की और मानसिक क्षुधा के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है उसी तरह शरीर की भी अपनी एक क्षुधा होती है जिसकी अतृप्ति भटकनों के रास्ते प्रशस्त करती है किन्तु भारतीय संस्कृति, भारतीय नारी को अनेक बेड़ियों में जकड़े उसे पाश्चात्य की स्वतंत्रता प्रदान नहीं करती फलतः भारतीय नारी, देवी बनी अन्दर ही अन्दर प्रदीप्त ज्वाला को मौन के आवरण में छुपाये सुलगती रहती है।

उपन्यास-‘प्रश्नों के घेरे’ की माधुरी जैसी अनेक नारियाँ हैं जो अपने सुलगते जीवन को होम कर देती हैं।    

आज अपूर्व की बातों ने उसके जीवन में क्यों? क्या? जैसे शब्दों को जगह दे दी थी। वह बार-बार सोचती रही कि क्यों उसने अपनी जायदाद दामाद के नाम की। क्यों? उसके साथ हर कदम पर छल हुआ। क्यों आंखिर क्यो? (पृष्ट-15)                                

क्लारा रीव ने अपनी पुस्तक-‘‘प्रोग्रेस ऑव रोमांस’’ में उपन्यास विधा के बारे में लिखा हैै-‘‘उपन्यास अपने युग का चित्रण करता है। उपन्यास की सफलता इसमें है कि प्रत्येक दृश्य  इस सरलता और स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत हो और उसे इतना सामान्य बनाया जाय कि उसकी वास्तविकता में विश्वास   हो जाय, कम से कम जब तक हम उसे पढ़ते रहें। यहाँ तक कि पात्रों के सुख-दुःख से हम वैसे ही प्रभावित हों मानों वे हमारे अपने ही हैं।’’

सुश्री उषा शर्मा के उपन्यास ‘‘प्रश्नों के घेरे’’ पर भी यह उक्ति पूर्णरूपेण सटीक बैठती है जिसमें लेखिका ने उपन्यास की नायिका ‘माधुरी’ के माध्यम से समस्त नारी जाति की समस्याओं, विडंम्बनाओं और अन्तर्द्वन्द्वों को बहुत ही बारीकी से उकेरा है। नवविवाहिता पत्नी के साथ पैशाचिक व्यवहार, विवाह विच्छेद के बाद पुत्री-दामाद के साथ सामंजस्य आदि।

‘‘तड़ाक्-तड़ाक्... गाल पर पड़े थप्पड़ों की आवाज से पूरा कमरा गूंज गया था.....साली जवान भी चलाती है...कमीनी तुझे पता है हमारे घर में औरतें जवान नहीं चलाती....समझी?.....अब निकल यहाँ से बड़ी आई थी सुहागरात मनाने।...अब मन गई न सुहागरात....अब क्या है.....जा यहाँ से....कहते...कहते उसने माधुरी के लम्बे बालों को पकड़ा और घसीट कर बाहर कर दिया और अन्दर से कमरा बंद कर लिया।    (पृष्ट-54)      

माना कि पुरुष प्रधान समाज में शोषण का सारा दोष पुरुष के सिर ही लगता रहा है किन्तु वास्तविकता यह भी है कि आदि काल से ही नारी ही नारी की शोषक रही है पुरुष को माध्यम बनाकर।

‘‘रहने दो मीरा, अब घावों पर नमक मत लगाओ। दिनेश ने जो किया और तुमने जो किया वह मैं आज तक नहीं भूली हूँ। दोनों अपनी-अपनी सजा पा रहे हो। वैसे मुझे किसी से न कभी कोई शिकायत थी न है क्योंकि होता वही है जो होना होता है फिर क्यों किसी को दोष दें।’’-कहते हुए माधुरी ने रिक्शा पकड़ा और चल दी। (पृष्ट -134) 

उपन्यास की नायिका माधुरी का विवाह सास द्वारा अपने उस पुत्र के साथ करा देना जो पहले से ही चारित्रिक और मानसिक दोषों से ग्रसित था और माधुरी की माँ द्वारा ऐसे व्यक्ति के साथ स्वीकृति इसलिए दिया जाना कि वे लोग बिना दहेज के विवाह करने को तैयार हैं साथ ही माधुरी के अन्य छोटे बहन-भाइयों के विवाह का मार्ग भी प्रशस्त हो जायेगा, नारी के द्वारा नारी के शोषण का ही उदाहरण हैं। उपन्यास की ‘माधुरी और फिर शालू’ भी अपनी माँ और सास के कुचक्रों का शिकार बनती रही हैं।            

सुश्री उषा शर्मा इस उपन्यास के वस्तु विन्यास को विश्वसनीय  बनाने में सफल रही हैं यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। घटनाओं के परस्पर घात-प्रतिघात से संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है जो पराकाष्ठा की ओर अग्रसर होकर चरमोत्कर्ष की सृष्टि करती है। माधुरी के साथ घटित घटनाओं का चक्र पाठक को अपना सहयात्री बनाते हुए उसे पूरे वातावरण से रूबरू कराता हुआ, उसी धारा में बहाये ले जाता है जिसमें उपन्यास के पात्र बह रहे होते हैं। 

जिस तरह सुबह के बाद रात और रात के बाद सुबह आना निश्चित है हरियाली के बाद बंजर निश्चित है उसी तरह एक दिन अचानक दिनेश ने आकर एक फोटो दिखाया-‘ये मीरा है बहुत स्वाभिमानी है, अपना काम करना चाहती है तो मैंने सोचा कि इनकी मदद कर दूँ।’

‘‘लगता है आपने पूरी दुनिया की औरतों की सहायता करने का ठेका ले रखा है?’’-माधुरी सुलग उठी। (पृष्ट -128)

सुश्री उषा शर्मा ने उपन्यास ‘‘प्रश्नों के घेरे’’ के एक एक पात्र को इस कुशलता से गढ़ा है कि सभी पात्रों के क्रिया-कलाप और भाव भंगिमा का साक्षात चित्र प्रकट होता प्रतीत होता है। माधुरी के जीवन में पति से विच्छेद के बाद दिनेश का प्रवेश भी एक महिला मीरा के कारण निरापद न रह सका तो माधुरी व्यथित हो उठी-

‘‘रहने दो मीरा, अब घावों पर नमक मत लगाओ। दिनेश ने जो किया और तुमने जो किया वह मैं आज तक नहीं भूली हूँ। दोनों अपनी-अपनी सजा पा रहे हो। वैसे मुझे किसी से न कभी कोई शिकायत थी न है क्योंकि होता वही है जो होना होता है फिर क्यों किसी को दोष दें।’’-कहते हुए माधुरी ने रिक्शा पकड़ा और चल दी।( पृष्ट -134)

बावजूद इसके, जीवन के अन्तिम पड़ाव पर माधुरी स्त्री के एकाकीपन की पीड़ा और उसकी असहायता का एहसास करके सभी ऐसी महिलाओं को एक आश्रय प्रदान करने की सोचती ही नहीं अपितु उसको क्रियान्वित भी करती है एक ‘मैत्रीघर’ बनाकर और यही वह बात है जो सुश्री उषा शर्मा का उपन्यास मानवता को सर्वोच्च सिद्ध करता प्रतीत होता है।

चारों ओर खुशियों के माहौल के बीच दो वृद्धाएँ अन्य को सहारा देने के लिए हाथ बढ़ा रहीं थीं, क्या ये उसके जीवन की पूर्णाहुति थी? क्यों आज भी अकेली खड़ी माधुरी इस दिशा में आगे बढ़ी?    

 मैत्रीघर सभी वृद्ध महिलाओं के लिये सहारा बनने को तैयार था। अनेक प्रश्नों के घेरे से निकल कर माधुरी आज दूसरों के प्रश्नों को हल करने की दिशा में कदम आगे बढ़ा चुकी थी। ( पृष्ट -158)

देशकाल और पात्रों के अनुकूल स्वाभाविकता, उपन्यास की रोचकता और आकर्षण को बढ़ाने वाली अभिनयात्मकता और सरसता इस उपन्यास में सर्वत्र विद्यमान है और यही इसकी सफलता है।                                                                                   
सुश्री उषा शर्मा के इस उपन्यास का हिन्दी साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

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