समकालीन हिंदी महिला उपन्यासों में प्रतिरोध की भाषा

सलमी सेबास्टियन

अतिथि अध्यापिका, सेंट.जोसफ्स कॉलेज (स्वायत्त),  इरिन्जालक्कूड़ा, त्रिशुर, केरल

समाज में प्रचलित स्त्री की छवि जो पितृसत्ता द्वारा बनायी गयी थी। स्त्री अपनी चेतना को पहचाना तो पितृसत्ता द्वारा बनायी गयी सांस्कृतिक ऐतिहासिक और सामाजिक स्त्री छवि को तोड़ने और नयी रचने का प्रयत्न किया। इसलिए स्त्री चेतना पितृसत्तात्मक समाज के विरोध की चेतना है। स्त्री चेतना का प्रभाव स्त्री की भाषिक चेतना पर भी पड़ता है। स्त्री भाषा भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध करती है। इसलिए स्त्री भाषा में प्रतिरोध का स्वर बुलंद है। स्त्री की भाषा एवं स्त्री संघर्ष का परस्पर संबंध है। जगदीश्वर चतुर्वेदी ने कहा है- “स्त्री के हितों की लड़ाई का स्त्री भाषा के निर्माण की प्रक्रिया से गहरा संबंध है। स्त्री हितों की रक्षा एवं विस्तार की कोशिश जितनी तेज होंगी, स्त्री भाषा के निर्माण की संभावनाएँ उतनी ही प्रबल होंगी। स्त्री-संघर्ष के बगैर स्त्री भाषा संभव नहीं है। उसी तरह स्त्री की भाषा के बगैर स्त्री के संघर्ष को सही दिशा देना भी संभव नहीं है।”1 इससे यह व्यक्त है कि स्त्री को अपनी एक अलग भाषा की आवश्यकता है, जिससे वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था से संघर्ष एवं प्रतिरोध कर सकती है और अपनी मुक्ति एवं स्वतंत्रता को हासिल कर सके। 
प्राचीन समय में स्त्री द्वारा रचित साहित्य भी पुरुष दृष्टि का साहित्य रहा। उस साहित्य की स्त्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अनुसरण-अनुगमन करनेवाली थी। लेकिन आज की स्त्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रतिरोध करने वाली स्त्री है। आज की स्त्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था के उन तमाम नियम, कायदे, कानून, परंपरा आदि का विरोध करती है जो स्त्री की अस्मिता, मानवाधिकार, स्वतंत्रता आदि के लिए व्यवधान डालते हैं। इसलिए आज की स्त्री की भाषा में भी व्यवस्था से प्रतिरोध विद्यमान है। प्रभा खेतान कहती है- “अतीत में स्त्री ने विरोध की भाषा नहीं सीखी थी। पर आज की स्त्री सही मायनों में प्रतिरोध की भाषा समझती है।”2 समकालीन हिन्दी महिला उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में तीखी भाषा के सहारे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध जाहिर किया है। सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक सभी क्षेत्रों में पितृसत्ता द्वारा रचे गए नियमों पर स्त्री ने अपनी भाषा में विद्रोह जाहिर किया है।
हमें पता है कि ईमानदारी, वफादारी, प्यार, समर्पण आदि निभाने में पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को बाध्य किया और पुरुष को इनसे मुक्त किया गया, अगर स्त्री किसी को प्रेम में धोखा दे तो हमारे समाज में उसके ऊपर तेजाबी आक्रमण होता है। प्रभा खेतान के उपन्यास ‘छिन्नमस्ता’ की नायिका प्रिया परंपरा से स्त्री को सिखाई गयी आपसी ईमानदारी, वफादारी, प्यार, समर्पण आदि को नकारती है। वह कहती है- “सच कहूँ नरेंद्र, ये शब्द भ्रम हैं। औरत को यह सब इसलिए सिखाया जाता है कि वह इन शब्दों के चक्रव्यूह से कभी नहीं निकल पाए ताकि युगों से चली आती आहुति की परंपरा को कायम रखे।”3 पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरुष ने स्त्री को अपने अधीन करने के लिए जो साजिश रची है, उसी को ही प्रिया के माध्यम से प्रभा जी ने इन शब्दों में व्यक्त किया है। उपन्यास में प्रिया इसका विरोध करती है। उनके उपन्यास ‘अपने-अपने चेहरे’ में पुरुष पर हमेशा निर्भर करनेवाली स्त्री रूप का विरोध किया गया है। क्योंकि स्त्री का वह रूप पितृसत्ता द्वारा निर्मित है। उपन्यास की नायिका रमा के अनुसार एक व्यक्ति के रूप में खुद स्त्री को स्थापित करने के लिए किसी पुरुष की ज़रुरत नहीं है। “सुनो राजेन्द्र! अपने आप में मैं एक इकाई हूँ। पूर्ण हूँ। यानी मुझे अपने जीवन में अब पुरुष की कोई ऐसी भूमिका नज़र नहीं आती। जहाँ तक संवेदना और लगाव का  सवाल है, उसे और भी कई रूपों में पाया जा सकता हैं।”4 
मधु कांकरिया के उपन्यास ‘सलाम आखिरी’ में पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा बनाए गए नियमों पर वार करते हुए सुकीर्ति कहती है- “जनाब तब पहले विधुरपन के लिए विधान तय किए जाते, फिर वैधव्य का नम्बर आता। पहले पुरुषों के विधुर हो जाने पर उनकी घड़ी और चश्मे तुडवा दिए जाते, चमचमाती पतलून और टाई को धोती-कुर्ते की बाध्यता में बदला जाता तब विधवाओं की चूड़ियाँ और सिन्दूर का नम्बर आता, विजय तुम कल्पना में भी अपने पुरुषोचित अहम् को इस प्रकार आघात होते नहीं देख सकते जो हम पर सहस्त्राब्दियों से लादा गया है। बस एक मिनट में ही मुँह लटक गया तुम्हारा और सोचो हमने सदियों तक झेली है सती-प्रथा।”5 लेखिका ने स्त्री को पितृसत्ता द्वारा बनायी गयी अछूती, अनाघ्रत, बाँझ, गौरी, चरणदासी आदी कहनेवाली भाषा का विरोध करते हुए कहती है- “अब तुम्हीं सोचो, अछूती, अनाघ्रत, बाँझ, गौरी, चरणदासी जैसे शब्द किस मानसिकता के परिचायक हैं। जरूरत है इन शब्दों को खारिज करने की। मेरा वश चले तो या तो इन शब्दों को ही उड़ा दूँ शब्दकोश से या इन्हीं के समानान्तर पुरुषों को भी शब्दों से गढ़ूं-अछूता, अनुपजाऊ।”6 इस उपन्यास की रेशमी नामक वेश्या एड्स बीमारी से पीड़ित है। वह उस पुरुष को भी एड्स देना चाहती है जिसने उसे वेश्या बनायी। उसके तीखे प्रतिशोध की भाषा देखिए- “मुझे नहीं करवाना अपना इलाज-विलाज। विनाश की इस सौगात को मैं बारिक सँभालकर रख रही हूँ उस व्यक्ति के लिए जिसने मुझे रंडी बनाया- जिसने मुझे एक ही रास्ता दिखाया, जांघों का रास्ता, वह भी तेरह वर्ष की उर्म में। मैं दिन-रात उसे ढूंढ रही हूँ। ...वह जब तक नहीं मिलता, मैं संपूर्ण पुरुष जाति से बदला लूँगी, उन सब पुरुषों को यह बीमारी दूँगी जो यहाँ आते हैं।”7 उसका  यह कठोर प्रतिशोध पूरी पितृसत्ता से है।
शरद सिंह के उपन्यास ‘कस्बाई सीमोन’ में नायिका सुगंधा पितृसत्ता द्वारा बनायी गयी सामाजिक प्रतिष्ठा पर अपनी भाषा में वार करते हुए कहती है –“पिताजी, आप जिस सामाजिक प्रतिष्ठा की बात कर रहे हैं वह उस समय कहाँ चली जाती है जब किसी नववधू को जलाकर मार दिया जाता है, यह प्रतिष्ठा उस समय कहाँ जाती है जब किसी पत्नी से छुटकारा पाने के लिए अकारण उसे बदचलन करार दे दिया जाता है। पिता जी, जिस समाज और सामाजिक प्रतिष्ठा का आप वास्ता दे रहे हैं वह प्रतिष्ठा मिलती है उस पति को जिसने अपनी पत्नी को जलाया था, दसियों परिवार अपनी-अपनी बेटियाँ लेकर खड़े हो जाते हैं कि लो, तुमने एक को मारा तो वह उसी लायक रही होगी, अब हमारी बेटी से शादी करो और खुश रहो, ये समाज प्रतिष्ठा के नाम पर इंसान से उसके अधिकारों को छीन लेता है, तुमने फलां से प्यार किया तो क्यों किया? तुमने फलां से शादी की तो क्यों की? तुम प्यार नहीं कर सकते हो क्यों कि समाज कहलाने वाले चंद लोग नहीं चाहते हैं, तुम अपनी इच्छानुसार शादी नहीं कर सकते हो क्योंकि समाज कहलाने वाले लोग नहीं चाहते हैं, आखिर कब तक हम अपनी कायरता को सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर ढोते रहेंगे?”8 इस सामाजिक प्रतिष्ठा की बात पुरुष के लिए नहीं है, बस स्त्री के लिए मात्र बन गयी है, सुगंधा की तीखी आवाज इसके विरुद्ध है।
पुराने समय में पति की मृत्यु के बाद स्त्री को सती होनी पड़ती है, अनामिका जी के उपन्यास ‘दस द्वारे का पींजरा’ में पंडिता रमाबाई पितृसत्तामक व्यवस्था के इस नियम पर प्रतिरोध करती है- “क्यों होगी वह सती, वह जीवित होता तो इसकी खातिर सता होता क्या।”9 यह सिर्फ स्त्रियों के लिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा बनायी गयी सती प्रथा के ऊपर तीखी भाषा में प्रतिरोध है। ‘सती’ शब्द स्त्री लिंग है और इसके लिए पुल्लिंग़ शब्द पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने नहीं गढ़ा है। पंडिता रमाबाई के जरिए अनामिका जी ने ‘सता’ शब्द का प्रयोग यहाँ किया। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध है।
धर्म में स्त्री और शूद्र एक समान हाशिएकृत हैं। निर्मला सिंह के उपन्यास ‘सरोरुह’ में मंदिर के पंडित ने एक बच्चे को दलित होने के कारण प्रसाद देना मना किया तो नायिका शैफाली अपनी सशक्त भाषा में पितृसत्ता द्वारा बनायी गई धर्म की मान्यताओं पर प्रतिरोध करती है- “हाँ हाँ, मैं केशव चौधरी जी की बेटी हूँ, रत्ती भर छूत में विश्वास नहीं करती हूँ और मेरे लिये सब धर्म सब जातियाँ एक समान हैं क्योंकि पंडितजी धर्म मानव जीवन की रक्षा का कवच है यह हमें पुण्य काम करने के लिए कहता है। इंसान को इन्सान से नफ़रत नहीं सिखाता है।”10 
राजनीति के क्षेत्र में सशक्त प्रतिरोधी स्वर कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यास ‘बित्ता भर की छोकरी’ में देख सकते है। नेताओं ने इंदिरा पर यह आरोप लगाया कि वह अपने पिता की नीतियों को टाल रही है, और वह अपने अगले चुनाव में तो पी.एम. नहीं बन सकती। इंदिरा तीखे स्वर में कहती है– “मुझे कुछ लोग यह न सिखाएँ या बताएँ कि मैं अपने पिता के आदर्श भूल गई हूँ। मैं सदा अपने पिता के साथ काम करती रही हूँ व उनके आदर्शों का सम्मान भी करती हूँ परन्तु किसी की भी नकल या अन्धानुकरण मुझे नापसंद है। देशहित के लिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि किसी पारिवर्तन की आवश्यकता हैं तो मैं पीछे नहीं हटूँगी। यदि मैं समयानुकूल कुछ परिवर्तनं करना चाहती हूँ तो करूँगी। यदि इस परिवर्तन करने के कारण कोई मुझे पसंद नहीं करता या वे पी.एम. के पद से मुझे हटाना चाहते हैं तो हटा दें।”11 इंदिरा गांधी की इस बात से व्यक्त है कि वे दूसरों के बनाए हुए रास्ते पर नहीं खुद की रास्ता बनाकर चलेंगी।
संक्षेप में कहें तो समकालीन हिन्दी महिला उपन्यासकारों ने स्त्री भाषा को नया आयाम देने का प्रयास किया है। स्त्री मुक्ति के लिए भाषा की ज़रूरत है, लेकिन वर्तमान समाज व्यवस्था में जो भाषा प्रयुक्त है वह पुरुष द्वारा निर्मित भाषा है। स्त्री की भाषा में स्त्री की भावना और उसकी निजी अनुभूति ही व्यक्त होती है। प्रतिरोध की भाषा वह भाषा है जिसके जरिए स्त्री पितृसत्तात्मक व्यवस्था से अपना प्रतिरोध या विरोध ज़ाहिर करती है। उस भाषा में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध विरोध मात्र नहीं, स्त्री की अस्मिता एवं आत्मविश्वास भी झलकते हैं। समकालीन हिन्दी महिला उपन्यासकारों ने उपने उपन्यासों में प्रतिरोध की सशक्त भाषा का प्रयोग किया है। ‘छिन्नमस्ता’ उपन्यास की प्रिया, ‘अपने अपने चेहरे’ की रमा, ‘सलाम आखिरी’ की सुकीर्ति और रेशमी, ‘कस्बाई सीमोन’ की सुगंधा, ‘दस द्वारे का पींजरा’ की पंडिता रमाबाई, ‘बित्ता भर की छोकरी’ की इंदिरा गाँधी आदि पात्रों के जरिए लेखिकाओं ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध अपनी निजी भाषा में तीखा प्रतिरोध व्यक्त किया है।

सदर्भ ग्रन्थ:
1 जगदीश्वर चतुर्वेदी – स्त्रीवादी साहित्य विमर्श- पृ-278
2 प्रभा खेतान- उपनिवेश में स्त्री-पृ.111
3 प्रभा खेतान- छिन्नमस्ता- पृ.12
4 प्रभा खेतान- अपने-अपने चेहरे- पृ.182
5 मधु कांकरिया- सलाम आखिरी- पृ.136
6 वहीं- पृ.137
7 वहीं- पृ.186
8 शरद सिंह- कस्बाई सीमोन- पृ.93-94
9 अनामिका- दस द्वारे का पींजरा- पृ.29
10 निर्मला सिंह- सरोरुह- पृ.22
11 कृष्णा अग्निहोत्री- बित्ता भर की छोकरी- पृ.192

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