व्यंग्य: कानून पर व्यवस्था का जलवा

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


धरती सूरज की नई परिक्रमा शुरू कर चुकी थी कि थाने के बाहर ग्रामीणों की भीड़ लग गई। भीड़ को उग्र बनाने वाले लोग अभी आए नहीं थे। वे टीवी चैनल वालों की प्रतीक्षा कर रहे थे। छुटभयै वीडियो वायरल कर उत्तेजना भड़काने का माहौल बना रहे थे। परेशान थानेदार हॉट लाइन पर था तो हेडसाब रोजनामचा खोजने का ढोंग करने लगे। रोजनामचा बासी अखबार के नीचे शांति से दबा पड़ा था। ग्रामीण चिल्ला रहे थे - किसान के हत्यारे को पकड़ो। भू-माफिया के गुण्डों ने उसकी हत्या की है। वे न्याय मांग रहे थे। बेवकूफ लोग आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे थे, फिर भी यही समझते थे कि माँगने से न्याय मिल जाता है। तभी थानेदार ने फोन पर राहत की अंगड़ाई ली। राजधानी से सरजी का फोन था। वे कह रहे थे छोटी जोत वाले किसान की जमीन कौन छीनेगा? अवैध कब्जे के लिए राज्य में इतनी सरकारी जमीन पड़ी है। बड़े साहब ने साफ कहा – “इंस्पेक्टर, गरीब की कभी हत्या नहीं होती, वह हमेशा आत्महत्या करता है। आत्महत्या करने के लिए उसके पास कारण हैं - साहूकारों का कर्जा, भूखे बच्चे, बीमार औरत। तुम एफआईआर लिखो, पंचनामा बनाओ। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को ज्ञान दो कि जो अंग-प्रत्यंग फटाफट बिक जाते हैं उन्हें कैश कर ले। खुद ऐश करे और तुमको ऐश करवाए। अपनी विवेचना में लिखना कि मृतक अनपढ़ था। सुसाइड नोट नहीं लिख सकता था। इसलिए बिना नोट लिखे आत्महत्या कर गया। ऐसे प्रकरण बंद करना आसान होता है। घर वाले नहीं मानें तो तुम कानून-व्यवस्था का हवाला दे कर लाश स्वाहा करवा देना। तुम्हारे राज में बेदम बीबी-बच्चे कितना दम मारेंगे। कानून व्यवस्था ढीली नहीं होनी चाहिए।” तदनुसार किसान की आत्महत्या का पुलिसिया ऐलान हो गया। ग्रामीण ठंडे पड़ गए। मृतक गरीब था, ऊपर से गाँव में उसकी जात के लोग कम थे। संदिग्ध हत्यारे हाईकमान से पूर्व आशीर्वाद प्राप्त थे। टीआरपी की संभावनाएँ क्षीण हो गई थीं। ऐसे में अभिव्यक्ति की आजादी चाहने वाले चैनल, दूसरे लाभदायी प्रोजेक्ट की तलाश में जुट गए थे। वैसे भी ढलती शाम के साथ गाँव सोने लगता था।

राजधानी की बात और थी। शाम ढलती तो वहाँ रात का शबाब कुलाँचें मारने लगता। शहरी थाने का फोन टनटनाया और पों-पों करती जीपें ‘बीच एरिया’ की ओर दौड़ पड़ीं। प्राथमिक खबर थी कि एक अधेड़ उद्योगपति उसके बंगले में पंखे की छत से टंगा पड़ा था। पुलिस को सुसाइड नोट भी मिला जिसमें उद्योगपति ने खुदकुशी की जिम्मेदारी खुद ले ली थी। यही चिंता का सबब था। उद्योगपति के पास बंगला था, गाड़ी थी, प्रेमिका थी, फैक्ट्री थी, बैंक बैलेंस था, पार्टियाँ उड़ाने वाले दोस्त थे। आत्महत्या करने का उसके पास ठोस कारण नहीं था। इंस्पेक्टर को अपने इलाके की माली हालत पता थी। यहाँ हफ्ता एडवांस में मिल जाता था। नोट गिनने वाली मशीन से कभी शिकायत नहीं आई कि ब्रीफकेस में नोट कम निकले। सुयोग्य असामी आत्महत्या कर ले तो उसकी इन्कम गिर जाए। उसने सरजी को फोन पर कहा - सरजी इस बार सौ करोड़ नहीं हो पाएँगे। सरजी ने उसे डाँटते हुए कहा - ऐ थानेदार, आपदा को अवसर बना। इस महीने डेढ़ सौ करोड़ का टारगेट रख। इसे अज्ञात हत्या का केस बना दे, कह कि इसके दुश्मनों ने हत्या कर उद्योगपति को पंखे से लटका दिया। इससे बंदूक की नोक पर दबाव डालकर सुसाइड नोट लिखवाया गया है। बस, इसके सब दुश्मन तुम्हारे आगे-पीछे घूमने लग जाएँगे। लाश को फटाफट उतरवा और पोस्टमार्टम करा ले। डॉक्टर को बता दे कि इसमें से कुछ नहीं निकाले। वैसे भी मृतक का लीवर खराब होगा, किडनियाँ बर्बाद होंगी, सालों से डायबिटीक रहा होगा। परिवारजन मरे हुए की मिट्टी और पलीद नहीं करने देंगे। लाश को साबूत सौंपने के बहाने ही कुछ खोखे झटक लेना। और सुन, इसके नौकर को सिखा-पढ़ा देना। रिश्तेदारों-दोस्तों को थाने बुलाकर उनकी परेड करवाना, सबको रिमांड पर लेने के लिए उनके फोन रिकॉर्ड खंगाल लेना। तुम सिटी इंस्पेक्टर हो, कुछ में से बहुत कुछ निकाल सकते हो। अपना अनुभव लुटा दो। पचास पेटी का मामला बनता है। संदेह करोगे तो संदेह का लाभ उठा पाओगे। ढंग से काम करो। मैं एक चैनल को आग लगाता हूँ, तुम दूसरे को लगाओ।

एक्शन शुरू हुआ, मामला सुलग पड़ा। रिश्तेदार और दोस्त थाने के अंदर-बाहर हो रहे हैं। वे टीवी चैनलों पर अपना मुँह छिपा रहे हैं। आत्महत्या में कोई हत्यारा नहीं होता, इसलिए भीड़ हत्यारों को पकड़ने की मांग कर रही है। थाने के पिछवाड़े खड़ी मिनी वैन में पेटियाँ जम रही हैं। धरती सूरज की यह परिक्रमा पूरी करने वाली है। वही धूरी थी, वैसे ही दिन-रात हो गए। सरजी के चेहरे पर आने वाले नए दिन का ओज चमक रहा है। कानून पर व्यवस्था का जलवा अब भी कायम है।
***

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: + 416 225 2415
सम्पर्क: 1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।