कहानी: अल्फाबेटिकल ऑर्डर

हरदीप सबरवाल

पंजाबी यूनीवर्सिटी से सनातकोत्तर हरदीप सबरवाल की रचनाएँ विभिन्न ऑनलाइन और प्रिंट पत्रिकाओं और कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है। अंग्रेज़ी काव्य संग्रह फेसलैस, तथा कहानी संग्रह एक ख्वाब की मौत ईबुक के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। अब तक 6 सांझा संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित। प्रतिलिपि कविता सम्मान 2019 से सम्मानित

स्कूल से वापिस आते वक़्त भंडारे से दो दोने कढ़ी चावल लेते हुए रज्जी ने कहा, “तुम्हारा घर मोहल्ले में सबसे अजीब है”
   वो मुझे चिड़ाने के लिए ऐसा बोलती रहती, “ चुप कर, भुक्खड कहीं की, दो दोने क्यों लिए लालची” मैंने भी बदला लिया।
“तेरा आवाज़ों वाला घर है ना” वो हँस कर बोली,
“और तेरा भूक्खड, तू दूसरों के टिफिन से खाना चोरी करती हैं”, मैंने माथे पर त्यौरियाँ चढ़ाते हुए कहा।
पर वो हँसती रही, हार कर मैंने धमकी दी, “तुझे धक्का दे कर दोनों दोने गिरा दूंगी”
  वो एक पल को सहमी, उसे पता था मैं ऐसा कर दूंगी, आखिर उसने अपना ब्रह्मास्त्र चला, “गिरा दे, मैं रोती हुई तेरी दादी के पास जाऊंगी, तब तुझे मज़ा मिलेगा।“
     उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान आ गई, वो जीत गई थी,
मगर मैं उसे ऐसे जाने नहीं दे सकती थी, मैंने अपना आखिरी तुरप का पत्ता चला, “हिसाब का काम कैसे करेगी, आना कॉपी मांगने, कल स्कूल में डंडे खाना”, और मैं जीते हुए योद्धा सी उस से अलग हो पिछली गली के रास्ते घर की तरफ चल दी। कढ़ी चावल के दोने का क्या करूँ, घर इतना पास है कि खत्म नहीं होगा, अगर माँ को दूँ तो दादी कहेगी, “माँ की चमची” माँ वैसे भी खाएगी नहीं, खुद ही खा लूंगी, अभी घर पहुँची ही कि रीता चिल्लाई, “आ गई, भिखारिन कहीं की, और ये दोना कहाँ से मांग कर लाई?”
“तुझे इस से क्या?”, मैंने उसे कोहनी से धक्का देते हुए आगे बढ़कर कहा।
  “आते ही झगड़ा शुरू, कब सुधरेगी ये दोनों बिल्लियाँ”, दादी ने फटकार लगाई। और माँ को देखा। हमेशा ऐसा ही होता है, दोनों जब भी हमें डाँटती है तो एक दूसरे को देखती, माँ ने अपनी बाजी खेली और झल्ला कर बोली, “चल इधर, और हाथ मुँह धोकर कर खाना खा”।
      माँ हमसे हमेशा या तो डाँट-फटकार के बात करती, या फिर बेहद ज्यादा लाड प्यार से, जैसे उसे साधारण ढंग से बात करना आता ही नहीं, उसका डाँट-फटकार से बात करना मुझे पसंद नहीं, पर चाशनी जैसा लाड प्यार तो और भी बर्दाश्त से बाहर की चीज, जैसे कोई कुत्ता आकर आपके मुँह को चाट रहा हो वैसे वाला अनुभव, उस से तो गुर्राता कुत्ता अच्छा।
      दादा सामने ही बैठे थे, हमेशा की तरह, उनकी सीट पक्की है, उसके बगल में किताबों की एक अलमारी, जिसमें तरह तरह की किताबें लाकर मेरे पिता रख दिया करते है, दादा जी किताबों के लिए पिता को बुरा भला कहते, अकसर ही, और पिता किसी अपराधी से चुपचाप सुनते, “जहाँ सरस्वती विद्यमान हो वहाँ लक्ष्मी नहीं विराजती, इसी वजह से सब डूब गया।”
     और जब पिता नहीं होते तब चुपचाप उनमें से कोई किताब उठा कर पढ़ने लगते, उन दोनों के अलावा कोई और उन किताबों को नहीं देखता, माँ को किताबें पसंद नहीं, रीता तो पढ़ने में फिसड्डी है, और इस बात के लिए जलती है कि मेरे नंबर ज्यादा आते।
       दादी दरवाजे के पास कोने में बैठती, और वहाँ से गेट पर नजर रखती, किसी चौकीदार की तरह उसका ध्यान गेट पर लगा रहता, दिन में दस पंद्रह बार पूछती, “गेट की कुण्डी लगा दी कि नहीं?, आजकल चोरी चकारी खूब हो रही”,
  पिता कई बार हँस कर कहते, “ क्यों इतनी चिंता करती हो, दुनिया भर के महल छोड़ क्या चोर हमारे घर ही चोरी करने आएंगे, यहाँ चोरी लायक रखा भी क्या!”
   मौका बेमौका दादा अपना नश्तर छोड़ते, “हम्म, सब बर्बाद जो हो गया”
     पिता कई सुना अनसुना कर देते। कई बार पलट वार करते, “जहाँ सब बचा है, वहाँ क्यों नहीं जाकर रहते, छह औलादे और भी है, यहीं मेरे सर पर सवार क्यों रहते,
“मैंने तुझे कितना कुछ दिया”
“सब वापिस ले लो, और जाओ जहाँ दिल करे”
“नहीं जाऊंगा, यहीं रहूंगा, समझे”
“सब समझा, यहाँ जैसी मौज जो नहीं किसी और जगह”, पिता बुदबुदाते।
“माँ मुझे पैसे दो, मुझे रंग लेने है”, रीता माँ से बोली
“अभी पिछले हफ्ते तो तुझे रंग दिलवाए”
“वे खत्म हो गए, मुझे नए चाहिए”
“बड़ी लाट साहब की बेटी है जो खत्म हो गए इतनी जल्दी, मेरे पास नहीं कोई पैसा, अपने बाप से मांगना जब वो आए”, माँ ने जोरदार फटकार लगाई।
     रीता ढीठ बन खड़ी रही, अब वो शाम तक ऐसा ही करेगी, कुछ खाएगी नहीं जब तक नए रंग नहीं लेगी, या फिर वह मेरे रंग हथियाएगी, मुझे अपने रंगों की चिंता खाए जा रही है।
    अभी पिता खाना खाने आएंगे और या तो रीता की पिटाई होगी, रंग के लिए पैसे भी मिल सकते हैं, किसी संभावना से इनकार नहीं। रोज जितनी देर पिता खाना खाते है, उनके खाना खाते समय माँ हमारी शिकायतों का अंबार ले कर बैठ जाती, ज्यादातर पिता तटस्थ रहते, और ऐसे खाना खाते रहते जैसे वो नहीं कोई भूत बैठा, उस दिन माँ की झल्लाहट और भी बढ़ जाती, पर किसी किसी दिन तो माँ की बाते ऐसा तेज असर करती कि खाना अभी आधा प्लेट में ही होता कि पिता की डांट कब थप्पड़ों में बदल जाती हमें पता भी नहीं चलता, माँ विजयी सी आगे आती बचाने को, “अब बस भी करो” और पिता खाना अधूरा छोड़ ही चले जाते।
  दादी हल्का सा बुदबुदा देती, “खाना तो खा लेने दिया कर उसे चैन से”, और अपने कमरे में चली जाती।
     जिस दिन माँ कामयाब रहती उस दिन वो बाकी सारा दिन हमसे इतने लाड प्यार से बात करती कि बर्दाश्त करना मुश्किल होता, उसके रटे रटाए डायलॉग होते, जिनमें सबसे प्रमुख होता, “ माँ-बाप तो बच्चों का भला ही चाहते”, मुझे कुत्ते का मुँह चाटना याद आ जाता।
         उस शाम दादी हमें अपने पाले में खींचने के लिए पैसे देती, रीता आगे पीछे भी दादी से पैसे ठग लेती, कई बार दादा से भी, पर वो उनके कहने पर एक भी काम नहीं करती, उनके क्या किसी के कहने पर भी नहीं, बस ढीठ बन कहती, “अभी करती हूं” इतनी ढीठ और आलसी होकर भी वो दादा की चहेती बनी रहती, वो कहते इसका गुस्सा ठीक मेरे पिता की तरह है,
  मैं सारे काम भाग भाग कर करती, और सब कहते “कितनी सयानी लड़की है” और मैं मुसकुरा कर रीता की तरफ देखती, वो मुँह में बुदबुदाती, “नौकरानी” पर ऐसा बोल के भी वो असल में हार जाती।
          अभी पिता घर आ ही जाएंगे खाना खाने, माँ की शिकायतों और रीता के रंगों की फरमाइश के चलते मैं चुपचाप बिस्तर पर लेट गई, ताकि उनके गुस्से का सामना मुझे ना करना पड़े। हर छुट्टी वाले दिन पिता सुबह ही उठ जाते, और घर का कोना कोना साफ करने में जुट जाते। उस दिन माँ बहुत खुश रहती, वो बार बार पिता से कहती “आप रहने दो, मैं कर लूंगी”, पर पिता मुस्कुरा कर काम करते रहते, वो मुझे और रीता को भी काम देते, मैं दौड़ दौड़ कर काम करती, पर रीता अपने आलस में बोलती, “अभी करती हूं”, कई बार पिता खीझ कर कहते, “पता नहीं किस पर गई है ये लड़की” तब दादा ऐसी आवाज में बोलते जैसे कोई सपना देख रहे हो, “किसी पूर्वज पर ही गई होगी, बच्चों में उनके है गुण आते”
 लंबे और पतले पिता मुझे किसी जिराफ की तरह लगते, मेरी टीचर ने बताया था कि जिराफ गूंगे होते है, कई बार पिता भी गूंगे बन जाते, बुलाओ तो बात ही नहीं करते, और कई बार ढेर सारी बातें करते। उनके पास मेरे हर सवाल का जवाब होता था, जब मैं पूछती कि कहाँ से पता चला, तो वो बोलते किताबों से, पर किसी किसी सवाल का जवाब वो टाल भी जाते, फिर कहते एक ही दिन में सब नहीं जान सकते।
      सबसे आखिर में वो किताबों की अलमारी साफ करते, तब तक मैं थक जाती, वो थकते कि नहीं पता नहीं चलता, मैं किताब जल्दी से रखती तो वो बोलते ऐसे नहीं रखते, क्रम अनुसार रखना होता है, अल्फाबेटिकल ऑर्डर में,
इस से खोजना आसान रहता।
“इन किताबों में क्या लिखा है?” एक दिन मैंने पूछा
“दुनिया भर की जानकारी”, बताते वक़्त उनकी आंखों में अजीब चमक आई
“सब में?”
“हाँ, सब में, लेकिन सब अलग अलग बात बताती हैं”
“बताती हैं!” मुझे बड़ी हँसी आई, “फिर तो ये सब एक दूसरे में क्या है वो भी जानती होंगी”
“अरे नहीं, सिर्फ अपने अंदर क्या है, वो ही जानती है, एक किताब नहीं बता सकती कि दूसरी किताब में क्या है।“ और पिता किताबों में खो जाते।
“देख”, रीता ने जोर जोर से हिला कर मेरी नींद खराब की, “मेरे नए रंग” इतरा कर नए रंगों का डिब्बा हिलाया।
“ये तो महंगे वाले लग रहे”, मैं आधी नींद में बोली। इसका मतलब पिता आकर चले भी गए, और मुझे ये पता नहीं चला कि रीता को डाँट पड़ी या नहीं, जरूर पिता आज खुश होंगे।
   चाय के बाद माँ ने लाड़ से कहा, “प्यारी दिशु, जा छत से कपड़े उतार ला” लाड़ प्यार में या फटकार में भी दिशा का दिशू होना तय है। छत पर कपड़े उठाने गई तो रज्जी हमारे घर की तरफ आ रही थी, मैंने उसे जीभ चिढ़ाई और मुक्का दिखाया, पर वो चिढ़ी नहीं, उसने दोनों कानों को पकड़ सॉरी का इशारा किया, और आगे आ गई,
   मैं नीचे आई तो वो बोली, “देख तेरे लिए क्या लाई”, उसने मुझे एक लाल रंग का रिबन दिखाया।
“आह! कितना सुंदर, मैंने खुश हो कहा, फिर नकली गुस्सा दिखाया, “कहाँ से चुरा कर लाई चोरनी, अपने पापा की दुकान से”
“अपनी दुकान में कोई चोरी करता है, अच्छा बता ना, हिसाब का काम करवाएगी” उसने बहुत प्यार से पूछा।
“हाँ बिल्कुल, मैंने रिबन उसके हाथ से लेते हुए कहा।
रीता ने रिबन देखा तो मुझे चिढ़ाने के लिए पीछे से मुँह बना मुँह में ही बोली, “भिखारिन”
मैंने शान से रिबन लहराया और उसे किताबों की अलमारी के पास रख दिया।
दादा अपनी सीट पर बैठे थे, और दादी उसी कोने में।
मुझे लगा हम सब भी किताबों की तरह एक क्रम में है, जिन्हें यह तो पता है कि अपने अंदर क्या है, पर दूसरी किताब में क्या है यह नहीं पता…

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