कीर्तिशेष राजेंद्र प्रसाद सिंह: हिंदी नवगीतों के प्रवर्तक

मनोहर अभय

मनोहर अभय


विगत शताब्दी के छठे चरण में यूरोप के अनेक देशों के रचनाकारों में कुछ नया कर- गुजरने की ललक बढ़ रही थी। लगता था कि वे साहित्य की पारम्परिक शैली की कविता, कहानी उपन्यास और निबंध आदि से ऊब गए हैं। आधुनिकता, स्वायत्ता, स्वतन्त्रता और वैज्ञानिक सोच के बीच उन्हें एक नए आदमी का चेहरा झाँकता नजर आ रहा था जो मानो पुरानी मान्यताओं के स्थान पर समय सापेक्ष अवधारणाओं की मांग कर रहा हो। इस नए आदमी की संतुष्टि के लिए चल पड़ा "नएपन" का अभियान। साहित्य की विभिन्न विधाओं के आगे जोड़ दिया गया 'नया' ‘या 'नये ' शब्द का उपसर्ग। विदेशी साहित्य के हिंदी अध्येता, जो भारतीय काव्य शास्त्र के बंधनों से उकता गए या अधिक भिज्ञ नहीं थे, ''प्रयोग'' और ''प्रगति'' के नाम पर, जुड़ गए 'नयेपन' के इस अभियान से। साहित्य की विविध विधाओं के आगे 'नव' या ',नई' जैसे उपसर्ग जोड़े गए। कहानी हुई ''नई कहानी'', कविता 'नई कविता' और निबन्ध ''ललित निबंध''। गीत क्यों पीछे रहने लगे ? ''पारम्परिक देहयष्टि'' को तिलांजलि देकर इसका भी नया नामकरण किया ''गीतंगिनी'' (1958) के सम्पादक कीर्ति- शेष राजेंद्र प्रसाद सिंह ने। उनका कहना था: ''नयी कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे धातव्य कवियों का अभाव नहीं है,जो मानव जीवन के ऊँचे और गहरे, किन्तु सहज नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता, मार्मिकता, विच्छित्ति और मांगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज-संवार कर नयी ‘टेकनीक’ से, हार्दिक परिवेश की नयी विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं। प्रगति और विकास की दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नयी कविता की प्रगति का पूरक बनकर ‘नवगीत’ का निकाय जन्म ले रहा है। नवगीत नयी अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयता पूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्राविधि का संतुलन" भी।

राजेंद्र प्रसाद सिंह (12 जुलाई 1930 - 8 नवंबर, 2007) ने नवगीतों को ''नई कविता'' की समान्तर धारा न मानकर, उसके पूरक की मान्यता दी। जो नई कविता में नहीं है, वह नवगीतों में मिलेगा। उनकी दृष्टि से नई कविता के सात मान बिंदु हैं - ऐतिहासिकता, सामाजिकता, व्यक्तित्व, समाहार, समग्रता, शोभा और विराम। इसके विपरीत उन्होंने नवगीतों के लिए स्थापित किए पाँच मूल तत्व: यथा: जीवनदर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व -बोध, प्रीति तत्व और परिसंचय।

राजेंद्र प्रसाद सिंह ने नवगीत का नामकरण ही नहीं किया, अपितु 'नवगीत' जैसी विधा की सार्वजनिक घोषणा से पूर्व भी ऐसे गीत लिखे जो अपने समय के 'अघोषित नवगीत' थे। फिर नए से नए गीत लिख कर इस नूतन विधा को हर प्रकार से समृद्ध किया। गीतांगिनी, भूमिका’ मादिनी दिग्वधू, संजीवनी कहाँ डायरी',के जन्मदिन,शब्द यात्रा प्रस्थान बिंदु जैसे सम्पादित संकलन के अतिरिक्त उनके स्वतंत्र गीत संकलन हैं 'आओ खुली बयार', 'रात आँख मूँद कर जगी, 'भरी सड़क पर', 'गजर आधी रात का', 'लाल- नीली धारा'। उनके द्वारा सम्पादित पत्रिका गीतांगिनी(1958)तो हिंदी नवगीतों की जन्मकुंडली है।

डॉ. रवि रंजन अपने आलेख "नवगीत से जनगीत तक" में कहते हैं : ''हिंदी गीतकाव्य के इतिहास में मुजफ्फरपुर, बिहार के निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह, नवगीत के प्रवर्तक तथा एक बड़े कवि के रूप में जाने जाते हैं। ('हिंदी समय : आजादी का अमृत महोत्सव)। किसी भी भाव -धारा का प्रवर्तक वही कहलाएगा जिसने विचारोँ की खोह में पड़ी अंत:सलिला के अवतरण हेतु ऐसी जमीन प्रदान की हो जिस पर ''उड़ती धूल" न हो। यही तो लिखा था राजेंद्र प्रसाद सिंह ने अपने 'विरजपथ’ नामक गीत में ‘‘-इस पथ पर उड़ती धूल नहीं। \खिलते-मुरझाते किन्तु कभी\तोड़े जाते ये फूल नहीं। \खुलकर भी चुप रह जाते हैं ये अधर जहाँ, \अधखुले नयन भी बोल-बोल उठते जैसे;\इस हरियाली की सघन छाँह में मन खोया,\अब लाख-लाख पल्लव के प्राण छुऊं कैसे? (‘कविताएं-1956’)" वस्तुतः उनके गीतों में सामान्य- जन की पीड़ा को सम्बोधित करता सहज सम्प्रेषणीय वस्तुगत कथ्य है। कवि को लगता है कि आस- पास का सारा परिवेश विषाक्त हो चुका है। वंचना, छलना, अंधी तृष्णा से भरा आधुनिक जीवन अतृप्ति, असंतोष से दंशित है। यहाँ सत्य स्वप्न की छाया सा है। प्रपंच असंयम के बीच नैतिक मूल्य अर्थहीन हो चुके हैं। अहमन्यता सबको पतन की ओर ढकेल रही है। एक जागरूक कवि से अपेक्षा की जाती है कि वह पीड़ित अभावग्रस्त व्यक्तियों का सम्बल बने। राजेंद्र प्रसाद सिंह का कवि सारे जग की पीड़ा पीने को आतुर हैं '' मैं अरुण-नील अम्बर की\सुधा अगर पी लूँ,\तो गरल हवा का, लापत धारा की कौन पिये?\ मैं भी लूँ मुखड़ा ढाँक, घुटन की चादर से,\तो तार-तार आँचल जनता का कौन सिये?\मैं या मेरे जैसे ही सब गिरते जाएँ\तो सबको फिर सब कुछ जायेगा कौन दिये?(गीतांगिनी-1958)। जो कवि जाग्रत नहीं है। समय-असमय चादर ओढ़े सोया पड़ा हुआ है, वह दुःख- दारिद्र्य से तार-तार कातर सामान्य जन को जीवन जीने की आश्वस्ति कैसे देगा? ''घुटन की चादर'' 'मुखड़ा ढाँक' 'तार- तार आँचल जनता का' में झाँकते बिम्ब और प्रतीक किस सुघराई से दुःख-दारिद्र्य की पीड़ा को शब्दांकित करते है। कवि जनता- जनार्दन को मुक्त करना चाहता है गरीबी से, पिछड़ेपन से, अज्ञान, असस्वास्थ्य, असमानता और अन्याय से। पराई पीड़ा को आत्मसात कर गिरे- टूटे शक्ति सामंतों के पैरों में पड़े दीन हीनों को अपने काव्य का महानायक बनाने की जो तड़प राजेंद्र जी के गीतों में प्रतिबिम्बित होती है,वह उनके समकालीन अन्य कवियों में दुर्लभ थी। वे गिरे हुओं को उठाने के लिए ही प्रतिबद्ध नहीं थे। उन्हें छीजती आदमियत का दर्द भी कचोटता था। संवेदनहीन होता आदमी। पत्थर का टुकड़ा। एक उत्पाद या जिन्स। लिप्साओं से लिपटा भोक्ता। श्रुति कहती है ''तू त्याग के साथ भोग कर, गिद्ध की तरह लालच मत कर (तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृद्ध: - ईशोपनिषद)। हावी हो रहा है पदार्थवादी चिंतन। आदमी मशीन या कहें यंत्र का दास होगया है। पलंग पर लेटे- लेटे सीलिंग फेंन हो या टी वी स्वतः चलने लगेंगे बस रिमोट का बटन ही दबाना है। रोबो आपकी 'डिनर- टेबल' सजा सकता है, बच्चे को बोतल का दूध पिला सकता है। इसे कहते हैं 'पुश -बटन कल्चर'। कहीं आने -जाने की जरूरत ही नहीं फोन कॉल कीजिए सारा सामान हाजिर है 'होम डिलीवरी सर्विस' जो है। आपको नहीं लगता आदमी एकांत- वासी हो गया है। पड़ गया है अलग- थलग ''एलिनेटेड''। आधुनिकता उसे अलगाव(ऐलीलिनेशन) तथा अमानवीकरण( डी-ह्यूमैनाइजेशन) की ओर धकेल रही है। मानवीय मूल्यों से रहित मनुष्य एक पदार्थ है, संचेतना -संवेदना रहित लोहा, ताँबा, पीतल की तरह। ध्यातव्य है उनका गीत : ''ताँबे का आसमान,\टिन के सितारे,\गैसीला अन्धकार,\उड़ते हैं कसकुट के पंछी बेचारे,\लोहे की धरती पर\चाँदी की धारा\पीतल का सूरज है,\राँगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा,\सोने के सपनों की नौका है\गन्धक का झोंका है,\आदमी धुएँ के हैं,\छाया ने रोका है,\हीरे की चाहत ने\कभी-कभी टोका है,\शीशे ने समझा\कि रेडियम का मौका है\धूल ‘अनकल्चर्ड’ है,\इसीलिए बिकती है-\- ‘ज़िन्दगी नहीं है \यह- धोखा है, धोखा है’\बैजनी साँझ ने पाँव छुए चंदा के,\छूती सूरज के चरण उषा नारंगी;\यह एक परिधि पूरी होती अनुभव की\मेरा सारा आकाश चकित-विस्मित है!'आदमी धुएँ के हैं' (परिधि का गीत)।

इस गीत ने तत्कालीन समलोचकों के बीच खलबली मचा दी। जहाँ लक्ष्मीकांत वर्मा ने इसे ''निर्थक और टूटे हुए बिंबों का ढेर'' घोषित किया तो कैलाश वाजपेयी ने कहा :कि "नवीनता के नाम पर इस युग के कवि विचित्र उत्प्रेक्षाएँ करते हैं, उन्हें आसमान ताँबे का और सितारे टिन के बने दिखाई देते हैं"। मुद्राराक्षस को गीत में प्रकृति से उठाए प्रतीक और बिम्ब अव्यवस्थित लगे। फिर भी उनकी सम्मति संतुलित थी " नया कवि जब भाषा में कुछ सर्वथा नया कहना चाहता है या अर्थ को कोई नया आयाम देना चाहता है, तो वह कृति के तत्वों को बेतरतीब (डिस्टोर्शन)करता है। यह बेतरतीबी कविता के तत्वों को सामान्य से कुछ विशेष बना देती है। इस रचना की बेतरतीबी को मैं प्रतीक या 'बिंबदेशीय' की संज्ञा देना चाहूँगा। फिल्मी सेट या नाट्यमंच की सजावट में नकली फूल-पत्तों,पक्षियों यहाँ तक कि मिटटी या काठ के नारी- पुरुष की 'डमी' प्रयोग में लाई जाती हैं। अपनी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए मुद्राराक्षस ने कहा ''पक्षी को अगर जिंदगी की उड़ान का प्रतीक मानें और फिर उसी पक्षी को कसकुट का देखें, तो सिर्फ एक अर्थ प्रतिपाद्य लगता है - जिंदगी की संभावनाएँ, ऊँची उड़ानें मात्र' डमी' रह गई हैं। स्वाभाविकता या वास्तविकता से विच्छिन्न होने का यह उदाहरण सिद्ध करता है कि सामान्य प्रतीक एक विशिष्ट जीवन का संकेत देना चाहते हैं - जीवन जो झूठा है, बनावटी है, दिखावटी है। शाब्दिक अर्थ की अपेक्षा यह लय-विच्छिन्नता, संभावनाओं से विच्छिन्न जिस जीवन को संकेतित कर रही है, वही रचना का मुख्य प्रतिपाद्य है। "इस तथ्य का खुलासा कवि ने स्वयं किया यह कह कर कि ''ज़िन्दगी नहीं है \यह- धोखा है, धोखा है’\। वस्तुतः न इस गीत में किसी तरह की अव्यवस्था या बेतरतीबी (डिस्टोर्शन) बल्कि बनावटी जिंदगी अलगाव (ऐलियनेशन) तथा अमानवीकरण (डी-ह्यूमैनाइजेशन) का शब्दांकन है, नवीनतम प्रतीकों, बिम्बोंऔर उपमानों के द्वारा। राजेंद्र जी के गीत संकलन ' उजली कसौटी'(1969) में संग्रहीत इस गीत पर डॉ रविरंजन कहते हैं कि ''यह रचना अमानवीकरण के संदर्भ में है, जिसे आगे चलकर साठोत्तर काव्यांदोलनों ने अपना कथ्य बनाया''। इस मील के पत्थर तक पहुँचने से पहले राजेंद्र जी की गीतयात्रा के अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव हैं, जो नवगीतों की प्रशस्ति और प्रयोगधर्मिता को प्रशस्त करते हैं।

राजेंद्र जी ने नवगीतों की जो तात्विक विवेचना की है, वह उनके गीतों में झाँकती मिलेगी। यहाँ प्रीति तत्व के मनभावन गीत हैं प्रकृति प्रेम में मानवीय प्रेम की मधुर व्यंजना है। सांध्य वर्णन है :बैजनी साँझ ने पाँव छुए चंदा के,\छूती सूरज के चरण उषा नारंगी;\यह एक परिधि पूरी होती अनुभव की,\मेरा सारा आकाश चकित-विस्मित है!\...गोधूलि याद आती, वह जादूगरनी,\छूकर, सूरज को चाँद बनाने वाली;\.वह सॉझ,- भुलाती नहीं पुजारिन कोई-\चितवन से मन्दिर – दीप जलाने वाली,\.वह रात,-चाँदनी पहन भटकती मालिन,\वीरान दयारों को दुलराने वाली!\इन ओस-कणों में बीज स्वप्न के बोकर,\कुहरे में अपना जादुई तन खोकर-\फिर सूरज धन्य हुआ जिसके स्वागत में,\मेरे सागर में वही उषा बिंबित है!\...इस एक परिधि में दो बूँदों का सागर,\तिर रहीं बिकी, विच्छिन्न फूल-मालाएँ;\...तट पर बजती जंजीर–बंधी शहनाई\सुलगाती मंद हवा जल में ज्वालाएँ;\...बन–बन कर मिट जातीं गीताभ गगन में\लालसा-भरी, बादली रंगशालाएं!\जादू की लाली, अंतर की उजियाली\आभा,-सोया विश्वास जगाने वाली-\घुल रहीं सभी गौरव की अरुणाली में,\मेरे तन-मन में वही विभा पुलकित है''!(हिंदी कविता कोश)

ऐसे गीतों में जब लोक तत्व ध्वनित होता है तो गीत का सौंदर्य देखते ही बनता है --पूनम को मैंने न दियना जलाए\इस मावस के इंतजार में\ आँगन, रात भर अधूरे ही बोल रहे चुप मेरे मन। है !उधर जाएँ न हिय के सत धार में \बस रह गई इसी विचार में\चंदन की रात कभी बीत गई \किसी तरह यों, काजल की रात भी करेगी यह \उसी तरह क्यों \ऐसे आए कि पिया हो गए पराए\मुरझा गए दिए कतार में \इसी मावस के इंतजार में (खुली वायर)। इसी क्रम में 'करुण आँसुओं से बने हैं \तरल वेदना के सजल गीत मेरे ' या 'चाँद है मेरा नभ में \मगर तुम धरा पर, चाँदनी हो' (भूमिका)

प्रीति तत्व में केवल मानवी या प्रकृति प्रेम नहीं अपितु इस से संबंधित घर, परिवार, समाज और व्यक्ति का अपना जीवन तथा प्रेम की बदलती अवधारणाओं पर ताजे- टटके गीतों की कमी नहीं हैं। दाम्पत्य संबंधों के धागे कोई और बुनता है। घर परिवार के बुजुर्ग। जन्मकुंडली देखने-बनाने वाले पंडित। मन किसी और से बंधा है, तन किसी और का होने जा रहा है। चलते -चलते भोक्ता यही कहेगा न ''लेलो जी !अपना भाग \कल ये हाथ पराए होंगे \आँगन की मिट्टी की मँह- मँह\ चंदन चुक जाएगा\पिंजरे में बैठ \सुआ पाँखी \सरगम तक रुक जाएगा\गौरइया दर्पण द्वार न खटकाएगी\ लेलो जी! कल ये चषक जुठाए होंगे"। इसी अनुभूति को स्वर प्रदान करता एक और गीत है "खोलो जी,सुबक नयन खोलो --यह उजड़ा सा नीड़ तुम्हारा \बस, टूटा पेड़ सहारा \तूफानों से लड़ कर भी जो न कभी भीतर से हारा \डालें कहतीं सुधापान को \विष से होँठ भिगो लो जी (रात जगी आँख मलते)

मानव मूल्यों के क्षरण की जब बात करते हैं तो उस संवाद में प्रेम को दैहिक संबंधों या सेक्स तक सीमित रह जाने की चिंता गहराती है, टूटते- बिखरते दाम्पत्य जीवन की दुर्दशा देख कर। ''जल गुफा का द्वार आखिर ढह गया \आइना ''मैं" नई सभ्यता की देही \तुम क्या हो फैशन के नए कलेवर में जो बढ़ती रही दुराशा \मैं पलती रही उसी में \अधिकारोँ के हर तेवर का \जो चलता रहा तमाशा \मैं ढलती रही उसी में \अब "मैं" तनाव की छवि ने ही \तुम क्या हो''। आधुनिकता की समता -मूलक वैचारिकी में जरूरी है कि सब समान धरातल पर हों। विशेषतः नारी और पुरुष की सत्ता समान हो। किन्तु क्या दिया है आधुनिकता ने? नारी- पुरुष मात्र देह की दहलीज पर खड़े हैं --''मैं नई सभ्यता की देही \तुम क्या हो फैशन के नए कलेवर में\ जो बढ़ती रही दुराशा \मैं पलती रही उसी में\अधिकारोँ के हर तेवर का \जो चलता रहा तमाशा''। अधिकारों और कर्तव्यों के इस अंतर्विरोध में कितने ही परिवार विखंडित नहीं हुए। खटास भरी अनुभूतियों ने अपहृत कर ली कितने ही दाम्पत्य जीवन की मिठास। ''जल गुफा का द्वार आखिर ढह गया'' अर्थात शुचिता, शीतलता और सुख की छाया देने वाला घर ध्वस्त होगया, अहंकारों के टकराव में।
नारी के बदलते रूप, उसके विचार, रहन -सहन तथा पुरुष से अलग स्वतंत्र पहचान बनाने की उत्कंठा को लेकर जो राजेंद्र प्रसाद सिंह विगत सदी के पांचवें दशक में लिख गए, वह आज के कवियों का विशेष मुद्दा है। द्रष्टव्य है नवगीतों की समृद्धि के लिए समर्पित पूर्णिमा वर्मन की रचना : "बिंदी जो कभी थी एक बूंद रक्त \होती गई बड़ी समय के साथ\इतनी बड़ी कि\औरत ने उसे उतारा\और टांग दिया आसमान पर\सूरज की तरह\अब वह सूरज उसकी राहों को\रोशन करता है\हँसुली बरसों तक\जो लटकी रही गले में\अचानक एक दिन इतनी भारी लगी\कि औरत ने उसे उतारा\और टांग दिया आसमान पर चाँद की तरह \ओह! मन ऐसा शीतल हुआ कि\जैसे चंद्रकिरण समा गई हो\भीतर तक\किसी को पता नहीं चला ''। समय के साथ औरत हो गई कितनी ऊँची कि अपनी ही बिंदी अपनी ही हंसुली\आसमान पर टांग\अपनी राह खोज ली उसने\खोज ली अपनी शांति\लोग नहीं जानते\जो दूसरों के लिये खटने वाले अपना भी कर सकते हैं कायापलट! (आसमान पर बिंदी कविता कोश)

यह सब आधुनिकता की देन है। आयातित संस्कृति का पैकेज। राजेंद्र जी तो आधुनिकबोध में भारतीय संस्कारों तथा लोक संस्कृति की बात करते थे। 'उजली कसौटी' में संकलित 'उषा स्तवन' वैदिक प्रार्थना के समतुल्य है। वे जब व्यक्तित्वबोध की बात करते हैं तो उसमें सामान्य जन के साथ सामूहिक सापेक्षता का बोध भी है। द्रष्टव्य उनके जनवादी गीत का अंश:"ओ भैया, न साधू ना चोर \हम मुँह जोर\झुगी वाले \ चटकल की चिमनी ने \आज तरेरी आँखें\मिल की भट्टी\आग लहू का भेद मिटाती\करखनिया मजदूर \इक्ठे हिम्मत से भरपूर \नशे में चूर, --कबीरा गाते"। लक्ष्मीपतियों पर किया कटाक्ष देखिए 'लछमी जी सदा सहाय'\उधर आँखें हैं सोने की\गड्डियों में कीमत चुकती\खिलखिलाने या रोने की \न अहसासों का कोई मोल\न कुछ मजबूरी की परवाह\न ऐसी नन्ही-नन्ही खुशी\न ऐसी उम्र खींचती आह। \× × ×\इधर है पड़ी गरीबी गले\जिधर सीने हैं फौलादी,\पसीना बिकता अपना रोज,गैर की होती आबादी !\न अरमानों के खिलते फूल\न उम्मीदों की बढ़ती बेल,\गरीबी फाँक रही जो रेत,\अमीरी उसे बनाती तेल"। इस गीत में लय है, गेयता है और छान्दिक कसाव।

राजेंद्र जी मार्क्स से प्रभावित नहीं थे। उनके गीतों में भोगी हुई जन पीड़ा है। इसीलिए आदमीउनके लिए केवल आदमी है, धर्म जाति वर्ग मत -मतान्तर से ऊपर। जिस शिद्द्त से फौलाद पिघलाते ''करखनिया'' मजदूरों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई, उसी जोश- खरोश से दफ्तरों में फाइलें निबटाते, टाइप राइटर \कम्प्यूटर पर काम करते छोटे- बड़े बाबू और ऊँची कुर्सी पर बैठे अफसर की दिनचर्या भी रेखंकित की। मशीनी जिंदगी जीते ये कैसे काटते हैं पूरा दिन। पढ़िए गीत 'सुबह दुपहर शाम' : शाम ढली \चले कुचले से हम राहों पर \छुट्टी पाते ही घिर आई धरा नशीली \जोत रंगीली \बिन बरसे गहराई \बंध चले \सभी आरोप से \दर्पण को लेते चूम \निरे आरोप से (भरी सड़क पर)। महानगरों में स्थापित होते विस्थापित उनके लिए मानो जलते हुए फूल हों : -''महानगरी के गगन का \एक तारा \धूमिल गगन में वास \धूसर हवा में सांस \चुपचाप जलता फूल \बिम्बित दहकती प्यास। घुटन के तम में जला है दीप धीरज का \यातनाओं में पला वह शौर्य हारा--दण्ड पा\अपराध सीखे जंतु न्यारा \एक तारा'' (भरी सड़क पर)। ऐसे गीतों में एक ओर महानगर का नारकीय जीवन है तो पूंजीवाद की दारुण अवहेला, आधुनिकता की चमक- दमक की असलियत और मानवी गरिमा का अन्तर्विरोधी अनुभव है।

गहरी से गहरी अनुभूति को सहज सरल तथा देशज शब्दोँ से अलंकृत भाषा में सम्प्रेषित करने की राजेंद्र जी प्रवीणता वरेण्य है। शब्द या अर्थ की लय के स्थान पर वे प्रधानता देते हैं 'मनोलय' को। अर्थात रचना की प्रक्रिया में रचनाकार की समग्र मनःस्थिति की लय उद्घाटित हो। उनके शब्द हैं :"नवगीत की बेधकता इसी में है कि उस समग्र मनःस्थिति की लय को, भाषा के विन्यास में, कथ्य की काट-छाँट और अर्थ की लय के हावी होने से बचाकर पूरे अनुभव के ही केंद्रण के द्वारा, अधिकाधिक संक्रमणशील बनाया जाए। "वे बल देकर कहते हैं किअनुभव और अभिव्यक्ति के बीच संतुलन हो। अभिव्यक्ति के प्रति सम्मोहन से "चमत्कार तो उत्पन्न हो जाता है, पर उसके द्वारा घनीभूत अनुभव सही- सही अभिव्यक्त नहीं हो पता''। मनोलय से कथ्य कहीं अधिक जीवंत हो उठता है। कल्पना कहीं अधिक सजीव --''लहरों की आग रुपहली ओ s s पुरवाई \एक मौन से हार गई शहनाई' --\'चाँद बिना आसमान डूब गया धारा में\लहक भी न उठती तो हाय!क्यों न बुझती अब इन ठंडे शोलों की अंगड़ाई में ''। यहाँ रुपहली आग पूर्वा हवा के झौंके से आलोड़ित प्रणयी की स्मृति है। ठंडे शोलों की अंगड़ाई नदी में लहराती तटवर्ती प्रकाश पंक्तियाँ। इसी तरह शहनाई की एक धुन का हार जाना, टूटे हुए दाम्पत्य सूत्र का बिम्ब है।

राजेंद्र प्रसाद सिंह की रचना धर्मिता जितनी सम्पन्न है, उतनी ही प्रभावी रही प्रस्तुति। डॉ रवि रंजन के शब्दों में : ''संभवतः 1985-86 में पटना साइंस कॉलेज के सभागार में 'जनसंस्कृति मंच' के एक कार्यक्रम में पहली बार मैंने उन्हें जनगीत गाते सुना,- भैया, कूदे उछल कुदाल,\ हँसियाँ बल खाये, \भोर हुई, चिड़ियन संग जागे,\खैनी दाब, ढोर संग लागे,\आँगन लीप, मेहरिया ठनकी,\दे न उधार बनियवां सनकी,\कारज-अरज जिमदार न माने,\लाठियल अमला विरद बखाने.\ भैया, तामे भूख किवाल,\ तिरखा कटखाये, \“साँझ भई, नहिं आय मुरारी,”\-भैया, कूदे उछल कुदाल हँसिया बल खाए' (गज़र आधी रात का,पृ.32)अब पढ़िएसमकालीन मार्क्सवादी केदारनाथ अग्रवाल (01 अप्रैल 1911-22 जून 2000) का गीत है: "यह बाँदा है। सूदख़ोर आढ़त वालों की इस नगरी में,\जहाँ मार, काबर, कछार, मड़ुआ की फ़सलें,\कृषकों के पौरुष से उपजा कन-कन सोना,\लढ़ियों में लद-लद कर आ-आ कर,\बीच हाट में बिक कर कोठों-गोदामों में,\गहरी खोहों में खो जाता है जा-जा कर,\और यहाँ पर\रामपदारथ, रामनिहोरे,\बेनी पंडित, बासुदेव, बल्देव, विधाता\चंदन, चतुरी और चतुर्भुज,गाँवों से आ-आ कर गहने गिरवी रखते,\बढ़े ब्याज के मुँह में बर-बस बेबस घुसते,\फिर भी घर का ख़र्च नहीं पूरा कर सकते,\मोटा खाते, फटा पहनते,लस्टम-पस्टम जैसे-तैसे मरते –खपते"। सीधा सपाट कथ्य। सीधी सपाट भाषा। न गेयता,न लय और छान्दिक कसाव।

विश्व विख्यात चित्रकार बिमल बिश्वास को राजेन्द्रपसाद सिंह का सामीप्य ही नहीं, उन्हें निकट से सस्वर सुनने के दुर्लभ अवसर भी मिले।

अनौपचारिक बातचीत में उनसे (इस लेखक को)गीत सुनने का सौभाग्य मिला। प्रस्तुत है एक गीतांश : ''इस नये गाछ के तुनुक तने से पीठ सटा\अपने बाजू पर \अपनी गर्दन मोड़ो तो;\मुट्ठी में बाँधे हो\ जिस दिल की चिड़िया को,\उसको छन भर इस खुली हवा में छोड़ो तो,\फिर देखो, कैसे बन जाती है\कौन दिशा अनुकूल नहीं"। इस गीतांश में कितने जीवंत बिम्ब हैं, जरा गिनिए और नारी मुक्ति के प्रच्छन्न संदेश टटोलिए। यात्रा पर निकलने से पहले कभी ''दिशा-शूल" (वह घड़ी, पहर जिसमें किसी जगह जाना अशुभ माना जाता है)ज्ञात करने का प्रश्न उठता था। इस परम्परा पर प्रहार करते हुए राजेन्द्रजी कहते हैं जिस दिल की चिड़िया (अपनी प्रिया) को वन्दी बना रखा है, उसे क्षण भर के लिए खुली हवा में छोड़ कर तो देखो, फिर पता लग जायेगा कि इस वंदिनी के लिए कौन सी दिशा अनुकूल या प्रतिकूल है।

राजेन्द्रपसाद सिंह के प्रारम्भिक गीतों में आंचलिक भाषा का लालित्य देखते ही बनता है; जैसे ''गा मंगल के गीत सुहागिन चौमुख दियरा बाल के\ सम्मुख इच्छा बुला रही / पीछे संयम-स्वर रोकते,\धर्म-कर्म भी दाएँ-बाएँ/रुकी देखकर टोकते, \अग-जग की ये चार दिशाएँ / तम से धुँधलीदिखती,\चतुर्मुखी आलोक जला ले / स्नेह सत्य का ढाल के\ दीप-दीप भावों के झिलमिल / और शिखाएँ प्रीति की, \गति-मति के पथ पर चलना है / ज्योति लिए नव रीति की,\यह प्रकाश का पर्व अमर हो / तम के दुर्गम देश में\चमकी मिट्टी की उजियाली नभ का कुहरा टाल के। " देशज शब्द ''दियरा'' इस गीत की केंद्रीय शक्ति है। इतनी शक्ति न 'दीप' में है न 'दिवला' में। इस गीत की समीक्षा करते हुए प्रसिद्ध समीक्षक रामनरेश पाठक ने कहा यह '' दीप-गीत नई पीढ़ी की आशा-आकांक्षा का हौसला-भरा मंगल नर्तन है। वे इसे राजेंद्र प्रसाद सिंह का 'प्रथम नवगीत-बीज' मानते हैं। इस गीत से गुजरते हुए याद आया नरेन्द्र शर्मा का दीप-गीत : "चौमुख दिवला बाल \धरूँगी चौबारे पर आज,\जाने कौन दिशा से आवें\मेरे राजकुमार?" दोनों गीतों की तुलनात्मक समीक्षा करते हए रामनरेश पाठक कहते हैं कि हमें समझना होगा कि '' इस रचना में (राजेंद्र जी के गीत से)) लोक-प्रचलित बिंब 'चौमुख दियरा’ तो ले लिया है, मगर काम उससे भावुकता का ही लिया है। नरेंद्र शर्मा की सीमा को पीछे छोड़ कर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने उस दीपक के चारों दिशा-मुखों से जुड़े लोकधर्मी प्रतीकार्थों को उजागर करने का काम किया है"।

रामनरेश जी भूल गए कि राजेन्द्र प्रसाद सिंह भी अपने गीत में ''और शिखाएँ प्रीति की,\गति-मति के पथ पर चलना है / ज्योति लिए नव रीति की'',। जब शिखाएं प्रीति की हैं, ज्योति नव रीति की है तो नरेंद्र शर्मा के माथे ''भावुकता''का टीका क्यों थोप दिया। नरेंद्र जी के गीत का वाचक है प्रोषितपतिका, जो चाहती है कि उसका प्रतीक्षित प्रकाश के अभाव में कहीं भटक न जाय। नरेन्द्र जी ने कुछ भी उधार नहीं लिया। वे दीप को दियरा नहीं, दिवला कहते है (अति लघु दीप) ‘चौमुख दिवला’ दहलीज पर नहीं, तुलसी चौरे पर भी नहीं अपितु चौबारे (घर की खुली छत)पर ऐसे धरेगी कि दूर से ही चतुर्दिक प्रकाश दिखाई दे। जब प्रकाश चतुर्दिक फैलेगा, तो केवल प्रतीक्षित ही नहीं, चारोँ दिशाओं से आने वाले लाभन्वित होंगे। यह प्रकाश सबके लिए मंगलमय होगा। दूसरी बात, राजेंद्र जी मंगल गान के लिएआमंत्रित करते हैं सुहागिन नारियों को ''गा मंगल के गीत सुहागिन चौमुख दियरा बाल के''। वैधव्य झेलती महिला को मंगल गीत गाने के लिए निमंत्रित क्यों नहीं किया ?। भारतीय समाज में सारे मांगलिक कार्य सुहागिन के लिए आरक्षित हैं। विधवा की तो परछाईं भी नहीं पड़नी चाहिए राजेन्द्रजी से अपेक्षा थी कि वे बेढव रीती- रिवाजों विकृतियों वर्जनाओं, परम्पराओं -संस्कारों पर प्रहार करेंगे। विधवाओं को 'मंगल के गीत,' गाने से वंचित कर, विकृत परम्परा का पोषण ही किया, जिस से नव्यता के पोषक को बचना चाहिए था।

किंतु, इतने से नवगीतों के प्रवर्तन के प्रति राजेन्द्र प्रसाद सिंह के अवदान को कम नहीं आँका जा सकता। राष्ट्रकवि दिनकर ने ज्ञानपीठ सम्मान ग्रहण करते समय राजेंद्र प्रसाद सिंह को नवगीतों का प्रवर्तक कह कर सम्बोधित किया। इस सम्बोधन में कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। राजेंद्र प्रसाद सिंह न केवल नवगीतों के प्रवर्तक रहे, अपितु इस नूतन विधा को समृद्ध करने में उनका योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। डॉ. शिवदास पांडेय (हिंदुस्तान में प्रकाशित अपने आलेख में) लिखते हैं :' 'नवगीत के प्रवर्तक, कवि व साहित्यकार राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने आप में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था थे। उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और लगन से एक ऐसा सकारात्मक माहौल तैयार किया जिसमें बहुत सारे कवियों और साहित्यकारों का जन्म हुआ। प्रसिद्ध साहित्य सेवी डॉ. रेवती रमण कहते हैं कि राजेंद्र प्रसाद सिंह की कविता मनुष्यता की वकालत करती है। उन्होंने सबसे बड़ा धर्म मनुष्यता को माना। सामंती प्रतिमानों को तोड़ने का काम किया। (देखें हिंदुस्तान28 सितम्बर 2021) गीतकवि मधुकर अष्ठाना के विचार से सर्व प्रथम गीति रचनाओं में नूतनता का समावेश हमें वर्ष 1955 में अज्ञेय के सम्पादन में प्रकाशित द्वितीय तारसप्तक में दिखाई पड़ता है जिसकी पुनरावृति वर्ष 1958 में राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा सम्पादित संकलन (गीतांगिनी) में प्रकाशित गीतों में होती है, जिन्हें सर्वप्रथम नवगीत अथवा नए गीत की संज्ञा दी गई। तत्कालीन परिवेश में उक्त काव्य संकलन ने इतना प्रभावित किया कि अनेक पत्रिकाओं ने वैसे ही गीतों के विशेषांक प्रकाशित किए (नवगीत: नई दस्तकें -- सम्पादक निर्मल शुक्ल ’। श्री नचिकेता कहते हैं: ''यह एक ऐतिहासिक सचाई है किअविरल प्रवाहित गीत-धारा के गर्भ से, आधुनिकता के दवाब से और जनगीत के दो समानांतर पाटों के बीच से होकर बहने वाली एक नई गीत-धारा प्रस्फुटित हुई, जिसे वर्ष 1958 में 'गीतांगिनी' के सम्पादन- क्रम पहली बार नवगीत की संज्ञा से अभिहित कर पहचानने और परखने की चेष्टा राजेंद्र प्रसाद सिंह ने की'' (प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत)। श्री नचिकेता ने ''नवगीत की संज्ञा से अभिहित कर पहचानने और परखने की चेष्टा'' की ही बात कही नवगीत के प्रवर्तन की नहीं। उनके विचार से किसी काव्य- धारा या साहित्यिक परम्परा का कोई प्रवर्तक नहीं होता।

इसके अतिरिक्त अन्य किसी नवगीतकार ने राजेंद्र जी को नवगीत के प्रवर्तककी प्रतिष्ठा प्रदान नहीं की। करते भी क्यों उनके सारे अनुवर्ती चाहे डॉ. देवेंद्र शर्मा इंद्र हों या कोई और प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने को पुरोधा ही नहीं प्रवर्तक पद से नीचा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

नवगीतों के भारी -भरकम ग्रंथोँ में मायक्रो- लेंस लगा कर भी राजेंद्र जी का एक भी गीत पढ़ने को नहीं मिलेगा, जबकि नवगीत की जगह ''नवांतर'' के प्रवर्तक के गीतों को प्रतिष्ठा मिली। जिन्हें स्थान देना था, उन्हें छोड़, ऐसों को प्रतिष्ठा दी गई जो उसके अधिकारी नहीं थे। शीर्ष नवगीतकार डॉ. माहेश्वर तिवारी ने एक साक्षात्कार में गीतकवि योगेंद्र व्योम के ऐसे ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा ''यह बात बिल्कुल सच है कि नवगीत दशक तथा नवगीत अर्द्धशती में कुछ महत्वपूर्ण रचनाकार छोड़ दिए गए या छूट गए। ऐसा तारसप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक में भी हुआ था और पिछले दिनों साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘श्रेष्ठ गीत संचयन’ में भी यह कमी पाई गई। --- नवगीत दशक (एक) के प्रकाशन के बाद स्व. ठाकुरप्रसाद सिंह ने सबसे पहले इस बात को लेकर एतराज किया था कि उसमें कुछ ऐसे नाम हैं जो नहीं होने चाहिए और कुछ ऐसे महत्वपूर्ण नाम हैं जो होने चाहिए थे"। डॉ. रवि रंजन कहते हैं :'' जमींदार परिवार में जन्म लेने (जिनमें से ज्यादातर जमीन-जायदाद उनके जन्म के पहले से तरह-तरह की मुकदमेबाजी में फँसी थी) और मुजफ्फरपुर जैसे एक छोटे-से शहर में आजीवन रहने के चलते वे हिंदी जगत की उपेक्षा एवं कई बार येन-केन-प्रकारेण हरदम छोटा-बड़ा पुरस्कार पाने के लिए जुगाड़- भिड़ाने और पैसा बनाने की फिराक में लगे तथा कथित साहित्यिकों के द्वारा उपहास के शिकार भी हुए"। 'उपहास' नहीं, शिविरबद्धता अथवा खेमेवाजी के कारण, उपेक्षा के पात्र हुए। राजेंद्र जी के सार्थक प्रयत्नों से जब नवगीत लोकप्रियता के शीर्ष पर थे, तब बहुत से कवि नई कविता के पोस्टर बॉय बने हुए थे। ये ही यकायक लिखने लगे 'समय की शिला पर मधुर चित्र कितने,\किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए'। ऐसे सृजनधर्मियों ने ही "समय की शिला" पर पहला नवगीत लिखने वाले को "मिटाने" की जी तोड़ कोशिश की और स्वयंभू की तरह स्वयं को ही नवगीतों का प्रवर्तक, प्रवक्ता प्रस्रोता घोषित कर दिया। लेकिन इतिहास को झुठलाना इतना आसान नहीं है और न राजेंद्र प्रसाद सिंह के कद को घटा पाना।

1 comment :

  1. मेरे आलेख को प्रकाशित करने के लिए सेतु के यशस्वी सम्पादक श्री अनुराग शर्मा और उनके सहयोगियों को आत्मीय आभार| सादर
    नोहर अभय

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