चार कविताएँ: अनुपमा मिश्रा

अनुपमा मिश्रा
कविता 1

भाता नहीं बात करना किसी का
एक गहरी चुप्पी पर मोहित है मन
एक पीड़ा पर मंत्र-मुग्ध है
अधूरी पड़ी कलाकृति पर सम्मोहित,
उदासी निराश्रित है इसलिए
एक आह को भी अपना लेता है मेरा हृदय
जिसे बार-बार पाषाण की संज्ञा दी गयी,
पुराने लोग, पुरानी बातें, गुज़री यादें
खींचती हैं मुझे,
एक पुरातन खंडहर में महफूज़ हूँ मैं
झाँकती हूँ तो बाहर खिले हुए हँसते चेहरे हैं हर तरफ
मैं खुद को खोने के डर से
दरवाजा बंद कर लेती हूँ।
***


कविता 2

शरीर काँपता हुआ
अपने लिए अंत की माँग कर रहा था
आकाश में तारे थे
ईश्वर नदारद,
जिह्वा मौन बुन रही थी
शब्दों का मूल्य समाप्त हो चला था
लगा था मृत्यु ने बाज़ी मार ली है
बचा ही क्या था
अहसास मृत होकर गिर रहे थे
कहीं कम्पन नहीं
कोई ध्वनि नहीं
हर ओर निस्तब्धता,
धुंधला देखते देखते आँखें थककर
ढेर हो जाना चाहती थीं
हृदय सुन्न पड़ रहा था
गति धीमी,
नसें जमनी शुरू हो गयीं थी
मन मस्तिष्क भावना शून्य,
मोह खत्म हो रहा था
लगता था
शून्य में निहारते हुए
प्राण प्रयाण करेंगे,
पर कौन कह सकता है
अगला क्षण मृत्यु के पाले में गिरेगा
या जीवन की झोली में
कहीं से एक हल्की लौ ने दस्तक दी
धीमी आँच आत्मा को सेंकती रही
वर्षों से जमा हुआ बर्फ
पिघलने लगा
चेतना आने लगी
लगा बसंत आ गया 
पुनः जी उठने को।
***


कविता 3

उसी तरह उदास हूँ
जैसे माँ की गोद से उतारा हुआ बच्चा
रुँधे हुए कंठ में
रुका हुआ स्वर हूँ,
पर रोशनी के कतरे की दया पर ज़िंदा नहीं हूँ
अंधेरे के कोप से डरती नहीं
शब्द मुझे मोहते नहीं
मुझे खर्च देते हैं
मौन साधता है मुझे
बचा लेता है,
अकारण आई हुई हँसी हूँ
व्यर्थ सी
बेमतलब सी व्यय कर दी गयी,
कीमती नहीं हूँ उसी तरह
जैसे किसी शोरूम में सजी
सुंदर वस्तुओं के बीच
एक पुराना बंद पड़ा लालटेन,
सहानुभूति के शब्दों पर आश्रित नहीं जीवन मेरा
काँटों के बीच फूल रही बेल हूँ।
***


कविता 4

चारों ओर हँसी बिखरी पड़ी थी
मैंने आँसू चुने
अपना मन अपना न रहे
ये जतन मैंने खुद किये,
मैं अपने आप में रहना जानती थी
पर मुझे तुम्हारी
आत्मा में समाहित होना था
फिर कैसा शरीर?
और कैसा उसका मोह
एक- एक कतरा रक्त का
मैंने बड़े प्रेम से बहाया
अपनी हड्डियों से नाव बनाई
तुम तक पहुँचने को,
बड़ा शौक था मुझमें
तुम्हारे लिए समाप्त हो जाने का
तुम बहुत दूर थे
हालांकि दृश्य कुछ ऐसा था कि तुम बहुत करीब दिखते थे
पर तुम सागर के उस पार थे,
मेरी आँखें डूब रहीं थीं
इन्हें देखना था तुम्हें करीब से
इन्हें डूबना था, मगर ऐसे नहीं
तुम्हारी आँखों में डूबना था,
तुम नहीं मिले
तुम्हारी आवाज़ गूंजती रही
तुम्हें ऐसे नहीं डूबना था पगली।

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