अँधेरे के विरुद्ध युद्ध में एकजुटता का आव्हान करते गीत

वेद प्रकाश अमिताभ


गीत निजी दुख-सुख, राग-विराग, हर्ष- विषाद की कोख से जन्मा जरूर है, लेकिन 'दुख की बदली' स्व तक सीमित न रह कर 'पर' तक उमड़ती-घुमड़ती है- 'सबका क्रंदन पहचान चली'। गीतकार की पीर उसे निस्संदेह गमगीन करती है, लेकिन दूसरों की आँखों के नीर तथा हर पाँव की जंजीर से वह और भी व्यथित हो जाता है | डॉ. मनोहर अभय के नवगीतों में यदि 'उत्पीड़ित के मार खाए चेहरे का बिम्ब' (राघवेन्द्र तिवारी) स्वत: उभरता है या उनके गीत 'निरंतर व्यवस्था की नुकीली दुरभिसंधियों पर अपनी मानकी शैली में प्रहार करते हैं' (डॉ. शांति सुमन) तो ये उनकी गीतधर्मिता की गहराई और विस्तार-दोनों के द्योतक हैं। अनुभूत सत्यों से सिरजा गया गीत-यथार्थ समय और समाज की कुरूपताओं और विडम्बनाओं को अनदेखा नहीं करता और उससे निथरा हुआ 'विजन' क्रांतदर्शी होने की गवाही देता है। 'आदमी उत्पाद की पैकिंग हुआ' और 'टूटेंगे दर्प शिलाओं के' उनके चर्चित नवगीत-संग्रह हैं। पहले का शीर्शक आज के बाजारवादी दौर में आदमी की नियति का बयान है,जबकि दूसरा नवगीतों के समवेत विजन का व्यंजक है।

डॉ. मनोहर अभय
डॉ. अभय के नवगीतों की बुनावट में 'अँधेरा' और 'प्रकाश' का कंट्रास्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 'तिमिर के प्रहरी निरंतर/पी रहे हैं वारुणी', 'मजलिस अँधेरे की लगी', 'अँधेरा ओढ़ कर सोया', 'ये अँधेरा जानलेवा/पी गया है बस्तियाँ',' अँधेरे कर रहे अँधेर', 'बहुत पीचुके घने अँधेरे' आदि में 'अँधेरा' बहुआयामी है और आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक विसंगतियाँ और भयावहताओं के प्रतीकार्थ लिए हुए है। भूख, अभाव, उत्पीड़न, अज्ञानता, जड़ता, संबंधाभाव आदि स्थितियाँ इस देश व्यापी अँधेरे में संश्लिष्ट हैं। गीतकार ने जहाँ-तहाँ संकेत दिया है कि अन्याय, विषमता, भेदभाव को बढ़ाने वाली व्यवस्था ने अँधेरे के वर्चस्व को और घनीभूत कर दिया है। इसलिए 'हम तो पूछेंगे' में गीतकार उत्तरदायी तत्त्वों की पहचान के लिए प्रश्नाकुल है- 'कहाँ सुबह की लाली बिखरी/कहाँ सिंदूरी शाम/धुली दुपहरी/किसने लूटी/हम तो पूछेंगे'। आलोक का संवाहक सवेरा या सुबह हिन्दी-उर्दू कवियों के लिए आजादी का परिचित प्रतीक रहा है।कहाँ फैज अहमद फैज की हताशा (ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर\वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं), कहाँ डॉ. अभय के आक्रोश भरे स्वर:''हमें चाहिए\वही सेवरा\जिसकी आशा थी \ताम्र पत्र पर\लिखी शहीदी भाषा थी \कितने झूले\फाँसी घर में\हम तो पूछेंगे''।

डॉ. वेद प्रकाश अमिताभ
'नवगीत' की एक प्रमुख विशेषता लोक जीवन और लोक संस्कृति से जुड़ाव है। छठे दशक में मोहभंग की शुरुआत के साथ कई विधाओं और रचनाकारों को पिछड़े ग्रामीण अंचलों की ओर उन्मुख होते देखा गया। विशेषतः नवगीत और आँचलिक उपन्यास इन अंचलों में लोकतंत्र की जड़ों की तलाश में गए। इसलिए उनके लेखन में कहीं 'भारत माता ग्राम वासिनी' का 'धूल भरा मैला सा आँचल' है तो कहीं 'फटेहाल वीरानों से ही/हमने गीत चुने' की स्वीकारोक्ति भी है। डॉ. मनोहर अभय के अनेक नवगीत 'लोक' या सामान्यजन की जिजीविषा, जुझारूपन और मनुष्यता से ऊर्जा पाते हैं तो यह आकस्मिक नहीं है। श्रमजीवियों-किसान, वनवासी, माछीमार, गड़िया लुहार, लकड़हारे, बुनकर, पॉलिश करने वाले, राजगीर, फूल बेचने वाली (जूड़ा खोले \बाल बखेरे \गजरे बेच रही लड़की) आदि पर जितने नवगीत उन्होंने लिखे हैं और उनके जीवन के अँधेरे को प्रकाश में लाने का उद्यम किया है, उतने कम गीतकारों ने ही लिखे होंगे।

डॉ. अभय ने क्षोभ पूर्वक देखा है कि विरसा मुंडा के वंशज ''आँखों के आँगन में 'हत का उजियारा' लेकर जैसे -तैसे जी रहे हैं (बड़ी हवेली देखी तुमने \देखे राज निवास\ आओ राजन तुम्हें दिखाएँ वनवासी का वास), गाड़ी तक सीमित घरबार वाले गड़िया लुहार वक्त की मार सह रहे हैं (गाड़ी में घरबार\बबुआ !हम 'गड़िया लोहार'), बच्चे सड़कों पर सुबह -शाम की रोटी तलाश रहे हैं ('हम साहब पॉलिश वाले') कहीं पूरा परिवार मेहनत करने के बाद भी कड़की झेल रहा है ('गजरे बेच रही लड़की')। 'साँझ ढले आना' गीत में 'बहुत दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास' जैसी अभाव-दशा है- 'शीतलहर में/चूल्हों के मुँह/कब से नहीं खुले हैं'। चूल्हा ही नहीं, करघा भी उदास पड़ा है ('हम बुनकर मगहर के')। दूसरों का घर गढ़ते राजगीरों के अपने घर सुघड़ नहीं होते हैं (बनाते महल टॉवर\तोड़ कर पत्थर हवेलियाँ सुन्दर\राजगीरों के सुघड़ घर नहीं होते )। इन पसीना बहाने वालों के प्रति गीतकार का लगाव औपचारिक नहीं है, 'रात उदासी में गुजरी' शीर्षक गीत में सत्य प्रत्यक्ष है कि निराला की पत्थर तोड़ने वाली आज भी सिर पर सौ-सौ ईंटें ढोने को अभिशप्त है। नयी सुबह लाने के वादे छलावा साबित हुए हैं - ' नए भोर की बातें/हुई पुरानी खोटी/तीन ईंट का चूल्हा/भूख बड़ी/रोटियाँ छोटी'। एक अन्य गीत में भी 'चुक गया/आश्वासनों का तेल, बाती/औं' दिया' रहनुमाओं के छल को संकेतित करता है। ये सारे कटु और भयावह प्रसंग गीतकार की इस प्रतिश्रुति के अनुरूप हैं-''आखर -आखर लिखो\आँखों ने जो देखा\कही-सुनी बातों का\छोड़ो लेखा-जोखा''| गीतकार का 'आँखिन देखी' यथार्थ दुख, अभाव, निराशा, यातना, अर्थात् अँधेरे तक सीमित नहीं है, उसने उजली संभावनाओं की आहट भी सुनी है। 

नयी पीढ़ी फटेहाली के बाबजूद आश्वस्त है- 'फटी ओढ़नी ओढ़ सयानी बिटिया कहती है\ कभी हमारे भी/ये दिन पलटेंगे'। इन्हें अपने श्रम पर विश्वास है और चारित्रिक दृढ़ता का भी सहारा है- 'गली-गली/फिसलन/पर पाँव नहीं फिसले'। नवगीतों का समग्र विजन आलोक-उन्मुख है, ज्योतिधर्मी है, वायवीय या कल्पित नहीं। अँधेरे के कंट्रास्ट में प्रकाश की अगवानी बार-बार हुई है। 'फूटे फुहारे ज्योति के', 'किरणें बुनने लगीं उजाला', 'खिड़कियाँ उजास की', 'अँधी सुरंगों में कहीं/ताजे उजाले पड़े', 'खुलेंगी रोशनी की खिड़कियाँ', 'सवेरे जागे हुए हैं' आदि सकारात्मक संकेतों के साथ निर्भीक चुनौती भी हैं-''चलो देखें\और कितना\ दमखम बचा है\अँधेरों में| एक ओर अँधेरे के विरुद्ध युद्ध में एक जुटता का आव्हान है- 'जगमगाहट हो/मुँडेरों पर/अनगिनत/दीपक जलाओ/अब अँधेरे को यहाँ/टिकने न देना' तो दूसरी ओर परिवर्तन का विश्वास भी दबा -ढँका नहीं है-ढल गया जो आज\सूरज कल उगेगा\नदियाँ दूध की\छलछलायेंगी\देख लेना''| यद्यपि स्थितियाँ विषम हैं। 'ऊँची कुर्सियाँ' दुराव बाँट रही हैं, सबसे बड़ा घराना गरीबों की रोटी हजम कर रहा है, फिर भी जनसाधारण का विश्वास है- 'उजाला नहीं देगा/अब की बार धोखे'। क्यों नहीं धोखे देगा, इसका कोई पुख्ता तर्क नहीं है। शायद नयी व्यवस्था में विश्वास इसके मूल में हो।या कई बार धोखा दे चुका हो, विकास का उजाला| या अब जनसाधारण के बदलते तेवर कवि की आशा के पोषक हो सकते हैं। 'सूर्य के तेवर तने/अब किनारा कीजिए', 'नये अंतेवासियों को/कुछ और पढ़ने दीजिए', नव्यता के कमेरे/जागे हुए' इस बदलाव का संकेत देते हैं। गीतकार ने उचित ही अँधेरे और उजीते की लड़ाई में सावधान रहने को कहा है। 'भूख की शब्दावली में/आप इकले तो नहीं', 'रुख बदलती/वक्त की सरगर्मियाँ' आदि भी सकारात्मक परिवर्तन के प्रति आशा को दृढ़ करते हैं। निर्मल शुक्ल के गीतों पर लिखते हुए डॉ. मनोहर अभय ने जो लिखा है, वह उनके गीतों पर भी सटीक है: 'शुक्लजी का आशावादी सोच कोरी भावुकता नहीं, लोकमंगल की महती कामना है'।

गीत रचनाओं पर व्यावसायिकता और कुलीनता आदि के दबाव के निहितार्थ से कवि अवगत हैं। 'बाजार की भरमार में/गीत हैं दुश्वार' और 'वे गीत चलेंगे कितने/जो ठहरे हैं/रनिवासों में' आदि में गीतकार की चिन्ता स्वाभाविक है। 'आँखिन देखी' कहने वाला रचनाकार बाजार या राजमहल का मुखापेक्षी हो भी नहीं सकता।डॉ. अभय का कवि बार-बार सच्चाइयों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता है -सच्चाइयों से धूल झाड़ी\बेबसी ओढ़ी नहीं\भोगी हुई जिन्दगी के\ कह दिए सब भोग'' 'नवगीतों में नव्यता का संकट' नामक अपने आलेख में डॉ. मनोहर अभय ने चिंता व्यक्त की है कि अनेक प्रतिष्ठित नवगीतकार खुद को दुहरा रहे हैं। तीस साल से बूढ़ा बरगद, धागों बंँधा पीपल, गाँव की पोखर, पगडंडी, झील पर अटके हुए हैं। स्वयं डॉ. अभय ने गाँव, प्रकृति, लोक संस्कृति से जुड़ाव दर्शाते हुए कुछ नयापन लाने का प्रयास किया है। वे जानते हैं कि बहुतों को अब पाँव जलने पर, गाँव सुख नहीं देता क्यों कि अब वह गाँव रहा ही नहीं, जिसकी याद आए। आज के गाँव में अलावों पर 'अलगाव के आख्यान हैं', भावज-भतीजे बँटवार चाहते है, तलैया ताल की जगह पगडंडियों के फटे पाँव हैं। 'शस्य श्यामला गाँव' धुँध में खो गए हैं। गनीमत हैं कि पारिवारिक संबंधों में रागात्मकता थोड़ी बहुत शेष है। उदाहरण के लिए बेटियों से संबंधित कई गीत बहुत मार्मिक बन पड़े हैं। 'पीहर छोड़ चली', 'लौट आई लाड़ली', 'छुट्टियाँ एक', 'छुट्टियाँ: दो', 'दुहिता किसी की' आदि में आधी आबादी के कई पक्ष हैं। छुटपन छोड़ चली बिटिया के देहरी लाँघने पर आँगन ही रुआँसा नहीं होता, पाठक भी आर्द्र हो जाता है। यही लाड़ली 'पिंजरे की सारिका पर कटी' नहीं बन पाती तो उसे बावली बता कर निष्कासित कर दिया जाता है। जहाँ निष्कासन नहीं है, वहाँ अग्नि -स्नान की यंत्रणा है- 'क्या जली \दुहिता\ किसी की व्याहता--- खाक होकर रह गई/गाँव भर की/अस्मिता'। जहाँ ये भयावहताएँ नहीं हैं, वहाँ बेटियों के घर आने की सूचना उत्सव का माहौल बना जाती है। इस तरह के गीत गहरे अंतरंग अनुभवों के बिना नहीं लिखे जा सकते हैं। 

बेटी संबंधी गीतों में परिवेश की प्रामाणिकता के साथ 'विजन' का उजलापन भी जहाँ-तहाँ दीप्त है। 'जानकी लौटी नहीं' में अपमानित ब्याहता आँधियों को चीर कर ऊँची उड़ान भरती है। पुरुष वर्चस्व के सामने घुटने नहीं टेकती। मिथकीय स्पर्श लिए यह स्त्री-अस्मिता कथित देहवादी नारी-मुक्ति से अलग स्वाभिमान और स्वावलंबन की दीप्ति लिए हुए हैं-''जानकी लौटी नहीं\लव-कुश लिए\बात अपनी पर अड़ी'' | गीतकार का यह विश्वास सघन और मूल्यवान है कि स्त्री विशेषतः बच्चों, रसोई, बिस्तर के बीच भागती-दौड़ती गृहिणी को अंँधेरे की जगह उजाला मिलकर रहेगा:'रोशनी का हक तुम्हें/मिलकर रहेगा'। ये नवगीत केवल वैविध्यपूर्ण,संवेदना सम्पन्न, वैचारिक ऊर्जा से दीप्त नहीं है। इनकी भाषा और कहन भी अन्तर्वस्तु से संश्लिष्ट हैं। इसलिए भाषा और कहन के विविध रूप ध्यान आकर्षित करते हैं। 'ॠतु रंजनी ऋतम्भरा ', 'मंत्र शोधित मंत्रणाएँ', 'सौहार्द के स्तूप' जैसे तत्सम पदो के साथ 'सियानी नहीं, कमसिन रही', 'तिलस्मी अंदाज' और मीडिया, पैकिंग, ड्रोन, डिजीटल, मेकअप, ग्लोबल, नेट तथा छपरी, फतूरी, ढिबरी, काँकरी, सीरी, ओसारे आदि शब्दों का समावेश गीतकार के शब्द भंडार, शब्दचयन और सम्प्रेषण क्षमता का परिचायक है। एक ही वर्ण्य विषय या अप्रस्तुत को विभिन्न अर्थच्छवियों से समृद्ध करने का कौशल 'धूप' के संदर्भ में देखा जा सकता है। स्थितियों-मन:स्थितियों के अनुरूप 'गुनगुनी सी धूप', 'धूप सहमी सी खड़ी', 'झाँके धूप चुड़ैल;, 'निर्वासिनी सी धूप', 'धूप के चश्मे', 'धूप के बिस्तर', 'धूप बूढ़ी', 'धूप उखड़ी सी पड़ी', 'पियराई सी/धूप निगोड़ी', 'धूप चकमा दे गई', 'चटखती धूप' जैसे बिम्ब गीतों में यथा स्थान हैं और अर्थग्रहण कराने में सहायक हैं। कुछ अन्य अप्रस्तुतों-बिम्बों के द्वारा भी मंतव्य की व्यंजना संभव हुई है। 'शोर के कैफे', मैत्रियों के पैटन टैंक', 'बेटियाँ सुगंध की', 'जंगखाई हथकड़ी', विष्णु प्रिया सी पावन', 'उत्पाद की पैकिंग, 'तालियाँ पीटते ऊसर', 'गुनगुनाती बदलियाँ' आदि प्रयोग नवीन और विविधता-पूर्ण हैं।विविधता, गीतों की प्रस्तुति, छंद विधान, गेयता और कथन-भंगिमाओं में भी भरपूर है। जिन गीतों में जनविरोधी व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, वहाँ प्राय: प्रश्न वाचक भँगिमा है। 'पाँखुरे उजास के', 'हम तो पूछेंगे' आदि गीत इसी कोटि के हैं। जहाँ अवमूल्यन, दमन की स्थितियाँ हैं वहाँ भी 'कैसे रहती हो' और 'साँतिए किधर काढूँ' सरीखी रचनाएँ प्रश्नाकुलता की मुद्रा में हैं। संबोधन के रूप में रचित नवगीत अधिक संख्या में हैं। संबोधन का आलंबन कई गीतों में 'तुम' हैं। 'उगते उजाले', 'गाना भूल गई' में 'तुम' विसंगतियों के लिए उत्तरदायी वर्ग है। 'हम बुनकर भगहर के' शीर्शक गीत बुनकरों के अवलोकन बिन्दु से कबीर को संबोधित है। कई संबोधनों में आग्रह जुड़ा हुआ है, कुछ अच्छी चीजों को बचा लेने का। 'अरी! दिया तो बारि/अँधेरा खाए जाता है' में रोशनी जलानी है और 'बचाए रखना' में हरियाली के पंखों को बचा लेने का आग्रह है। 'रे 'मितवा' में मितवा मित्र नहीं, गुफा में रोशनी छिपाने वाला अभियुक्त है किन्तु 'बचुआ! हमें बताना' में किसी भुक्त -भोगी हमदर्द से दुःख बाँटा जा रहा है। सीधे-सपाट बयान वाले गीत संख्या में कम हैं। गीत-भंगिमाएँ कोई सी भी हों, अँधेरे और उजीते की लड़ाई से जुड़ी हुई हैं। ये कभी आग्रह करती हैं, कभी सुझाव देती हैं और कभी सावधान भी करती है। शिल्पगत कारीगरी वाले गीत नगण्य हैं। डॉ. मनोहर अभय, जैसा कि उन्होंने संकेत किया है, 'धुँध पीती रात का' गीत नहीं सुनाते, 'भैरवी हम चाहते हैं भोर की';उनकी यह आकांक्षा उनके नवगीतों में फलीभूत हुई है।
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परिचय: डॉ. वेद प्रकाश अमिताभ 
जन्म: 1 जुलाई, 1947, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश )
प्रथम श्रेणी में आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. इसी दौर में सबसे पहली स्वरचित समालोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित हुई। चार दशक तक स्नातकोत्तर विद्यालयों में अध्यापन के उपरांत सेवानिवृति और अब स्वतंत्र लेखन। अध्यापन काल में पी -एच डी; और डी.लिट चार कविता संग्रह, पाँच कहानी संकलन और अठ्ठारह समीक्षात्मक कृतियाँ प्रकाशित। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने 2016 में दो लाख रुपये की राशि का साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया। इसके अतिरिक्त बाबू गुलाब राय और राजश्री प्रतिभा सम्मान से अलंकृत हुए।
पता: डी-131, रमेश विहार,अलीगढ़-202001
चलभाष: +91 983 700 4113

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