काव्य: गोविन्द सेन

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ईमेल: govindsen2011@gmail.com

गोविंद सेन




रचना 1

मुफ्त का माल  खाते रहे,
गीत दानी के गाते रहे।

जागते ही नहीं देवता,
घंटियाँ हम बजाते रहे।

अब तो बच्चे बड़े हो गए,
हम खिलौने ही लाते रहे।

यूँ तो मिलना मुनासिब न था,
आप यादों में आते रहे।

जिनको मिलती नहीं नौकरी,
घर में चुपके से जाते रहे।

लोग हँसने-हँसाने लगे,
कष्ट अपने छिपाते रहे।
***


रचना 2

जाने क्या चलता है भीतर,
शायद कुछ जलता है भीतर।

बाहर जाकर देख लिया है,
अब अच्छा लगता है भीतर।

एक दिन ढक्कन खुल जाएगा,
दाब बहुत रहता है भीतर।

साथ उसी के बहते हैं हम,
जो दरिया बहता है भीतर।

बाहर आदर्शों की बातें,
उल्टा ही चलता है भीतर।
***


रचना 3

धूप में दौड़ती गिलहरी
हो गई सुनहरी गिलहरी

अन्न की खोज में है लगी
दरबदर भागती गिलहरी

पथ के खतरों से अनजान है
डर नहीं जानती गिलहरी

पीठ पर ले हरी धारियाँ
देहरियाँ फाँदती गिलहरी

डालियों में कहीं खो गई
पेड़ को नापती गिलहरी

पेट भरने की तुक-तान में
आदमी सी लगी गिलहरी

पाँव के बल खड़ी हो गई
हाथ को जोड़ती गिलहरी

द्वार से भीत पर चढ़ गई,
देह को मोड़ती गिलहरी

तेज रफ्तार के दौर में
मोटरों को खली गिलहरी
***


ग़ज़ल

जाने क्या चलता है भीतर
शायद कुछ जलता है भीतर

बाहर जाकर देख लिया है
अब अच्छा लगता है भीतर

एक दिन ढक्कन खुल जाएगा
दाब बहुत रहता है भीतर

साथ उसी के बहते हैं हम
जो दरिया बहता है भीतर

बाहर आदर्शों की बातें
उल्टा ही चलता है भीतर।
***

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