तृप्ति, अतृप्ति का द्वैध एवं अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।

सुख का आधार और सुख की कामना दोनों अलग-अलग चीजें हैं। कामना करना व्यक्ति के वश में है किंतु सुख का आधार निःसंदेह प्रारब्ध से प्रभावित होता है। पिछले कई जन्मों में अर्जित पूण्य व्यक्ति के वर्तमान को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि लोग आश्चर्य करते हैं। प्रारब्ध कभी भी किसी भी दशा में न्यायशील है। वह किसी से प्रभावित नहीं होता जैसे आत्मा को कोई प्रभावित नहीं कर सकता। ईश्वर को कोई अतिरिक्त तरीके से प्रभावित नहीं कर सकता। ईश्वर को प्रभावित करने का माध्यम तो प्रेम और भक्ति मार्ग होता भी है लेकिन प्रारब्ध में हस्तक्षेप ईश्वर भी नहीं करता। 
तृप्ति तो मनुष्य की सुख की अवस्था है। अतृप्ति हिंसा का उद्गम है। तृप्ति से मनुष्य कल्याण के लिए उत्सुक, जागरूक और कर्मशील हो जाता है किंतु अतृप्ति तो संघर्ष, हिंसा और क्रूरता की ओर ले जाती है। तृष्णा अतृप्ति के मूल में होती है। इसी तृष्णा और आसक्ति के अधीन होकर व्यक्ति, मनुष्य, जीव और व्यवस्था सब हिंसक हो जाते हैं। यह हिंसा की रूपों में दिखाई देती है। कदाचित अतृप्ति अहिंसा के लिए अवसर देती है।
अतृप्त कौन है? जीव क्या सदैव अतृप्त है? क्या मोह माया से विरक्ति ही अतृप्त होने का लक्षण है? इस पर अनेक विचार हैं लेकिन ज्ञान, सहिष्णुता, दया यह सब ऐसे विभूषित करने वाले संकल्प और अनुष्ठान हैं जो तृप्ति की ओर ले जाते हैं। गुरु स्वयं तो अतृप्त है लेकिन एक तरह से देखा जाए तो वह अपने शिष्यों के लिए परिपूर्णता का प्रतीक है। उसके ज्ञान की सीमाएँ अपने शिष्यों के लिए श्रेष्ठ और कहीं उनकी अपेक्षा से अधिक है। इसी प्रकार दया का गुण भी तृप्ति का द्योतक है। सहिष्णुता का गुण भी तृप्ति का द्योतक है। यह गुण वही धारण कर सकता है जो संतुष्टि रखता हो। संतुष्टि रखने वाला ज्यादा दया, करुणा, सहिष्णुता और अन्य इस प्रकार के गुणों को दूसरों पर बरसा सकता है। यदि वह अतृप्त होगा तो उससे ज्यादा अपेक्षा करना भी ठीक नहीं।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तृप्ति पूर्ण ही है उनमें जो ऐसा करते हैं। अपितु सांस्कृतिक और साभ्यतिक अवस्थाओं की जब हम समझ बनाने की कोशिश करते हैं तो हमारे प्राचीन ज्ञान परंपरा में ऋषियों/महर्षियों और मुनियों/योगियों में भी समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के बाद ईश्वर की प्राप्ति की अतृप्ति देखी गई है। तो क्या तृप्ति का सम्पूर्ण व सार्वभौम केंद्र ईश्वर है? ऐसा है भी और ऐसा होकर भी कुछ ऐसे भी दर्शन हमारे यहाँ मिलते है जिसमें लौकिक शांति और लौकिक जगत में रह रही समस्त उपस्थित दृश्यगत के सुख को देखना ही तृप्ति माना गया है। सम्भवतः यह भावना ही हमारे चेतना में इस प्रकार की इच्छाएँ प्रस्फुटित करता है कि हमें चिड़ियों के साथ, पेड़ों के साथ और इस सृष्टि के विद्यमान सभी चीजों के प्रति उदात्त होना चाहिए। हम देखते हैं कि इसी लिए राजा को प्रजा के सुख के बारे में चेतस होने की कल्पना की गई है। धनी को निर्बल के प्रति उदार होने की कामना की गई है। सबके प्रति करुणा की संवेदना बनाए रखने पर बल दिया गया है।  हर व्यवस्था को किसी कमजोर के प्रति उदासीन होने की बात कभी न की गई है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अपनी सम्पूर्णता को व्यक्त करते हुए अतृप्त और तृप्त के द्वैध को लगभग समाप्त किया किंतु इस चराचर जगत में जुटने भी अज्ञान हैं वे अतृप्ति के कारण समझे जाने चाहिए। क्योंकि ईश्वर स्वयं कहते हैं-
मत्तः पर्तं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
माई सर्वमिदं प्रोक्तं सूत्रे मणिगण इव॥
अर्थात,
हे धनंजय! इस जगत का कोई भी हिस्सा नहीं हो सकता है। मैं ही पूरी दुनिया का महाकारण हूँ। इस तरह के नियंत्रण में ये सभी कार्य करेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि- भगवान के सिवाय संसार की स्वतंत्र सत्ता नहीं है।
रसोऽहमपसु कौन प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
अर्थात
अब, प्रकृति के कण-कण में खुद को व्यवस्थित करना है: हे कुन्तीपुत्र! मैं ही जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, समस्त वैदिक मन्त्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ और मनुष्यों द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ भी मैं ही हूँ।
जीवात्मा ही तो अतृप्त है। पर उसके भी द्वैध समाप्त करके परमसत्ता यह व्यक्त करने की कोशिश की है कि हम सब एक दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे की उपस्थिति में परिपूर्ण है । 
एक बड़ी जिज्ञासा रहती है कि यदि ऐसा ही है तो फिर तृप्त और अतृप्त  यह कहाँ से आता है? लेकिन यह है और उसे इस नश्वर संसार में अज्ञान के रूप में जाना गया है। भौतिक जीवन का सत्य यह है कि मनुष्य निर्मित अनेक इच्छाएँ और अपेक्षाएँ उसे अतृप्त बनाती हैं। फिर वह मानव निर्मित कोई व्यवस्था हो अथवा इसके द्वारा कोई सभ्यता का सृजन किया गया हो या फिर राज्य ही क्यों न हो। ये सभी यदि अपेक्षाओं और तृष्णा के शिकार हैं तो हिंसा के कारण हैं। दुनिया का कोई राज्य यह नहीं कह सकता कि वह तृप्त है। वह कल्याणकारी हो ही चुका है। यह होना असंभव है। रामराज्य में भी अनेक सवाल थे। पर एक आदर्श के रूप में रामराज्य की कल्पना की जाती है। उसे जिसने देखा हो, वह सत्य कह सकता शेष उसकी व्याख्या करने वाले उत्तरसत्य के आसपास होते हैं। आदर्श सत्य तो तृप्ति का है किंतु आदर्श सत्य की कसौटी क्या है और उसकी अनुभूति क्या है, यह एक कल्पना है।
नश्वरता ने ज़रूर यह बताया कि आदर्श सत्य ही अहिंसा है। उत्तरसत्य से तो हिंसा जन्म लेती है। अहिंसा की संकल्पना में इसलिए तृप्ति के लिए दया, करुणा, प्रेम,  सहिष्णुता और औदार्य को प्रतिष्ठा दी गई। डिवॉन के भीतर भी अतृप्ति के अनेक उदाहरण हैं इसीलिए उन्हें अनेक संघर्ष के रूप में पाया गया। अधिष्ठात्री देवी की पूर्णता उनके अनेक तरह से धर्म की स्थापना में हम पाते हैं। और सनातन धर्म में इसीलिए अनेक जिज्ञासाओं का समाधान तृप्ति की अनुभूति में व्यक्त है। सुखद की अनुभूति भी तृप्ति है और यह अनुभूति प्रेम और अहिंसा का निरूपण करती है।
यह अशांति न हो, यदि संतुष्टि के भाव ज्यादा हों। हम इस संसार में अशांति को जिस रूप में देख रहे हैं उसकी वजह अतृप्ति है। इसीलिए हिंसा, संघर्ष, युद्ध और अंतर्द्वंद्व हैं। इसलिए ऊँच-नीच की खाईं हैं और इसीलिए गरीबी और अमीरी है। जो अमीर है उसकी अतृप्ति क्या है आखिर, सोचिए जरा! जो देश ज्यादा अमीर हैं, साम्राज्य भी उनका बहुत बड़ा है, उनकी अतृप्ति क्या है? जो जंगल में बाघ है वह अपना भोजन लेकर कुछ समय के लिए सब कुछ से मुक्त होकर सो जाता है। यह जो देशों के बीच में हर क्षण षड्यंत्र, मानव विरोधी रणनीतियां और प्रतिस्पर्धा है यह अतृप्ति नहीं तो और क्या है? इसीलिए हिंसा और रक्तपात होते हुए हम आज तक कभी सुंदर और शांतिप्रिय समाज दुनिया में नहीं बना पाए। यह अतृप्ति इतनी भयावह है कि हम क्लाइमेट चेंज पर चिंतित हैं। यह अद्भुत सी बात है कि हमारी सभ्यताएँ संघर्ष करते हुए थकी नहीं और अनवरत अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। यह अच्छा है कि हम अपनी प्रतिरोधात्मक क्षमता को बधाई हैं और इससे घबड़ाए नहीं लेकिन आप ऐसी कल्पना करें कि यदि सभी दुनिया की मानव सभ्यता एक दूसरे के सहयोग के लिए एक साथ आगे आतीं तो हमारा अहिंसक वातावरण कैसा होता?
क्या हम उस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं? यह एक सांकेतिक प्रतिवेदन है किंतु इस प्रतिवेदन को स्वीकार करने के लिए अहिंसक होना पड़ेगा। दुनिया को अहिंसक होने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है, वस्तुतः उसका अभाव है और वह इतना जल्दी समाप्त होने वाला नहीं। इसलिए यदि श्रेष्ठ सभ्यता के संवाहकों को इसका दामन थामना होगा जिससे हम आशा के बिम्ब बना सकते हैं जो आगे के समय में अपना विस्तार भी पा सकती है।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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