काव्य: रणजीत सरपाल

सब्जी मंडी
 
कंक्रीट और तारों के बीच
दूर से
एक टापू जैसी लगती है

हरी-भरी सब्जियों और फलों के ढेर
ठुँसी हुई सब्जियों के बीच 
टेडी मेढ़ी पतली पगडंडियाँ
और एक दूसरे से बचते-टकराते
एक ही शहर के
अनजान से चेहरे

यहाँ कोई नहीं पूछता
किसी का नाम
न किसी को मतलब
किसी की शादी से
एक अजीब सा मज़ा है
अजनबी होने का
लेकिन ये अजनबीपन
वैसा अजनबीपन नहीं है
जहाँ लोग एक दूसरे को
बता देते हैं घर की बातें
बिना किसी
राज़ खुलने के डर से 
जैसे अक्सर होता है
हमारे यहाँ
लोकल रेलगाड़ियों में।

यहाँ सब्जियों के अलावा
कुछ नहीं देखा जाता
किसी ने कहा नहीं है 
बस मान लिया गया है
वे सब सब्जी बेचने वाले हैं
और
हम सब्जी खरीदने वाले।


सब्जियों के ढेरों पर
मक्खियों की तरह
मंडराते-मंडराते
हम अपनी
पहचान खो देते हैं
और
सस्ती और बढ़िया सब्जी
खरीदने की लालसा 
छीन लेती है हमसे
इंसान होने की उत्सुकता
हम सिर्फ सब्जियाँ देखते हैं
और वे हम में
एक पुख्ता ग्राहक

एक इंसानी
रिश्ते की सम्भावना
और एक मार्मिक संवाद
स्वाद और दामों के बीच की
कश्मकश तक सिमट कर रह जाते हैं
हम नहीं पूछ पाते
किसी का नाम
लालच और स्वाद की
ऐसी एकाग्रता
देखने लायक है

तरबूज बेचने वाले को मैं
अपने प्रतिद्वंदी के रूप में देखता हूँ
और थोड़ा झिझकता भी हूँ
उसके पास जाने से
उसके तरबूज की परख
मुझे अपनी नाकाबिलियत लगती है
वह सारे तरबूज
चीनी कह कर बेच देता है
मैं भी खरीदता हूँ
लेकिन कोई तरबजू
मीठा नहीं निकलता

बड़ा अजीब लगता है
जब घर आकर
आप ठगा हुआ महसूस करते हैं
फिर से सब्जी मंडी में जाना
अपनी हीन भावना से
लड़ने जैसा लगता है
ऐसी मनोदशा में
अगले दिन सब्जी मंडी
फिर ऐसे जाते हैं
जैसे
किसी युद्ध के मैदान में
और आपका
स्वाद से ज्यादा
मकसद होता है
ठगे न जाने का
निरंतर प्रयत्न करना।

मेरी माँ के पास
एक अलग तरीका है
इससे लड़ने का
वे जब भी
सब्जी खरीदती हैं
मुफ्त का धनिया और हरी मिर्च डलवाना नहीं भूलतीं
मेरी माँ को लगता है
बिना चालाकी के
सब्जी नहीं खरीदी जा सकती
मुझे लगता है
सब्जी बेचने वाला भी यही सोचता होगा

पहला ग्राहक आता है
अपनी तरफ से सबसे उतम
भिंडियाँ छाँटके ले जाता है
दूसरा ग्राहक भी
अपनी तरफ से सबसे उतम
भिंडियाँ छाँटकर ले जाता है
भिंडियाँ तब तक छँटती रहती हैं
जब तक खत्म नहीं हो जाती
मैं देखता हूँ
सब्जी बेचने वाले की तरफ
वह एक रहस्यमय तरीके
मुस्कुरा देता है
हक्का-बक्का सा
मैं घर की तरफ़ चल पड़ता हूँ
और सोचता हूँ
ये दुकानदार कितना
जानता है हमारे बारे में
***


सदमा

सदमा अब कोई अलग से
झकझोर देने वाला अनुभव नहीं रहा
अब ये उतना ही साधारण
हो गया है जितना कि 
कमीज पहनते वक्त
बटन का टूट जाना।
हमने सीख लिया है
चरम से चरम अनुभव को भी
साधारण कर देना।

बिस्तर पर लेटे हुए
पति मोबाइल पर
पत्नी को सन्ता बंता
का चुटकला सुनाता है
पत्नी हँसते हुए
उसकी छाती पर ढेर हो जाती है
पति, चुटकले ढूंढते-ढूंढते
एक आदमी को
पीट-पीट कर
मार डालने का वीडियो देखता है
फिर से देखता है
और आगे दोस्तों को भेजता है
उसकी पत्नी अभी भी 
उसी चुटकले पर हँसती है
दोनों की हँसी
कामुकता में बदल जाती है
संता-बंता फिर
जीत जाते है सदमे से
जब तक संता-बंता में से
एक मर नहीं जाता
सदमा
सदमा नहीं लगेगा।

मैंने हिम्मत करके
अपनी प्रमिका से कहा
मैंने उसे कई बार
धोखा दिया है
मैं चाहता था
वह अपना सिर पीटे
थूके मेरे मुँह पर
दे गालियाँ मुझको
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ
मेरी उम्मीद के विपरीत
हँस कर बोली,
“मुझे अच्छा लगा
 तुमने सच बोला”
उसे भी आता था
हर अनुभव को
साधारण कर देना
***


चींटियाँ

चींटियाँ इतनी छोटी होती हैं कि
हमारा पाप नहीं बन सकती।
हम हाथ के एक घुमाव से
कत्ले-आम कर देते हैं चींटियों का
न कहीं कराहने की आवाज़
न कहीं खून का निशान।

शरीर पर काले तिल
के आकार का वज़ूद
मसल दिया जाता है दीवारों पर
जिसका खून नहीं
उसके मरने का भला क्या पाप!
पाप सिर्फ
लहू का लगता है
जैसे कि पाप का रंग
तय किया गया हो।

चींटियाँ इतिहासरहित
जिंदगी जीती है
इनका कहीं ज़िक्र नहीं होता 
फिर भी हमारे
विचारों से नहीं जाती
हमारे बयाँ न किये जा सकने वाले डर का
जीता जागता
सबूत हैं चींटियाँ 
दीवारों और इधर उधर की चीजों पर
सटकर एक सीधी लाइन में
चलती चींटियाँ
एक ताना हैं
हमारी भटकन पर।
***

रणजीत सरपाल सरकारी कॉलेज चंडीगढ़ में अंग्रेज़ी साहित्य के सहायक प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी में कविताएँ लिखते है और आजकल एक काव्यानुवाद परियोजना के साथ-साथ इंस्टाग्राम पर एक कविता पेज का संचालन भी करते हैं: www.instagram.com/indianpoetry07
ईपता: ranjeetsarpal@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।