युवा एवं वृद्ध पीढ़ी में सामंजस्य का संदेश देते सूरत सिंह नेगी के उपन्यास

- भारती शर्मा

शोधार्थी, पीएचडी (हिंदी), दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट,आगरा


साहित्य समाज का दर्पण है।
                   - महावीर प्रसाद द्विवेदी

साहित्य सदैव ही समाज का पथ प्रदर्शक रहा है। साहित्य का प्रयास यथार्थ से अवगत कराते हुए आदर्शों की ओर उन्मुख करना रहा है। आधुनिक युग व्यक्ति मोह का नहीं वस्तु मोह का युगधर्म हो गया है जहाँ व्यक्ति को व्यक्ति से अधिक वस्तुओं से लगाव अधिक होने लगा है। परिवार जो समाज की महत्वपूर्ण इकाई है, वस्तु मोह के कारण विघटित होती जा रही है। परिवार के सदस्यों के मध्य बढ़ती वैचारिक शून्यता समाज में एकाकीपन, शून्यता तथा मूल्यहीनता को बढ़ावा दे रही है।पहले परिवार का मुखिया घर का बुजुर्ग हुआ करता था, किंतु आज परिवार में बुजुर्गों को उपेक्षित किया जाने लगा है।जीवन के इस अंतिम पड़ाव में वृद्धों को शारीरिक कष्ट तो स्वाभाविक है किंतु इससे भी अधिक कष्टदायक है मानसिक कष्ट। युवा पीढ़ी या आधुनिक युग में वस्तु से मोह रखने वाली पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने में साहित्यकारों की भूमिका मुख्य रही है। डॉ. सूरज सिंह नेगी के उपन्यासों में भी इसी ओर प्रयास किया गया है कि भटके हुए लोगों को रिश्तों और सामाजिक दायित्व की गरिमा का अहसास कराते हुए सही मार्ग पर ले आएँ तथा समाज और राष्ट्र में सहयोग, त्याग और सदभावना की लहर दौड़ने लगे, जिससे समाज विसंगतियों से रहित हो जाए इसीलिए उनके उपन्यासों में वृद्ध पीढ़ी तथा युवा पीढ़ी के मध्य सामंजस्य का संदेश प्रकट होता है।

तीन पीढ़ियों को समानांतर लेकर लिखा गया उपन्यास ‘वसीयत’ का नायक अपने युवावस्था में की गई गलतियों के पश्चाताप तथा वृद्धावस्था में अपने पुत्र द्वारा की जा रही उपेक्षा के कारण मानसिक पीड़ा से ग्रस्त है। जब वह युवा था वह अपने माता-पिता तथा गाँव की बात-बात पर उपेक्षा करता रहता था। उसके माता पिता उसके इंतजार में दुनिया से चल बसे। तब भी वह शहर छोड़कर उस समय भी गाँव नहीं गया किंतु आज जब वह वृद्धावस्था में है तब उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है जब उसका बेटा राजकुमार भी उसकी उपेक्षा करता रहता है। यह सत्य है कि आज युवा पीढ़ी जो अपने बुजुर्गों को उपेक्षित कर रही है तो वह भी अपनी भावी संतान से अपने लिए आदर एवं सम्मान की अपेक्षा नहीं कर सकती। इस उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार नेगी जी वृद्धों तथा युवाओं को बहुत उपयोगी संदेश देते हैं कि भौतिक संपत्ति, जमीन- जायदाद आदि सब अल्पकालिक तथा नश्वर है। एक पीढ़ी को इस संपत्ति के अलावा अपने परोपकार, परहित, त्याग तथा समर्पण से अर्जित किए गए संस्कार, जीवन मूल्य एवं सिद्धांत रूपी संपत्ति भी देनी चाहिए जो कभी नष्ट नहीं होती। इसे जितना अधिक खर्च किया जाए इसमें उतनी ही वृद्धि होती है। इसे खर्च करने से यश-कीर्ति में वृद्धि होती है। इस उपन्यास में पुरखों द्वारा प्राप्त इसी वसीयत को विश्वनाथ के पिता ने विश्वनाथ को और उसने अपने पुत्र राजकुमार को दिया है। सूरज सिंह नेगी के इस उपन्यास में जीवन मूल्य, संस्कारों, परोपकार, सिद्धांतों एवं आदर्शों पर प्रकाश डाला गया है।

उनके ‘रिश्तो की आँच’ उपन्यास के नायक रामप्रसाद के माध्यम से उपन्यासकार सूरज सिंह नेगी ने यह संदेश दिया है कि परिवार का मुखिया अपनी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा तथा परोपकार आदि संस्कारों एवं जीवन मूल्यों के आधार पर कठिन से कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने में सक्षम हो पाता है। रामप्रसाद के पिता की मृत्यु के पश्चात जीवन में इतने संघर्ष आए किंतु अपने सहज स्वभाव, संस्कार एवं जीवन मूल्य के आदर्शों पर चलकर इन कठिनाइयों को पार कर गया और अपने परिवार को एकजुट करने में सफल रहा। रामप्रसाद की माँके शब्दों में, “बेटी नेहा ! आज हमारा परिवार पूरा एकजुट है। यह सब रामप्रसाद के कारण हुआ है। इसने कितने कष्ट उठाए, संघर्ष झेले लेकिन परिवार को संबल दिया।” माँके इस कथन से यह संदेश मिलता है कि वृद्ध पीढ़ी की सदैव यही मनोकामना रहती है कि उसका बड़ा तथा भरा-पूरा परिवार एकजुट मिलकर रहे। सूरज सिंह नेगी के उपन्यास में प्रकृति की भूमिका भी मुख्य रही है। इस उपन्यास में नीम का पेड़ रामप्रसाद को समय-समय पर सांत्वना देते दिखाई पड़ता है। एक बार जब रामप्रसाद रिटायर होने पर ऑफिस से तथा उसी पेड़ से बिछड़ने के कारण दुखी हो रहा था तब उसने महसूस किया कि यह पेड़ कुछ संदेश दे रहा हो कि, “देखो रामप्रसाद! यह प्रकृति का नियम है, एक निश्चित समय काल के लिए प्रत्येक को दी गई भूमिका का निर्वाहन करना होता है। यह उस कलाकार पर निर्भर करता है कि किस प्रकार अपनी भूमिका निभाता है। कुछ लोग हैं जो अपने कार्य और भूमिका से नई पीढ़ियों के लिए एक मिसाल छोड़ जाया करते हैं। आने वाली पीढ़ियाँ उनके पद चिन्हों पर चलकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती हैं।” पेड़ के यह शब्द संदेश हैं पुरानी पीढ़ी को, कि वे ऐसे सत्कर्म करें जिससे नई पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन जाए और वह उनको उपेक्षित ही न कर पाएँ। इस उपन्यास के माध्यम से युवा पीढ़ी को भी एक संदेश है जो ऑफिस के मुखिया साहब जी के माध्यम से दिया गया है। रामप्रसाद के रिटायरमेंट पर वह कहते हैं, “रामप्रसाद जी के आज तक सरकारी कामकाज में व्यस्त रहने के कारण हो सकता है कि परिवार पर पूरा समय न दे पाये हो, आज इस कार्यालय और सेवा से विदा ले रहे हैं तो ऐसे में जीवन के शेष भाग में परिवारजन की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वह उनको पूरा सम्मान दें। कभी यह अहसास न होने दें कि वह सेवानिवृत्त हो चुके हैं, किसी को उनकी जरूरत नहीं है। यह भाव मन में आते ही व्यक्ति कई प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। आज तक जिस अधिकार से यह रहते आए हैं वही मान सम्मान मिलते रहना चाहिए। इसमें सर्वाधिक योगदान परिवारजन ही दे सकते हैं।” उपन्यासकार का यह संदेश सीधे नई पीढ़ी, या कहें वस्तु मोह युग को जाता है।

इसी प्रकार का संदेश सूरज सिंह नेगी के उपन्यास ‘नियति-चक्र' में दिया गया है कि युवा पीढ़ी अपने बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद के बिना अधिक फलफूल नहीं सकती। इतिहास साक्षी है कि हमारे जीवन में बड़े बुजुर्गों का कितना महत्व है। पांडव अपने बुजुर्गों के आशीर्वाद और प्रार्थनाओं के बल पर महाभारत जैसा युद्ध जीत गए। एक साधारण सा श्रवण कुमार अपने माता-पिता की सेवा कर सदैव के लिए अमर हो गया। ‘नियति चक्र' उपन्यास के मुख्य पात्र नितिन घोष के बेटे चित्रांश के माध्यम से यही संदेश दिया गया है कि जब कोई युवा (बेटा) अपने माता-पिता की उपेक्षा कर उसे घर से बाहर कर देता है और उनके आशीर्वाद स्नेह से वंचित हो जाता है तो उस युवा की क्या दुर्दशा होती है। वहीं दूसरी ओर नितिन घोष के माध्यम से यह दिखाया गया है कि व्यक्ति को सदैव ईमानदारी, निष्ठा, सच्चाई, परोपकार संवेदनशीलता तथा जीवन में मानवीय मूल्यों के मार्ग पर चलना चाहिए। इसमें कठिनाइयाँ तो अवश्य आती हैं किंतु अंत में जीत उसी की होती है और इस मार्ग पर चलने वालों का नाम सदैव के लिए अमर हो जाता है। इस उपन्यास में डॉक्टरों को भी एक संदेश मिलता है कि यदि वह मरीज के मनोविज्ञान को समझकर उनका इलाज करें तो उसकी मानसिक स्थिति के साथ शारीरिक स्वास्थ्य शीघ्र स्वस्थ होने लगता है।

 जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि डॉ. सूरज सिंह नेगी के उपन्यासों में प्रकृति की भूमिका रही मुख्य रही है। उनके उपन्यास ‘यह कैसा रिश्ता' की नायिका का भी आम के पेड़ से आत्मीय रिश्ता है। वह उसके जीवन संघर्षों का साक्षी है। एक बार जब उसके भाई कुछ रुपयों के लालच में आम के पेड़ को काटने को तत्पर थे तो वह इसकी रक्षा के लिए जान न्योछावर करने को तैयार हो गई जैसा कि वह कोई अपना सगा संबंधी हो। उसकी नजर में यह पूर्वजों की निशानियाँ में से एक था। इस उपन्यास का एक और संदेश मालूम पड़ता है। वह पंडित गौरीदत्त प्रधानाचार्य के माध्यम से प्रकट होता है जो प्रत्येक शिक्षित वर्ग के लिए है। वह पूरन से कहते हैं, “शिक्षा केवल ज्ञान चक्षु ही नहीं खोलती;अपितु इंसान में करुणा,जीवन मूल्य सदाशयता, संवेदनशीलता, संस्कार जैसे मूल्यों का विकास भी करती है जो जीवन भर उसकी पहचान बन जाते हैं और इन्हीं गुणों से इंसान की असल परख होती है।” एक और शिक्षा यह देते हैं कि जब कर्तव्य निर्वहन एवं मानवीय मूल्यों में द्वंद्व की स्थिति तो वहाँ हृदय में करुणा और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि कर्तव्य निर्वहन के अनेक अवसर मिल जाते हैं किंतु यदि हमारे मानवीय मूल्यों तथा करुणा से किसी का जीवन बिगड़ने से बच जाए तो ऐसा अवसर पुनः नहीं मिलेगा।

इस उपन्यास में वृद्धों के प्रति सम्मानपूर्वक व्यवहार का मार्ग प्रशस्त किया गया है। हमारी संस्कृति एवं रीति-रिवाजों से अवगत कराने वाले बड़े-बुजुर्ग एवं वृद्धजन ही हैं। इसलिए नई पीढ़ी को उनके अनुभवों एवं जीवन मूल्यों की कितनी आवश्यकता है इस उपन्यास में बखूबी चित्रित किया गया है। इस उपन्यास की नायिका पदमा द्वारा चलाए गए कार्यक्रम से समाज को यह प्रेरणा मिलती है कि व्यवहार में भी समाज में कुछ कार्यक्रम जैसे ‘वृद्धों के अनुभवों से सीखें कार्यक्रम' चलाए जाएँ जिससे कि वृद्धजन के महत्व से नई पीढ़ी को अवगत कराया जा सके तथा वृद्धि या पुरानी पीढ़ी उपेक्षा का पात्र न बनें।

निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि सूरज सिंह नेगी के उपन्यासों में वृद्धों के लिए आदर सम्मान के भाव के साथ युवा को मूल्य शिक्षा का भी संदेश दिया गया है जिससे भावी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में सामंजस्य स्थापित किया जा सके। इनके सभी उपन्यासों में पत्रों तथा डायरी जैसी विधाओं के माध्यम से एक ओर वृद्ध पीढ़ी द्वारा संवेग,मानवीय, संवेदना,परोपकार, परंपराओं, संस्कारों तथा जीवन मूल्यों आदि की महत्वता को स्पष्ट किया है तो दूसरी ओर इन संस्कारों एवं जीवन मूल्य को युवा पीढ़ी को आत्मसात करने का संदेश दिया गया है।

“माता-पिता की जितनी जरूरत हमें बचपन में होती है।
उतनी ही जरूरत उन्हें बुढ़ापे में हमारी होती है॥”
 
संदर्भ
• ‘वसीयत', डॉ. सूरज सिंह नेगी, साहित्यगार प्रकाशक, 2018.
• ‘रिश्तों की आँच’, डॉ. सूरज सिंह नेगी, नवजीवन पब्लिकेशन, 2016.
• ‘नियति चक्र', डॉ. सूरज सिंह नेगी, सनातन प्रकाशन, 2019.
• ‘यह कैसा रिश्ता', डॉ. सूरज सिंह नेगी, हिंदी साहित्य निकेतन, 2020.
• ‘समकालीन विमर्श वादी उपन्यास’, रमेश चंद मीणा, 2020.
• ‘हिंदी उपन्यासों में सामाजिक चेतना', डॉ. राजेश रानी, 2009.
• ‘सूरज सिंह नेगी की रचनाओं के विविध पहलू', रेनू बाला, 2020.

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