व्यंग्य: हिंदी की भैंस

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


आप रसीलाजी को नहीं जानते तो पक्का सुरीलीजी को भी नहीं जानते होंगे। वे महान बनने के जुगाड़ में जी जान से लगे थे पर पैंदे से ऊपर उठ नहीं पा रहे थे। उन्हें पता था कि विदेश में रहकर महान बनना बहुत सरल है। हिंदी नाम की जो भैंस है बस उसको दोहना सीख जाएँ तो उनके घर में भी घी-दूध की नदियाँ बह जाएँ। उस भैंस की पूँछ तक उनके बलिष्ठ हाथ पहुँच गए थे पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए जगह नहीं मिल रही थी। कई बाहुबलियों ने पूँछ कस कर पकड़ रखी थी। इतनी रस्साकशी थी कि मुझे पूँछ उखड़ जाने का डर था। पूँछ उखड़ जाती तो सारे पूँछ-पकड़क धड़ाम से गिर जाते। पर बिना पूँछ पकड़े भैंस के थन तक पहुँचना संभव नहीं था इसलिए वे सब पूँछ पकड़े हुए थे।

पर आप तो सुरीलीजी को नहीं जानते, तो आप उनकी भजन-मंडली के बारे में भी नहीं जानते होंगे। उनकी भजन-मंडली मन-लुभावन गीत गाती है। इनमें सुरीलीजी डीजे वाले बाबू रसीलाराज से कहती हैं आप कितने आकर्षक हैं, मेरा गाना बजा दीजिए प्लीज। तब मुस्कराते रसीलाराज कहते हैं आप तो सुर की देवी हैं, असुर को स-सुर और बाद में सर बना देती हैं। इस तरह ‘अहो रूपम अहो ध्वनि’ करते हुए वे परस्पर एक दूसरे को महान बनाने में लगे थे। पर भैंस थी कि पूँछ से आगे बढ़ने की जगह नहीं दे रही थी। यहाँ रहकर वे सिर्फ गोबर पा सकते थे जबकि दिल्ली में भैंस पकड़ने वाले दूध दोह सकते थे। वे दोनों हिंदी की भैंस को सीधे थन से पकड़ना चाहते थे।

जब मैं कथा सुना रहा होता हूँ, प्रभु का स्मरण जरूर करता हूँ। प्रभु कृपा हो जाए तो मैं भैंस की पूँछ पर लिखने के बजाय तारणहार पर लिखना शुरू कर दूँ। जैसे भैंस पर चिंतन करते-करते मैं प्रभु को याद कर बैठा वैसे ही सुरीलीजी को तुलसीबाबा याद आ गए- ‘चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुवीर’। उन्हें भैंस की पूँछ पकड़े सारे लोग संत लगने लगे। उन्होंने रसीलाजी को कहा- प्रिय कवि, तुम चंदन लाओ, हम भैंस की पूँछ छोड़कर चंदन घिसेंगे। तुलसीजी ने रामजी को चंदन-तिलक किया तो तुलसीबाबा महान बन गए। हम चंदन घिस कर प्रभुतुल्य मंत्रीवर को तिलक लगाएँगे तो हम भी महान बन जाएँगे। भैंस की पूँछ से वैसे भी अब बहुत दुर्गंध आने लगी है। सरकारी भैंस को बहुतेरे लोगों ने चारों तरफ से घेर रखा है। हम जब तक थन के पास पहुँचेंगे भैंस से दूध उतरना बंद हो चुका होगा। इसलिए भैंस की पूँछ छोड़कर चंदन घिसने का काम बेहतर है और सुगंधित भी।

दोनों ने भैंस की पूँछ छोड़ दी। सुरीलीजी ने चंदन घिस-घिस कर थाल भर दिया। चंदन की महक सारी दुनिया में फैलने लगी। सुरीलीजी व रसीलाजी की जोड़ी ने मंत्रीवर को चंदन-तिलक किया। वे मंत्रीवर को घूरते रहे कि कब वह उनके भाल पर रिटर्न-तिलक कर दें। भैंस की पूँछ पकड़े लोगों को यह लीला समझ नहीं आ रही थी। उन्होंने भैंस की पूँछ को जोर से मरोड़ दिया। भैंस रंभाने लगी तो मंत्रीवर का ध्यान भंग हो गया। वे तिलककर्ताओं को धन्यवाद तिलक नहीं लगा पाए। सुरीलीजी ने चंदन का थाल मंत्रीवर के चरणों में रख दिया और प्रार्थना की कि हे नाथ, आपके चरण इस थाल में रखकर घिसे हुए चंदन को उपकृत करें। मंत्रीवर ने गद्गद् हो वैसा ही किया। अब मंत्रीवर के तलवों में चंदन ही चंदन लगा था। तब रसीलाजी और सुरीलीजी ने मंत्रीवर की जय-जयकार करते हुए कहा नाथ आपके पुण्य चरण हमारे भाल पर रख दें। मंत्रीवर संस्कृति रक्षक थे, नरमुंडों पर नंगे पैर चलने में प्रशिक्षित थे। उन्होंने सुरीलीजी व रसीलाजी के भाल पर अपने चरण टिका दिए। कलाकार की गर्दन में लोच हो, रीढ़ में लचीलापन हो, घुटनों में नम्यता हो और पवित्र चरणों पर दृष्टि हो तो मंत्रीवर के चरण तक कलाकार का भाल पहुँच ही जाता है। सुरीलीजी का भाल चंदन से सुशोभित हो महक रहा था। अब भैंस स्वयं ही सुरीलीजी की तरफ आ रही थी। भैंस की पूँछ पकड़े लोग भी घिसटते-घिसटते सुरीलीजी के चरणों में आकर गिर पड़े थे।

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