लोक-काव्य रूप

पवनदीप कौर

हिन्दी विभाग, पंजाबी युर्निवर्सिटी, पटियाला। चलभाष: +91 981 401 0529
लोक-काव्य लोक जीवन की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है। जनमानस के जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति इस के माध्यम से होती है। लोक-काव्य की उत्पत्ति मानव के जीवन के अनुभव से हुई जब वह स्वानुभूति से प्रेरित होकर दुख तथा सुख की संवेदनाओं से आंदोलित हुआ तभी काव्य उसके मुख से निकल उठा इसी लिए उस ने आरम्भ से जो कुछ अनुभव किया उसे धरोहर के रूप में सुरक्षित रखने के लिए से ही लोक-काव्य का निर्माण किया। “लोक-काव्य व्यक्ति का समाजीकरण करता है और सामाजिक जीवन में समरसता उत्पन्न करता है तथा मानव सम्बन्धों को बुनता है। लोक काव्य में लोक मानस की व्यथा, चिंता, प्रसन्नता, कल्पना, संवेदना और स्मृति की अभिव्यक्ति है।’’   लोक मानस की सरल भावनाओं का सच्चा रूप लोक-काव्य में ही उजागर होता है जब लोक ने अपने उद्वेगों को संगीतमय रूप में प्रस्तुत किया तब लोक-काव्य का उद्य हुआ। “लौकिक काव्य रूप लोक प्रचलित गान शैलियों अथवा लोक-काव्य के विभिन्न प्रकारों अथवा लोक गायन की विविध परिपाटियों की अनुकृति होते हैं।’’   लोक-काव्य रूप लोक में प्रचलित लोक-काव्य की विधियाँ हैं। जिसके माध्यम से लोक मन अपनी खुशी, उल्लास को व्यक्त करता है। “लोक काव्य रूपों से भाव लोक गीतों के विशेष रूप हैं। जिनको लोक समूह ने स्वीकृति देकर सर्वप्रिय बना लिया होता है। जन साधारण में रुचि देखकर ही विशिष्ट साहित्य के रचयिता बार-बार इन काव्य रूपों को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं।’’   लोक चित की अभिव्यक्ति लोक-काव्य रूप हैं और समाज में रहने के कारण कवि का संबंध लोक समूह से होता है। वह लोक द्वारा स्वीकृत लोक-काव्य को माध्यम बनाता है और अपने विचारों को जन-जन तक सम्प्रेषित करता है।
लोक काव्य जन मानस के कण्ठ में निवास कर ही जीवित रहता है क्योंकि मानव ह्दय के उद्गारों को, रुचियों को तथा भिन्न-भिन्न प्रथाओं से उत्पन्न भावनाओं को लोक-काव्य गायन के विविध रूपों के माध्यम से प्रकट किया जा सकता है। सौन्दर्य पूर्ण समन्वित काव्य रूपों की प्रेरणा लोक से ही उत्पन्न होती है क्योंकि लोक-काव्य की प्रवृति सदा प्रवाहमान नदी की धारा की तरह है, जो एक स्वतन्त्र गति से प्रवाहित होती रहती है।
समाज में ऐसा कोई संस्कार, पर्व नहीं है जो लोक-काव्य के बिना पूर्ण होता हो। लोक जीवन में प्रचलित संस्कारों पर्वों, उत्सवों से संबंधित अनुभवों, उल्लासों को लोक-काव्य रूपों में देखा जा सकता है। विभिन्न लोक-काव्य रूप विभिन्न संस्कारों, रीति रिवाजों को प्रकट करते हैं। “लोक काव्य लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। हमारी संस्कृति की सच्ची झलक यदि कहीं से प्राप्त हो सकती है तो वह लोक-काव्य में ही है। लोक-काव्य में मानव जीवन की गंभीर अभिव्यंजना शक्ति छिपी हुई है। लोक-काव्य हमारे जातीय विकास के इतिहास की अमूल्य निधि हैं। जातीय हृदय की उथल-पुथल, सुख-दुख, संयोग-वियोग आदि की भावनाएँ भिन्न-भिन्न प्रथाओं के गीतों के रूप में हुई हैं।’’   लोकचित्त की सामूहिक चेतना तथा अनुभूतियों का साहित्य लोक-काव्य है। मानव ह्दय में उठने वाले भावों की सहज अभिव्यक्ति लोक-काव्य के माध्यम से होती है लोकचित्त की सामूहिक चेतना तथा अनुभूतियों का साहित्य लोक-काव्य है। मौखिक साहित्य में प्रचलित परंपरागत गान शैलियों पर आधारित काव्य भेदों को, जिनके माध्यम से लोक जीवन की अभिव्यक्ति होती है, लोक-काव्य रूपों की श्रेणी में रखा जाता है।  लोक-काव्य मौखिक संचारित कला है जो लोक-काव्य के विविध रूपों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती है और इसकी निरंतरता मनुष्य की स्मरण शक्ति और सामूहिक स्वीकृति के कारण संभव है। सामूहिक रूप में लोक की कलात्मकता का परिचय लोक-काव्य रूप देते हैं। लोक-काव्य समाज में हर एक पर्व उत्सव के अनुसार प्रचलित गायन की विविध परिपाटियाँ हैं जिसे लोक मन हर त्यौहार पर गाता गुनगुनाता है और इसी तरह गायन की यह कला परम्परागत रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होती रहती है। लोक-काव्य रूपों का गायन और रचना कभी भी किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं होती यह लोक की, समूह की रचना है। 
लोक-काव्य की रुचि जन साधारण के जीवन में पूर्ण रूप से व्याप्त होती है। लोक-जीवन के प्रत्येक पक्ष की झलक लोक-काव्य के विविध रूप प्रस्तुत करते हैं। और इन्हीं से प्रभावित होकर साहित्य के रचयिता भी इन लोक-काव्य रूपों को अपने विचार प्रकट करने का आधार बनाते हैं। “किसी रचनाकार को जब भी जनता के नजदीक जाने की जरूरत पड़ी और किसी प्रकार का धार्मिक सामाजिक या कोई और उपदेश लोगों को देना चाहा तो साहित्य को लोक साहित्य के तत्वों द्वारा अभिमंत्रित करके लोकप्रिय बनाने की कोशिश की।”   जब रचयिता के मन में भावों को प्रकट करने की उत्कट लालसा उत्पन्न होती है तो जिस लोकचित्त के साथ वह निरंतर रह रहा होता है जिस लोक संगीत, संवेदन शैली में वह जीता है अनायास ही वह लोक में प्रचलित विभिन्न शैलियों को अपने भाव प्रकट करने का साधन बना लेता है। एक रचनाकार अपने परिवेश या परिस्थिति विशेष में जन्म लेता है बढ़ता है और संस्कार ग्रहण करता है। वह अपने परिपार्श्व की परिस्थितियों और आस-पास होने वाली घटनाओं के प्रभाव को रचनाओं में प्रतिबिम्बित करता है।
  
संदर्भ सूची
[1] हरि सिंह पाल, ब्रज लोक काव्यःसमाजिक संदर्भ, नीरज बुक सैंटर, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष 2005, पृष्ठ 10
[2] रवीन्द्र, भ्रमर, हिन्दी भक्ति साहित्य में लोक तत्व, भारती साहित्य मंदिर, दिल्ली, 1961, पृष्ठ 122
[3] करनैल सिंह, थिंद, लोकयान तथा मध्यकालीन पंजाबी साहित्य, रवि साहित्य प्रकाशन, अमृतसर, प्रकाशन वर्ष.1973, पृष्ठ 137
[4] नुपेन्द्र प्रसाद, शर्मा, पद्मावत का लोकतात्विक अध्ययन, अनुपम प्रकाशन, पटना, प्रकाशन वर्ष 1979, पृष्ठ 3
[5] रवीन्द्र, भ्रमर, हिन्दी भक्ति साहित्य में लोक तत्व, भारती साहित्य मंदिर, दिल्ली, 1961, पृष्ठ 9


सहायक ग्रंथः
थिंद, करनैल सिंहः लोकयान तथा मध्यकालीन पंजाबी साहित्य, रवि साहित्य प्रकाशन, अमृतसर, प्रकाशन वर्ष 1973
पाल, हरि सिंहः ब्रज लोक काव्यःसमाजिक संदर्भ, नीरज बुक सैंटर, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष 2005
लोक काव्य के क्षितिज, अनंग प्रकाशन, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष 2005.
भ्रमर, रवीन्द्रः हिन्दी भक्ति साहित्य में लोक तत्व, भारती साहित्य मंदिर, दिल्ली, 1961.
शर्मा, नुपेन्द्र प्रसादः पद्मावत का लोकतात्विक अध्ययन, अनुपम प्रकाशन, पटना, प्रकाशन वर्ष 1979.
वणजारा बेदी, सोहिंदर सिंह: पंजाबी लोकधारा विश्वकोश, नैशनल बुक शॉप, दिल्ली, 2009

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