जनजातीय छात्रों के स्वावलंबन के लिए व्यावसायिक शिक्षा है ज़रूरी

दर्शनी प्रिय

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पुरातन लेखों में अत्विका कहे जाने और देश के लगभग 17 प्रांतों में बहुसंख्यक फैले कुल जनसंख्या के 8.6 प्रतिशत जनजातियों से भारत भूमि का गहरा नाता रहा है। संभवतः महात्मा गांधी के उन्हें गिरिजन नाम से जोड़ने का मंतव्य भी यही रहा होगा कि भारतीय भू भाग की वृहत्तर सांस्कृतिक सामाजिक विरासत के जीवंत हिस्से के रूप में उन्हें जोड़ा जा सके। देश भर के 698 अनुसूचित जनजातियों की अपनी समृद्ध विरासत रही है। लेकिन शिक्षा,जीविकोपार्जन के स्त्रोतों और उद्यमिता से सालो दूर रहे इन जनजातियों का मुख्य धारा से कटे रहना अब अखरता है। बदले समय में उनका परंपरागत शिक्षा से इतर व्यवसायिक शिक्षा से जुड़ना न केवल प्रासंगिक हो गया है अपितु अत्यावश्यक भी। जनजातीय छात्रों के समग्र विकास की आधारशिला की परिकल्पना पेशेवर शिक्षा को केंद्र में रखकर ही की जा सकती है।

वैसे भी व्यावसायिक शिक्षा जीविकोपार्जन के मूल में है। ज्ञानाधारित शिक्षा से इतर व्यावसायिक शिक्षा की मांग हाल के दिनों में तेज़ी से बढ़ी है। ज्ञान की वैविध्यता के साथ जीविका आधारित शिक्षा के जरिये भविष्य को सुरक्षित रखना है तो व्यावसायिक शिक्षा के मूल मन्त्र को समझना होगा। निःसंदेह वस्तुनिष्ठ या सूचनापरक ज्ञान आम जन जीवन को भविष्य के उच्चतम विकल्प उपलब्ध कराता है।लेकिन रोजगारपरक व पेशेवर शिक्षा के बिना अर्थोपार्जन की राह कठिन है। समाज के सभी वर्गों विशेषकर वंचित या जनजातीयो के लिए व्यावसायिक या रोजगारपरक शिक्षा पर खासा जोर दिया जाना तात्कालिक रूप से जरूरी है। ताकी रोजगारपरक शिक्षा के बूते ही एक सशक्त और स्वावलम्बी जनजातीय पीढ़ी तैयार की जा सके। 

लेकिन चिंतनीय है कि देश के सुदूर वनवासी क्षेत्रों में परंपरागत शिक्षा से इतर कभी किसी दूसरी समकक्ष पेशेवर शिक्षा को वांछित महत्ता नहीं दी गई । आज भी देश के बड़े जनजातीय क्षेत्रों के सत्तर प्रतिशत से अधिक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा जैसी कोई एच्छिक या अनिवार्य पाठ्यक्रम की विधिवत व्यवस्था नहीं ।

व्यावसायिक शिक्षा, अकादमिक शिक्षा से कई मायनों में अलग है । इसमें ज्ञान और कौशल का, व्यावहारिक चुनौतियों और अर्थव्यवस्था की कार्य -स्तिथियों के बीच गहरा सम्बन्ध होता है। इसे कौशल एवं कौशल विकास से अलग रखकर देखा जाना चाहिए । इस प्रकार की शिक्षा में ज्ञान, कौशल अभिवृति का एक एकीकृत रूप समाहित होता है। तेज़ी से बदलती कामकाज़ी दुनिया में ज़रूरी व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम जनजातियों को न केवल कौशल बल्कि सैद्धांतिक ज्ञान,अभिवृति एवं मानसिकता के साथ किसी पेशे के लिए जरुरी सॉफ्ट स्किल भी दिये जा सकते हैं ।

देश में जनजातीय युवा बेरोजगारों की एक बड़ी संख्या है जिनमें से ज्यादातर केवल बुनियादी शिक्षा के भरोसे अपने भविष्य को संवारने के दिवास्वप्न में है । उनके पास वैकल्पिक शिक्षा का कोई विकल्प नहीं। और अगर गाहे बगाहे अवसर उपलब्ध भी हो जाए तो संसाधन की भारी कमी बाधा बन जाती है। ऐसे में विशाल जनजातीय आबादी को केवल परंपरागत शिक्षा के जरिये रोजगार मुहैया कराना दुःस्वप्न ही है। हालांकि अतीत में भी व्यवसायिक शिक्षा संबंधी सरकारी प्रयास किये जाते रहे हैं अपितु उनके उनके सफल क्रियान्वयन में अड़चने अधिक आई हैं। पेशों की समाजिक हैसियत के पदानुक्रम ने उच्च शिक्षा में कई तरीको से दिक्कत पैदा की है। इसने व्यावसायिक शिक्षा के संबंध में आम जान की समझ और इसके चलते उच्च शिक्षा में छात्रों द्वारा किये जाने वाले चयन को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। ऐसे कई कारण हैं जिसने व्यावसायिक शिक्षा के बारे में लोगो की सोच को प्रभावित किया है। अकादमिक और पेशेवर शिक्षा से व्यावसायिक शिक्षा के अलगाव और व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों की सामान्यतः खराब गुणवत्ता ने स्पष्ट रूप से इसमें अपनी भूमिका अदा की है। इस स्तिथि में तुरंत बदलाव की आवश्यकता है। 

व्यावसायिक शिक्षा को जनजातीय छात्रों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनाया जाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा छात्र इसके प्रति उन्मुख हो सकें। इसके क्रियान्वयन में सुधार लाना एक बड़ा बुनियादी कदम होगा। इसके अतिरिक्त शिक्षक विकास और नियुक्ति,पाठ्यचर्या, बुनियादी संरचना आदि सभी कारणों में सुधार की ज़रुरत होगी। इसे मुख्यधारा की शिक्षा से अलग न कर मुख्यधारा की शिक्षा में पूरी तरह से जोड़ा जाना चाहिए ताकि सभी छात्र व्यावसायिक शिक्षा के बारे में जान सके और उनके पास इसकी विशिष्ट धारा को चुनने का विकल्प हो। अहर्ताओं /सर्टिफिकेट और क्रेडिट व्यवस्था की स्पष्ट समकक्षता भी उपलब्ध हो ताकि छात्र व्यावसायिक और सामान्य शिक्षा के बीच आसानी से आ-जा सकें। इससे व्यावसायिक शिक्षा को व्यापक बनाने, समाजिक स्वीकार्यता बढ़ाने और सभी छात्रों को केवल व्यावसायिक शिक्षा अथवा व्यावसायिक शिक्षा और पेशेवर एवं अकादमिक अनुशासनों को संयुक्त रूप से पढ़ने के मौके देने में मदद मिलेगी।

कुछ ऐसी व्यवस्था हो जिसमें छात्रों के पास अपने अकादमिक करियर के दौरान व्यावसायिक शिक्षा को चुनने का विकल्प हो और वे इस चुने गए विकल्प पर एक उचित समयवधि तक काम कर सकें। इससे उन्हें अधिक व्यापक कोर्स का लाभ मिलेगा और आगे चल कर उनके पास यह विकल्प रहेगा की वे उच्च व्यावसायिक डिग्री ले सकेंगे या फिर किसी अन्य विषय /संकाय के प्रोग्राम में पढ़ाई जारी रख सकेंगे।

विभिन्न स्कूलों और कालेजों के स्नातकों को शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत रोजगार के पर्याप्त मौके मिल सके इसके लिए मानक उद्दोग संस्थानों और भावी नियोक्ताओं को साथ मिलकर काम करना होगा। आईटीआई, पॉलिटेक्निक, स्थानीय उद्दोगों और कारोबार, खेतों, अस्पतालों और गैर सरकारी संस्थानों और ऐसी अन्य सुविधाओं के साथ समन्वय करना होगा जहाँ छात्रों को व्यावहारिक कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा सके। साथ ही ऐसे शिक्षा कार्यक्रमों को विकसित करना होगा जो मुख्यधारा की शिक्षा से एकीकृत हो और जिनसे प्राप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण को, उससे सम्बद्ध सैद्धांतिक ज्ञान से पूरा किया जा सके। इन कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण जीवन कौशलों जैस- सम्प्रेषण, कौशल, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता, उद्दमिता आदि से सम्बंधित कोर्स भी शामिल होने चाहिए। 

व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्किल गैप एनालिसिस, स्थानीय अवसरों का पता लगाना, सभी शैक्षिक संस्थानों के साथ व्यावसायिक शिक्षा एकीकरण हेतु वित्तीय सहयोग, बुनियादी संरचना एवं व्यावसायिक शिक्षा को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए लोगों की भर्ती, तैयारी और सहयोग के लिए पर्याप्त निवेश, अप्रेंटिसशिप को प्रोत्साहित करने जैसे कई महत्वपूर्ण कदम उठाये जाने की बात की गयी है। बहुत संभव है इससे छात्रो के लिए नई राह खुले। इसके अतिरिक्त सभी शैक्षिक संस्थानों द्वारा उनके पाठ्यक्रम में 25% व्यावसायिक कोर्स को शामिल करना इस दिशा में एक अहम कड़ी साबित हो सकती है। तथापि छात्रों को आत्मनिर्भर और स्वावलम्बी बनाने की दिशा में बहुत कुछ किया जाना अभी शेष है । सामान्य शिक्षा के साथ-साथ व्यावसायिक शिक्षा को निर्वाध रुप से पाठ्यक्रम में लागू करके ही छात्रों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकेगा।


हालांकि इस दिशा में सकारात्मक पहल करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अपने बजट प्रावधान को 5329.32 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5957.18 करोड़ रुपये कर दिया है। साथ ही दो विशेष कौशल क्षेत्र कार्यक्रम के तहत 2385.90 करोड़ रुपये की रकम भी जारी की गई है। और वर्तमान शैक्षणिक वर्ष के दौरान देश भर के विभिन्न एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में नामांकित 73,145 आदिवासी छात्रों को व्यवसायिक शिक्षा से जोड़ने का भी प्रयास किया जा रहा है।

लेकिन केवल इतने से बात नहीं बनने वाली।कौशल विकास कार्यक्रमों में कुछ विशेष पाठ्यक्रमों को जोड़कर इस और सुग्राही बनाया जाए तो बेहतर। विभिन्न व्यवसायिक कार्य जैसे कार्यालय प्रबंधन सहित योजना और प्रबंधन, सौर तकनीशियन/इलैक्ट्रीशियन, सौंदर्य विशेषज्ञ, हस्तशिल्प, रोजमर्रा के निर्माण कार्यों (जैसे नलसाज, राजमिस्त्री, इलैक्ट्रीशियन, फिटर, वेल्डर, बढ़ई आदि) के लिए आवश्यक कौशल,रेफ्रिजरेशन और एसी की मरम्मत, मोबाइल मरम्मत,पोषण, आयुर्वेदिक और जनजातीय औषधियां, आईटी,डेटा इंट्री,फेब्रिकेशन, पेरामेडिक्स और घर पर नर्स का प्रशिक्षण, वाहन चलाना आदि ऐसे हजारों कार्यक्रम है जिनसे उन्हें जोड़कर जोड़कर उन्हें आर्थिक सशक्तता की राह पर आगे बढ़ाया जा सकता है। 


इसके अतिरिक्त पॉलिटेक्निक जैसे पुराने और व्यवसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम जो पहले से बाजार में जमे हुये है जिसके जरिये छात्रो को इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान जैसे पारंपरिक विषयों में तीन वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रदान किया जाता है, इसे भी पुनर्जीवित करना होगा। इस कड़ी में राष्ट्रीय शहरी जीवन मिशन परियोजना और “आजीविका” मिशन जैसी परियोजना से जनजातीय छात्रों को जोड़कर रोजगार, पूरक ज्ञान, उपकरण, कौशल सेट, और अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्त प्रदान करने संबंधी सुविधा भिंडी का सकती है। किया 

हालांकि इन कुछेक योजनाओं के बूते बेरोजगार जनजातियों की एक लंबी श्रृखंला को स्वावलंबन की दिशा में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता । इसके लिये व्यापक और बहुसंख्यक योजनाओं सहित उसके उचित क्रियान्वयन की दरकार होगी।

 भारत के सुदूर वन आच्छदित क्षेत्रों में जहाँ ज्यादातर युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे है वहां उन्हें व्यवसायिक शिक्षा से लैस किया जाना बहुत ज़रूरी है। वास्तव में छात्रों के स्वावलंबन की नींव व्यवसायिक शिक्षा के आधार पर ही टिकी है। परंपरागत शिक्षा से उलट व्यवसायिक शिक्षा आधारित इनोवेशन से इस दिशा में वांछित परिणाम हासिल किये जा सकेगें । यदि जनजातीय छात्रों को आर्थिक रुप से सशक्त बनाना है तो व्यावसायिक शिक्षा के महत्व को समझना ही होगा तथा उसे परंपरागत शिक्षा के समकक्ष खड़ा कर शैक्षिक पाठ्यक्रमों में दृढ़ता से लागू करना होगा केवल तभी पूर्ण स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।


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