कविता: भूख भी पागलपन है

- जितेन्द्र कुमार


कोई पागल नहीं होता,
भूख ही पागल बना देती है।
कोई सड़क पर नहीं सोता,
नींद ही सुला देती है।

बात कुछ दिनों पहले की है,
लौट रहा था काशी से मैं
यह वही काशी है जो धर्मवाहिनी कही जाती है। 

अकस्मात् दृष्टि आकर रुकी मिष्टान्न की दुकान पर,
दुकान का नाम भी था 'बाबा विश्वनाथ' के नाम पर।
मौसम शीत का था लेकिन दुकान पर 'गर्मियाँ' थीं,
हाँ, सही समझे आप चुनाव की ही 'सरगर्मियाँ' थीं।

सवारी बस उसी दुकान के सामने रुकी थी, जहाँ
चुनाव की बड़ी-बड़ी पर्चियाँ टँगी थीं।
काफी भीड़ थी, जन कोलाहल था,
कोई कुछ लेकर जाता था, कोई आता था टहलता।

उस थोड़े से पल में मेरी दृष्टि गई उधर,
एक भिक्षुक या कि  पागल खड़ा था जिधर।
खा कर फेंके गए उन समोसे-लौंगलता के दोनों को,
बारंबार चाट रहा वह 'पागल' शीरे से सने कोनों को।

टपकीं शीरे की दो-तीन बूंदे धरा पर,
धूल के आगोश में आकर जैसे,
वे 'शीतोपलादि' बन गयीं थीं उसके लिए।
भूख कहाँ मिटने वाली थी उन खाली दोनों से,
बिना झिझक लगा वह चाटने उस 'शहदीले शीतोपलादि' को।

था कारुणिक दृश्य मेरे लिए वह,
तभी चल देती बस से मैंने सुना-
कोई खद्दरधारी दुकानदा से उसे हटाने को कह रहा था।

मैं अब भी सोच रहा हूँ कि-
वह भूखा था, या पागल था, या भिक्षुक था? 
या था वह पागल-भूखा-भिक्षुक?

फिर मुझे लगा, ''भूख भी पागलपन है।''
***

सहायक अध्यापक, राजकुमार इंटर कॉलेज भुजना, चन्दौली - 232110
चलभाष: +91 945 250 8522

3 comments :

  1. पूरी सेतु टीम का अशेष आभार

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  2. पूरी सेतु टीम का अशेष आभार

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  3. Very nice poem sir
    आपने एक भूख से पीड़ित व्यक्ति की व्यथा का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है।।
    मां सरस्वती का आशीर्वाद आप पर सदा बरसे,
    आप ऐसे ही अपने चाहने वालों को अच्छी अच्छी कविता के माध्यम से प्रसन्नचित तथा समाज को जागृत करते रहे।।
    हमलोग को आपकी अगली कविता का इंतेजार रहेगा सर।।

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