कहानी: फैसला

सुषमा मुनींद्र

- सुषमा मुनीन्द्र


आम तौर पर वे बेचैन रहते हैं।
कुटुम्ब न्यायालय (फेमिली कोर्ट) में चल रहे संबंध विच्छेद के मामले की सुनवाई करते हुये लग रहा है अब तक ऐसे बेचैन नहीं थे जैसे अब हो गये हैं। अद्भुत बात यह है बेचैनी के बावजूद गवाहों और साक्ष्य पर पूरी सजगता से ध्यान देते हुये वे स्वविवेक से योग्य फैसला करते हैं। यह पहला मौका है जब उन्हें लग रहा है जो भी फैसला देंगे, गलत होगा। 
वादी कह रहा था, "सर, इस सिरफिरी औरत के साथ रहने की मैंने तीन साल कोशिश की। अब इसके साथ रहा तो पागल हो जाऊॅंगा। पागल के साथ रहते हुये भला चंगा इंसान पागल हो जाता है।"
"ये पागल नहीं हैं, कुछ सुस्त हैं।" उन्होंने कहा वादी से, लेकिन देखा प्रतिवादिनी को।
प्रतिवादिनी उन्हें ही देख रही थी। वे अकबका गये। इसकी नजर उनकी पत्नी मनोकामना की नजर से कितनी मिलती है। खालीपन लिये हुये मासूम चितवन। लगा प्रतिवादिनी कुछ कहना चाहती है पर पिछली पेशियों की तरह वह चुप रही। 
वादी बोला, "इसको अब अपने साथ नहीं रख सकता। इसके माँ-बाप ने हम लोगों को धोखे में रख कर इसे मरे साथ ब्याह दिया। इसे जन्म देने वालों ने नहीं रखा, मैं कैसे रख सकता हूँ? फेरों का बंधन, जन्म के बंधन से मजबूत नहीं होता है फिर भी देखिये इसके माँ-बाप ने धोखे से इसकी शादी कर दी कि अब यह जाने और मैं जानूँ। सर जिंदगी एक बार मिलती है। मैं अपनी जिंदगी को और तबाह नहीं करूंगा।"

वादी के प्रश्न उन्हें बेचैन करते हैं। प्रबल इच्छा है पूँछें - तो आपके साथ धोखा हुआ है? आपको इसके माता-पिता ने छला या आपके माता-पिता ने? आपके माता-पिता को इसके मंद बुद्धि होने की जानकारी थी? क्या इसके एक समर्थ-समृद्धिशाली मामा हैं जिन्होंने आपको और आपके भाइयों को बड़े पद दिलाये हैं? परिवार और भाइयों के लिये विकास के रास्ते खुल गये जबकि आपके हिस्से में आई पागल? वे बेचैन हैं। न्यायाधीशी गरिमा और गम्भीरता का ख्याल रख वे वादी से ऐसे प्रश्न नहीं कर सकते। प्रश्नवाची नजर से वादी को देखते रह गये - यह पत्नी को छोड़ने की मानसिकता कैसे बना पाया? वे क्यों न बना पाये? ब्यवहारिक, साहसी बल्कि निष्ठुर कैसे हो पाया? वे क्यों न हुये? शायद एक समान स्थिति का सामना सभी लोग एक समान भाव से नहीं कर पाते हैं। अब उन्होंने प्रतिवादिनी को देखा। वादी अपनी जगह सही है लेकिन प्रतिवादिनी निरपराध है। यह अपने लिये कभी कोई फैसला नहीं कर पाई होगी। दूसरों के द्वारा किये गये फैसलों को भली-भाँति समझ न पाती होगी। समझती होगी तो प्रतिकार न कर पाती होगी। ठीक मनोकामना की तरह। मनोकामना गलती करती है। वे दुत्कार देते हैं। सहम कर वह निर्दोष नजर से उन्हें देखने लगती है। वे क्रोध को जब्त कर लेते हैं। इसी असमंजस में उन्होंने मनोकामना के साथ तीस साल गुजार दिये। तलाक का विचार तक नहीं किया। तीस साल।

तीस साल पहले वे ऐसे छात्र थे जिसका चित्त पढ़ाई में नहीं लगता था। पूरक परीक्षायें देते हुये विधि स्नातक हुये और रोजगार ढूँढ़ने लगे। बेरोजगारी के उन्हीं दिनों में अम्मा ने उन्हें चैंका दिया था -
""सदाव्रत, हम तो सोचते थे सपरमिंटी (सप्लीमेन्ट्री) वाले बेरोजगार लड़के की सादी कैसे होगी लेकिन अच्छी गोटी बैठ गई। लड़की की फोटो देखो। कितनी सुंदर है। एमए पास है। चाचा कानून मंत्री हैं।"
बेरोजगार के लिये भव्य वैवाहिक प्रस्ताव उन्हें अस्वाभाविक लगा था - 
"अम्मा, बड़े घर की यह लड़की तुम्हारे बेरोजगार सदा को अपना निजी सचिव बना कर रखेगी।"
अम्मा चतुराई से हॅंसी, "निजी सचिव नहीं, मजिस्ट्रेट बनोगे। हम और तुम्हारे पिताजी मनोकामना को देखने जा रहे हैं।"

कुछ तारीखें महज तारीख नहीं होतीं। सम्पूर्ण जीवन का फलादेश बन जाती हैं। वे प्रथम रात्रि को ही जान गये थे अम्मा और पिता जी ने ऐसी लड़की उनके ऊपर थोप दी है जिसका मानसिक विकास मंद है। उसने लाल ब्लाउज के भीतर नीला ब्लाउज पहन रखा था। गले से दिखते नीले ब्लाउज को देख उन्होंने कहा था -
"इस गर्मी में दो ब्लाउज क्यों पहने हैं?"
"डर लग रहा है।" मनोकामना इतना झुक कर बैठी थी मानो अपने में समा जायेगी।
"एमए हिंदी साहित्य में किया है न।"
"फस्र्ट डिवीजन। चाचाजी कापी बनवा देते थे।"
"बेवकूफ हो।"
मनोकामना घबरा गई थी।
वे उससे दूर भागते लेकिन उनके छोटे भाइयों देवव्रत और देशव्रत को नई भाभी की संगत अच्छी लगती थी। दोनों उससे खूब बातें करते। बातें सुन वह स्वतंत्र होकर हॅंसती। उसका हॅंसना भिन्न होता था जो उसके मंद मानसिक विकास को सूचित करता था। उसके मायके से आने वाली सौगातों में अम्मा की बहुत रुचि थी लेकिन उसकी हठीली हॅंसी चुभती थी। अम्मा तमक कर उनके कमरे में आईं, "सदा, तुम सो रहे हो। दुलहिन अट्टहास कर रही है। पिताजी का भी लिहाज नहीं।"
वे वेग से उठे थे "देश, देव तुम दोनों पढ़ते क्यों नहीं? और जी तुम गॅंवारों जैसी क्यों ठिलठिला रही हो? कमरे में जाओ।" उन पर कातर नजर डाल मनोकामना कमरे में चली गई थी। अम्मा ने संताप कहा "न रसोई का काम जानती है, न सीखना चाहती है। ढेर हॅंसती है। सदा इसे सभ्यता सिखाओ।"
"तुम सिखाओ अम्मा। तुम्हारी पसंद की बहू है।"
"तुम क्यों न सिखाओगे? तुम्हें इससे परेशानी नहीं है?" 
"सब ठीक है।"
ऐसा जवाब देकर वे बताना चाहते थे उनकी अपराधी मनोकामना नहीं अम्मा-पिताजी हैं। मनोकामना को स्वीकार करने में उन्हें अम्मा-पिताजी से बदला लेने जैसा एहसास मिल रहा था। वे मानसिक प्रताड़ना से गुजर रहे हैं तो अपराध बोध से अम्मा-पिताजी भी नहीं बच सकते। वे खुद को मजबूत करने लगे थे। स्थिति को अपनी नियति मान लें तो मनोकामना के साथ जीवन यापन कर लेंगे।

जल्दी ही वे सिविल जज के लिये सलेक्ट हो गये। उन्हें कल्पना नहीं थी उन जैसा निम्न औसत छात्र जो सिविल जज के इन्टरव्यू में एक भी प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे पाया था मजिस्ट्रेट बन जायेगा। अम्मा का कार्यक्रम सफल रहा। हुलस कर कह रही थीं -
"दुहहिन के चाचाजी जबान के पक्के हैं। सदा को जज बना दिया। देव एलएलबी कर रहा है, बीए के बाद देश भी कर ले तो दोनों की जज्जी पक्की समझो।" 
सुदूर निमाड़ में उन्हें पहली पोस्टिंग मिली।
मनोकामना की तैयारी देख अम्मा ने आपत्ति की -
"सदा इसे न ले जाओ। न घर की देख भाल करेगी न तुम्हारी। परदेस में मुसीबत होगी।"
"अम्मा, यह सब तुम्हें शादी से पहले सोचना था। जो भी मुसीबत होगी देखा जायेगा। इसे यहाँ किसके भरोसे छोड़ दूँ? तीज-त्योहार पर इसके मायके से जो सामान आता है तुम्हें बहुत अच्छा लगता है लेकिन तुम इसका मजाक बनाती हो।"
मनोकामना को ससुराल में जगह दिलाने के उद्देश्य से उसके माता-पिता मौके-मौके पर सौगातें भेजते थे।
अम्मा ने आशय बदला "सदा, हमने तुम्हारे साथ नेकी की है। जज बन गये वरना खाली बैठे रहते।"
"इसके कारण जज बना हूँ तब तो इसको लेकर मेरी जवाब देही और बढ़ गई है अम्मा।"

निमाड़ की अपेक्षाकृत छोटी और अविकसित तहसील में वे मनोकामना के साथ रहने का उद्यम करने लगे। डरी-सहमी मनोकामना बिस्तर पर पड़ी रहती, कभी धीमी आवाज में खुद से बात करती, कभी मेड के साथ खुल कर हॅंसती। वे दुत्कार देते तो प्रतिक्रिया न दे अजब निरपराध नजर से उन्हें देखने लगती। वह परिस्थिति पर अधिक विचार नहीं करती थी। पूरी तीक्ष्णता और आवेग से नहीं सोच पाती थी। जब वे तेज आवाज में बोलते सहम कर तत्काल आदेश का पालन करती। किसी आगंतुक के लिये दरवाजा न खोले जैसा आदेश देकर वे कचहरी चले जाते। जानते थे मनोकामना दरवाजा बंद कर खुद से बातें करते हुये सो जायेगी या आँगन में लगे पीपल के पेड़ पर बैठे पक्षियों को देखेगी फिर भी उन्हें लगता शाम को जब घर पहुँचेंगे वहाँ कोई अनहोनी मिलेगी। वे सोचते और मस्तिष्क पर दबाव महसूस करते। लगता जल्दी ही मनोकामना की तरह धीमी गतिविधि वाले हो जायेंगे। छोटी जगह में अधिकारियों की खबरें तेजी से प्रसारित होती हैं -
- बाईजी का दिमाक ठीक नहीं है।
- बाईजी पैसा सम्हालना नहीं जानतीं। साहब पाई-पाई का हिसाब रखते हैं।
- बाईजी शादी से पहले ऐसी थीं या बाद में हुईं?
- साहब निभा रहे हैं, दूसरा होता तो छोड़ देता।

बातों के आभास और प्रतिध्वनियों को वे समझते थे पर चुप रहते थे। लोग सीधे उनसे सवाल न करें इसलिये लोगों से मिलते-जुलते नहीं थे। जब कभी कहना जरूरी हुआ कहा, "हाँ, मनोकामना कुछ सुस्त है। बहुत लोग हैं जो किन्हीं वजहों से परेशान हैं लेकिन हमारे समाज का हिस्सा है। मनोकामना को सहयोग करना मुझे अच्छा लगता है।" यह सब कहकर वे खुद को साबित नहीं करना चाहते थे। बस, खुद को परिस्थिति से घिरा हुआ नहीं दिखाना चाहते थे। चिंतित जरूर रहते थे इन परिस्थितियों मे मनोकामना और खुद को कब तक सुरक्षित-सलामत रख सकेंगे। मनोकामना के गर्भवती होने पर उनकी चिंता बढ़ गई। संतान के रूप में उन्हें उनके हिस्से का सुख मिलने वाला है। मनोकामना कोई गलती कर बैठेगी तो गर्भस्थ शिशु को आघात पहुँचेगा। अम्मा पर भरोसा नहीं रहा। उसे उसकी माँ के पास छोड़ आये। माँ आश्वस्त दिखी। मनोकामना गर्भवती है अर्थात् सदाव्रत ने इसे स्वीकार कर लिया है। कृतज्ञ माँ ने कहा, "तुम इसे हमारे पास लाये, मुझे अच्छा लगा। इसकी देख-भाल होती रहेगी। बहुत सीधी लड़की है। गलती करती है पर प्रेम से समझाने पर समझ जाती है। आते-जाते रहना।"
"आऊॅंगा।"
वे चलने लगे तो एकाएक मनोकामना उनके सामने आकर खड़ी हो गई थी -
"मैं बुरी हूँ? बेवकूफ?" मनोकामना उन्हें उसी तरह देख रही थी जिस तरह प्रतिवादिनी देखती है।
"तुम अच्छी हो।"
"फिर कब आयेंगे? मुझे छोड़ तो नहीं देंगे?"
वे चकित। यह सुनती रही है ऐसे आशय और संदर्भ? 
"जल्दी आऊंगा। अपना ध्यान रखना।"
पुत्र जन्म पर वे छुट्टी लेकर आये थे। चिकित्सक से पूछा, "बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ है न?"
"हाँ। क्यों?"
"कुछ नहीं।"
पुत्र का नाम सत्यव्रत रख लौट गये थे। सत्यव्रत छः माह का हो गया तब उसे और मनोकामना को अपने साथ ले गये। वापसी पर मनोकामना की माँ भेंट-उपहार सजाने लगी थीं। उन्होंने मना किया, "कुछ नहीं ले जाऊॅंगा।"
"नाराज हैं?"
"नहीं। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता।"
"अभी तो अपने अम्मा-पिताजी के पास जा रहे हैं न? उनके लिये कपड़े ..."
"औपचारिकता न करें।"
वे दो दिन अम्मा-पिताजी के पास रहे। सत्यव्रत के जन्म पर अम्मा को काफी माल मिलने की उम्मीद थी। सत्यव्रत को सुनाया, "दुलहिन की जचकी यहाँ होती पर सदा तुमने अपने ससुराल वालों पर भरोसा किया।"
"हटाओ न अम्मा।"
"देख रही हूँ दुलहिन खाली हाथ आई है। तब देते थे कि तुम पगलिया को छोड़ न दो। अब इसका इतना आदर करने लगे हो तो क्यों दें?"
अम्मा को हताश देख उन्हें विचित्र किस्म का तोष मिल रहा था "वे बहुत दे रहे थे। मैं नहीं लाया। भगवान ने स्वस्थ बच्चा दे दिया। और कुछ नहीं चाहिये।"
"दुलहिन को अपना होश नहीं, बच्चा कैसे पालेगी?"
उन्होंने मनोकामना को देखा। अम्मा की मधुर वाणी सुन क्या सोच रही है? वह प्रतिक्रिया विहीन दिखाई दी।
"मैं पालूँगा।"

सत्यव्रत का लालन-पालन सही अर्थों में उन्होंने ही किया। मनोकामना रात को बेसुध सोती। वे सत्यव्रत को गोद में लेकर टहलते। दूध गरम करके पिलाते। सत्यव्रत के काम करते हुये उन्हें आनंद मिलता। उसे मनोकामना के पास छोड़ कर कचहरी जाते हुये सशंकित रहते पर मेड नहीं रखते थे कि मनोकामना को बेवकूफ बना कर वारदात कर सकती है। वे कचहरी से रोज सशंकित लौटते थे और देखा पाँच साल के सत्यव्रत का हाथ एक स्ट्रीट डॉग के मुँह में है। उन्होंने पत्थर मार कर कुत्ते को भगाया और रोते हुये सत्यव्रत को गोद में ले लिया। सत्यव्रत हिचक कर बताने लगा वह कुत्ते को बिस्किट खिलाना चाहता था लेकिन कुत्ते ने हाथ मुँह में भर लिया। दो अंगुलियों की त्वचा कट जाने से बूँद की शक्ल में रक्त छलक आया था। उन्होंने आसमान की ओर देख कर भगवान को स्मरण किया कि बड़ा घाव नहीं है। सत्यव्रत को गोद में लिये, हाँफते हुये वे आँगन में बैठी मनोकामना के सामने खड़े हो गये थे -
"मनोकामना, तुम सचमुच पागल हो।"
विकराल चीख सुन वह काँप कर ऊॅंचे स्वर में रोने लगी।
"इतनी लापरवाही ... तुम मर क्यों नहीं जाती? किसी दिन मैं सत्यव्रत को खो दूँगा।"
अपार क्रोध के वशीभूत हो वे सत्यव्रत को वहीं बैठा कर वे मनोकामना का गला दबाने लगे। उनकी पकड़ कमजोर थी या मनोकामना अपनी रक्षा करना जानती थी। उनकी पकड़ से छूट कर घिसटती-लड़खड़ाती हुई बाहरी बरामदे में आई और प्रचण्ड होकर रोती रही। जब वे सत्यव्रत को अस्पताल ले जाने के लिये बाहर निकले देखते हैं, कुछ लोग ताक-झाँक कर रहे हैं। वे सुस्त पड़ गये। खुद को परिस्थितियों से घिरा हुआ नहीं दिखाना चाहते लेकिन आज? एकाएक उन्हें चेत आया। ठीक अभी क्या होने जा रहा था? उनके हाथों मनोकामना की हत्या? उसके बाद क्या होता? वे जेल में और सत्यव्रत अनाथ। अदालत में अपराधियों के चेहरे देखते हुये उनमें आपराधिक वृत्ति आती जा रही है या अब संयम नहीं रहा? अस्पताल से लौट कर वे काफी सम्हल गये थे। मनोकामना का मानसिक विकास मंद है पर उनके विवेक को क्या हो गया है? खुद पर अचरज हुआ और लज्जा आई। यह जैसी भी है पूर्णतः स्वस्थ, सुंदर, तंदरुस्त बच्चा इसी ने दिया है। वे मनोकामना की पीठ सहलाने लगे -
"मनोकामना तुम अच्छी हो।"
"आप अच्छे हैं।"
उसकी निरपराध नजर उनके चेहरे पर थी। वे तेजी से सोच रहे थे। अच्छी बातें सोचनी होंगी। मस्तिष्क पर पड़ते दबाव को रोकना होगा। उन्हें कुछ हो गया तो मनोकामना और सत्यव्रत का क्या होगा? उन्होंने सत्यव्रत को छोटी उम्र में बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया। घर से दूर भेजने के कारण सत्यव्रत उन्हें दोषी मानता था। बाद में समझ पाया उन्होंने उसके कल्याण के लिये उसे माहौल से दूर रखा। अब वह पुणे में कानून की पढ़ाई कर रहा है। मनोकामना को लेकर उसके भीतर हीन भाव नहीं है। उनसे तो इतना मित्रवत हो चुका है कि नियमित रूप से मोबाइल पर उनसे बात करता है। अपनी पढ़ाई की जानकारी देता है, वे अदालत की गतिविधि पर बात करते हैं। संबंध विच्छेद के मामले में सत्यव्रत की जिज्ञासा बनी हुई है। वह मोबाइल पर था -
"पापा कुछ फैसला हुआ?"
वे एकाएक बोले "सत्य, वादी की जगह तुम होते तो क्या करते?"
"फ्रेंकली स्पीकिंग, ऐसी लड़की से शादी नहीं करता। चीटिंग हो जाती तो पहले दिन ब्रेकअप कर लेता। पापा, इस इंसान ने तो तीन साल बिता दिये।"
"बेटा, वह औरत कहाँ जायेगी?"
"यह उसके पैरेण्ट्स को सोचना था। पापा अब कोई मिशनरी भाव नहीं रखता। सबकी अपनी लाइफ है। मुझे तो सब कुछ अच्छा चाहिये। बेस्ट।"
"पर ..."
"पापा, आप जैसा इंसान अब नहीं मिलेगा। सोचता हूँ तो दहशत होती है। आपने स्थिति को जितना कठिन समझा होगा, वह उससे अधिक कठिन रही होगी लेकिन आपने मेरी माँ का बहुत ख्याल रखा। उनकी इतनी केयर तो नाना-नानी नहीं कर सकते थे। बताओ पापा जिसकी केयर माँ-बाप न कर सकें हसबैन्ड कब तक करेगा?"
यह प्रश्न बार-बार सामने आता रहा है। पर वे मनोकामना के माता-पिता से कभी नहीं कह पाये - जिस मंद बुद्धि लड़की की जिम्मेदारी आप नहीं उठा सकते, मैं उठाऊॅंगा यह विश्वास आपको क्यों है? विवाह का नाता क्या जन्म के नाते से बड़ा होता है? मैं इसकी जिम्मेदारी न उठाऊॅं तो यह फिर से आपकी जिम्मेदारी नहीं हो जायेगी? लड़की की शादी इतनी जरूरी क्यों होती है कि वह छोड़ी हुई स्त्री के तौर पर मायके में भले ही शरण पा जाये पर एक बार तो उसे ब्याहना ही होगा? 

वादी उनसे यही प्रश्न कर रहा है। उनके पास तर्क नहीं हैं। फिर भी उन्होंने मेल-मिलाप की अच्छी कोशिश की। वादी सहमत न हुआ। वे वादी और प्रतिवादिनी दोनों के साथ न्याय करना चाहते हैं। 
मुश्किल यह है एक के पक्ष में किया गया न्याय दूसरे के लिये स्वतः अन्याय हो जायेगा। वे बेचैन हैं ........ फैसला देना है। कलम उठाई। कलम वादी के पक्ष में फैसला दे रही थी, वे प्रतिवादिनी के पक्ष में थे।
***

सुषमा मुनीन्द्र
द्वारा श्री एम. के. मिश्र
जीवन विहार अपार्टमेन्ट, फ्लैट नं0 7, द्वितीय तल, महेश्वरी स्वीट्स के पीछे, रीवा रोड, सतना (म.प्र.)-485001

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