कन्हैया त्रिपाठी की पाँच कविताएँ

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
पेंच, कुछ दाँवपेंच

समुद्र की मछलियाँ
और समुद्र की सीपों में रिश्ते
रेत पर चलते ऊँट नहीं समझते।

कुएँ के मेंढक
नहीं समझते क्या होती हैं
समुद्री मछलियाँ या सीपें

सूरज और चांद को सब पता है
पर वे व्यक्त नहीं कर सकते अव्यक्त
सच तो यह है कि बहुत कुछ
रह जाते हैं अव्यक्त इस जीवन में।

किसी के लिए पहेली हैं
रेत पर चलते ऊँट भी।

देस जानते हैं ऊँट
लेकिन वे नहीं जानते समुद्र
मछलियाँ समुद्र को नापकर भी
रेत पर नहीं चलतीं, क्योंकि
रेत और मछली के रिश्ते नहीं होते।
***

दो पाटों के बीच

जूते और चप्पलें बनाता आदमी
रिक्शा खींचता इंसान
और मजदूरी करती स्त्री
दो पहाड़ों के बीच
पहाड़ सी ज़िंदगी
जीते हैं लोग

इन्हें कविताएँ लिखना नहीं पता,
गल्प सुनाना नहीं आता,
लेकिन जी लेते हैं ज़िंदगी।

उन्हें पता है टेकुआ डोर
उन्हें पता है अपने पैरों का बल
और चैन की पकड़
उन्हें पता है अपना खांची, खुरपी
और हँसिया-हथौड़ा

इन्हें पता है जीवन की जीत
क्योंकि वे हार नहीं मानते।
*** 


सोच

उसने एक शब्द भी नहीं समझा
उसका मस्तिष्क बहुत बड़ा है
उसकी बहुत सी अच्छाइयाँ
उसके भीतर छुप गईं

हवा, अग्नि, पानी से डरकर
और डरकर आकाश से
मिट्टी से टूटकर भयवश
उसने जन्म नहीं लिया

उसका यह सोचना कि
इससे अलग उसका अस्तित्व रहेगा
पंचमहाभूतों से इतर इस संसार में
कोई नहीं है
ईश्वर भी नहीं,
प्रकृति भी नहीं, सम्भवतः
कुछ भी नहीं।
***


कर दो मेरा सत्य-पथ प्रशस्त

सत्य के अनुष्ठान
और सत्य का वरण करना
सीखा मैंने आपसे
आपसे ही सीखी मैंने
ईमानदारी।

आपने ही मेरे भीतर सत्य का
प्रज्ज्वलित किया है दीपक
आपसे ही सीखी मैंने
दुनियादारी।

आपका ही रक्त बह रहा
मेरे भीतर सत्य सा
अलौकिक पूण्यात्मा हैं
हे तिमिरनाशक!

सत्य का हमेशा मुझमें
प्रकाश भर दो
भटकूँ अगर मैं सत्य से कभी
आकर मेरा सत्य-पथ प्रशस्त कर दो।
***


चुनाव

अपना मताधिकार
आत्मा की आवाज़ पर
***

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