कश्मीर केंद्रित हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त विस्थापन की विभीषिका

सोनू कुमार भारती

शोधार्थी (हिन्दी), हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला, काँगड़ा - 176215 (हिमाचल प्रदेश)
ईमेल: sonubharti1015@gmail.com


 कश्मीर से हिन्दुओं का विस्थापन 1990 ईस्वी से पूर्व भी कई बार हुआ है। चौदहवीं शताब्दी के अंत और पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ के दशक में सुल्तान सिकंदर के अत्याचारों से तंग आकर कश्मीर घाटी के समस्त पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा। इस संदर्भ में शशि शेखर तोषखानी लिखते हैं “सिकन्दर बुतशिकन के नरसंहारों की स्मृति कश्मीरी भाषा की एक कहावत ‘कशीरि रूध काहाय गर’ अर्थात कश्मीर में केवल ग्यारह घर ही बचे रहे, में आज भी शेष है। कश्मीरी पंडितों का वह पहला और 19 जनवरी 1990 को सातवाँ और सबसे भयंकर विस्थापन था। ‘रलिव, चलिव या गलिव’ अर्थात हम में मिल जाओ यानी ‘इस्लाम स्वीकार करो, भागो या फिर नष्ट हो जाओ’- कश्मीरी पंडितों के सामने जीने के तब ये तीन विकल्प रखे गए थे, और फिर 1990 में भी।”1 अतः कश्मीरी पंडितों का पूरा इतिहास ही निर्वासन, मतान्तरण, नरसंहारों और यातनाओं का इतिहास रहा है। अपनी अस्मिता और अस्तित्व को बचाये रखने के लिए अपनी जन्मभूमि से विस्थापन की विभीषिका उन्हें बार-बार सहनी पड़ी।

 कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को तीन दशक बीत चुके हैं। इस अवधि में सांप्रदायिक आतंकवादी हिंसा में अपना सब कुछ खो कर इधर-उधर शरणार्थियों के रूप में रह रहे इस समुदाय के कुछ रचनाकारों ने स्वयं उन यातनाओं, पीड़ाओं और बर्बरता को लिपिबद्ध किया जिन्हें इन्होंने भोगा था। इन रचनाकारों ने जो कुछ भी लिखा है उसमें उनके अनुभव का यथार्थ पूरी प्रामाणिकता और संवेदनशीलता के साथ अभिव्यंजित हुआ है। यूँ तो कश्मीरी हिन्दुओं के विस्थापन की त्रासदी को साहित्य की अलग-अलग विधाओं में चित्रित किया गया परन्तु सबसे सार्थक और मार्मिक चित्रण उपन्यासों में देखने को मिलता है। यह साहित्य उनके जातीय विस्थापन और उन पर हुए अमानवीय अत्याचारों का एक सच्चा दस्तावेज बन पड़ा है। इस यातनाप्रद व्यथा-कथा को इतनी सच्चाई के साथ उन्हें छोड़कर कह भी कौन कर सकता था। इन उपन्यासकारों ने न केवल कश्मीरी हिन्दुओं के विस्थापन को दिखाया है साथ ही विस्थापन के पीछे के कारणों को भी उजागर किया है।

 जब कोई बलात अपने भूमि से विस्थापित होता है तो केवल उसकी जमीन और घर ही नहीं छूटता साथ में छूट जाती है और भी बहुत कुछ जो दिखाई नहीं देता। जो दोबारा चाह कर भी कहीं नहीं मिलता। उसकी संस्कृति, पहचान अस्मिता और सम्मान सबकुछ मिट जाता है मिटने की यह प्रक्रिया बहुत ही पीड़ादायी है, और यही पीड़ा विस्थापित कश्मीरियों की सच्चाई है।
 बाहर से आये कुछ फिराकपरस्तों ने पैसे और आतंक के बल पर कश्मीर के साझी संस्कृति में दरार डाल दी। जिस कश्मीरियत की मिसाल पूरे भारतवर्ष में दी जाती थी आज उसी की छाती में साम्प्रदायिकता और आतंकवाद का खंजर घोप कर उसे लहुलुहान कर दिया गया है। एक वर्ग को कश्मीर से पलायन करने के लिए मजबूर किया तो दूसरे वर्ग को कश्मीर के दहशत भरे माहौल और गरीबी की बेड़ियों में कैद कर दिया। यह दुःख साझा है। इस यातना को भोगा दोनों समुदाय के लोगों ने परन्तु कश्मीरी हिन्दू सबसे अधिक प्रताड़ित हुआ।

 चन्द्रकान्ता के उपन्यास ‘कथा सतीसर’ संजना कौल के उपन्यास ‘पाषाण युग’ क्षमा कौल के उपन्यास ‘दर्दपुर’ मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ‘शिगाफ़’ और मीरा कांत के उपन्यास ‘एक कोई था कहीं नहीं-सा’ में कश्मीर से विस्थापित उन कश्मीरियों की पीड़ा है जिन्हें घर वापसी की थोड़ी सी उम्मीद के साथ दुर्गति से भरी शरणार्थी कैंपों की जिंदगी मिली है, एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतिजार मिला है पुनःअपने घर लौट पाने का और दिलासा मिला है सबकुछ ठीक हो जाने का।
 चन्द्रकान्ता द्वारा रचित उपन्यास ‘कथा सतीसर, एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है जिसमें 1931 ई. से ले कर 2000 ई. तक के कश्मीर की वृहद कथा को उठाया गया है। इस उपन्यास के केंद्र में कश्मीरी हिन्दुओं का विस्थापन है जो लेखिका को बार-बार झकझोरता है। डॉ. सत्यकाम ने उचित ही ‘कथा सतीसर’ को विस्थापन की पीड़ा का आख्यान’ कहा है।

 चन्द्रकान्ता इस रचना के माध्यम से यह प्रसंग उठाती हैं कि घर और अपने जन्मभूमि को छोड़ना किसी के लिए इतना सहज नहीं होता है। घर छूटने की कीमत सिर्फ वही समझ सकता है जिसे बरबस घर से निकाल दिया गया हो। चन्द्रकान्ता लिखती हैं कि “घर का अर्थ वही जनता है जिसका घर छूट गया हो। घर छिनना अपने भूगोल, अपने इतिहास और अपने स्मृति संसार से कट जाना होता है, घर कोई किसी के इशारे पर अकारण ही नहीं छोड़ सकता।”2 यहाँ लेखिका उन अफवाहों से भी पर्दा हटाती हैं जो कुछ बुद्धिजीवियों ने भ्रम फैलाया था कि कश्मीरी पंडितों का कश्मीर से पलायन सोची समझी राजनीति थी। हम केवल उस दुःख और बेवशी का अंदाजा ही लगा सकते हैं जिन परिस्थितियों में कश्मीरी पंडितों ने अपना घर छोड़ा होगा। अपने आपको निस्सहाय अकेला पा कर। कश्मीर से विस्थापित होने के बाद कश्मीरी हिन्दू आज भी शरणार्थी की तरह अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कात्या सोचती है “मै फय्याज से न कह सकी, कि एक बार पशुओं से भी बदतर जीवन जीते, कैंपों, दड़बों में रहते – सड़ते विस्थापितों से पूछो, कि घर छूटना कैसा होता है? बीमारियों, मनोरोगों और अपमानों के बीच जीते, उन स्वाभिमानी लोगों से पूछो, लू के थपेड़ों, बिच्छू-साँपों के बीच जीते लोगों से पूछो, उन्हें अपने उम्रों के घरौंदे छोड़ने पर मजबूर क्यों होना पड़ा? क्या सचमुच वे सब मुखबिर थे? गाँव-जवार के सीधे-साधे मेहनतकश लोग, जो दो वक्त भात के अलावा भगवान् से जरा-सा आत्मसम्मान और शांति के सिवा कुछ नहीं माँगते, क्या वे भी जगमोहन के कहने से घर छोड़ कर भाग गए?”3

 देश विभाजन के समय भी सांप्रदायिक घटनाओं की वजह से कुछ लोग भारत से पाकिस्तान गए तो कुछ पाकिस्तान से भारत आये। विस्थापन दोनों ही देशों और धर्मों के लोगों के हिस्से आया। परन्तु कश्मीर के संदर्भ में यह बिलकुल अलग और नया अनुभव था। कश्मीरी हिन्दुओं का अपने ही देश से अपने ही देश में विस्थापन था। यह बात इनके मन में काँटे की तरह चुभती है और वे अपने ही देश में अपने आपको उपेक्षित महसूस करते हैं। विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के मन में यह पीड़ा सदैव बनी रहती है कि आखिर मातृभूमि में रहने का अधिकार उन्हें क्यों नहीं है। क्या उनसे कश्मीर में रहने का अधिकार इसलिए छीन लिया गया कि उनका धर्म अलग था और वे अल्पसंख्यक थे? अपनी भूमि से बिछड़ने की पीड़ा कश्मीरी पंडितों के साथ हमेशा बनी रहती है जो उन्हें कभी सुकून से रहने नहीं देती।

 यह उपन्यास उन संतप्त कश्मीरी हिन्दुओं की कहानी है जिन्हें घाटी छोड़ने के लिए कई मर्तबा मजबूर किया गया। जिनकी आकांक्षाएँ मात्र इतनी थी कि उन्हें अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को दिखाने के लिए मुक्त वातावरण मिले पर यह अवसर उन्हें वादी से बहार जाने के बाद ही मिला। प्रस्तुत उपन्यास में कश्मीरी हिन्दू युवाओं के दोतरफा संघर्ष को भी दिखाया गया है जहाँ एक ओर वे सांप्रदायिक उन्माद और आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी से निर्वासित होने के लिए विवश हैं तो दूसरी तरफ रोजगार की तलाश में। जहाँ एक तरफ उन्हें अपने ही प्रदेश में यह सुनने को मिलता है कि “तुम्हारे लिए तो बनिहाल पार के दरवाजे खुले हैं मगर वादी के नौजवान नौकरी ढूंढने कहाँ जायेंगे।”4 दूसरी ओर जब वे कश्मीर से बहार कही रोजगार के तलाश में जाते हैं तो उन्हें यह बोला जाता है कि भारत इतना धन कश्मीर पर खर्च कर रहा है तुम काम मांगने यहाँ क्यों आते हो। कश्मीरी हिन्दू युवा दोनों जगह से अपने आपको उपेक्षित महसूस करते हैं। इस प्रश्न का सामना उन्हें हमेशा करना पड़ता है। शिवनाथ ताता से कहते हैं “जगह-जगह जलील हो रहे हैं हमारे बच्चे! प्रश्न पूछे जाते हैं, उधर किसी भारतीयों को बसने की इजाजत नहीं है, तुम क्यों इधर बसना चाहते हो? किस-किस को उत्तर दें हमारे लडके?”5 यहाँ विस्थापन की पीड़ा दोहरी हो जाती है।

 ‘कथा सतीसर’ में लेखिका ने विस्थापितों की पीड़ा को संवेदना के धरातल पर अभिव्यक्त किया है। अपने जड़ों से उखड़ने के बाद दर-दर की ठोकरें खाते और शरणार्थी कैंपों में हो रहे उनके साथ ज्यादतियों को भी चित्रित किया है। कैसे सरकारी कर्मचारी और अधिकारी उनके साथ दुर्रव्यवहार करते हैं, उन्हें कभी मांगने वाला कह देते हैं तो कभी सहायता देते समय उन्हें भीख का अहसास करा देते हैं। किशोरी होती लड़कियों पर राशन बाँटने वाला बुरी नजर रखता है और व्यंग्य के लहजे में कहता भी है ‘लड़कियों को भेजा करो आंटी, राशन के लिए धूप में क्यों तकलीफ पाती हो?, यह कश्मीरी हिन्दुओं के लिए विस्थापन की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है जहाँ सहानुभूति कम और शारीरिक दहशत अधिक है। विस्थापित की पीड़ा को ये व्यंग्य और दुगुना कर देते हैं जो कभी दाता थे आज वही याचक बने हुए हैं। कश्मीरी पंडित आज भी अपने वतन वापसी की राह देख रहे हैं। आज भी उनके मन में अपनी मिट्टी और वादी की याद बसी हुई है। अजोध्यानाथ कश्मीर में दहशत भरे परिस्थितियों के बीच घाटी से पलायन करते व्यक्तियों के मनःस्थितियों को समझने का प्रयास करते हुए सोचते हैं “कोई तो कारण होगा अपनी मिट्टी की महक में जीने का, जिसमें जज्ब होना आदमी की आखिरी इच्छा होती है।”6 अपनी मिट्टी में दफ्न होने की इसी आश को लगाए बैठी लल्ली इंतजार करती है अपनी उस बेटी को बुलाने का जिसे सब कुछ ठीक होने पर पुनः कश्मीर बुलाने वादा किया है।

 यहीं इच्छा लिए मीरा कान्त के उपन्यास ‘एक कोई था कहीं नहीं-सा’ में शबरी कश्मीर से दिल्ली जाती है। उसे लगता है कि एक दिन सब कुछ ठीक होगा और वह पुनः अपने घर में लौट आयेगी। अपने जीवन के सांध्य वेला में जब शबरी की घर वापसी की आशा टूटने लगती है तब उसे हमेशा वह शेर याद आता है जो उसके भाई अम्बरनाथ गुनगुनाया करते थे – 
 बुलबुल न ये वसीयत एहबाब भूल जाएँ 
 गंगा के बदले मेरे झेलम में फूल जाएँ।”7

परंतु अंतिम साँस अपनी मिट्टी और घर में लेने की कश्मीरियों की इच्छाएँ अधूरी रह जाती है। शबरी जैसे अनेक कश्मीरी अपने वतन वापसी की आस लिए बैठे हैं परन्तु वापसी की प्रतीक्षा और लम्बी होती जा रही है। शबरी जो उम्र की पचहत्तर पड़ाव पार कर चुकी है, जिस घर में जन्म हुआ, उसी घर से ब्याही गई और पति के मृत्यु के बाद पुनः उसी घर में लौट आती है। उसी घर में उसने पिता समान दो भाई खोये। उसने इसी घर में न जाने एक ही जन्म में कई जन्म जिये हैं, उस घर से उसका अटूट रिश्ता है। वह किसी भी परिस्थिति में अपने घर को छोड़ कर जाना नहीं चाहती परंतु उसे भी बढ़ते सांप्रदायिक दंगे और इन दंगों में शिकार बनाये जा रहे हिन्दुओं पर ढायी जा रही क्रूरताओं तथा आतंकवाद के बढ़ते प्रकोप के कारण उसे भी अपने घर से विस्थापित होना पड़ता है। शबरी को अपने घर से निकलते समय अहसास हुआ “उसे लगा आज बिस्मिल श्रीनगर से उसे नहीं उसकी मय्यत को ले कर जा रहा हो! जनाजा भी ठीक से नहीं निकल पा रहा था, क्योंकि उसे उतने कंधे तक नहीं मिले थे।”8 कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद और सांप्रदायिक घटनाओं के कारण आज भी वहाँ से लोग पलायन कर रहे हैं।

 जब शबरी दिल्ली जाती है तब वह वहाँ हो कर भी नहीं होती उसके प्राण अपने श्रीनगर वाले घर में ही अटका रहता है। परंतु वह सोचती है कि कम से कम उसके सिर के ऊपर छत तो नसीब है। वह बाकी अपने हजारों निर्वासित भाई-बहनों की तरह शरणार्थी कैंपों की नारकीय जिन्दगी जीने से तो बची है जो जीवन के धधकते श्मशान थे “झुलसती धूप और तेज़ाब सी बारिश में कैसे वे लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ उन टैंटों में जीते होंगे! बारिश टैंटों के अंदर-बाहर कीचड़ ही कीचड़ कर जाती होगी। ... कहा था उसने जहन्नुम है वो जहन्नुम! शाम होते हीं वीरान जिंदगियों का अँधेरा ढँक लेता है उन शिविरों को। रात में कहीं आशंका और भय से भरी हुई बाँह अपनी जवान बेटी पर रख कर सोती माँ तो दिन-रात कहीं बुढ़ाती बेटियों के भागकर शादी करने के इंतज़ार करते बूढ़े माँ-बाप। बस जिन्दगी की साँस को किसी तरह हर हाल में बचाए रखने की कोशिश!”9 विस्थापन की त्रासदी सहते इन कश्मीरी हिन्दुओं को न जाने कितने दुःख और असहनीय पीड़ाओं को सहना पड़ा जो किसी भी मनुष्य को भीतर से तोड़ कर रख देती है। जो लोग पीढ़ियों से संयुक्त परिवार में रहते चले आये थे, विस्थापन के कारण वे बिखर गए। सांप्रदायिक उन्माद के कारण उत्पन्न आतंकवाद के कारण कश्मीर के मूलनिवासी आज खानाबदोश जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।

 शरणार्थी शिविर में रह रहे व्यक्तियों के अस्त व्यस्त जीवन और उनकी समस्याओं को संजना कौल भी अपने उपन्यास ‘पाषाण युग, में चित्रित करती हैं। इस अस्त व्यस्त जीवन के कारण काफी कठिनाइयाँ आने लगी। कश्मीर की ठंडी घाटियों में रहने के अभ्यस्त ये लोग जम्मू की लू भरी गर्मी में झुलसने लगे। कई लोगों की इस भीषण गर्मी के कारण मृत्यु हो गई। केशर की क्यारियों में चहकने वाले बच्चों का बचपन छीन गया। जब बहू और बेटी को कपड़े बदलने होते थे तो बहू और बेटी को तंबू से बाहर रहना पड़ता था अंजलि अपने भाई को लेकर चिंतित है वह है कि - “जिस शरणार्थी शिविर से बचने के लिए वह आखिर तक हाथ-पाँव मारती रही थी, उसका तेजतर्रार, खुद्दार भाई उसी शरणार्थी शिविर में रह रहा था।”10 विस्थापित हिन्दुओं का जीवन दिन-ब-दिन बद से बदतर होता गया जो कभी बड़े-बड़े मकानों के मालिक थे वही लोग पशुओं से भी बदतर जीवन जीने के लिए विवश हो गए। उन्हें ही अब उन शरणार्थी शिविरों और टैंटों में दूसरों के दया पर निर्भर रहना पड़ रहा था। दूसरे के सामने सहायता के लिए हाथ फैलाये ये कश्मीरी पंडित अपने आपको जलील महसूस करने लगे। इस विस्थापन ने उन्हें अनगिनत घाव दिए।

 कश्मीरी हिन्दुओं के विस्थापन की चीर व्यथा को व्यक्त करने वाले उपन्यासों की कड़ी में मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘शिगाफ़’ भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अपने घरों को छोड़ कर बार- बार कहीं और विस्थापित होने का दर्द इस उपन्यास के केंद्र में है। मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा रचित उपन्यास ‘शिगाफ़’ की मुख्य पात्र अमिता विस्थापन से उपजी पीड़ा और शरणार्थी शिविर में भोगे हुए दुःख तथा अन्तर्मन को व्यथित कर देने वाले अनुभवों को साझा करते हुए लिखती है - “एक सप्ताह में वह घर छोड़कर रिफ्यूजी कैम्प की नारकीय जिन्दगी का रुख करना पड़ा था। जलते टीन की छत और नदी के किनारे की जलती बालू की जमीन। बक्से लगा कर बनाई गई आड़ जहाँ महीने भर मैं लू में भटकती और अपना हब्बाकदल ढूंढती दादी मर गई और अगले तीन महीनों में चुपचाप दुख झेलती हुई माँ मर गई।”11 साम्प्रदायिक उन्माद और आतंकवादजनित विस्थापन की वजह से न जाने कितने लोग तबाह हो गए, कितनी जिन्दगियाँ खराब हो गई। अपने घरों से निकलने के बाद कश्मीरी हिन्दुओं के जीवन में कभी स्थायित्व नहीं आ पाया, वे घर की तलाश में हमेशा इधर-उधर भटकते रहे। करोड़ों की जायदादें छोड़ कश्मीरी पंडित शिविरों और दड़बेनुमा कमरों में रहने के लिए अभिशप्त हो गए।

 किसी के लिए घर छोड़ना इतना आसान कहा होता है। घर छोड़ने का मतलब है अपने जड़ों से उखड़ जाना, अपनी अस्मिता को भूल जाना। क्योंकि घर केवल ईंट और पत्थरों से जोड़ कर नहीं बना होता है उसके साथ जुड़ी होती हैं व्यक्ति की भावनाएँ, जो हमेशा उसकी, भूमि, और उसके घर से संबध रखती है। जब किसी समुदाय के लोगों का विस्थापन होता है तो केवल व्यक्ति का ही विस्थापन नहीं होता है उसके साथ विस्थापित होती हैं उसकी संस्कृति, परम्परा और भाषाएँ भी जो उस समाज की अमूल्य धरोहर होती है। अपनी भाषा और संस्कृति को भूल जाना किसी के लिए इतना आसान कहाँ होता है। गैर भाषियों के बीच स्पेन में रह रही अमिता लिखती है “मेरा उच्चारण मेरे छूटे हुए देश की याद दिलाता है। मैं वो शब्द बोलती हूँ जो मेरे हैं ही नहीं, जिन्हें मेरी माँ ने कभी नहीं बोला होगा। ...गैर भाषियों के बीच अपनी भाषा का मोह कितना सालता है, यह बांग्ला बोलने को तरसती तसलीमा नसरीन से पूछकर भी देखना होगा कभी।”12 अमिता को अपने विस्थापित होने की वाकया बा-बार याद आता है। निर्वासन के वर्षों बाद भी कश्मीर और उसका बचपन वाला घर ही उसके स्मृतियों में बना हुआ है। वह सपने में भी उसी घर को देखती थी। क्योंकि उसे अपना नया वाला घर कभी घर जैसा लगा ही नहीं, उसे ये घर शरणार्थी कैंपों जैसा ही लगता है। 
 हिन्दुओं के विस्थापन के समूचे दर्द को ‘शिगाफ़’ की लेखिका ने इस छोटी सी कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है –
 “मैं आज निर्वासित हूँ – क्योंकि तुमने चुना था निहत्थों को मारना।
 मैं आज निर्वासित हूँ – मैंने चुना सम्मान से जीना, हथियार न उठाना।
 मैं आज निर्वासित हूँ – क्योंकि पूरा संसार चुप रहा महज कुछ लोग ही तो मर रहे थे।
 मैं आज निर्वासित हूँ – क्योंकि मेरा भारतीय होने में विश्वास था।”13

 प्रतिबंधों से भरा जीवन, रोजगार की तलाश, मौत, और आतंकवाद के कारण वादी में फैली दहशत हिन्दुओं के कश्मीर से विस्थापन की प्रमुख वजहें हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इस रचना के माध्यम से यह भी दिखाया है कि विस्थापन केवल हिन्दुओं का ही नहीं हुआ अपितु कई मुसलमानों ने भी इसे भोगा है। मुजीब हसनैन एक कश्मीरी मुसलमान जो लंदन में रहता है। जब वह कश्मीर लौट कर जाता है तब वहाँ के लोग, मिलिटरी, मिलिटेंसी सभी उसे शक की निगाह से देखते हैं, अतः वह पुनः लंदन जा कर वहीं बस जाता है। वह अपनी पहचान को छुपाने का प्रयास करता है। कश्मीर लौटने पर मुजीब भी खुद को अमिता की तरह ही विस्थापित महसूस करता है। वहीं नसीम एक अलग तरह का विस्थापन झेलती है। उसे किसी ने बलपूर्वक निर्वासित नहीं किया। उसे लगता है कि कश्मीर रहने लायक नहीं है। वह कहती है ‘मेरा क्या है वहाँ ...वहाँ काम भी कुछ नही है। आए दिन जान की आफत ... नौकरी नहीं मिलती, उस पर पहरेदारी अलग से।’ विस्थापन के कारण अलग-अलग हो सकते हैं परंतु दुःख उनका साझा है।

 इस उपन्यास में लेखिका ने निरंजन रैना के माध्यम से विस्थापित कश्मीरियों के अन्तर्मन की उस भरोषा को दिखाया है जिसका टूटना ही उसकी नियति थी परंतु उसे बनाये रखना ही उनके जीवन की एकमात्र आस थी।

 क्षमा कौल का उपान्यास ‘दर्दपुर’ कश्मीरी हिन्दुओं के संहार, उत्पीड़न और विस्थापन के भयंकर यथार्थ को उद्घाटित करते हुए, अपनी भूमि से बेदखल किए गए हिन्दू समाज के मनोभावों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। इस रचना के माध्यम से विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के मन-मस्तिष्क पर बने कभी न भरने वाले जख्मों को देखा जा सकता है। ‘दर्दपुर’ उपन्यास की कथा कश्मीर से विस्थापित सुधा के एक एन.जो.ओ. की सदस्या के रूप में दुबारा कश्मीर जाने से होती है। जब वह कश्मीर जाती है तो उसे अपने पुराने दिन याद आते हैं। वह रेस्टहाउस के माली से पूछती है, “पंडितों के सेबों का क्या करते हो?” तब माली उसे बताता है “उनके सेब के पेड़ काटकर जला दिए गए हैं, अगर आर्मी नहीं आती तो गाँव वालों ने उनकी जमीनों को आपस में बाँटना शुरू कर दिया था।” उसका उत्तर सुनकर सुधा का मन व्यथा से भर उठता है। यह किसी भी व्यक्ति के लिए यातनाप्रद है। सुधा अपने-आपको पुनः उन्हीं परिस्थितियों में पाती है और पुरानी स्मृतियाँ उसके आँखों के आगे जीवित हो उठती हैं। परंतु वह लाचार है। उसके पास सब कुछ होते हुए भी आज कुछ नहीं है। वह उन दिनों को याद करते हुए दुःख के गहरे समुद्र में डूब जाती है और सोचती है “काश हम यहीं होते ... इनको क्या मालूम हमने कितना दुख झेला है यहाँ से जाने पर। कौन-कौन रास्ते नापे हैं यहाँ से जाने पर ... बच्चे मासूम थे ठिकाना न था। तन पर कपड़ा न था यहाँ से जा कर। भाई के घर जाते वह भी बेघर था। बहन के घर जाते वह भी बेघर थी ... हम कितने निस्सहाय थे यहाँ से जा कर।”14 जब किसी समुदाय विशेष को उनकी जन्मभूमि से बलात बेदखल किया जाता है तो विस्थापित समाज किन-किन मानसिक और दैहिक पीड़ा से गुजरता है, यह उपन्यास विस्थापन से मिली उस पीड़ा को व्यक्त करने सफल हुआ है।

पहले भी कश्मीरी पंडितों को वहाँ से हटाने के लिए पहले उनके अंदर भय का आतंक पैदा किया गया जिससे इस समाज में दहशत फैल गई। कबाइलियों ने गाँव के गाँव उजाड़े थे, उत्तर कश्मीर के सभी गाँव हिन्दुओं से खाली हो चुके थे। यह दहशत घाटी में चारों तरफ फैल गई क्योंकि हमलावर इतने क्रूर और बर्बर थे कि उन्होंने असंख्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया तथा उनकी बहू-बेटियों के साथ पाशविक घटनाओं को अंजाम दिया। ऐसे में कश्मीरी हिन्दुओं के मन में भविष्य को लेकर शंकाएँ उत्पन्न होने लगी, उनका जीवन समुद्र में फँसी उस नौका के सामान हो चूका था जो तूफान के कारण किसी भी समय डूब सकती है। अतः उन्होंने आगत समय में खतरों से बचने के लिए अपनी मिट्टी और घरों को छोड़ कर पलायन करना आरंभ किया। वे किसी भी तरह अपने प्राण बचाकर भाग रहे थे केवल दो जोड़ी कपड़ों के साथ। सुधा की भाभी जब जम्मू में बस टिकट लेने के लिए कतार में खड़ी हो है तो देखती है, “ वह समझ रही है कि भाग रहे समुदाय में सभी का यही हाल है। कोई किसी से बात नहीं कर रहा है। सब पस्त हैं। स्वयं को मरे हुए जीवित मान रहे हैं।”15 अपनी अस्मिता और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए उन्होंने निर्वासन को चुना। इन विस्थापितों के कारण जम्मू में भीड़ बढ़ गई। सभी मंदिर, धर्मशालाएँ, बस अड्डा इन शरणार्थियों से भर गए जिसको जहाँ जगह मिली वहीं पड़ा रहा।

 कश्मीर से निष्कासित हिन्दू जम्मू, पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली तक बस गए जो आज भी विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं। जम्मू में मंदिर, स्कूल, अधढके अहाते जहाँ भी सिर पर छत दिखी हिन्दुओं ने धोती, टाट, चद्दरें बांधकर अपने आपको ढक लिया। जम्मू में कुछ जगहों पर विस्थापितों के लिए शरणार्थी शिविर खोले गए। जब लसकाक अफताब चाचा के साथ शरणार्थी शिविर में बेहोशी की हालत में पहुँचता हैं तो कुछ क्षण के लिए कुछ समझ नहीं पाता। वह अपने टाठा को ढूढ़ते हुए दहाड़ मार कर रोने लगता है। शरणार्थी शिविर में चारों ओर चीख-चिल्लाहट सुनाई दे रही थी। जब वह होश में आता है तब देखता है “अफताब चाचा के साथ उसके घर के लोग भी कोने में दुबके पड़े हैं। सबके मुख मलिन और उदास हैं। कपड़े फटे और गंदे हैं। चेहरे विदीर्ण और मलिन हैं। नीचे कहीं टाट और कहीं दरी बिछी है कमरा खचाखच लोगों से भरा पड़ा है। विभिन्न गाँवों के लोगों से। कुछ स्त्रियाँ रो रही थी और कुछ पुरुष भी सुबक रहे थे। कुछ स्त्रियाँ और पुरुष रोते हुए को ढाढस बंधा रहे थे।”16

 हिन्दू अपने प्राण रक्षा और अपनी घर की महिलाओं की आबरू बचाने के लिए रात के अँधेरे में अपने घरों को छोड़ कर जम्मू जाने लगे। उनके जाने के पश्चात उनके सम्पत्तियों को कौड़ियों के मोल में बेच दिया गया। जिस घर को अपने मेहनत की कमाई से बनाया था उससे दूर जाते हुए उनका हृदय कराह उठता है। क्योंकि वहाँ उसकी ईंट दीवारों में उनकी आत्मा निवास करती थी। तभी तो घर छोड़ने का दर्द क्या होता है। सुधा अपने माँ के दुःख को आत्मसात करते हुए कहती है, “मैंने इस घर को बनाने के बाद सोचा था कि उसकी ड्योढ़ी से मेरी अर्थी जाएगी, और तभी चिता पर लेटूंगी, घर मुझे भव्य विदा कहेगा। मगर हुआ उल्टा, मेरे मन के इस घर से वह घर निकला अर्थी में सोया और असमय भस्म हुआ, वह मात्र घर ही नहीं, मेरी आत्मा का निवास था, मेरे देवता का निवास था, उसमें मेरा नंदबाब रहता था।”17 कश्मीरी पंडित अपनी जड़ों से कटकट टूटे वृक्ष की टहनियों की तरह जहाँ-तहाँ गिर पड़े। वे आज भी विस्थापन का दंश झेल रहे हैं तथा अपने घर लौटने की आशा लगाए बैठे हैं। उन्हें इन्तज़ार है किसी बड़शाह की जो उनको घर वापसी करा सके।

 उपरोक्त उपन्यासों के केंद्र में भय, आतंक उत्पीड़न और विस्थापन का दंश झेल रहे समस्त जनसमुदाय की पीड़ा है। विस्थापन के जिन त्रासद अनुभवों की अभिव्यक्ति इनमें मिलती है उनसे हो कर पूरा विस्थापित समुदाय गुजरा है। वैयक्तिकता और आत्मकेंद्र के संकीर्ण घरौंदे को लांघ कर ये उपन्यास हमें मानवीय संवेदना के वृहद संदर्भों से जोड़ते हैं।
 
संदर्भ ग्रंथ
1. तोषखानी, डॉ. शशि शेखर, (जुलाई-सितम्बर, 2018), पत्रिका- साहित्य भारती, (विस्थापन की त्रासदी: संदर्भ कश्मीर विशेषांक), उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ, पृष्ठ संख्या 13 
2. चन्द्रकान्ता, (2013), कथा सतीसर, राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पृष्ठ संख्या 556
3. वही, पृष्ठ संख्या 557
4. वही, पृष्ठ संख्या 258
5. वही, पृष्ठ संख्या 377 
6. वही, पृष्ठ संख्या 256
7. कांत, मीरा, (2009), एक कोई था कहीं नहीं-सा’ वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या196
8. वही, पृष्ठ संख्या189
9. वही, पृष्ठ संख्या197
10.  कौल, संजना, (2003), पाषाण युग, आधार प्रकाशन, पंचकूला, पृष्ठ संख्या 89 
11.  कुलश्रेष्ठ, मनीषा, (2012), शिगाफ़, राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, पृष्ठ संख्या 69
12.  वही, पृष्ठ संख्या12 
13.  वही, पृष्ठ संख्या 29
14.  कौल, क्षमा, (2014), दर्दपुर, ज्योतिपर्व प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्ठ संख्या 174-75 
15.  वही, पृष्ठ संख्या 73 
16.  वही, पृष्ठ संख्या 44 
17.  वही, पृष्ठ संख्या 121

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