स्कर्दू किले की घेरा बंदी, और मेरे मामाजी सूबेदार रामचन्द्र

शशि पाधा

- शशि पाधा

(चित्र सौजन्य: भारतीय सेना अभिलेखागार)

 वर्षों के स्वतन्त्रता संग्राम का सुफल यह हुआ था कि अंत में ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ना पड़ा। किन्तु जाते-जाते भी अंग्रेज़ धर्म और जाति के आधार पर भारत के दो टुकड़े करते गए और पाकिस्तान की स्थापना हुई। वर्ष 1947 तक  जम्मू-कश्मीर एक विशाल स्वतंत्र राज्य था जिसकी सीमाएँ जम्मू नगर से लेकर सुदूर गिलगित-बल्तिस्तान तक फैली थीं। भारत के विभाजन के समय अन्य रियासतों के समान इस राज्य का स्वतंत्र भारत के साथ विलय नहीं हुआ था। नया जन्मा साम्राज्यवादी देश पाकिस्तान इस राज्य पर भी अपना अधिकार जमाना चाहता था। इसी महत्वाकांक्षा को लेकर पाकिस्तानी सैनिकों ने कबाइलियों के वेश में आकर  पाकिस्तान के अधीन मुजफ्फराबाद से आते हुए जम्मू कश्मीर राज्य के उड़ी, बारामुला और फिर श्रीनगर तक हमला कर दिया था। इन नगरों से गुज़रते हुए कबाइलियों के द्वारा सैंकड़ों लोगों की हत्या की गई, कितनी असहाय स्त्रियों के साथ बलात्कार  हुआ, लूट पाट और आगजनी भी हुई। इस रियासत के शासक महाराजा हरि सिंह की सेना ने इनका डट कर प्रतिरोध किया। कबाइलियों के इस हमले में अनेक स्थानीय लोगों एवं राजकीय सेना के सैनिकों को जान गँवानी पड़ी। इस कठिन स्थिति से जूझने के लिए जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से सैनिक सहायता मांगी। भारत सरकार सहायता के लिए तैयार थी लेकिन वह महाराजा हरि सिंह के साथ विलय की संधि की इच्छुक थी। बहुत सोच-विचार के बाद अपने राज्य के लोगों के हित का ध्यान रखते हुए महाराजा ने विलयपत्र (Instrument Of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए और जम्मू –कश्मीर राज्य विशाल भारत का भाग हो गया। अमूल्य समय को न गँवाते हुए 30 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना हवाई मार्ग से कश्मीर पहुँच गई। इस प्रकार उस समय कश्मीर के निवासियों को जीवन दान मिला था।

स्कर्दू दुर्ग का प्रवेशद्वार
उन दिनों जम्मू कश्मीर राज्य की सेनाएँ सुदूर पर्वतों के बर्फीले भाग लद्दाख, गिलगित बाल्टिस्तान में तैनात थीं। स्कर्दू बल्तिस्तान तहसील का मुख्य हैडक्वाटर था जहाँ भारतीय सेना के लिए सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण छावनी थी। बहुत से पाठक कारगिल युद्ध से परिचित होंगे और कारगिल की भौगोलिक स्थिति को भी जानते होंगे। ‘स्कर्दू’ कारगिल की पहाड़ियों के ठीक पीछे का पर्वतीय भाग है। गिलगित और लेह को जोड़ने वाला एक मात्र मार्ग स्कर्दू से हो कर जाता था और लेह की रक्षा के लिए स्कर्दू को पाकिस्तान की सेना के अधीन होने से बचाना भारतीय सेना का मुख्य ध्येय था। पाकिस्तान देश के जन्म की घोषणा के तुरंत बाद स्कर्दू छावनी और आस-पास की सैनिक छावनियों में तैनात सैनिकों के हृदय और कर्तव्य निष्ठा की भावना में भी विभाजन के कड़वे बीज अंकुरित हो गए। महाराजा हरि सिंह की ‘राज्य सेना’ विभाग के जम्मू-कश्मीर स्टेट फोर्सेस में हिन्दू, मुस्लिम, सिख और गोरखा जाति के सैनिकों का समावेश था। सेना का धर्म तो राष्ट्र रक्षा होता है किन्तु उस समय जाति और धर्म मुख्य हो गए और जम्मू कश्मीर स्टेट फोर्सेस के मुस्लिम सैनिकों ने बग़ावत कर दी और अपनी ही पलटन  के बहुत से हिन्दू और सिख सैनिकों की हत्या कर दी। बग़ावत के बाद वे मुस्लिम सैनिक अपनी कश्मीरी निष्ठा दरकिनार कर स्वयं पाकिस्तान सेना के अधीन गिलगित स्काउटस में सम्मिलित हो गए। बचे हुए सैनिकों के नेतृत्व के लिए भारतीय सरकार ने लेह में तैनात मेजर शेरजंग थापा की पदोन्नति करते हुए उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल बना कर जम्मू कश्मीर स्टेट फोर्सेस की कमान सौंपी। कर्नल थापा के लिये यह एक गंभीर चुनौती का कार्य था। सैनिकों के मनोबल को संभालना तो लक्ष्य था ही साथ ही स्कर्दू छावनी को पाकिस्तानी सेना के अधीन होने से बचाना सब से मुख्य ध्येय था।

लेफ़्टिनेंट कर्नल शेरजंग थापा
महावीर चक्र विजेता
यह एक बहुत ही दुरूह कार्य था क्यूँकि जम्मू कश्मीर स्टेट फोर्सेस में बहुत ही कम सैनिक बचे थे जबकि पाकिस्तान फ़ोर्स पुनर्गठित होकर दावा बोलने को तैयार थी। उस समय कर्नल थापा ने भारत सरकार से हर प्रकार की सैनिक सहायता मांगी किन्तु तब तक जम्मू-कश्मीर के अन्य स्थानों पर कबाइलियों का आक्रमण ज़ोर पकड गया था। स्कर्दू के स्थानीय लोगों ने भी सैनिक कमांडर से सहायता की गुहार की। कर्नल थापा ने उस समय अपने सैनिकों की जान बचाने और स्थानीय निवासियों की सहायता करने का निर्णय लेते हुए सभी लोगों को स्कर्दू स्थित किले में शरण लेने का निर्देश दिया। स्थिति की विकटता को भाँपते हुए कर्नल थापा ने 3 दिसम्बर 1947 को पलटन के बचे खुचे सैनिकों को भी इसी किले में आश्रय लेने का आदेश दिया।

 भारतीय सेना के गौरवमय इतिहास की इसी महत्वपूर्ण घटना को ‘स्कर्दू किले की घेराबंदी’ के नाम से जाना जाता है। हमारे मामाजी ‘सूबेदार रामचन्द्र’ उस समय ‘6, जम्मू कश्मीर स्टेट फोर्सेस’ में सेवारत थे और अन्य सैनिकों के साथ उन्होंने ने भी किले में आश्रय लिया था।

रामचन्द्र मामाजी
मामा जी की पलटन के स्कर्दू किले में आश्रय लेने तक की सूचना हमारे परिवार को थी किन्तु वे जीवित हैं; बंदी हैं या शहीद हो गए हैं, इस विषय में कहीं से कुछ भी पता नहीं चल रहा था। सारा परिवार केवल एक आस पर जीवित था कि ‘बुरी खबर नहीं आई तो सब अच्छा ही होगा।’ कोई नहीं जानता था कि उनके साथ क्या हुआ होगा। घर में बेचैनी तो थी किन्तु नई नवेली दुल्हन ‘पुष्पा मामी’ के आगे-पीछे हमारी नानी और परिवार ने आश्वासन और सांत्वना का रक्षा कवच बाँध दिया था। नानी देवी-देवताओं की कहानियाँ सुना कर मामी का दिल बहलाती रहती थीं। गाँव में कई प्रकार की अफवाहें उड़ती रहती थीं किन्तु नानी उनकी भनक तक मामी के कानों तक नहीं पड़ने देतीं थी। उस समय प्रभु से प्रार्थना ही एक मात्र संबल था।

भारत के अन्य प्रान्तों की तरह हमारे डुग्गर प्रान्त में भी ’कुलदेवी’ का बहुत महत्व है। हमारी प्रांतीय भाषा में इन्हें ‘सजावती’ कहा जाता है। घर में कोई शुभकार्य हो तो सब से पहले ‘सजावती’ के द्वार पर माथा टेकने के लिए लोग सपरिवार जाते हैं। हर प्रकार की कठिनाई में भी उसी देवी माँ के आगे माथा टेक कर मन्नत माँगी जाती है। नानी भी मामी को उसी सजावती  के पास माथा टेकने ले जातीं थीं। सुना है कि नानी ने मामा जी के सकुशल लौट आने पर सोने की नत्थ चढाने की मन्नत माँगी थी। घर में भजन, कीर्तन, व्रत, अनुष्ठान, हर दिन कुछ न कुछ होता रहता था। अशुभ की कल्पना की भी सब को पूरी मनाही थी।

दिन, महीने, वर्ष बीतने लगे किन्तु मामा जी की कोई सूचना नहीं मिली। कई बार स्थानीय छावनी में जाकर खबर लेने के लिए नानाजी जाते लेकिन किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। बस अनुमान से कभी यह बता दिया जाता था कि शायद वो पाकिस्तान के किसी कैम्प में युद्धबंदी थे। किन्तु यह भी केवल अनुमान था। युद्ध की परिस्थितियों का एक नियम होता है। जब तक किसी सैनिक की मृत देह नहीं मिलती या उनके शहीद होने की पुष्टि नहीं होती तब तक उन्हें  ‘कार्रवाई में लापता’ (‘Missing in Action) ही माना जाता है। युद्धबंदी तो तभी माना जाता है जब शत्रु देश की ओर से नामों की सूची भेजी जाती है। ऐसी कोई सूची अभी तक पाकिस्तान की ओर से नहीं आई थी। प्रतीक्षा और असमंजस की अवधि बहुत दीर्घ होती जा रही थी।

(जनवरी 1948 को लापता हुए, फ़रवरी 1951 को लौटे) तीन वर्ष, छह महीने के लम्बे अंतराल बाद एक दिन जम्मू छावनी से कोई सैनिक नाना जी के घर आया। आप सोच सकते हैं कि वह पल कितना दहशत वाला होगा। क्या समाचार होगा, क्या बताने आया होगा? घर की सभी महिलाएँ कमरों में छिप कर भगवान् से प्रार्थना करने लगीं। आगंतुक को सीधे मामा जी के कमरे में ले जाया गया। सभी के लिए एक-एक पल जीना पहाड़ जैसा दूभर था। नानी तो बस अपने भगवान् के पास बैठ गई थीं। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। पता नहीं पाठक इस पल को कैसे जी रहे होंगे किन्तु एक सैनिक पत्नी होने के नाते मैं इस पल को कितनी बार जी चुकी हूँ और अनुमान लगा सकती हूँ कि मामी जी के मन-मस्तिष्क में उस समय कैसा तूफ़ान चल रहा होगा।

कुछ ही पलों में आँगन में एक गगनभेदी गूँज सुनाई पड़ी। नाना जी शायद उस प्रभु से बात कर रहे थे - रामचन्द्र जीवित है, हमारा रामचन्द्र जीवित है। हे प्रभु! मेरा बहादुर सैनिक बेटा सकुशल है...। उस समय आह्लाद, धन्यवाद, अपार प्रसन्नता के स्वरों की गूँज से उस घर में खुशियों और नवजीवन की बौछार हो रही थी। नानी और मामी तो केवल भगवान् की प्रतिमा के आगे चुपचाप बैठीं थी। एक माँ और एक नई नवेली पत्नी के लिए भगवान् को धन्यवाद देने का वह दिव्य पल था।

मामा जी उस समाचार मिलने के कुछ दिनों बाद लौटे थे। गाँव की सरहद पर ही उनका बैंड-बाजे के साथ स्वागत किया गया था। पूरा गाँव और परिवार गाँव के प्रवेश द्वार पर एकत्रित था। मामा जी को एक सजे-सजाए घोड़े पर बिठा दिया गया और गौरव, सम्मान और ढेर सारे प्यार के साथ मामा जी की सवारी गाँव की ओर चल पड़ी थी। घर में प्रवेश करने से पहले उन्हें ‘सजावती’ की देहरी पर ले जाया गया। वहाँ घर की स्त्रियाँ मामी जी को लेकर पहले ही पहुँच गईं थी। मामी दुल्हन के जोड़े में सजीं थीं। पूरी विधि के साथ उन दोनों ने कुलदेवी की पूजा अर्चना की और पति पत्नी को नए ब्याहे जोड़े के समान घर में लाया गया। सुना है महीनों घर में पकवान बनते रहे और दान पुण्य का वातावरण रहा। हमारी ननिहाल का घर फिर से खुशियों से भर गया था।

तीन वर्षों के बाद घर लौटने पर सभी लोग मामा जी से उनके बीते तीन वर्षों की जीवनगाथा सुनने को उत्सुक रहते थे। जाने कितनी बार उन्होंने इसे दोहराया होगा। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय जब मेरे पति भी छम्ब क्षेत्र में अपनी पलटन के साथ शत्रु से लोहा ले रहे थे तो मैं भी मानसिक सांत्वना पाने की इच्छा से मामा जी के पास उनकी वीर गाथा सुनने चली जाती थी। लगभग तीन वर्षों की उनकी रोमांचित करने वाली कहानी उनके ही शब्दों में -

“स्कर्दू के किले में रहना जीवन और मृत्यु से हर रोज़ जूझने जैसा था। बहुत दिनों तक तो मनोबल और शारीरिक क्षमता ने साथ दिया किन्तु धीरे-धीरे सब क्षीण होने लगा। अन्न की बोरियाँ खाली होने लगी और किले के बाहर से आते हुए पाकिस्तानी सेना के हमले का मुकाबला करते हुए गोला बारूद के भण्डार भी लगभग खाली हो रहे थे। साथी भी धीरे-धीरे बीमारी और भूख के शिकार होकर मरते गए। कुछ सैनिकों ने वहाँ से भाग कर भारत की सरहद तक जाने का प्रयत्न भी किया किन्तु या तो वो  पकड़े गए या उन दुरूह बर्फीले पहाड़ों में ही सदा के लिए गुम हो गए।”

“क्या भारत सरकार या सेना आपकी सहायता के लिए कुछ भी प्रयत्न नहीं कर रही थी” मैंने बहुत उत्सुकता से उनसे यह प्रश्न किया था।

अपने देश और अपनी सेना से अथाह प्यार करने वाले मामा जी ने बताया, “भारतीय सेना ने  बहुत बार हमसे सम्पर्क करने का प्रयत्न किया था। सहायता के लिए कितनी बार सैन्य टुकड़ियाँ  भी भेजीं लेकिन या तो उन्हें बीच मार्ग में ही पकड़ लिया जाता या वो नहीं पहुँच पाने की स्थिति में वापिस लौट जाती थीं। संचार का एकमात्र साधन रेडियो सेट भी काम करना बंद कर चुके थे। हवाई मार्ग से भी खाने-पीने की सामग्री गिराने का भी प्रयत्न किया गया किन्तु कभी बोरियाँ किले के बाहर गिर जातीं तो उन्हें अंदर लाना बहुत जोखिम का काम होता था। धीरे-धीरे हम सब शरीर से भी बहुत कमज़ोर हो गए। कई सैनिक बीमारियों का शिकार हो गए। बहुत ही कम सैनिक बचे रह गए। किले के भीतर आश्रय लेने वाले स्कर्दू के लोग भी धीरे-धीरे भूख और बीमारी से हारने लगे। स्थिति यहाँ तक आ गई कि सशक्त या योग्य सैनिकों के अभाव में किले में रहने वाले आम लोगों को भी हथियार चलाने की शिक्षा देनी पड़ी। बाहर से लगातार प्रहार होता रहता था। हमारा एम्युनिशन लगभग समाप्त हो गया था। मुझे याद है कि हमने कई बार बड़े-बड़े पत्थर भी सामने शत्रु पर फेंके थे।।  बीमारों और घायलों के लिए कोई दवा-दारू नहीं बची थी।  मृत सैनिकों व अन्य आश्रित लोगों का दाह संस्कार भी किले के भीतर ही कर दिया जाता था। हतोत्साह का सबसे बड़ा कारण यह था कि भारत की सेना के साथ सारे सम्पर्क टूट गए थे और वहाँ से सहायता आने की कोई आशा भी नहीं बची थी। आने वाले दिनों में भीष्म बर्फबारी के कारण सम्पर्क की सभी आशाएँ भी समाप्त हो गई थीं। किले में आश्रय लेते हुए  हमारे कमांडर ने ‘अंतिम सैनिक–अंतिम गोली’ तक शत्रु से जूझने का संकल्प लिया था लेकिन वे अपने सामने ही अपने बचे हुए सैनिकों को मरते हुए नहीं देखना चाहते थे। इस असहाय स्थिति में हमारे कमांडर के लिए आत्मसमर्पण ही एक मात्र विकल्प बचा रह गया था।

मैंने इतिहास में बहुत सी आत्मसमर्पण की कहानियाँ सुनी हुई हैं। सब से अधिक सिकन्दर के समक्ष पोरस के समर्पण की कहानी ने मुझे प्रभावित किया था। एक बहादुर कमांडर और उसके सैनिकों के लिए वे निर्णायक पल कैसे होते होंगे, वे किन मनस्थितियों से जूझ रहे होंगे? एक योग्य और अभिमानी सैनिक की पत्नी होने के नाते मैं स्वयं इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ रही थी।

मेरे पूछने पर मामा जी ने यही कहा था कि युद्ध में शत्रु से लड़ते हुए शहीद होना गर्व की बात है किन्तु कोई भी कमांडर अपनी सेना को अभावों से मरते हुए नहीं देख सकता। विश्व के हर युद्ध में आत्मसमर्पण होता आया है। उस समय की परिस्थति देखते हुए कर्नल थापा ने भी यही कठिन किन्तु सही निर्णय लिया था। लगभग 6 महीने तक हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने के बाद अंत में 14 अगस्त 1948 को कर्नल थापा ने अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। यह बात कह कर मामा जी मौन हो गए थे। न जाने उस समय भीतर  निराशा के कितने ज्वालामुखी पिघल रहे होंगे। हम तो केवल उनकी धीर, सौम्य बाह्यस्थिति को ही देख सकते थे।

मामा जी ने यह बात न जाने कितनी बार दोहराई होगी और कितनी बार उन दारुण पलों को जिया होगा, यह सोच कर ही हमारे शरीर में कँपकँपी हो जाती थी। उनकी कहानी की सब से महत्वपूर्ण और रौंगटे खड़े कर देने वाली कड़ी अभी बाकी थी। विश्व युद्ध में सैनिकों के आत्मसमर्पण की कितनी कहानियाँ मैंने उपन्यासों में पढ़ी थी और उन पर बनी फिल्में भी देखी थीं। यह भी जानती थी कि बंदी बनाए गए सैनिकों के साथ बहुत क्रूर और अमानवीय व्यवहार भी होता आया है। मामा जी तो उस के साक्षात् उदाहरण थे। उनसे बढ़ कर सच्चाई को कौन शब्दों में व्यक्त कर सकता था। वो सकुशल वापिस आ गए थे यह जानते हुए भी मैंने उनसे पूछ ही लिया था कि शत्रु के कैम्प में उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ था।

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मामा जी ने पहले आकाश की ओर देखते हुए उस प्रभु से मौन में बात की थी या धन्यवाद कहा होगा मैं नहीं जानती। किन्तु वो बहुत देर तक मौन रहे थे शायद   दूर अदृश्य में कुछ शब्द, कुछ अक्षर ढूँढ रहे थे।

बहुत धीमे स्वर में उन्होंने कहा, “‘आत्मसमर्पण के बाद पाकिस्तानी सेना ने हमें युद्धबंदी बना लिया। हम उनके शत्रु थे और हमारा जीवित रहना उनके लिए कई शंकाओं का कारण था। उनकी सीमा में पहुँचते ही पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों ने हमें एक पंक्ति में खड़ा कर दिया। हम नहीं जानते थे कि हमारे साथ अब क्या होगा। हम केवल यंत्रवत सामने के दृश्य को देख रहे थे। सब से पहले वे हमारे कमांडर कर्नल थापा और उनके सहायक को कहीं कैम्प में अंदर ले गए। सामने खड़े पाकिस्तानी सैनिकों के हाथ बंदूकें थीं। कुछ ही पलों में आरम्भ हो गया नर संहार और नफ़रत का तांडव। उनके बन्दूकधारी सैनिक हमारी कतार से एक-एक करके भारतीय सैनिक को पीछे नाले की ओर ले जाते। ‘ठक्क’ की क्रूर गूँज से हमें यही अनुमान हो जाता था कि उसी नाले में असहाय सैनिक को गोली मार दी गयी है।  मैं जान गया था कि अब जीवन  का अंतिम समय बहुत ही निकट है। मैंने अपने प्रभु को याद करना शुरू कर दिया था। मेरी दायीं ओर केवल चार सैनिक बचे थे। मैंने अपने आप को पूरी तरह उस प्रभु से मिलने के लिए तैयार कर लिया। एक, दो तीन और ठक्क –दायीं ओर के सभी सैनिक शहीद हो गए थे। अब मेरी बारी थी। नाले की ओर ले जाने वाले सैनिक ने जैसे ही मुझे पकड़ा तो मुझे सामने से कुछ अस्फुट शब्द सुनाई दिए। मेरी आँखें तो बंद थीं किन्तु मैंने  सुना कि कोई सैनिक सामने खड़े कमांडर को बता रहा था, “साब! यह पढ़ा लिखा सैनिक है। यह हमारी पलटन के कागज़ी कामकाज और एकाउन्टिंग करने में हमारी सहायता कर सकता है।”
मैंने केवल यही सुना, “ओह अच्छा, तो फिर इसे कैम्प में ले जाओ।”

उस समय मैं हैरान था या जड़ हो गया था मुझे नहीं मालूम। मुझे अपने जीवित होने का विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन यंत्रवत मैं कैम्प की ओर चलता रहा-चलता रहा। होने या न होने की स्थिति में मुझे यही आभास हो रहा था कि मैं दूर किसी अज्ञात गुफा की ओर जा रहा हूँ। मुझे उस समय उस गुफा के अंत में एक दिव्य ज्योति दिखाई दे रही थी। अब ‘मैं’ वह पहले जैसा राम चन्द्र नहीं था। मेरा दूसरा जन्म हो गया था।”

‘दूसरा जन्म ही हुआ होगा’ इस बात पर मेरी गहरी आस्था है। आपने सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा सुनी होगी। सती सावित्री ने भी तपस्या और हठ के बल पर वरदान ले कर यमराज से अपने मृत पति को जीवनदान देने का वचन लिया था। मामा जी भी मृत्यु के द्वार पर खड़े थे। मामी के कठिन व्रत और अनुष्ठानों के प्रभाव से वे उस द्वार से जीवित लौट आए थे। मामा जी ने गुफा के दूसरे छोर पर जो दिव्य ज्योति देखी थी वो वही आस्था, विश्वास और निष्ठा की ज्योति थी।

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