कहानी: सौदा

राम नगीना मौर्य
 जैसा कि हम सब भली-भांति वाकिफ हैं, मकान बनवाने के काम में अमूमन आर्किटेक्ट, मजदूर, राजमिस्त्री, प्लम्बर, इलेक्ट्रिीशियन सहित बालू, सीमेण्ट, सरिया, ईंट, गिट्टी, मोरंग, के साथ-साथ बाँस, बल्ली, चाहली, सीढ़ी, पटरों आदि बिल्डिंग-मैटेरियल्स की भी आवश्यकता पड़ती है। 
 हमारे मकान के निर्माण-कार्य की देख-रेख एवं उससे जुड़े सारे काम-काज पिताजी ही देख रहे थे, साथ ही इंजीनियर होने के नाते आर्किटेक्ट सम्बन्धी कार्य भी उन्हीं के मार्ग-दर्शन में चल रहा था।
 भूतल की छत पड़ जाने के उपरान्त, लिण्टल से सम्बन्धित ढ़ांचे को अमूमन महीने-भर के अन्दर खोल देना था, लेकिन शहर में अचानक कफ्र्यू लग जाने के कारण बाँस, बल्ली, चाहली, सीढ़ी, पटरों की देखरेख, चैकीदारी के लिए हमारे राजमिस्त्री हीरालाल और एक मजदूर को छोड़कर, बाकी सभी मजदूर अपने-अपने गांव चले गये। इन्हीं सब कारणों से लगभग ढ़ाई महीनों से छत की ढ़लाई में प्रयुक्त किये गये बाँस, बल्ली, चाहली, सीढ़ी, पटरे, आदि बिल्डिंग-मैटेरियल्स भी नहीं हटाये जा सके। शहर में कफ्र्यू लगा होने की वजह से इनका किराया दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। तिस पर कोढ़ में खाज ये कि सरन बिल्डिंग-मैटेरियल्स के मालिक का लड़का सुरेन्द्र लगभग आये दिन ही इन बिल्डिंग-मैटेरियल्स के किराये के लिए तगादा करने हमारे प्लॉट पर चला आता। हमारे समक्ष अजीब पशोपेश वाली स्थिति थी। पिताजी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि इस आकस्मिक विपदा से कैसे निबटा जाय?
 एक दिन दोपहर में अर्द्धनिर्मित अपने मकान के आगे स्थित नीम के पेड़ के नीचे, मन्द-मन्द चल रही मलय-समीर के बीच चारपाई पर लेटे-लेटे ही पिताजी ने कुछ गुणा-भाग किया। उन्होंने अंदाजा लगाया कि छत की ढ़लाई में प्रयुक्त इन बिल्डिंग-मैटेरियल्स का अब तक जितना किराया हो गया होगा, उतने में तो हम ये सारा बिल्डिंग-मैटेरियल्स नये सिरे से भी खरीद सकते हैं। यही सब जोड़-घटाव, गुणा-भाग लगाते हुए अगले दिन दोपहर को पिताजी सरन बिल्डिंग-मैटेरियल्स की दुकान पर ही जा पहुंचे।
 “सरन साहब, नमस्कार।” दुकान पर काउण्टर के पीछे अपनी कुर्सी की पुश्त से सिर टिकाए सरन साहब लगभग ऊंघ से रहे थे। छत से टंगा सीलिंग-फैन, जो आवाज ज्यादा कर रहा था, लेकिन हवा धीमें-धीमें दे रहा था, हौले-हौले घूम रहा था।
 “जी, बाउजी! नमस्कार। आप सहाय साहब है न?” अधखुली नींद से जागते हुए सरन साहब ने पिताजी से लगभग अकबकाते हुए पूछा।
 “जी, सही पहचाना आपने।” पिताजी ने उन्हें मुस्कुराते हुए आश्वस्त किया।
 “कैसा चल रहा है, आपके मकान का कार्य?” सरन साहब को जैसे कुछ याद आया हो। उन्होंने ये औपचारिक सा प्रश्न दागा।
 “अजी, कैसा चलेगा? आप तो जानते ही हैं कि हमारे मकान के भूतल की छत की ढ़लाई का कार्य जैसे ही पूरा हुआ, उसके सातवें दिन ही शहर में कफ्र्यू लग गया। मजदूर भी सभी काम छोड़-छाड़ कर अपने-अपने गांॅव चले गये। अब ऐसे में जो लिण्टल लगभग महीने-भर के अन्दर खुल जाना चाहिए था, मजदूरों के अभाव में लगभग ढ़ाई महीने से अटका पड़ा है। तिस पर बिल्डिंग-मैटेरियल्स का आपका किराया अलग से दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है।”
 “सहाय साहब, ये तो आपने एकदम सही बात कही। लेकिन, मकान बनवाने के काम में तो ये सब घट-बढ़ चलता ही रहता है। लागत हम यदि एक मान कर चलते हैं, तो खर्चा अमूमन उसके डेढ़ गुने से ज्यादा ही हो जाता है। अब हमें ही देखिये! कोई भी बिजनेस कीजिए, ढ़ेरों अनिश्चितताओं से भरा होता है। लेकिन मुझे लगता है कि ये बिल्डिंग-मैटेरियल्स के बिजनेस का काम तो और भी अनिश्चितताओं वाला है।” सरन साहब ने पिताजी की बातों को निरपेक्ष-भाव लेते, अपना ही रोना रोते, अपनी तरफ से ये बहुमूल्य विचार व्यक्त किये।
 “सही कह रहे हैं सरन साहब।” पिताजी ने महसूस किया कि मजदूरों के अभाव में महीनों से अटके काम और दिन-ब-दिन बिल्डिंग-मैटेरियल्स के बढ़ते किराये में किसी तरह की रियायत देने के मुद्दे पर, सरन साहब किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं हैं, और न इस दिशा में अपनी तरफ से उन्होंने कोई दिलचस्पी ही दिखाई। 
 “अब देखिये न सहाय साहब! इस काम को शुरू करने से पहले मैं भी आपकी ही तरह सरकारी सेवा से रिटायर हुआ था। रिटायरमेण्ट के समय लड़के-बच्चे अभी छोटे ही थे। किसी काम धण्धे में नहीं लगे थे। ऐसे में परिवार चलाने, बच्चों के खाने-कमाने की व्यवस्था होने तक के लिए मुझे रिटायरमेण्ट के बाद भी कोई-न-कोई बिजनेस तो शुरू करना ही था। दोस्तों से सुझाव के बाद ये बिल्डिंग-मैटेरियल्स का काम शुरू किया तो ढ़ेर सारा बिल्डिंग-मैटेरियल्स उधार में ही लाना पड़ा। अजीब टेढ़ा काम है यह। दसियों बार तगादा करने पर भी आज-कल करते, लोग समय पर पूरे पैसे नहीं देते। हमेशा सिर पर किसी-न-किसी का उधार चढ़ा ही रहता है।” इस बार हाव-भाव से सरन साहब कुछ निराश-हताश से भी दिखे।
 “अब ये तो कमोबेश हर बिजनेस में लगा रहता है। कोई भी बिजनेस करेंगे, उधार-खाता तो चलता ही रहता है।” पिताजी ने उन्हें बीच में ही टोकना चाहा।
 “मेरी पूरी बात तो सुनिये! बिजनेस से जुड़े ऐसे बहुत सारे काम हैं, जहाँ उधार-खाता नहीं भी चलता। आखिर, दुकान का किराया, दुकान की देख-रेख के लिए रखे गये दो-दो मजदूरों के नियमित वेतन का खर्चा तो देना ही पड़ता है न? साथ ही ये बिल्डिंग-मैटेरियल्स, सड़क किनारे रखे जाने के वाबजूद प्राधिकरण, पालिका वालों के रोक-टोक, हेन-तेन, अटर-पटर अन्य खर्चे आदि मिलाकर महीने में जितनी कमाई होती है, लगभग उतना ही खर्च भी हो जाता है।” ये कहते सरन साहब ने छत्तीस कोण का मुंह बनाते, चेहरे पर ऐसे हाव-भाव लाए, मानो वे बिल्डिंग-मैटेरियल्स के अपने बिजनेस से पूरी तरह ऊब चुके हों।
 “यानी कि आपका बिजनेस भी ‘नो प्राॅफिट, नो लाॅस’ पर ही चल रहा है?”
 “जी, यही समझ लीजिए। ऊपर से मेरे साहबजादे की आवारागर्दी में कोई कमी नहीं आ रही है। वो तो सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा।”
 “अरे हाँ! आपके साहबजादे की बात पर याद आया। सुरेन्द्र नाम है न उसका?”
 “जी हाँ, क्या कोई गड़बड़ी की उसने?” यह पूछते, सरन साहब के चेहरे पर चिन्ता और परेशानी के भाव उभर आए।
 “नहीं ऐसा कुछ नहीं है। सुरेन्द्र अक्सर मेरी उपस्थिति में या अनुपस्थिति में मकान की सुरक्षा के लिए रखे गये मजदूर से, छत की ढ़लाई में प्रयुक्त बिल्डिंग-मैटेरियल्स का किराया आदि मांॅगने आ धमकता है। कभी-कभी हमारे उस मजदूर से जद्द-बद्द भी बोलने लगता है। मुझे उसके हाव-भाव से उसकी गतिविधियाँ तो संदिग्ध लगती ही हैं, इरादे भी नेक नहीं लगते। मैं सोचता हूँ कि जब उन मैटेरियल्स के किराये का सौदा मैंने आपसे किया है, तो मैं आपके लड़के को कोई धनराशि या किराये के पैसे क्यों दूँ, आपको ही क्यों न दूँ?” पिताजी ने सरन साहब को विस्तार से समझाना चाहा।
 “जी, बिलकुल। आपको उसे पैसे देने भी नहीं चाहिए। बल्कि मैं तो आपको आगाह करने वाला था कि यदि सुरेन्द्र आपके पास उन बिल्डिंग-मैटेरियल्स के किराये के पैसे आदि मांगने या तगादा करने आये तो आप उसे तत्काल मना कर दीजियेगा।” ये कहते, इस बार सरन साहब की आंखों में खास तरह की चमक दिखी। 
 “धन्यवाद, सरन साहब। आपने मेरी समस्या का समाधान तो किया ही, सिर से एक बोझ भी कम कर दिया।” पिताजी भी थोड़ा आश्वस्त हुए।
 “वैसे, सच बताऊँ सहाय साहब, तो मैं रोज-रोज की ग्राहकों, मजदूरों की इन चिक-चिक, झिक-झिक से बिल्डिंग-मैटेरियल्स के इस बिजनेस से आजिज आ चुका हूँ। सोचता हूँ कि ये सारे मैटेरियल्स किसी को बेच-बाच कर कोई दूसरा ढ़ंग का काम-धण्धा शुरू करूँ। मैंने महसूस किया है कि मेरे साहबजादे सुरेन्द्र को भी यह काम पसन्द नहीं है, तभी तो वो जनाब नित-प्रति दुकान पर न बैठने के बीसों बहाने खोजते रहते हैं।” इस बार सरन साहब ने अपनी दिली व्यथा कह ही डाली।
 “अच्छा! ऐसा है?” मानो पिताजी को मन-वांछित मुराद मिल गयी हो।
 “हाँ, मेरे पुत्र जनाब तो लगभग रोज ही कोई नया बिजनेस स्टार्ट करने के आइडिया पर बतियाते, ये अल्टीमेटम भी देते रहते हैं कि अगर हमने जल्द ही कोई नया बिजनेस नहीं शुरू किया, तो वो खुद ही बैंक से या दोस्तों से लोन लेकर कोई नया बिजनेस शुरू कर देगा। कहता है कि मोबायल, एसेशरीज या जनरल-स्टोर्स की कोई दुकान खोलिए, ताकि कम मेहनत में ही अधिक पैसे बनाए जा सकें। ये लड़के मेहनत भी तो नहीं करना चाहते।” सरन साहब ने अपने पुत्र की कार्य-योजना का खुलासा किया था।
 “पर सरन साहब, आप ये क्यों भूलते हैं कि बिजनेस कोई भी हो, बिना मेहनत के तो कुछ भी सम्भव नहीं। फिलहाल, ये तो आप पिता-पुत्र का व्यक्तिगत निर्णय होगा, इसमें भला मैं क्या कह सकता हूँॅ? बहरहाल, आपके पास रखे इन सब बिल्डिंग-मैटेरियल्स की कुल कितनी लागत होगी? मेरे एक जान-पहचान वाले बिल्डिंग-मैटेरियल्स का ही बिजनेस शुरू करना चाहते हैं।” बातचीत के इस चरण में पिताजी ने विस्तार से जानना चाहा।
 “ज्यादा नहीं, जो थोड़ा-बहुत बिल्डिंग-मैटेरियल्स एक-दो साइट्स पर मौजूद हैं, और जो यहाँ आपको दिख रहे हैं, इन्हें लेकर यही कोई सात या आठ हजार के मैटेरियल्स बचे हैं। हाँ याद आया, कुछ हमारे मकान के अहाते में भी रखे हैं।” सरन साहब को जैसे कुछ याद आया हो। 
 “यानी, मोटा-मोटी आपको कुल दस हजार रूपये तक दिलवा दिये जांय, तो आपका काम आसान हो जायेगा?” पिताजी के मन-मस्तिष्क में आशा का संचार हुआ।
 “जी, सहाय साहब। आपने एकदम सही हिसाब-किताब लगाया।” ये कहते सरन साहब की आंखों में भी खास तरह की चमक दिखी।
 “तो ठीक है, मैं कल अपने दोस्त को लेकर आपके पास हाजिर होता हूँ। तब-तक आप इन मैटेरियल्स को अपने मजदूरों से इकट्ठा करवाकर, एक साथ बंधवा दीजिए, और हाँ! जो मैटेरियल्स आपके घर पर अहाते में रखे पड़े हैं, वो भी मंगवा लीजियेगा।”
 “जी, ठीक है।” सरन साहब से ये सौदा तय करके पिताजी खुशी-खुशी प्लॉट पर वापस आ गये। 
 ***

 “मकान बनने के बाद आप इन बिल्डिंग-मैटेरियल्स का क्या करेंगे?” शाम को पिताजी ने हम सबके सामने जब सरन साहब के नये बिजनेस-आइडिया व अपनी भावी योजना के बारे में राज खोले तो हमने पूछा।
 “देखो बेटा, मैंने पूरा हिसाब-किताब लगा लिया है। छत की ढ़लाई में हमारे यहाँ सरन साहब के यहाँ से अब तक जो भी मैटेरियल्स लगे हैं, उनका आज के दिन तक का किराया रूपये छिहत्तर सौ हुए। अभी हमारे मकान का भूतल ही बना है। प्रथम और द्वितीय तल भी बनना है। इनकी अभी हमें कम-अज-कम तीन बार जरूरत पड़ेगी। यानी कि एक ही सामान के लिए हमें तीन-तीन बार किराया देना पड़ेगा। गाहे-बगाहे ऐसी आकस्मिक व आपदा वाली परिस्थितियाँ भी आ सकती हैं, जैसी कि अभी आयी हुई है। सरन साहब की दुकान, उनके घर, और एक-दो साइट्स पर जो कुछ भी मैटेरियल्स पड़ा है, और जो हमारी साइट पर लगे हैं, मैंने इन सभी का सौदा दस हजार रूपये में तय कर लिया है।” 
 “यानी, उनके बिल्डिंग-मैटेरियल्स पर अब हमारा मालिकाना अधिकार होगा? किराया देने के झंझट से भी मुक्ति?” मैंने उत्सुकता जाहिर की।
 “बिलकुल।” पिताजी ने आश्वस्त भाव से कहा।
 “लेकिन, ये प्रश्न तो अभी भी अनुत्तरित है कि मकान का कार्य पूरा हो जाने के बाद हम इन बिल्डिंग-मैटेरियल्स का क्या करेंगे?” मैंने आशंका जताई।
 “देखो बेटा। ये तो सामान्य सी बात है कि मकान का काम पूरा होते-होते इन मैटेरियल्स में कुछ टूट-फूट होगी ही। फिर भी हमारे पास इनमें से लगभग सत्तर फीसद मैटेरियल्स दुरूस्त हालत में तो बचे मिलेंगे ही।”
 “हाँॅ, वही तो। हम उन सत्तर फीसद मैटेरियल्स का भी क्या करेंगे?” इस बार मैंने लगभग खींझते हुए पिताजी से पूछा।
 “बताता हूँ। बताता हूँ। तनिक धैर्य रखो। हमारे राजमिस्त्री हीरालाल जी कह रहे थे कि उम्र हो जाने के कारण अब वे राजगिरी के काम में दिक्कत महसूस करते हैं। ऊँची बिल्डिंग्स में काम करने में दसियों तरह के खतरे रहते हैं। वो बिल्डिंग-मैटेरियल्स से ही जुड़ा कोई हल्का-फुल्का काम-धाम शुरू करना चाहते हैं। मैंने उनसे बात कर ली है। मकान का कार्य पूरा हो जाने के बाद मैं ये सारे मैटेरियल्स उन्हें दे दूंगा। वो तो अपनी मजदूरी में इनकी कीमत को एडजस्ट करने की बात कह रहे थे, लेकिन मैंने ही उन्हें ये कहते मना कर दिया कि इन मैटेरियल्स से मिले थोड़े से पैसों से हम क्या कर लेंगे? हमारे मकान का निर्माण कार्य आपके सुपरविजन में बड़ी ही अच्छी तरह से चल रहा है। अतः ये मैटेरियल्स हमारी तरफ से आपको बतौर इनाम होगा।” प्रत्युत्तर में पिताजी ने विस्तार से खुलासा किया।
 “वाह! यानी, हर्रे लगे न फिटकरी, रंग चोखा-ही-चोखा।”
 “यही समझ लो।” 
 ***

 “हाँ, अंकल जी। क्या सोचा है? हमारे किराये के कुछ पैसे आज दे रहे हैं या नहीं?” हम पिता-पुत्र के बीच अभी बातचीत चल ही रही थी कि सरन साहब का लड़का सुरेन्द्र वहाँ अपनी बाइक पर सवार हो पहुँचा।
 “अभी तो कुछ नहीं सोचा है बेटा।” पिताजी ने निश्चिन्त-भाव उत्तर दिया।
 “क्यों?” सुरेन्द्र ने जिज्ञासा की थी।
 “इस बारे में तुम अपने पिताजी से जाकर पूछना।”
 “ठीक है, अंकल जी। आप लोग ऐसे नहीं मानेंगे। लगता है अब मुझे ही कुछ करना होगा।” सुरेन्द्र ने इस बार तनिक तल्खी दिखाई।
 “बेटा, इस विषय में पहले अपने पिताजी से जाकर बात तो कर लो। हमारे उनके बीच इन बिल्डिंग-मैटेरियल्स के सम्बन्ध में सौदा पक्का हो गया है। कल तुम्हारी दुकान पर आकर सारे पैसे चुकता भी कर दूँगा।” पिताजी ने उसे इत्मिनान से समझाया।
 “कैसा सौदा? किसके बीच? आप ये किस सौदे की बात कर रहे हैं?”
 “इस बारे में भी तुम्हें कल पता चल जायेगा।” पिताजी, सुरेन्द्र के सामने अपनी योजना का खुलासा नहीं करना चाहते थे।
 “ठीक है। मैं कल आप लोगों का अपनी दुकान पर इन्तजार करूंगा।” कहते-भुनभुनाते हुए सुरेन्द्र, अपनी बाइक पर सवार हो, हमारे प्लॉट से वापस चला गया। 
 “ई सुरेन्दरवा पूरा अबलह ही है। उसे पता ही नहीं कि जिस स्कूल में पढ़े होगा, सहाय साहब उहाँ के प्रिंसिपल रहे होंगे...हें-हें-हें।” पास ही खड़े राजमिस्त्री हीरालाल जी ने टहोका-सा लिया। यह सुनकर पिताजी, हीरालाल जी और मेरे चेहरे पर खास तरह की मुस्कुराहट तैर गयी।
 सरन साहब का लड़का सुरेन्द्र, फिर कभी हमारे प्लॉट पर नहीं आया। शहर में कर्फ़्यू खत्म होने के बाद, हमारे मकान का प्रथम, द्वितीय तल भी शीघ्र बन कर पूरा हो गया। हाँ! बताता चलूँ, हीरालाल राजमिस्त्री का बिल्डिंग-मैटेरियल्स का काम भी आजकल ठीक-ठाक चल रहा है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।