बेमिसाल प्रेम


हिमांशु पाठक

ए-36, जज-फार्म, छोटी मुखानी, हल्द्वानी-263139, जिला-नैनीताल, उत्तराखण्ड
कुमाँऊनी भाषा और हरियाणवी भाषा के संमिश्रण का एक प्रयोग, जिसमें हरियाणा की एक लड़की उत्तराखंड के अल्मोड़ा गाँव में सपरिवार घुमने आती है। वहाँ पहाड़ी के खिसकने के कारण हुए हादसे में उसका परिवार खत्म हो जाता है तब एक उत्तराखंड के पचपन साल के आदमी को उस बच्ची पर दया आ जाती है; वो उस बच्ची को पिता का स्नेह देता है और उसका पालन-पोषण स्वयं करता है; परन्तु वो हरियाणा कि लड़की जो सोलह बरस की है उस के पिता तुल्य स्नेह को प्रियवर तुल्य स्नेह समझने लगती है और उस पर आकर्षित होने लगती है तब वह व्यक्ति उसे समझाता पर वह लड़की है कि मानने को तैयार नहीं होती। इसको लेकर ही ये संवाद है हरियाणवी लड़की और उत्तराखंड के व्यस्क के बीच, जिसमें हास-परिहास भी शामिल है। इसको कृपया कर मात्र मनोरंजन ही माने इसका यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं है। ये सिर्फ एक प्रयोग है कुमाऊँनी और हरियाणवी भाषा के मिश्रण का। 
- रचनाकार
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*1*
मैं उत्तराखंडी ब्राह्मण छूँ, 
तू हरियाणा कै छी गोरी।।
त्यार-म्यार, गोरी मेल छु काँ,
काँ मिलेनि आपुण भाषा,
काँ मिलेछि आपुण संस्कार, संस्कृति,
किले पड़े छी तू म्यार पीछाड़ गोरी?
किले पड़े छी तू म्यार पीछाड़ गोरी?
(मैं उत्तराखंड का ब्राह्मण हूँ और तू हरियाणा की गोरी है।
तेरा मेरा कोई मेल नही है। न ही अपनी भाषाएँ मिलती हैं, न संस्कार और न ही संस्कृति, फिर तू क्यों मेरे पीछे पड़ी है।)


*2*
तू उत्तराखंड का ब्राह्मण सै,
तो मैं गोरी हरियाणे की
जब मन से मन मिल जावे सै,
आँखों से आँखें बोली सैं।
फिर भाषा की किब हो जरूरत,
कै काम करे इब संस्कार, संस्कृति।
इब प्रेम की एक ही भाषा है,
दिल से, दिल मिल जावे सै।
तू सै ब्राह्मण उत्तराखंडी,
तो मैं गोरी हरियाणे की।
(अगर तू उत्तराखंड का ब्राह्मण है, तो मैं हरियाणा की गोरी हूँ। और प्रेम में तो दिल से दिल मिलनें चाहिए फिर भाषा, संस्कृति और संस्कार की क्या आवश्यकता है? प्रेम में आँखे ही आँखों से बातें करतीं है और मन ही मन के भावों को समझता है फिर कौन सी भाषा अलग है और क्यों? मैं तो एक ही बात जानतीं हूँ कि प्रेम की एक ही भाषा होती है, वह है भावनाओं की। अब अगर तू उत्तराखंडी ब्राह्मण है,तो मैं भी हरियाणवी गोरी हूँ)
अरे! मैं योई तो समुझुण यूँ,।
कि मैं छू ब्राह्मण उत्तराखंड क,
तो तू छी हरियाणा क गोरी।
(अरे! मैं भी तो तूझे यही समझा रहाँ हूँ, कि तू हरियाणा की गोरी हैं और मैं उत्तराखंड का ब्राह्मण हूँ।)

*3*
तू उमर देख आपुण , सोलह बरस,
और मैं लाग छू, बुड़ पचपन वर्ष क।
त्यार दगण होल मेर मेल कसी?
मैं तो लागणु त्यैर बौज्यू जस,
तू ल लाग छी म्यार चैली सी।
(वैसे भी तू अपनी उम्र देख और मेरी उम्र देख तू सोलह साल की तरुणी है और मैं पचपन साल का बुढ़ा हूँ। मैं तेरे पिता समान हूँ, और तू मेरी प्यारी सी बिटिया समान है। )

*4*
कब उम्र देखे सै, प्यार यहाँ?
ये तो बस धड़कन देखे सै।
थारे तो बसै मेरे दिल में,
इब मैं इस पे कि कर पावे से।
कहे लोग कुछ कि राधा कृष्ण के,
बीच उम्र न बाधा होवे सै।
जब राधा थी सात बरस की,
तब सात कहें, कृष्ण जी जन्में सै।
इब राधा- कृष्ण की जोड़ी भी,
विश्व-पटल पे छावे सै।
तो तु क्यूँ इत्ता घबराये से।
मैं तो तुझसे ही प्रीत करूँ।
जो तु ब्राह्मण, उत्तराखंडी,
तो मैं गोरी हरियाणे की।
(प्रेम कब उम्र देखता है? ये तो बस दिल की धड़कनों को देखता है। जब तुम तो मेरे दिल में बसे हों तो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ? लोग तो यह भी कहतें हैं कि जब कृष्ण मथुरा में जन्मे थें, तो राधा जी तब सात साल की थीं; तो क्या राधा और कृष्ण के मध्य प्रेम बाधा थी, क्या राधा और कृष्ण का प्रेम संपूर्ण विश्व में पूजनीय नही है? फिर तुम इतना क्यों डरते हो? अब मैं तो तुमसे ही प्रेम करती हूँ। अब पीछे तो नही हटूँगी, क्योंकि अगर तू उत्तराखंडी ब्राह्मण है तो मैं भी हरियाणा की गोरी हूँ, एक बार जिससे प्रेम किया तो किया फिर चाहें प्राण ही क्यों न चले जाए।)
यो तो मै कुण लाग रयी।
 
कि मैं छू ब्राह्मण उत्तराखंड क,
और तू छी गोरी हरियाणे की।
ये ही तो मैं तूझे समझा रहा हूँ कि तू हरियाणा की गोरी है और मैं उत्तराखंड का ब्राह्मण हूँ।)

*5*
तू तो लाग की, जस चन्द्रमुखणी,
और रात जैसी तू पूनम सी।
मैं कि देख मैं उल्टा ताव जैस,
जस रात काल अमावस सी।
तो त्यार दगण, मेल मेर काँ बैठूँ।
तू चन्द्र मुखणी, मैं काव् बादल।
तू छी गोरी हरियाणे की,
और मैं छू ब्राह्मण उत्तराखंडी।
(यही मैं तूझे कब से समझा रहा हूँ कि तू अपने को देख और मुझे देख। तू कहाँ चन्द्रमुखी है। चाँद की जैसी गोरी-चिट्टी! और मुझे देख बिल्कुल उल्टे तवे की तरह काला।कहाँ तू पूनम की चाँद और कहाँ मैं अमावस का चाँद। तो तू ही बता तेरा मेरा मेल कहाँ होने वाला ठहरा। कहाँ तू चन्द्रमुखी और कहाँ मैं उल्टा ताल जैसा काला। ऊपर से मैं उत्तराखंडी ब्राह्मण और तू हरियाणा की गोरी।) 
 
*6*
तू जो ब्राह्मण होवे है उत्तराखंडी, 
तो गोरी मैं हरियाणे की,
इब ठान लिया एकबार जो तो,
तो पाछण पैर फिर न धर ती।
तू बात कहें कारे, गोरे की
तो राधा भी थी गोरी-गोरी,
और श्याम, श्याम थे बादल सै।
फिर रंग दीवारें किब थी बनी,
दोनों के प्रेम के बीचण में।
राधा और कृष्ण में किथो भेद,
राधा थी कृष्ण और कृष्ण राधा।
(देखो! तुम चाहे कितने ही तर्क दे दो मैं बस अपनी बात पर अडिग हूँ, अगर तू उत्तराखंडी ब्राह्मण है, तो मैं भी हरियाणवी छोरी हूँ अगर एक बार ठान लिया तो फिर पीछे तो हटने वाली नहीं। तुम काले-गोरे की ये क्या बात करते हो भूल जातें हो कि राधा भी गोरी थी और कृष्ण भी काले बादलों समान काले थें ; फिर कब रंग उनके प्रेम के मध्य दीवार बनी। राधा, कृष्ण थीं और कृष्ण राधा।)
 
*7*
ना तू उत्तराखंडी ब्राह्मण,
ना मैं छोरी हरियाणे की,
ना तू होवे से पचपन का,
ना मैं सोलह की होवे सुँ,
ना तू काला, न मैं गोरी,
अदभुत होवेगी अपनी जोड़ी।
जब दिल से दिल मिल जावे सै,
मन में तब एक भाव ही आवे सै।
तू प्रीत मेरा, मैं तेरी प्रीति,
मैं प्रीत तेरी, तू मेरी प्रीति।
कब प्रेम देखता जाति वर्ण
कब प्रेम देखता भाषा और धर्म।।
कितने ही उदहारण ऐसे है।
जहाँ समझ होती है प्रेम-मर्म।।
मै और तू है भारतवासी।
ना मैं हरियाणी न तू उत्तराखंडी।
जहाँ प्रेम से बड़ा कोई कर्म नहीं।
जहाँ प्रिय से बड़ा कोई धर्म नहीं।।
(अब देख! क्या उत्तराखंड और हरियाणा का राग अलाप रखा है तुमने कब से; पहले तो न मैं हरियाणवी और न ही तुम उत्तराखंडी। हम मनुष्य हैं, भारतीय हैं। न तू पचपन का है, न मैं सोलह की। न तुम काले हो, न मैं गोरी। सोचो, अपनी जोड़ी कितनी विचित्र होगी। ये ठीक है कि ये प्रेम बेमेल प्रेम है पर है बेमिसाल प्रेम। अपनी जोड़ी अदभुत जोड़ी होगी। सोचो! जब दिल से दिल मिल जाएँगे, तब दिल में एक ही भाव होंगे। तू मेरा प्रीत होगा और मैं तेरी प्रीति या यूँ कहें कि मैं तेरी प्रीत हूँ और तू मेरी प्रीति। प्रेम न जाति देखता है, न वर्ण देखता है न क्षेत्र देखता है, न भाषा, न संस्कार और न ही संस्कृति। इतिहास में ऐसे बहुत सारे उदाहरण है, जहाँ प्रेम एक मर्म, रहा एक धर्म रहा और कर्म रहा। इसलिए प्रेम से बड़ा कोई कर्म नहीं हैऔर प्रिय से बड़ा कोई धर्म है।)
 

*8*
तू सच्ची कूड़ैछी चेली।
कि प्रेम क कोई जाति न हूँ, 
तू सच्ची कूड़ैछी चेली।
कि प्रेम क कोई वर्ण न हूँ।
य प्रेम तो बस हूँ चली प्रेम हूँ छ,
य कर्म ल छू, य धर्म ल छू, 
य प्रेम तो चैली मर्म ल छू।
मैं ल करनु तुके प्रेम चैली।
पर प्रेमी ज्यस ना, बौज्यू जस
मैं छू त्यार बौज्यू चैली,
और तू ल छी म्यार चैली बेटी,
ना मैं उत्तराखंडी, न तू हरियाण की
तू तो छ्य चैली आपुण बौज्यू की।
अब य छू हमारे बेमिसाल प्रेम।।
(तू सही कह रही है बिटिया कि प्रेम की न ही कोई जाति होती है,ना ही कोई वर्ण। ये प्रेम तो मर्म है, कर्म है और धर्म है। बिटिया ये प्रेम तो बस प्रेम होता है। इसलिए मैं तूझे प्यार करता हूँ पर प्रेमी के रूप में नही पिता के रूप में।
आज से मैं तेरा पिता और तू मेरी बेटी। न मैं उत्तराखंडी और न ही तू हरियाणावी, बस तू तो बिटिया अपने बापू की। यह है हमारा बेमिसाल प्रेम।)

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