समीक्षा: रिश्तों की परतें उघाड़ती कहानियाँ

समीक्षक: हंसा दीप

कहानी संग्रह - “स्टेपल्ड पर्चियाँ”
लेखिका - प्रगति गुप्ता
प्रकाशक – भारतीय ज्ञानपीठ

प्रगति गुप्ता का कहानी संग्रह “स्टेपल्ड पर्चियाँ” मेरे हाथों में पहुँचना, सात समंदर पार से अपने कथाकार मित्र का भेजा एक नायाब तोहफा मिलना है। प्रगति ने अब तक कई किताबों का सृजन किया है। कई सुप्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ मैं पढ़ती रही हूँ। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित इस संग्रह की हर कहानी को पढ़ते हुए मुझे लगता रहा कि मैं प्रगति के व्यक्तित्व से गहरे तक परिचित हो रही हूँ। एक कथाकार जब किसी भी कथ्य को अपने शब्द देता है तो उसका अपना स्व उसकी समूची कृति में छाया रहता है। इन कहानियों को पढ़ते हुए प्रगति की गहन अनुभूतियों को मैंने उनके शब्दों के जरिए अनुभव किया। प्रगति के लेखन की एक खासियत है कि जितनी तेजी से घटनाएँ बदलती हैं, उतनी ही तेजी से बदलती संवेदनाएँ पाठकों के मन को छूती हैं। रचनाओं की पठनीयता, और कथ्यों की विभिन्नता पाठक को प्रभावित करती है। हर कहानी एक अलग अंदाज़ में प्रारंभ होकर अंत तक अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होती है।

प्रगति गुप्ता
कहानी अदृश्य आवाजों का विसर्जन मेरी पसंदीदा कहानी है। यह बहुत अलग तरह की कहानी है। कहानी में अथाह दर्द और पीड़ा होने के बावजूद इसका सार्थक अंत सुकून से भरा है। मनोभावों को यथार्थ से जोड़कर एक मुकम्मल रचना में बदलती इस कहानी की भाषा ने मुझे बहुत प्रभावित किया। शब्दों का प्रवाह ऐसा है कि भीतर तक पहुँचते हैं। शुरुआत गजब की है। कहानी शुरू करो तो अंत तक बांधे रखती है। “.... नवीन यात्रा की प्रतीक्षा में....” इस वाक्य से कहानी का अंत सकारात्मक होकर पाठक को राहत देता है।

गुम होते क्रेडिट कार्ड्स कहानी कामकाजी स्त्रियों की मजबूरियों को बयान करती है जो वक्त की माँग होते ही अपने काम की प्राथमिकताओं को सूली पर टाँग देती हैं। क्रेडिट कार्ड की तरह इस्तेमाल होना उनकी विवशता है। कहानी में अपनी बेबसी को ढोती उस स्त्री पात्र से हर कामकाजी स्त्री जुड़ जाती है। ऐसा लगता है जैसे यह खुद के जीवन की आपबीती हो। पति की मृत्यु के बाद फिर से खुद को काम से जोड़ने की पुरजोर कोशिश के द्वारा प्रगति के नारी पात्र परिवार के लिए समर्पण के भावों को मजबूत करते हैं।

हंसा दीप
खिलवाड़ कहानी युवा पीढ़ी की भटकन का खूबसूरती से चित्रण करती है। अपनी बेटी के लिए कर्कश होती माँ की व्यथा कथा कुछ ऐसी है कि वह अपनी बेटी को सही रास्ते पर लाने के अथक प्रयास करते हुए भी कामयाब नहीं होती। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद वह कुछ नहीं कर पाती और बेटी को खो देती है। लेकिन तब भी वह कमजोर नहीं पड़ती बल्कि और ज्यादा मजबूत हो जाती है। “परिवार में किसी की भी ज़िंदगी सिर्फ उन्हीं की नहीं होती। सभी की ज़िंदगी का मूल्य एक दूसरे के लिए होता है।” निश्चित ही युवा पीढ़ी को गलत रास्तों पर ले जाती इस तरह की घटनाएँ सामाजिक विसंगतियों को बढ़ा रही हैं, परिवारों की नींव को हिला रही हैं। घर का युवा अगर गलत रास्ते पर है तो माता-पिता और सहोदर भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। हर रिश्ते में दरार आने लगती है। दुख, कटुता, क्षोभ, और ताने-उलाहने संबंधों की धज्जियाँ उड़ा देते हैं।

स्टेपल्ड पर्चियाँ कहानी किताब के शीर्षक को सार्थक करती सशक्त कहानी है। लेखिका कहानी की नारी पात्र की खुद से पहचान कराती हैं- “आज कॉफी के उड़ते धुएँ में सहेजी हुई पर्चियाँ वापिस धुंधली होकर खाली होने लगी थीं। ताकि कुछ नई इबारतें फिर से लिखी जाएँ।”

अपनी सूक्ष्म दृष्टि से रचनात्मकता को शीर्ष तक पहुँचातीं ये रचनाएँ मानवीय रिश्तों की परतें उघाड़ती हैं। लेखिका का यह संग्रह आज की कथा को एक नया आयाम देता है। ये कहानियाँ घटना प्रधान होते हुए भी गहन मानवीय संवेदनाओं को सामने लाती हैं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि प्रगति गुप्ता का यह कहानी संग्रह पाठकों को बेहद पसंद आएगा। मेरी ओर से प्रगति को हार्दिक बधाई व ढेर सारी शुभकामनाएँ।

1 comment :

  1. दिल से बहुत शुक्रिया हंसा। आत्मीय मित्र ही उन रिक्त जगह की भरन बनते है जहाँ उनको सहेजना स्वयं को ऊर्जित करने के लिए जरूरी होता है। तुम्हारे लिए मेरा असीम स्नेह और प्यार।

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