इंसानियत और राष्ट्र-भक्ति की भावना की प्रतिष्ठापन को उद्यत अद्भुत कहानियों का दस्तावेज: रॉकी अहमद सिंह

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com


पुस्तक:
 रॉकी अहमद सिंह (कहानी संग्रह)
लेखक: संजीव जायसवाल संजय
ISBN: 978-93-91797-08-9
पृष्ठ: 152
मूल्य: ₹ 380.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली


हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में 56 कृतियों के सृजनकर्त्ता, प्रबुद्ध साहित्यकार् श्री संजीव जायसवाल संजय, जिनकी कई पुस्तकों का 155 से भी अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, का नया कहानी संग्रह रॉकी अहमद सिंह अपने अन्दर जीवन में सकारात्मकता की पक्षधरता करती हुई 12 कहानियों को समाहित किए हुए है।
संग्रह की पहली कहानी ‘उसकी रोटी’ है जो यह सिद्ध करने में पूर्ण सफल हुई है कि संसार की सारी धन-संपदा भी भूख के आगे तुच्छ है।

अपने माता-पिता से बिछुड़ गया बालक भूख से व्याकुल अवस्था में एक ठेकेदार के हाथों पड़कर क्षुधा तृप्ति के आश्वासन के बाद बारात में अप्पू हाथी का चोगा पहनकर मनोरंजन करता है किन्तु भूख की व्याकुलता बार-बार उसे अपने साथियों से यह पूछने पर विवश करती है कि उसे रोटी कब मिलेगी।

काफी लोग खाना खाने जा चुके थे, बचे-खुचे आधा घंटे में निबट जायेंगे। उसने हिसाब लगाया। उसके बाद वह दुनिया की सबसे बड़ी आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है। इधर-उधर देखते हुए वह एक बार फिर खाने के पाँडाल की ओर बढ़ने लगा। वहाँ अभी भी उतना खाना बचा था कि वह सालभर खाए तब भी खत्म न हो किन्तु उसे तो सिर्फ दो रोटियाँ ही चाहिए थीं। (पृष्ठ-17)

किन्तु क्या उसे दो रोटी मिलीं? कहानीकार ने बड़ी ही मार्मिकता से कहानी का अंत किया है।


दिनेश पाठक ‘शशि’
स्ंग्रह की दूसरी कहानी, गुनाह, जाति-धर्म से परे देश-भक्ति को सर्वोपरि सिद्ध करती हुई कहानी है।
रजिया और रजनी, दो शरीर एक जान, जिस बस से लौट रही थीं आतंकवादियों ने उस बस के यात्रियों को धर्म और जाति के आधार पर गोलियों से भून दिया। रजनी को भी उसकी अस्मत लूटने के बाद मारकर फैंक दिया तो रजिया ने आतंकवादियों के कमाण्डर के कंधे पर नाखूनों से घाव कर दिया।

रजिया का निकाह जिस व्यक्ति से हुआ, वह आतंकियों का वही कमाण्डर निकला जिसने रजनी की इज्जत लूटी और खून किया और बस के निर्दोष यात्रियों को भून डाला था। रजिया का खून खौल उठा। उसने सुहागरात को अपने शौहर के सो जाने पर उसके लैपटाप को खोला और उसकी अनेक आतंकवादी गतिविधियों व योजनाओं के बारे में जान लिया। रजिया ने बिना देर किए इसकी सूचना ईमेल से तुरन्त पुलिस अधिकारियों तथा गृह मंत्रालय, आर्मी हैड क्वाटर आदि को दे दी। कहानीकार ने जहाँ कहानी को धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत बनाया है वहीं होटल की बारहवीं मंजिल से गिरने के बावजूद रजिया का जीवित बच जाना दिखाकर अतिशयोक्तिपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किया है।

संजीव जायसवाल संजय
रॉकी अहमद सिंह, संग्रह की तीसरी कहानी है। कहानी का नायक रॉकी अहमद सिंह एक वेश्या-पुत्र है। उसका यह नाम रॉकी अहमद सिंह कैसे पड़ा, कहानीकार ने विस्तृत रूप से बताया है किन्तु कहानी की जो मूल आत्मा है वह देश-भक्ति की भावना को सर्वोपरि सिद्ध करना ही है।

संग्रह की चौथी कहानी- ‘क्रान्ति शुरू होती है,, छठवी कहानी- कर्ज, सातवीं-  प्रतिशोध, दसवीं कहानी- व्हाइट मेलिंग, ग्यारहवीं- मंजिल के करीब और बारहवीं कहानी- सूरज की पहली किरण ऐसी कहानियाँ हैं जिनका स्वर कई क्षेत्रों में पुरुष वर्ग द्वारा नारी के शोषण को, नारी के सत्यम्, शिवम् सुन्दरम् रूप सहित सशक्तीकरण को और नारी सुचिता की पक्षधरता करता नजर आता है।

विगत काल में नारी और दलितों पर हुए अत्याचारों की पराकाष्ठा और इसके अन्त हेतु विगुल बजाती, क्रान्ति का शंखनाद करती कहानी- ‘क्रान्ति शुरू होती है’ की नायिका, गाँव के गरीब सोहन की थोड़ी पढ़ी-लिखी रूपवती पत्नी दुलारी पर ठाकुर साहब का दिल फिदा हुआ तो उन्होंने दुलारी को हथियाने के लिए अनेक अत्याचार कर डाले।

"जिस गाँव की गलियों में वह घूंघट काढ़कर चलने में भी शर्माती थी उन्हीं गलियों मे आज वह निर्वस्त्र दौड़ी चली जा रही थी। कोई देख लेगा इसकी चिंता करने की उसे फुर्सत नहीं थी। (पृष्ठ-51)

राजनीतिज्ञ वोट प्राप्त करने के लिए भले ही जाति-पाति की दुहाई देते हों किन्तु शोषण करने के मामले में सबकी एक जाति हो जाती है। अपनी जाति के विधायक से दुलारी ने सहायता की कामना की तो उसने भी दुलारी का उपभोग ही किया।

"दुलारी बार-बार अपनी जाति की दुहाई देती रही। मूर्ख को मालूम न था कि जाति सिर्फ दो ही होती हैं। एक शोषक की, दूसरी शोषित की।.......ठाकुरों के जुल्म तो अनादि काल से सामाजिक विडंबना और कमोवेश स्वीकार्य सत्य थे। उसका आक्रोश तो अपनों के ठाकुरों में परिवर्तित होने की प्रक्रिया के प्रति ज्यादा था। (पृष्ठ-53, 54)

आखिरकार क्षुब्ध दुलारी, नारी जाग्रति का बिगुल बजाने में सफल हो ही गई, "छोटी ठकुराइन आँखें फाड़-फाड़कर अपनी भोली-भाली सास को देख रही थी। क्रान्ति शुरू हो चुकी थी। उसे अब कोई रोक नहीं सकता था। (पृष्ठ-60)

संग्रहह की पाँचवीं और छठी कहानी- ‘तुम नीहारिका नहीं हो’ प्रेम सम्बन्धों में शुचिता को महत्व देती कहानी है तो ‘कर्ज’ कहानी प्रेम सम्बन्धों में शुचिता के साथ-साथ सामर्थ्यवान होने पर ही दुर्बल की सहायता कर पाना सम्भव है को पुष्ट करती है, "लेकिन जरा सोचो, इतने वर्षों में तुमने क्या हासिल किया? इन आदिवासियों की नेता तो तुम बन गईं लेकिन क्या इनकी जिंदगी बदल पाईं? ये आज भी वैसे ही भूखे और अधनंगे हैं जैसे बीस वर्ष पहले थे। (पृष्ठ-90)

डॉ. मीता द्वारा एक डॉक्टर होने के फर्ज को निभाते हुए, प्रतिशोध का अद्भुत और अकल्पनीय तरीका प्रस्तुत करती कहानी है-‘प्रतिशोध’। मौका मिलने पर अपने साथ बुरा करने वाले से बदला लेने के मौके को सामान्यतः कोई भी नहीं चूकना चाहता किन्तु यह जानते हुए भी कि उसकी इज्जत लूटने वाला राणासिंह ही दुर्घटना में घायल मरणासन्न मरीज है तो डॉ. मीता ने उसका इलाज ही नहीं किया अपितु उसके ग्रुप का ब्लड न मिलने पर अपना ब्लड भी दिया।

इंसानियत की पराकाष्ठा तक पहुँचे इस अकल्पनीय प्रतिशोध से राणासिंह भी अचम्भित रह गया।

"कमजोर समझकर जिस नारी के चंद पलों को तुमने रौदा था उसके रक्त के चंद कतरे अब हर पल तुम्हारे स्वाभिमान को रौदते रहेंगे। (पृष्ठ-101)

स्ंग्रह की आठवीं कहानी- ‘आखिरी सलाम’ देश पर शहीद होने वालों को श्रद्धा सुमन अर्पित करती कहानी है। कारगिल युद्ध में शहीद हुए मेजर भवानीसिंह का पाँच वर्ष का पुत्र मोहित जब मिलट्री ड्रेस पहनकर अपने पिता को जयहिन्द बोला तो सभी भावुक हो उठे। देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रेात इस कहानी का ताना-बाना कुछ इस कुशलता से बुना गया है कि सारा दृश्य चलचित्र की भांति प्रत्यक्ष हो उठता है।

संग्रह की नौवी कहानी- ‘बेड़ियाँ एक अलग प्रकार के कथानक पर बुनी गई कहानी है। इस कहानी का कथानक उन अनेक छद्मवेशधारी बाबाओं जिनके चंगुल में आमजन उलझे रहते हुए ठगे जाते हैं, को केन्द्र में रखकर बुना गया है। 

विद्वान कहानीकार श्री संजीव जायसवाल जी ने इस कहानी में अद्भुत तरीके से बाबा की असलियत का खुलासा किया है। मछली पकड़ने के लिए जिस तरह कांटे में आटा लगाकर डाला जाता है, एक भक्त भी स्वामी जी को 1-1 लाख की गड्डियाँ भेंट करके बाबा के 20 करोड़ रुपये लेकर चंपत हो जाता है।

"आपने अपने भक्तों की बेड़ियाँ तोड़ने का कार्य किया है और मैंने आपकी इन बेड़ियों को तोड़ने की छोटी सी चेष्टा की है। आप इसे ‘धंधा अपना-अपना’ भी कह सकते हैं।" (पृष्ठ-118)

परोक्ष रूप से कहानी ईश्वर-भक्ति के नाम पर छद्म बाबाओं की अंधाधुंध कमाई, दूसरों के लिए दिए जाने वाले प्रवचनों पर खुद ही अमल न करने की असलियत और जनता को मूर्ख बनाने की प्रवृत्ति का भी खुलासा करती है ।

‘व्हाइट मेलिग’ संग्रह की दसवीं कहानी है जो अनेकानेक स्कूल-कॉलेजों में शिक्षकों को नियमित न करने तथा उन्हें पूरा वेतन न देकर उनके शोषण किए जाने का खुलासा तो करती ही है, सुन्दर नारी शिक्षिकाओं की नियुक्ति करने के रहस्य पर से भी परदा हटाती है, "इस स्कूल में कोई भी टीचर नियमित नहीं है। पूरी तनख्वाह भी उसी को मिलती है जो देशराज को खुश रखे। बाकियों से दस्तखत पूरे पैसों पर कराये जाते हैं लेकिन पैसे आधे ही दिए जाते हैं"। (पृष्ठ-122)

किन्तु अति महत्वपूर्ण बात जिसका उद्बोधन कहानीकार ने इस कहानी के माध्यम से किया है वह यह कि आज नारी हर क्षेत्र के ऐसे शोषणों का विरोधं करने में पूर्ण रूप से समर्थ है और यह इसलिए कि आज नारी हर क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रही है।

"मेरा चेहरा देखने के बाद लगता है तूने मेरे बायोडाटा को ठीक से नहीं देखा वरना जरूर जान जाता कि मुझे जूडो-कराटे में ब्लैक-बैल्ट हासिल है। (पृष्ठ-125)

इसी प्रकार संग्रह की ग्यारहवीं कहानी‘मंजिल के करीब’ फिल्म उद्योग में होने वाले नारी शोषण को तथा नारी सशक्तीकरण के महत्व को दर्शाती कहानी है।

"आपने मुझे गलत समझा है। मैं कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूँ जो सफलता पाने के लिए गंदे समझौते करूंगी।" (पृष्ठ-137)

"फिल्मी दुनिया की कीचड़ में नहाने आई हो और सती-सावित्री बनने का ढोंग कर रही हो?" (पृष्ठ-138)

बावजूद इसके, फिल्म की हीरोइन, हीरो के दुर्व्यवहार का ऐसा उत्तर देती है कि भविष्य में पूरी जिन्दगी किसी नारी जाति की ओर कुदृष्टि डालने की हिम्मत भी वह न कर पायेगा।

स्ंग्रह की बारहवीं कहानी- ‘सूरज की पहली किरण’ ऐसे दो सहपाठियों अविनिका और अविनास की कहानी है जो विद्यार्थी जीवन में हर प्रतियोगिता में प्रथम आते रहे।

स्ंयोगवश बीस वर्ष बाद उनकी मुलाकात समुद्रतट पर मुंबई में होती है और संयोगवश दोनों रुके हुए भी एक ही होटल की एक ही मंजिल पर। दोनों डिनर एकसाथ अविनिका के कमरे में करना तय करते हैं। बातचीत के दौरान पता चलता है कि जिस लोन के काम से वह पुणे से मुंम्बई आई है उस बैंक का लोन सैंक्शन करना अविनास के हाथ में है।

डिनर के बाद अविनास मित्रता की सीमा के परे जाने का प्रयास करता है जिसे अविनिका सख्ती के साथ ठुकरा देती है-
"नुकसान!"-अविनिका तड़प उठी,-"क्या कर लोगे तुम? ज्यादा से ज्यादा मेरा लोन सैंक्शन नहीं करोगे? मत करो लेकिन उसे स्वीकृत कराने के लिए मैं अपने तन का सौदा नहीं कर सकती।"..... अविनास की जो मूर्ति इतने वर्ष से उसके अन्तर्मन में सुरक्षित थी वह पूरी तरह खंडित हो चुकी थी।......उसकी आँखों से ऑंसुओं की धार बह निकली। (पृष्ठ-150)

अविनिका की पूरी रात दुश्चिंताओं में बीती थी इसलिए सुबह चार बजे ही दरवाजे पर दस्तक सुनकर और दरवाजे पर अपनी मम्मी और अविनास की मम्मी को देखकर चौक जाना स्वाभाविक था।

अविनास की मम्मी की बात सुनकर अविनिका के आश्चर्य का अंत होता है, "बेटा, तुम्हारी ईमानदारी देख अविनास अपना जीवन धन्य मान रहा है।उसने हम दोनों को फोन करके कहा कि मेरी तलाश पूरी हो चुकी है। सुबह सूरज की पहली किरण निकलने से पहले मेरे प्यार का दीपक अविनिका के प्यार की किरणों से प्रज्वलित हो जाना चाहिए। इसलिए मैं पूरी रात चलकर अपने बेटे के लिए तुम्हारा हाथ मांगने आई हूँ। (पृष्ठ-151)

सभी कहानियों में शिल्प की कसावट और अद्भुत भाषा-शैली, कहानीकार की प्रबुद्धता और कहानी कौशल में प्रवीणता को प्रदर्शित करती है। कहानी संग्रह-"रॉकी अहमद सिंह’ का हिन्दी साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा ऐसी पूर्ण आशा है।

2 comments :

  1. बहुत सुंदर, उत्तम समीक्षा हेतु लेखक श्री संजीव जायसवाल जी 'संजय' एवं समीक्षक आदरणीय डॉ दिनेश पाठक'शशि'जी को बहुत बहुत बधाई।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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  2. खूबसूरत पुस्तक की सटीक व सारगर्भित समीक्षा। लेखक व समीक्षक को हार्दिक बधाई।

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