विनय-पत्रिका में भक्ति की सप्त भूमिकाएँ

सुबोध कुमार शांडिल्य

सुबोध कुमार शांडिल्य

भक्तिशास्त्र में शरणागति प्रपत्ति या आत्मनिवेदन की विशेष महत्ता स्थापित की गई है। वस्तुतः ईश्वर के प्रति अनन्य एवं अविरल प्रेम-भाव ही भक्ति की संज्ञा प्राप्त करता है। भक्तिशास्त्र के आचार्यों के अनुसार ईश्वर के प्रति अत्यंत अनुरक्ति या प्रेम को भक्ति कहा जाता है। इन्हीं भक्ति की प्राप्ति हेतु शरणागति या आत्मनिवेदन के सात विभाग किए गए हैं। ये हैं- दीनता, मानमर्षता, भयदर्शन, आश्वासन, भर्त्सना, मनोराज्य तथा विचारणा। इन्हें विनय की सप्त भूमिकाएँ के नाम से भी जाना जाता है। आगे हम तुलसीदास कृत विनय-पत्रिका में उनका अन्वेषण करना चाहेंगे।

1) दीनता - भक्तों द्वारा अपने को तुझ समझना और असफलता का सारा दोष अपने ऊपर लेना दीनता कहलाता है। दूसरे शब्दों में अपने को विकारों से युक्त और भगवान् को सद्गुणों की खान मानते हुए प्रभु की दयालुता, कृपालुता आदि में अटल विश्वास का नाम ही दीनता कहलाता है। तुलसीदास ने विनय-पत्रिका में कहा है – 

‘हे प्रभु! मेरोई सब दोसु।
सीलसिन्धु, कृपालु नाथ अनाथ, आरत-पोसु।।
बेष बचन बिराग मन अघ अवगुननि को कोसु।
राम प्रीटी-प्रतीति पोली, कपट-करतब ठोसु।।
राग-रंग कुसंग ही सों, साधु-संगती रोषु।
चाहत केहरि-जसहिं सेइ सृगाल ज्यों खरगोसू।।
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रामनाम-प्रभाव सुनि तुलसिहुँ परम परितोसु।’
 (विनय-पत्रिका, पद-159)

2) मानमर्षता - अहम् का विसर्जन और विनय के प्रदर्शन का नाम है-मानमर्षता। भक्ति- मार्ग का सबसे बड़ा प्रत्यूह है-अभिमान। अभिमान का त्याग किए बगैर भक्ति का सम्वरण संभव नहीं है। इसीलिए भक्त अभिमान पर विजय प्राप्त करना चाहता है।
तुलसीदास निःसीम निराभिमानता की अभिव्यक्ति में यह भी कहते हैं कि यदि यमराज भी सब कार्यों को छोड़ कर केवल उनके पापों का ही गणना करने का विचार लाएंगे तब भी उन्हें नहीं गिन पाएंगे। यथा-

‘तऊ न मेरे अघ-अवगुन गनिहैं। 
जौ जमराज काज सब परिहरि, इहै ख्याल उर अनिहैं।। 
चलिहैं छूटी पुंज पापिन के, असमंजस जिय जनिहैं। 
देखि खलल अधिकार प्रभू सों, भूरी भलाई भनिहैं।। 
हँसि करिहैं परतीति भक्त की, भक्त-सिरोमनि मनिहैं। 
ज्यों-ज्यों तुलसिदास कोसलपति, अपनायहि पर बनिहैं।।’ 
(विनयपत्रिका, पद-95) 

3) भय-दर्शन - अपने मन को पापों एवं दुष्कर्मों के भयंकर कुपरिणाम दिखला कर उसे प्रभुपाद में लगाने का नाम है भय-दर्शन। मानव का मन कामना, वासना, क्रोध, मद, मत्सर आदि में ही लिपटा रहता है। जब मन समझाने-बुझाने से नहीं मानता है तो उसे भय दिखाकर भगवदोन्मुख करना पड़ता है। गोस्वामी जी संसार की भयंकरता का वर्णन कर मन को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

‘संसार-कांतार अतिघोर, गंभीर, धन गहन तरुकर्म-संकुल, मुरारी।
वासना-बल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निबिड़, विटपाटवी कठिन भारी।।’ 
 (विनयपत्रिका, पद-59)

यह संसार कंटकाकीर्ण है। सर्वत्र ही विघ्न-बाधाएं हैं। परन्तु इस भाव-बाधा से मुक्ति के लिए एक हीं रास्ता है- ईश्वर का वरण करना। यथा-
तुलसीदास भव त्रास हरहु अब, होहु राम अनुकूला रे।
(विनयपत्रिका, पद-189)

4) भर्त्सना - सन्मार्ग पर न चलने पर मन को डांटना-फटकारना ही भर्त्सना कहलाता है। भय दिखाने से भी जब मन अपनी वृत्ति नहीं छोड़ता तब भक्त को अपने मन को डांटने फटकारने की आवश्यकता पड़ जाती है। तुलसीदास मन को फटकार लगाते हुए कहते हैं- ‘अरे मन! मनुष्य जन्म की आयु बीत जाने पर तुझे पछताना पड़ेगा। इसलिए इस दुर्लभ मानव-तन को पाकर कर्म, वचन और ह्रदय से प्रभु के चरण कमलों का भजन कर।

‘मन पछितै हे अवसर बीते।
दुरलभ देह पाइ हरि-पद-भजु, करम बचन अरू ही ते।।
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अब नाथहि अनुरागु, जागु जड़, त्यागु दुरासा जीते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी कहूँ, बिषय-भोग बहु घी ते।।’
(विनयपत्रिका, पद-198)

इसीलिए गोस्वामी जी कहते हैं – 

अरे मन! समस्त जागतिक कामनाओं को छोड़कर तू भगवान् का भजन कर-
‘तुलसीदास हरि भजहि आस तजि, काल-उरग जग खायो।’
(विनयपत्रिका, पद-199)

5) आश्वासन - अपने इष्टदेव के गुणों, उनकी उदारता, शरणागतवत्सलता और रक्षण-शक्ति आदि पर विश्वास रखकर मन को धीरज देना आश्वासन कहलाता है। भक्ति-मार्ग के दो शत्रु हैं - एक भीतर का और दूसरा बाहर का। उन दोनों शत्रुओं को नजरअंदाज कर भक्त मन को आश्वस्त करता है कि प्रभु की कृपा जब तक मुझ पर है तब तक कोई भी शत्रु मुझे पराजित नहीं कर सकता। भक्त जानता है कि कर्म, काल, स्वभाव, क्रोध, लोभ और मोहादि रुपी ग्राह से उसकी रक्षा प्रभु अवश्य करेंगे- 

‘तुलसी समुझि समुझायो मन बार-बार।
अपनो सो नाथ हूँ सो कहि निरबह्यो हौं।।’
(विनयपत्रिका, पद-260)

6) मनोराज्य - अन्तर्मन का यह विश्वास कि मैं प्रभु से जुड़ गया हूँ, प्रभु मेरी रक्षा कर रहा है, मेरे सभी पाप नष्ट हो गए हैं और मैं आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हूँ- ऐसी मनोदशा का नाम मनोराज्य है। इस भूमिका में भक्त बड़े-बड़े हौसले रखता है और भगवान् से निवेदन करता है कि वे उस हौसले को पूर्ण कर दे। गोस्वामी जी भी मनोराज्य की भूमिका में कहते हैं –

‘कबहिं देखाइहौ हरि चरन।
समन सकल क्लेश कलि-मल, सकल मंगल कारण।।
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कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति-हरन।
दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन।।’
(विनयपत्रिका, पद-218)

7) विचारणा - जब साधक का मन स्वयं अंतर्मुखी होकर अपने अन्दर ही अपनी गतिविधियों पर विचार करने लगता है, तब विचारणा का जन्म होता है। इस भूमिका में वह दर्शन के लोक में पहुंचकर जीवात्मा और परमात्मा संबंधी अनेकानेक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयत्न करता है। इस स्थिति में वह संसार के असारता, मोहादि विकारों, संबंधों की व्यर्थता आदि पर बार-बार विचार करता है। विचारणा की भूमिका में तुलसीदास अपने मन की कुटिलता और मूढ़ता पर बार-बार विचार करते हैं। यथा-

‘कबहुँ मन विश्राम न मान्यो। 
निसिदिन भ्रमत बिसारि सहज सुख, जहँ-जहँ इंद्रिन तान्यो।।
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तुलसीदास कब तृषा जाय सर खनतहिं जनम सिरान्यो।।’
(विनयपत्रिका, पद-88)

अस्तु कहा जा सकता है की विनय की ये सत्य भूमिकाएँ भगवत-कृपा प्राप्ति के अमोघ साधन हैं। भक्तिशिरोमणी तुलसीदास ने विनय-पत्रिका के माध्यम से प्रभु-पद-पंकज में शरणागति की हीं कामना की है। वास्तव में भगवत-शरणागति से बढ़कर कोई अन्य कल्याण का मार्ग नहीं है। ये सातों भूमिकाएँ प्रपत्ति अथवा शरणागति का अमोघ मंत्र है। तुलसीदास ने विनय-पत्रिका में केवल हरि-कृपा पर ही भरोसा व्यक्त किया है।

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