ग़ज़लें: अभय शुक्ला

ग़ज़ल 1

वहाँ की याद की मिट्टी से हम बचपन बनाते हैं,
हमारे गाँव में घर से बड़ा आँगन बनाते हैं।

बनाओ बादशाहों के लिए पोशाक तुम, हम तो,
किसी के चाक दामन के लिए कतरन बनाते हैं।

यहाँ बच्चों के लब पर नाज़ुकी मिलने नहीं वाली,
यहाँ मजदूर माँ के हाथ इक कोहकन बनाते हैं।

जहाँ बस्ती तुम्हें डूबी मिले तारीक साए में,
वहीं के लोग सारे शह्र को रोशन बनाते हैं।

तरीका है सियासतदाँ का यह झगड़ा लगाने का,
वही पत्थर बनाते हैं, वही दर्पन बनाते हैं।

उन्हीं के पास बहुमत है, अदालत है, वही मुंसिफ़,
चलो देखें किसे रहबर किसे रहज़न बनाते हैं।

हमारे साथ रह सकते नहीं, ना छ़ोड़ सकते हैं,
कभी यह मन बनाते हैं कभी वह मन बनाते हैं।

तुम्हारी गोलियाँ उस बेटी को बेवा बनाती हैं,
जिसे माँ बाप इतने शौक़ से दुल्हन बनाते हैं।

बचा पाए न जो इस्मत वो आँचल हम नहीं सीते,
बदल जाए जो परचम में वही दामन बनाते हैं।

तुम्हारी ख़ुश्बुओं को क़ैद करने की ये कोशिश है,
कि सारे साँप मिल जुल कर तुम्हें चंदन बनाते हैं।
***


ग़ज़ल 2

बँटते रहे जहान में दरियादिली से हम,
अब मर रहे हैं अपने में अपनी कमी से हम।

तुम से मिले थे रोशनी में रोशनी से हम,
वर्ना सभी पे खुलते हैं बस तीरगी से हम।

शायद ये तेरा दोष नहीं मेरा शौक़ है,
तंग आ गए हैं तेरी भी इस दोस्ती से हम।

कैसे भला ये ज़िंदगी ख़ुद को सरल करे,
है मुश्किलों से ज़िंदगी और ज़िंदगी से हम।

जिन के करम से हम को फ़ने शायरी मिला,
रुस्वा उन्हें करेंगे इसी शायरी से हम।

हम ख़ाक हैं मगर किसी ज़िद्दी बदन के हैं,
दोबारा कुछ न बनने के कूज़ागरी से हम।

मशहूर दोनों अपने ही फ़न के लिए हुए,
दीवाना कर ने से थे वो, दीवानगी से हम।

तुम वो ख़ुदा हो जिस की हदें हम से कम रहीं,
हासिल करेंगे क्या ही तेरी बंदगी से हम।

चलना है इस नदी के किनारे से अब हमें,
उठते हैं इस जहान से किस बेदिली से हम।
***


ग़ज़ल 3

तुम्हारे होने से है आस, यास मत जाना,
कहीं न लील ले मुझ को उजास, मत जाना।

शिकस्ता दिल हो अगर, या उदास, मत जाना,
तुम ऐसे हाल में पानी के पास, मत जाना।

ये इम्तिहान है अंतिम, यहाँ से मत लौटो,
यहीं पे टूटती है सब की आस, मत जाना।

अभी सहीह से रुस्वा नहीं हुए हो तुम,
बिना सुने ये मेरा शेरे ख़ास, मत जाना।

तमाम शौक़, सब एहसास, मुझे छोड़ गए,
बस एक तुम हो मेरे पास, प्यास मत जाना।

ये हर्फ़ दिल से कहे हैं, या दिल को रखने को,
लगाऊँ इन से मैं अब क्या कयास, "मत जाना"।

भले सौ ग़म हों, भले लाख हो परेशानी,
यूँ देर रात में घर बे हवास मत जाना।
***


ग़ज़ल 4

उजाले जगमगाने लग गए हैं,
अँधेरे याद आने लग गए हैं।

जनाज़े देख के औरों के घर के,
मुझे कुछ डर सताने लग गए हैं।

नयी मुश्किल सियासतदाँ की ये है,
कि मुर्दे सिर उठाने लग गए हैं।

बने हैं झील के पानी पे चेहरे,
अज़ाब अब याद आने लग गए हैं।

वहाँ आहें भरें वो, और दीपक,
यहाँ पर तिलमिलाने लग गए हैं।

हमारे पाँव पड़ते ही गली के,
अँधेरे झिलमिलाने लग गए हैं।

मैं जैसा हूँ मुझे रहने दो, मुझ को,
ये होने में ज़माने लग गए हैं।

तुम ऐसी स्याह शब में क्यूँ जगे हो,
तुम्हें भी ख़्वाब आने लग गए हैं?

ख़ुशी की धुन जिन्हें गानी थी वो सब,
ग़मों के गीत गाने लग गए हैं।

कई बचपन ग़रीबी खा चुकी है,
कई बच्चे कमाने लग गए हैं।

मेरी मंज़िल तो क़िस्मत तय करेगी,
मुझे रस्ते बुलाने लग गए हैं।

जहाँ पर बैठ कर देखे थे मेले,
जनाज़े में वो शाने लग गए हैं।

उसे मरना ही था, बीमारी ओ ग़म,
तो मरने के बहाने लग गए हैं।

हमें रोको की हम बातों में तुम से,
बहुत बातें बनाने लग गए हैं।

अमीरे शह्र ने देखी जो बस्ती,
वहाँ गिद्ध आने जाने लग गए हैं।

नहीं सँभले रुमूज़े हस्ती हम से,
हम अपना सच बताने लग गए हैं।

मैं जब से आ के बैठा हूँ यहाँ पर,
परिंदे उड़ के जाने लग गए हैं।

मेरे जीते जी कितने लोग मेरा,
बड़ा मातम मनाने लग गए हैं।

हैं शायर हँस, दर्दो ग़म हैं मोती,
हमारे हाथ दाने लग गए हैं।

कई जलते घरों की आँच में हम,
सुख़न अपना भुनाने लग गए हैं।

सँभाल अपनी तबीअत इश्क़, तुझ को,
दिवाने से दिवाने लग गए हैं।

हमारी इश्क़ में हालत है कुछ यूँ,
कि हम सड़कों पे गाने लग गए हैं।

मुसीबत है कि हम माली हैं, गुल पर,
हम अपना हक़ जताने लग गए हैं।

उठाए संग हैं सब ने, इधर हम,
क़लम अपनी उठाने लग गए हैं।
***

दिल्ली विश्वविद्यालय के दीन दयाल उपाध्याय महाविद्यालय में बी. कॉम. (ऑनर्स)  अंतिम (तीसरे) वर्ष के छात्र। भोपाल, इन्दौर, दिल्ली व हैदराबाद आदि नगरों के भिन्न भिन्न मंचों पर प्रस्तुति। साहित्य संबंधी प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय त्वरित शायरी लेखन के विजेता।
निवास: भोपाल (मध्य प्रदेश)
चलभाष: +91 798 786 0730

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