व्यंग्य: तोंद के घेरे में अमेरिकन सपना

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


अमेरिका में कोई पूछे कि वैभव नापने का पैमाना क्या, तो हर विशेषज्ञ पहले अपनी फीस गिनेगा। निवेश विशेषज्ञ कहेगा जमीन-जायदाद, बैंक बैलेंस और स्टॉक मार्केट में लगा धन गिन लो। कितने बुद्धू होते हैं निवेश विशेषज्ञ, कागजी संपत्ति को वैभव मानते हैं। जबकि असली वैभव तो छुपा कर रखा दो नंबर का धन है, हीरे-जवाहरात, बिटकॉइन, ऑफशोर अघोषित खाते, घड़ियों और बिस्कुटों में लगा धन है। टैक्स विशेषज्ञ जो अरबपति को दिवालिया बताकर कई मिलियन डॉलर टैक्स रिफंड दिला देते हैं, वे कभी सही वैभव नहीं बता पाएँगे। किसी प्रोफेसर से पूछेंगे तो वह हक्का-बक्का होकर ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में परिभाषा ढूँढने लगेगा। किसी सीनेटर या राजनेता से इसका जिक्र भी नहीं कीजिएगा, अन्यथा वे हर काम के लिए चंदा माँगने आ जाएँगे। यदि किसी इंजीनियर से पूछेंगे तो वह ट्रेसिंग पेपर पर वैभव का नक्शा खींच देगा। दरअसल, अमेरिकन अक्सर गलत लोगों से सलाह लेते हैं। हाइड्रोजन बम खुद बनाते हैं पर संदेह में इराक को ठोक आते हैं। वायरस चीन में बनता है पर सबसे ज्यादा मरने वाले अमेरिकन होते हैं। कारण वही, सही मुद्दे के लिए गलत सलाहकार।

मेरी समझ के अनुसार, वैभव नापने का सही विशेषज्ञ डॉक्टर होता है। वह अपना फीता निकालता है, दर्जी जैसे तोंद का घेरा नापता है और हँसते हुए कहता है- “मिस्टर जैन, आपके दिमाग से ज्यादा आपकी तोंद बड़ी है। दिमाग खाली है लेकिन तोंद ठसाठस। अमीर लोग ऐसे ही होते हैं।” डॉक्टर दावे से कहता है कि तोंद वैभव का प्रतीक है। जितनी बड़ी तोंद उतना धनी आदमी। अमीरी खुशी लाती है, साथ में कोलेस्ट्रोल, बी.पी. और शुगर बोनस में मिल जाते हैं। तब अमेरिकन ‘रिच’ की बजाय ‘सुपर रिच’ माना जाता है। आदमी अमेरिका आता ही इसलिए है कि वह खूब पैसा कमाए और अपनी तोंद में डालता जाए। तोंद ऊपर उठती है तो खुशी के बैरोमीटर का पारा भी ऊपर उठता है।

अमेरिकनों की तोंद को लेकर जो आँकड़े हैं उन्हें राष्ट्रहित में गोपनीय रखे जाने का विधान है। सरकार तोंद के आधार पर ग्रीन कार्ड देने का नियम नहीं बनाती, अन्यथा ग्रीन कार्ड पाने के चक्कर में जो लोग आधी जिंदगी मर-मर कर जीते वे सब यकायक तोंदियल हो जाते। तोंदियल होना ठेठ अमेरिकी नागरिकों का अधिकार है। मेरे मित्र ट्रंपलाल ने कई वर्षों तक “अमेरिकन नागरिकता और तोंद में सहसंबंध” विषय पर रिसर्च की। उन्होंने पाया कि अमेरिकी नागरिक बनने के पहले आप्रवासी बहुत मेहनत करता है। दिन-रात चीज़ पीज़ा खाता है, आइसक्रीम ठोकता है और डबल-डबल क्रीम वाली कॉफी या कोक पीता है। लोग दिन-रात पीज़ा खाते हैं और अमेरिकन ड्रीम देखते हैं। वे दिन में पच्चीस घंटे रोज काम करते हैं फिर भी उनके मध्य भाग का आयतन बढ़ जाता है। उन्हें एक ही बात मालूम है “टाइम इज़ मनी”। ट्रंपलाल ने पाया कि ऐसे लोगों की पिचकी तोंद धीरे-धीरे फूलने लगती है और जब मेडिकल टेस्ट में डॉक्टर का फीता तोंद से छोटा पड़ जाता है तो प्रार्थी की अमेरिकन नागरिकता पक्की हो जाती है। नागरिकता मिलते ही पेंटें टाइट हो जाती हैं और ब्लेजर के बटन खुल जाते हैं। यदि चिकित्सा विज्ञान अनुमति देता तो तोंद के कारण कई अमेरिकी पुरुष ‘गर्भवता’ मान लिए जाते।

मैंने ट्रंपलाल से पूछा कि आम अमेरिकन तोंदियल होता है, इस बारे में एफबीआई वालों की क्या राय है। वह ठहाका मारकर हँसने लगा, बोला- एफबीआई एक बात जानती है, दुनिया भर में दादागिरी करना हो तो शक्तिशाली नागरिक चाहिए। नागरिक खाते-पीते घर के लगें तो देश संपन्न लगता है। आम नागरिक तोंदियल दिखें तो कोई भी मान सकता है कि अमेरिका ‘सुपर रिच’ देश है। यहाँ के जो नागरिक वैज्ञानिक, खिलाड़ी, ऑस्कर विजेता या नोबेल विनर होते हैं वे प्रतिभाशाली माने जा सकते हैं पर बिना चर्बी चढ़ाये उन्हें सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। वे राष्ट्र की खातिर अपनी चर्बी बढ़ाते हैं और तोंद का विकास करते हैं। मैं समझता था कि तोंदियल बनते नहीं पैदा होते हैं, पर अमेरिकनों को देख कर यह धारणा बदल जाती है। वे तोंदियल बन कर तोंद पर हाथ नहीं फेरते, वे बड़े बैंकों और छोटे देशों पर हाथ फेर जाते हैं। इनलैंड रेवेन्यू विभाग, आयकर जाँच के मामले करदाता की तोंद के हिसाब से तय कर देता है।

अमेरिका में हर ओर विकास ही विकास है। किसी चीज की कमी नहीं। एक वस्तु माँगो तो तीन मिल जाती है, ‘बाय वन गेट थ्री फ्री’। किसी रेस्टोरेंट में जाकर देखना, अमेरिकन जितना खाते हैं उससे ज्यादा प्लेटों में झूठा छोड़ जाते हैं। अमीरी ऐसे बताई जाती है। दुनिया की एक तिहाई आबादी कुपोषित और भूखी है तो इसमें सुपोषितों का क्या दोष! वे एक दिन में जितना मक्खन और चीज़ खाते हैं गरीब देश के लोग उसमें सात दिन निकाल दें। अमेरिकनों को जूते पहनने का इतना शौक है कि एक अमेरिकन औसतन पंद्रह-बीस जोड़ी जूते रखता है गोया वक्त-जरूरत वह जूते खा सके। उसके कपड़ों का क्लोजेट ऐसा भरा लगता है जैसे वह कस्बे का रेडीमेड स्टोर हो। उसका फ्रिज और फ्रीजर इंच-इंच ऐसे भरे होते हैं कि एक-दो महीने किराने की दुकानें बंद हो जाएँ तो भी खाने-पीने की चीजें खत्म नहीं हों। प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका में गरीब नहीं है? गरीब हैं तो सही, पर वे दुनिया को बताने के लिए थोड़े ही हैं। अमेरिकन भीख देने के मामले में उदार नहीं हैं। सड़क पर कोई हाथ फैलाए गरीब दिख जाए तो पुलिस इसे देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेती है और उसे अपने साथ ले जाती है।

अमेरिका में हर चीज की बहुतायत है। सरकार एटम बम और हथियारों के जखीरे गरीब मुल्कों को दान कर सकती है, पर आम अमेरिकन अपने ‘सरप्लस’ का क्या करें? फिर इनका तोंद से क्या संबंध? पाठको, अमेरिकनों के पास इतना है कि उसे ठीक से भरने की जगह नहीं है। जगह बन जाए तो टाइम नहीं है। वे तो खा-पीकर चीजें अपने अंदर भरना जानते हैं, जिसे बाहर करने में काफी कठिनाई आती है। उनका टाइम तत्काल मनी में बदल जाता है। पैसा और चीजें जाएँ तो जाएँ कहाँ। ये सब सीधे तोंद में जा बसती हैं। युवा अमेरिकन स्वास्थ्य के प्रति सतर्क हो रहे हैं, उन्हें एक ही सुझाव दूँगा। अपनी तोंद का घेरा बढ़ाओ, अपना अमेरिकन ड्रीम पूरा करो और अमेरिका को समृद्ध बनाओ।


2 comments :

  1. बहुत सुंदर चित्रण किया है आपने अमरीका और अमरीकनों के गुणों :) का। आनंद आ गया।

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  2. बहुत सुंदर चित्रण किया है आपने अमरीका और अमरीकनों के गुणों :) का। आनंद आ गया।

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