भानगढ़

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

आप देश के किसी भी कॉफी हाउस में चले जाएँ, आपका स्वागत शोर करेगा। शोर पहचान है कॉफी हाउस की। मानो लोगों की दिलचस्पी कॉफी पीने से ज़्यादह शोर मचाने में है। पर ऐसा है नहीं। लोग कॉफी पीने आते हैं लेकिन कॉफी हाउस का माहौल कुछ ऐसा होता है कि वो बहस के लिए मजबूर हो जाते हैं। मुद्दा राजनीति हो, ग्लोबल वार्मिंग हो, चीन-पाकिस्तान हो, आणविक हथियार हों या कुछ और, बहस के लिए काफी है। बहस तो बहस होती है। बहस करेंगे तो आवाज़ ऊँची होगी! नतीज़ा - शोर।
सर्दी के मौसम में गर्मा–गर्म कॉफी का प्याला और कामता प्रसाद जी के रोमांचकारी किस्सों का साथ जन्नत का मज़ा दिला देता है। एक छोटे से शहर से एक अनजान महानगर में आए अल्हड़ नौजवान को कामता प्रसाद जी ने ही लखनऊ के तौर-तरीके सिखाए थे। यहीं, इसी कॉफी हाउस में। कामता प्रसाद जी हमारे दादा की उम्र के हैं, पर हमारे दोस्त हैं। हँसिये मत, ये हक़ीकत है। हर दिन उनके साथ कॉफी हाउस आते-आते हम भी, उनकी तरह, कॉफी हाउस का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। 
उस दिन, कर्णभेदी शोर को चीरती हुई एक आवाज़ गूँजी, “क्या बेकार की बात कर रहे हो। भूत-वूत कुछ नहीं होते। सिर्फ वहम होता है मन का।“ कामता प्रसाद जी की निगाहें उठीं इस आवाज़ के मालिक को देखने के लिए। हमारी कैसे पीछे रह सकती थीं। आवाज़ बराबर वाली मेज़ से आ रही थी जहाँ छरहरी मजबूत काठी, अधेड़ आयु की तरफ इशारा करते घने घुँघराले खिचड़ी बाल, बड़ी-बड़ी आँखों पर मोटा चश्मा, आत्मविश्वास से भरपूर, गोरा चेहरा लिए एक सज्जन विराजमान थे। ऐसा व्यक्तित्व एक ज्ञानी पुरुष का ही हो सकता था। उनके दाहिने हाथ एक नौजवान बैठा था जो और भी ऊँची आवाज़ में बोला, “कैसे नहीं होते? होते हैं जी। बचपन से हमारे बुज़ुर्ग बताते आए हैं हमें भूतों के बारे में। बुज़ुर्ग ग़लत थोड़े ही बतायेंगे।”
“नहीं। ग़लत क्यों बतायेंगे आपके बुज़ुर्ग।”
“तो फिर मानते हैं आप कि भूत होते हैं?” नवयुवक की आवाज़ में जीत की खनक थी।    
 “अच्छा, आपके ये बुज़ुर्ग, जिनके मुताबिक भूत-प्रेत होते हैं, कभी खुद किसी भूत से रूबरू हुए हैं?” उत्तर देने के स्थान पर ज्ञानी पुरुष ने प्रश्न किया।
“और क्या। अपने तजुर्बे से ही तो बताया उन्होंने हमें।“ नवयुवक की आवाज़ में अब पहले जितना आत्मविश्वास नहीं था। 
“उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद भूत देखे?” 
“गुस्ताखी माफ, क्या मैं आप लोगों की गुफ्तगू में शरीक हो सकता हूँ?” कामता प्रसाद जी उनकी तरफ मुखातिब हो कर बोले।  
बगलें झाँकने की तय्यारी करते नवयुवक को साहिल मिल गया था। कृतज्ञ आँखों से उसने कामता प्रसाद जी को मौन धन्यवाद दिया। उसके प्रतिद्वंदी के हाथ के इशारे को इजाज़त मान कर कामता प्रसाद जी ने खालिस लखनवी अन्दाज़ में सलाम करते हुए बताया, “बन्दे को कामता प्रसाद कहते हैं। और ये हैं हमारे अजीज़ अजय, हापुड़ से आते हैं।”
सामने वाले ने सलाम का जवाब सलाम से देते हुए बताया, “जी मैं राजेश। और ये हैं गोपाल और ओम।“
राजेश की तरह ओम भी अधेड़ अवस्था में प्रवेश कर चुके थे। पर राजेश की तरह छरहरा और मज़बूत शरीर नहीं था उनका। थुलथुल शरीर और मोटी तोंद चुग़ली कर रहे थे कि वो अमीनाबाद में कपड़े की दूकान की गद्दी सम्भालते हैं।  
“तो राजेश जी, भूत-प्रेत में यक़ीन नहीं है आपका?” कामता प्रसाद जी ने पूछा।  
“कैसे हो सकता है? कोई सबूत भी तो हो। मुझे आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जिसने भूत देखा हो।“ 
“अच्छा, तो आज देख लीजिए।”
“आप!” आश्चर्य से राजेश की आँखें फैल गईं। “आपने भूत देखा है!?”
“भूत तो नहीं पर उसका भाई-बन्द जिन्न ज़रूर देखा है।”
अजय समझ गया कि कामता प्रसाद जी अब ‘जिन्न बाबा’ (1) वाला किस्सा सुनायेंगे। यही हुआ। बड़े ध्यान से सुनता रहा राजेश कामता प्रसाद जी को। अविश्वास उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था। कुछ मिनट में अविश्वास के साथ हैरानी भी दिखने लगी। जब कामता प्रसाद जी ने अन्धेरी कोठरी में पैर पटकते हुए जिन्न साहब का हाथ सिर पर महसूस करने वाला हिस्सा बयान किया तो राजेश की हवाईयाँ उड़ गईं। किस्सा खत्म होने के बाद कुछ देर राजेश शून्य में ताकता रहा। उसके दिमाग़ में विश्वास और अविश्वास के बीच जँग चल रही है। वो तय नहीं कर पा रहा था कि कामता प्रसाद जी ने वास्तव में जिन्न देखा था या ये उनकी कल्पना थी। अन्त में उसने मुँह खोला और बोला, “बहुत खूब। अच्छी कहानी है। दरअसल आपने जिन्न नहीं देखा। जिन्न बाबा ने ऐसा माहोल बनाया कि आपको लगा आप जिन्न देख रहे हैं।“
कामता प्रसाद जी ने राजेश की बात को हल्के में लिया। धीरे से हँस कर बोले, “अपने सिर पर जिन्न का हाथ महसूस किया था हमने। क्या वो भी कल्पना थी?’
“नहीं, कोरी कल्पना तो नहीं पर बाबा ने आपको सम्मोहित कर दिया होगा। ऐसा अक्सर होता है।”
“और जो साल खत्म होते-होते हमें अपनी खोई हुई जायदाद मिल गई, उसका क्या? क्या ऐसा भी अक्सर होता है?”
“ये एक इत्तफाक था जिसकी वजह से आपको जिन्न पर पूरा यकीन हो गया।”
“अच्छा, तो दुनिया भर में जो भूतिया जगह मशहूर हैं वो सब वहम हैं। टावर ऑफ लॅंडन, जमैका का रोज़ हॉल, जापान का आओकिगाहरा फॉरेस्ट जैसी अनगिनत जगहों का क्या जो दुनिया भर में भूतिया के नाम से मशहूर हैं?” कामता प्रसाद जी आवेश में बोले जा रहे थे, “और इतनी दूर की बात क्यों? अपने करीब में भानगढ़ को लीजिए...”
“अरे छोड़िए साहब। क्या बेकार भूत-प्रेत की बातों को ले बैठे आप लोग।” ओम ने आँख से इशारा करते हुए कामता प्रसाद जी को रोकने की कोशिश की।  
इन्सान की जुबान तेज रफ्तार से चलती गाड़ी की तरह होती है। ब्रेक लगाने के बाद कुछ दूर चल के ही रुकती है। इससे पहले कि कामता प्रसाद जी ओम का इशारा समझ कर अपनी जुबान को लगाम दें, राजेश का चेहरा सफेद पड़ गया। शरीर काँपने लगा। आँखें बन्द हो गईं और उसके मुँह से गों-गों की आवाज़ें निकलने लगीं। ओम ने फुर्ती से राजेश की जेब में हाथ डाला, एक छोटी सी शीशी निकाली और उसमें से एक गोली ज़बरदस्ती राजेश के मुँह में जीभ के नीचे रख दी। हम लोग हैरानी से उन दोनों को देखते रहें। कुछ लम्हों में राजेश का काँपना बन्द हो गया। ओम ने खूनी आँखों से कामता प्रसाद जी को घूरा, उठ कर राजेश को अपनी बाहों का सहारा दिया और धीरे-धीरे बाहर ले गया। विस्मित सा गोपाल दूसरी बाँह सम्भाले था। हम कामता प्रसाद जी का, और कामता प्रसाद जी हमारा, मुँह देखते रह गए।  
पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। चार दिन बाद गोपाल और ओम से फिर मुलाकात हुई। वहीं। कॉफी हाउस में। राजेश नहीं था इस बार। पूछने पर गोपाल ने बताया --
तकरीबन पच्चीस बरस पहले हम चार दोस्त राजस्थान की सैर करने निकले। अलवर पहुँचे तो सुना कि वहाँ से कुछ दूर भानगढ़ नाम का एक भूतिया किला है। अगर कोई रात को किले में रह जाता है तो या तो वो कभी वापस नहीं आता या मरा हुआ पाया जाता है। इसलिए सूरज डूबने के बाद किसी को किले में रुकने नहीं दिया जाता। राजेश ने सुना तो बहुत हँसा। बोला, “बकवास है। भूत-प्रेत, चुड़ैल होते हैं कहीं? बच्चों को डराने के लिए कही जाती हैं ऐसी बातें। अच्छा, चलो इसी बात पर एक रात किले में बिताई जाए।”
सुनी-सुनाई बात पर यकीन हमें भी नहीं था। चाहते हम भी थे एक रात किले में बिताना। पर डर भी रहे थे। क्या पता कुछ सच्चाई हो इसमें। क्यों बेकार खतरा मोल लिया जाये। मना किया हमने राजेश को भी। पर वो नहीं माना। बोला, “बेवकूफ़ हो तुम लोग जो इन चीज़ों पे यकीन करते हो। मैं नहीं करता। तुम लोग अगर डरते हो तो रहने दो। पर कम से कम किला तो देख लो।”
अगले दिन हम किले में थे। साधारण सा था किला। इससे बेहतर कई किले हम देख चुके थे। ये किला सिर्फ भूतों की वजह से मशहूर है। हँसी आई अपने आप पर। बेकार डर रहे थे। चारों दोस्त हँसते-हँसाते, मज़ाक करते, एक दूसरे को डराने की कोशिश करते-करते पूरा किला घूम लिए। सूरज डूबने का टाइम हो रहा था। फाटक की तरफ चलते-चलते अचानक राजेश ठिठक कर खड़ा हो गया। बोला, “तुम लोग जाओ। मैं रुकूँगा। 
भौंचक्के रह गए हम लोग। कहा, “कैसे रुकोगे भाई? गार्ड रुकने देगा?
“इतना बड़ा किला है। गार्ड डाल-डाल मैं पात-पात?” मुसकुराते हुए राजेश बोला। 
“और फाटक पर हम क्या जवाब देंगे जब गार्ड पूछेगा कि चौथा आदमी कहाँ रह गया?”
“नहीं पूछेगा।“ पूरे विश्वास के साथ कहा राजेश ने। 
न जाने क्या सेटिंग थी राजेश की गार्ड के साथ। हमें देख कर उसने लम्बे हाथ से इशारा किया और हम बाहर निकल गए। 
अलवर वापस जाने का सवाल ही नहीं था। तीनों ने पास के एक खण्डहर में घास का बिस्तर बनाया, सूखी लकड़ी बटोर कर अलाव जगाया और इन्तज़ार करने लगे सुबह और राजेश की। देर सुबह तक राजेश नहीं आया तो हम तीनों निकल पड़े राजेश की तलाश में। 
उसे झील कहना तो ग़लत होगा लेकिन किले के पास एक गड्ढे में कभी पानी रहा होगा जो अब सूख कर कीचड़ में बदल गया था। करीब पहुँचे तो लगा कीचड़ में एक आदमी मुँह के बल पड़ा है। नज़दीक जा कर उसे सीधा किया तो चीख निकल गई हम तीनों के मुँह से। वो राजेश था। उसके तन पर कपड़े नहीं थे और वो बेहोश था। होश उड़ गए हमारे। ये क्या हो गया। कैसे हुआ? कैसे निकला होगा रात को बन्द किले से बाहर? फाटक के अलावा और कोई रास्ता तो है नहीं और फाटक हमारे सामने बन्द हो गया था। इसके अलावा शरीर के कपड़े कहाँ चले गए? इन सवालों के जवाब तलाशने का समय नहीं था ये। एक टैक्सी में कुछ टूरिस्ट आए हुए थे। उन्हें मसले की नज़ाकत बताई तो उन्होंने फौरन टैक्सी हमारे हवाले कर दी। साथ में तन ढकने के लिए एक दो तौलिए भी दे दिए।
टैक्सी में सरपट अलवर पहुँचे और राजेश को अस्पताल पहुँचाया। शाम हो गई उसे होश आते-आते। लेकिन ना वो कुछ बोल पा रहा था ना समझ। बस भयभीत आँखों से हर तरफ देख रहा था। तीन दिन रहा वो अस्पताल में लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। उसके पिता खबर पाते ही आ गए थे। चौथे दिन उसे लखनऊ लाकर अस्पताल में दाखिल कराया गया। 
लम्बे इलाज के बाद जब राजेश अस्पताल से घर आया तो परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था। पर खुशी अधिक दिन नहीं रह सकी। पहले वाला स्वच्छन्द राजेश कहीं खो गया था। अब वो अक्सर शून्य में ताकता हुआ गुमसुम सा रहने लगा था। पहले का निडर राजेश अब अकेला रहने से डरता था। हल्की सी आहट पर घबरा कर चारों ओर देखने लगता था। ऐसा लगता था डर उसके दिमाग़ में बस गया है जो उसकी आँखों में झलकने लगा है। डॉक्टर, वैद्य, हकीम, झाड़-फूँक, टोने-टोटके, ओझा, मन्दिर-मजार में मन्नत, क्या नहीं किया उसके माँ-बाप ने? पर राजेश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। आखिरकार एक मनोचिकित्सक की शरण में गए। हफ्ते में तीन दिन एक घण्टा रहता था राजेश। धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार होने लगा। दो साल पानी की तरह पैसा बहाया राजेश के पिता ने और एक दिन मनोचिकित्सक ने कहा कि राजेश ठीक हो गया है। लेकिन इतना ध्यान रखना होगा कि उसके सामने कोई ऐसी बात ना की जाए कि वो उत्तेजित हो जाए। ये भी कि उसके सामने भूल कर भी भानगढ़ का नाम ना लिया जाए।  
आपने देखा ना क्या हाल हुआ उसका जब अपने भानगढ़ का नाम लिया। मैंने कोशिश की थी आपको रोकने की पर कामयाब नहीं हुआ। राजेश अब फिर जाने लगा है मनोचिकित्सक के पास। मेरी गुजारिश है आप लोगों से कि राजेश के सामने भूत-प्रेत-जिन्न का ज़िक्र ना करें। 
इससे पहले कि कामता प्रसाद जी और हम जवाब दे सकें, पीछे से राजेश की आवाज़ गूँजी, “क्या बकवास कर रहे हो ओम! अरे भूत-प्रेत नहीं होते हैं। पागल हैं वो लोग जो उनके नाम से डरते हैं।”

(1) जिन्न बाबा की गाथा सेतु के फरवरी 2020 अंक में प्रकाशित हो चुकी है।

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