कहानी: वेलेन्टाइन्स डे

नीना सिन्हा
“विकी, देख! हमारे सामने वाला फ्लैट गुलजार हो गया!”

“कौन सा फ्लैट?”

“अरे वही, जिसमें बुड्ढे शर्मा अंकल-आंटी रहा करते थे।”

“तुझे कैसे पता इस बार उसमें कोई बुजुर्ग नहीं आये?”

“अरे देख तो विकी! लड़कियों के खूबसूरत कपड़े लटके हैं।”

“हद है यार तू भी! कपड़े खूबसूरत तो पहनने वाली लड़की भी खूबसूरत! यह कैसी गणना हुई?”

“तेरे जैसे दोस्तों से तो दुश्मन ही भले। टैक्सी हड़ताल से मुझे ऑफिस निकलने के लिए देर हुई थी तो मैंने कल सवेरे ही ट्रक से इनकी अनलोडिंग देखी थी।”

“पर मुझे तो कुछ नहीं दिखा, शशि!”

“तेरी जिंदगी कहाँ मेरी तरह रेगिस्तान है, कि अगल-बगल हरियाली और पानी का चश्मा ढूँढता फिरे? ईश्वर की कृपा से तेरे पास बला की खूबसूरत गर्लफ्रेंड है।”

“बहुत हुई तेरी इमोशनल ब्लैकमेलिंग। मुद्दे पर आ! कहना क्या चाहता है? और तेरे दिमाग में क्या खिचड़ी पक रही है? तू पहले बता ही ले, नहीं तो तेरे पेट का दर्द कम नहीं होगा”, कंप्यूटर बंद करते हुए विकी ने कहा, “मैं ऑफिस का काम बाद में निपटा लूंगा।”

“कल दो लड़कियाँ और एक किशोर शिफ्ट हुये हैं, सामने वाले फ्लैट में। दोनों बहने हैं या सहेलियाँ, एक ठीक-ठाक सी है और दूसरी बला की खूबसूरत। सुंदरी मिल जाए तो लाइफ सेट हो जाए।”

पकाऊ कथा से ऊबकर विकी ने कहा, “लग जा बच्चा काम पर, भगवान भली करेंगे।”

कुछ दिनों तक बालकनी में ऑफिस जाने से पहले टँगे रहने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो शशि पूरी तरह चिढ़ गया, “बड़ी घमंडी है यार! अब तक कोई पसंद नहीं आई थी, अब पसंद आई है तो भाव ही नहीं दे रही। पर जो भी हो वैलेंटाइन डे के पहले तो पटा ही लूँगा। इस बार अकेले नहीं मनाना चाहता।”

“जो भी हो, हमारे फ्लैटों के बीच में लंबा फासला है। यहाँ से चिल्ला कर तू उससे बात नहीं कर सकता। यूँ ही रोमियो बन मुँह उठाए घर पहुँच गया और लड़कियों ने शिकायत कर दी तो हमें ही फ्लैट खाली करना पड़ जाएगा। वैसे भी कुँवारों को कोई फ्लैट नहीं देता। बेबात का बखेड़ा मत खड़ा कर देना।”

शशि के चेहरे पर शैतानी मुस्कुराहट उभर आई, “जुगाड़ लगा ली है मैंने। उनके किशोर सर्वेंट से कहा कि ‘महेश हाउसिंग सोसायटी कोऑपरेटिव के सचिव का बेटा हूँ। पिताजी को तुम लोगों की शिफ्टिंग के बाबत बात करनी है। घर में से किसी बड़े का नंबर चाहिए।’  जो नंबर दिया है उसने, स्वभाविक है बड़ी वाली का होगा। नंबर लिया और व्हाट्सएप कनेक्ट कर लिया।”

“तुझे यह कैसे पता कि कौन छोटी है कौन बड़ी?”

“छोटी वाली कमोबेश दो-चार वर्ष छोटी लग रही है। तो, इतना फर्क तो पता चलता है न यार?”

“पागल हो गया है तू! सारी कहानियाँ मन से गढ़े जा रहा है। खुद भी मरेगा, मुझे भी मरवाएगा। आज तक कोई लड़की अच्छी नहीं लगी, और अब लगी है तो बिना आगा-पीछा और पृष्ठभूमि जाने बिना कूदने को तैयार! सर फूटेगा तेरा, कहे देता हूँ। बनाने का वक्त नहीं है अब, खाना ऑर्डर कर दिया है। तेरी कथा के चक्कर में कब देर हो गई पता ही नहीं चला।”

शशि के सब्र का बाँध टूटा जा रहा था। जब वह दफ्तर के लिए चला तो छोटी बहन भी किसी काम से निकली, “कॉलेज या दफ्तर, भगवान जाने?”

व्हाट्सएप पर मैसेज करते हुए वह थोड़ा घबराया हुआ था, पर उस पर काबू पाते हुए खुद के बारे में बताया और मैसेज किया, “मैं आपकी उल्टी दिशा वाले फ्लैट में रहता हूँ। मेरा डीपी देख कर आपने पहचान लिया होगा। आपने डीपी नहीं लगाई!”

“जी नहीं लगाती, आदत नहीं है।”

लड़की ने उसके व्हाट्सएप स्टेटस को देखकर थम्स-अप का इशारा किया था और डीपी की भी तारीफ की, लेकिन उसके ताबड़तोड़ अगले सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।

एक नये दिन की शुरुआत पर आज उसने कुछ मैसेज नहीं किया। दफ़्तर के लिए तैयार होते वक़्त एक निगाह घड़ी की तरफ थी, दूसरी फोन पर। लेकिन नेटवर्क ग़ायब। देश को फोर-जी, फाइव-जी में ले जाओ, पर समय पर कोई जी काम नहीं करता, और न कहीं जी लगता है। क्या हो सकता है, कल पूछे गए प्रश्नों का आज उसने जवाब दिया हो? पर देखूँ तो देखूँ कैसे? उसका जी उचट गया।

मेट्रो में बैठते हुए बस ‘गुड-मॉर्निग’ लिखा था उसने। नज़रें बदस्तूर मोबाइल पर जमी रहीं, प्रतीक्षारत। पहले मैसेज डेलिवर हुआ, पहले एक टिक का निशान, फिर दो नीली धारियाँ...। मैसेज पढ़ लिया है उसने। कल के किसी प्रश्न का तो जवाब नहीं था पर आज के ‘गुड-मॉर्निंग’ पर एक ‘गुड-मॉर्निंग’ आया और साथ ही एक प्रश्न, “माना कि आप सेक्रेटरी के बेटे हैं पर पूरी हाउसिंग सोसाइटी में जितनी भी लड़कियाँ हैं, उन्हें आप इसी तरह मैसेज किया करते हैं या फिर हमें ही?”

“जी ऐसा नहीं है कि मैं सब को मैसेज करता हूँ। मैं अपने झूठ को फाश किया देता हूँ, ‘मैं सेक्रेटरी का बेटा नहीं हूँ।’ आप इतनी अच्छी लगीं कि आपके सर्वेंट से आपका नंबर निकलवाने के लिए मुझे झूठ बोलना पड़ा, माफी चाहता हूँ। जल्द से जल्द मिल कर आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ।”

“सॉरी टू से! इन्हीं परेशानियों के मारे हम पिछली हाउसिंग सोसायटी छोड़कर आए हैं। यहाँ हमें कोई उठापटक नहीं चाहिए। कृपया माफ करें! यह भी बता दूँ कि जो समझ कर आप बात कर रहे हैं, वह मैं नहीं हूँ। दीदी का बालकनी में जाते ही आपका मंडराना, मेरी नजरों से छुपा नहीं है। मेरी दीदी है ही इतनी खूबसूरत। वैसे आप भी अपने आप में शानदार हैं।”

“जी मैं क्या हूँ पता नहीं, पर आज से पहले किसी लड़की को देखकर मेरा दिल यूँ नहीं धड़का। मैं सड़क छाप रोमियो भी नहीं हूँ, मैं आपकी दीदी के साथ साथ जिंदगी भर चलना चाहता हूं। वैलेंटाइन डे करीब है, आपके परिवार वालों की सहमति हुई तो उसी दिन उन्हें प्रपोज कर दूँगा।”

“सब कुछ ठीक होता तो इससे ज्यादा खुशी की बात मेरे लिए कुछ नहीं होती, पर ऐसा है नहीं। एक सड़क दुर्घटना में मेरे माता-पिता नहीं रहे तथा मेरी दीदी की आँखों की रोशनी चली गई। तब मैं हॉस्टल में थी, फाइनल ईयर में, और दीदी जॉब में। घर की जिम्मेदारी मैंने अपने ऊपर ले ली है। अब मैं हूँ अपनी दीदी की वैलेंटाइन। उनकी जिम्मेदारी मैं किसी को नहीं सौंप सकती क्योंकि जिंदगी तीन घंटे की फिल्म नहीं होती कि हीरोइन की टाँगे कट जाए और हीरो उसे गोद में उठाकर सात फेरे लेकर जिंदगी भर साथ निभाने का वादा करे । जिंदगी बहुत लंबी और बेरंग होती है, और अपनों का बोझ कोई अपना ही उठा सकता है।”

उसके बाद कोई मैसेज नहीं आया। शशि सच्चाई जानकर पूरी तरह पसीने से भीग गया। मन ही मन खुद को कोसा, “शारीरिक सुंदरता देख आगे पीछे डोल रहा था और सच्चाई जानते ही जबान तालू से सट गई।”
***

पटना साइंस कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय से जंतु विज्ञान में स्नातकोत्तर। पिछले दो वर्षों से देश के समाचार पत्रों एवं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लघुकथाएँ अनवरत प्रकाशित। निवास: पटना (बिहार)। 
ईपता: maurya.swadeshi@gmail.com 

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