चार हिंदी ग़ज़लें

संदीप राशिनकर
- 1 -

नदी का स्थिर स्वभाव नहीं है
संतुलित कोई बहाव नहीं है।

खतरे इतने घेरे खड़े है
मुमकिन कोई बचाव नहीं है।

लहू हमारा लगा है बहने
कहते हैं कोई घाव नहीं है।

तेज धूप में छाया कैसी
भाग्य में ही पड़ाव नहीं है।

खुशियाँ तो उस पार बहुत हैं
पास हमारे नाव नहीं है।
***


- 2 -

ये कैसा ज़माने का व्यापार है
जो देता दवाएँ वो बीमार है।

बहुत कुछ हूँ मैं कुछ ना होते हुए
ये सब मेरे रब का चमत्कार है।

जो कहते हैं हम है सबके अज़ीज़
खड़ी उनके आँगन में दीवार है।

मधुशाला हो या हो मंदिर कोई
नशा हर जगह है चमत्कार है।

है खुशबू भी रंगत भी संगीत भी
सज़ा सबके चेहरों पर बाज़ार है।

जो सुख शांति के लगाता है चित्र
वो खुद भूख से अपनी बेज़ार है।

वतन पर निछावर जो करते हैं जाँ
मेरा उन सभी को नमस्कार है।
***


- 3 -

बढ रहा सूरज का तेज
पड़ रही धरती निस्तेज।

मिट रही मानव की भूख
अपनी ही देहों को बेच।

अनदेखा कर आज को
संस्कृति को मत सहेज।

कथनी को अपना रहे
करनी से करते परहेज।

छटपटाता हुआ आदमी
खोज रहा मृत्यु की सेज।
***


- 4 -

कहूँ बात सच्ची इज़ाज़त नहीं है
हवा में उड़ाऊँ ये आदत नहीं है।

हमें रोजी रोटी तो देनी पड़ेगी
के हक मांगना तो बग़ावत नहीं है

लगी आग बस्ती हुई राख का ढेर
वो कहते हैं इसमें शरारत नहीं है।

लड़ो दुश्मनों से मरो सरहदों पर
अनीति में मरना शहादत नही है
***

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