कहानी: सरप्राइज़

नीहार गीते
टेलीफोन की लगातार बजती घंटी की आवाज़ सुन रत्नेश ने पाईप छोड़ा, और मोबाइल ढूंढ़ता आवाज की तरफ हो लिया।

"क्या पापा कितनी देर से कॉल कर रहा हूँ, उधर से रोहन बोला।"

"अरे थोड़ा गमलों में पानी देने लग गया था, बोल क्या बात है?"

"परसों उत्तरायण पर क्या प्रोग्राम है, आप लोगों का?" 

"प्रोग्राम क्या घर पर ही तिल-गुड़ कर लेंगे।"

"ओह अच्छा, ठीक है," वह बच निकला, पर रत्नेश के दिल की धधक बढ़ चली। पिछली संक्रांति की ही तो बात है, भैया-भाभी को उसके घर से गए हुए। स्नेह, सम्मान समय कुछ भी तो न दे पाया उन्हें। कैसे भूल गया कि जिंदगी के अकेलेपन में, जिंदगी के अंधेरों में, रिश्ते ही तो झाड़फानूस होते हैं।

वह दिन अब याद आता है जब भाई का उत्साह से भरा फोन आया था। "रतन, उधर आने का मन बन रहा है, आगे तक भी हो आएंगे, सुना है विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति बना डाले हो तुम लोग और, हाँ संक्रांति पर चरखी गड्ढे तैयार रखना।" 

"हाँ दादा!" बचपन की यादों से रत्नेश का भी दिल लहक गया। कई बार बुलाया, कभी बेटे के गृह प्रवेश की पूजा, कभी पोते का जन्मदिन। उन दोनों की व्यस्तताएँ अनेक। पर कोई भी अवसर उनके व्यवहार से ना चूकता। हर त्यौहार, जन्मदिवस, शादी की सालगिरह पर बधाई, उपहार उनकी व्यस्तता न देखते। पिता की तरह छोटे भाई की वे ही संपूर्ण खोज खबर रखते। रत्नेश मस्त मौला, उसकी अपनी रची एक अलग दुनिया थी। उसके अपने लोक थे, पत्नी, बच्चे, ससुराल, मित्र वह उनमें आनंदित रहता। प्राथमिकताओं में सबसे बाद में भाई का परिवार आता था। जब तक माँ थी तब तक भी गाँठ बंधी पड़ी थी, उनके जाने के बाद वह भी खुल गई।

रत्नेश ने पत्नी को पुकारा, "मंगला, भैया-भाभी आ रहे हैं?" 
"अच्छा! कब?"
"अभी थोड़ा समय है, अपनी गाड़ी से ही निकलेंगे।"
"चलो अच्छा है तब तक अपने घर का काम भी पूरा हो जाएगा। उन्हें बता दिया है न?" मंगला ने पूछा।
"अरे हाँ, भाई को तो बताना ही भूल गया।" कई सालों से घर की मरम्मत नहीं हुई थी। छोटी-मोटी टूट-फूट थी। मिस्त्री तीन-चार दिन में सब समेट देने का कह चुका था, "नहीं, अभी नहीं बताया है, सरप्राइज़ रहेगा।" 
"देखो जरा जल्दी निपटाओ, अब सारा घर अटालखाना हो गया है," मंगला ने उठते-उठते कहा।

सच है यूँ तो रत्नेश और बड़े भाई एक ही घर में बहुत ही कम सुविधाओं में पले-बड़े थे, पर उच्च पदस्थ नौकरी की क्षमताओं ने बड़े भाई को काफी सुविधा पसंद बना दिया था, ऊपर से भाभी के ‘सॉफिस्टिकेशन’ का तमंचा हमेशा तना रहता। काम फटाफट निपटाना होगा।

अगले ही दिन रोहन और रजत को सूचित किया कि भैया आ रहे हैं। दोनों बेटे इसी शहर में थे, दोनों ने ही अपनी पसंद से विवाह कर अपना-अपना घरबार अलग-अलग सजा लिया था। एक बेटा इंजीनियर था तो दूसरे का अपना व्यवसाय, दोनों सुखी, खुशहाल जीवन जी रहे थे। बहुएँ मिलनसार थीं, इसलिए उनके अलग होने का दुख जरूर हुआ पर तीज त्यौहार उनसे मिल पाने से मलाल नहीं रहा।

बड़े बेटे रोहन ने सुझाया, "पापा आप दोनों दो-चार दिन यहाँ शिफ्ट हो जाओ। घर को फ्रीली, डे एंड नाइट, वर्कर्स से ठीक कराते हैं।"
"यह भी ठीक है।" पति-पत्नी दोनों ने थोड़ा-थोड़ा सामान लिया और अगले ही दिन रोहन के यहाँ रहने चले गए। उसका घर पास ही था, दोनों ने पहुँचकर हमेशा की तरह उस घर को चमका दिया। अब रत्नेश के सुबह जल्दी घर से निकलने और शाम देर से घर आने का सिलसिला शुरू हुआ। ठेकेदार हँसमुख भाई ने भी अपनी तरफ से सहायता कर कुछ लेबर बढ़ा दी।

आज जब अपने घर पहुँचा तो देखा किचिन की कुछ टाइल्स नीचे धंस गई हैं। हसमुख भाई को कॉल किया, "भाई आ किचन टाइल्सने सुं थयु?"

"बहुत पुराना हो गया है बिल्डिंग। थोड़ा घी डालो आप, देखा कैसा माल तैयार करता हूँ।" उसने पूरी रूपरेखा समझाई, अंत में यह भी कह डाला, "घरना पैसा चार लाख न बधे तो तमारा पैसा पाछा।"

नए प्लान में किचन की मरम्मत की जगह, पूरे किचन को मोड्यूलर बनाना, क्लोस्ड् कैबिनेट्स, एक छोटी सी ‘डाईनिंग-टी’, नई टाईल्स, घर से मेचिंग पेंट, ड्राईंग रूम की दीवाल हटा उसे  किचन से ‘कनेक्ट’ करना आदि शामिल था। टॉयलेट्स के नल भी जंग खा गये थे। सबने सिर जोड़ा, विचार किया और तय हुआ, यही ठीक रहेगा, बार-बार काम खोलना आसान नहीं। "केटलो समय लागशे, हँसमुख भाई?" रत्नेश ने पूछा।

हँसमुख ने आँखें ऊपर-नीचे घुमाई, उंगली पर कुछ गिनती की, सिर खुजाया और बड़ी गंभीरता से कहा, "कितना भी जल्दी करूं, मोटा भाई ते ओछामाँ ओछो छे दिवस बहू समय लेश।"
  
सब ने आँखों-आँखों में एक दूसरे को देखा, अपनी खुशी दबाई और तुरंत हाँ कह दिया। "ठीक छे भाई पण छे दीवसथी बधारे एक दीवस ऊपर ना थाय, मारा भाई-भाभी वर्षों पछी आवे छे," रत्नेश ने कहा।
 
हँसमुख ने अपनी आँखों की चमक छुपाते हुए इतराकर अपने कान पकड़ लिए। छे दिवस, वह मन ही मन हँस पड़ा। चलो ये साल बड़ा काम हो जाएगा। सोचते हुए रत्नेश ने अपना बैंक बैलेंस टटोला! ठीक है चालीस जॉइंट अकाउंट में है। एक लाख का लोन वह एफ.डी. पर उठा लेगा तो सिर्फ एक परसेंट का ही नुकसान होगा। बस ठीक है। उसने बच्चों को आश्वस्त किया। बेटों ने भी राहत की साँस ली।
 
 अब एक समस्या आ पड़ी। काम तीन दिन का बचा है सोच बहू सोनल की माँ और भाभी ने अपना रिजर्वेशन करवा लिया था, फ्लेट छोटा था कैसे होगा? रजत ने तुरंत ऑफर दिया, "पापा हमारे घर चलेंगे।"  
"अरे नहीं," मंगला ने एकदम मना कर दिया, "तेरा घर बहुत दूर है रे बाबा, वहाँ से काम देखने आने में इनको बहुत परेशानी हो जाएगी।"
"तो रोज आना ही क्यों? हँसमुख क्या करेगा? पैसा फोकट ले रहा है क्या?" वह गुस्साया। दूर-दूर करके तुम लोग नहीं आने का बहाना मत लगाया करो।
"अरे नहीं रे," मंगला ने बेटे का मूड ताड़ा और अंततः यही तय हुआ, वे वहीं ‘शिफ्ट’ कर जाएंगे।
काम की ‘स्पीड’ बढ़ चली थी। भाई का भी फोन आ गया था, "बस सब तैयारी है, कार सर्विस में दी है, ओके हो जाए तो निकलें। यहाँ से क्या चाहिए, सोच लेना। तुम्हारा पसंदीदा खट्टा-मीठा मिक्षचर और सोहन पपड़ी तो हम लाएंगे ही। और बता दो इस बार सक्रांति पर धूम करेंगें।"
***

रात रत्नेश को नींद नहीं आ रही थी। मंगला ने लाइट जलाकर कारण पूछा।
 
"कुछ नहीं बस काम जल्दी खत्म हो जाए।" मन में सोचा, इस बार भाई-भाभी रह ही जाएँ। ससुराल वालों की, समधियाने की आवक-जावक के बीच, आते-जाते लोग टोकते, "तुम्हारे भाई-भाभी नहीं आते?" सुबह देर तक सोने वाला रत्नेश, इन दिनों सबसे पहले उठ, खुद चाय बना तैयार हो, अपना झोला टांग निकल पड़ता। मंगला कभी ब्रेड तो कभी पराठे, नाश्ते के लिए साथ रख देती। सामने रहने से काम में फरक पड़ता था। वह खुद जाकर ‘टाईल्स, अन्य फिटिंग्स’ पसंद कर आया था। सुबह का निकला अब रात आठ बजे तक ही घर पहुँच पाता। पर इस सबमें उसे एक अलग आनंद आ रहा था। दुकान-दुकान जाना, नई-नई ऐक्सेसरीज देखना, ठंडी पड़ी जिंदगी में कुछ तो लहर पड़ी। वापसी पर मंगला पूछती, खाने का क्या किया?

वह बताता, "सड़क पार चलता ढ़ाबा है। फ्रेश थाली देता है वहीं खा लिया।" कैसे बताए, कितना सुख था, उन पनीली सब्जियों में भी। खाना खाते समय ही, ये खतम, वो खतम, कल ये ले आना, वो ले आना की आवाज से मुक्ति।

"अच्छा किया, भूखे मत रहना, तुम्हें शुगर है, ध्यान रखना," मंगला ने कहा। 

हाँ, हूँ करते आजकल रत्नेश की कब आँख लग जाती उसे पता ही नहीं चलता। रजत ने काफी समय पहले सत्यनारायण की कथा मानी थी, जो किसी ना किसी कारण वष टलती जा रही थी, अब मां-पिता की उपस्थिति से उसे हौसला हुआ। उसने माँ और पत्नी से बात कर उनकी सहमति जान फौरन पंडित जी से चर्चा की, एक दिन बाद ही शुभ दिन था। पंडित जी ने सामान की सूची पकड़ाई और सुबह नौ बजे का समय तय हो गया। रात रत्नेश को मंगला ने बताया, परसों आप मत जाना, बच्चों ने घर में कथा रखी है।

"यह क्या? मुझसे पूछा क्या?" रत्नेश की त्यौरियाँ चढ़ गईं। 
"अरे, शुभ कार्य में पूछना क्या? एक ही दिन की तो बात है," मंगला बोली। 
"तुम सब जानते हो यहाँ एक-एक दिन मेरे लिए कितना कीमती है, जरा ढील दो तो मजदूर आँख में से काजल निकाल लेते हैं।"
"पापा अभी ताऊ जी आ जाते तब भी क्या आप जाना बंद नहीं करते," बेटे ने ताना मारा। 
"मैं तब भी जाता" ... बस यह एक वाक्य ही उसे खा गया। 

फिर वही हुआ जिसका डर था। हँसमुख का फोन बंद रहना, मजदूरों का कभी अमावस्या कभी त्योहारों का हवाला देकर ना आ पाना। बजट का बढ़ते चले जाना। छह दिन आठ हुए, फिर दस और अब ग्यारहवें दिन भैया के आने का बिगुल भी बज गया। 

अब तो भाई को बताना ही होगा, रत्नेश ने भाई को फोन लगाया। 
सब जान भाई ने बस यही कहा, "पहले बता देता। हमने रास्ते में डाकोर जी रुकने का प्लान बनाया है। वहाँ के रेस्ट-हाउस में दो दिन रिजर्वेशन भी है, फिर तो निकलना होगा। तू ऐसा कर होटल या ‘एअर बी एंड बी’ में बुकिंग डाल दे, भाई का स्वर ढ़ीला था।"

"नहीं-नहीं भैया, हम सब रजत के यहाँ आराम से रह लेंगे, उसका फ्लेट सुविधाजनक है। बस एकाध दिन यहाँ रह, सफाई करवा अपने घर निकल जाएंगे।"
"ठीक है," उनके स्वर में उत्साह की वह तेजी नहीं थी। 
इधर हँसमुख फोन पर वापस आ गया था, "बीमार पड़ गया था साब।"  
"थोड़ा समय आपो, फर्स्ट क्लास काम थशे।"
***

बैल की आवाज नींद में भी सुनाई पड़ रही थी। जब बातचीत की आवाजें आना शुरू हुई तो रत्नेश एकदम उठ बैठा।

"पापा, ताऊजी-ताईजी आ गए हैं," रजत ने आवाज दी। वह उठ खड़ा हुआ, "अरे वाह भाई," उसने ललक के दोनों के पैर छू लिए।

"हम तो सोच रहे थे, तुम नीचे तक तो लेने आओगे," अपना सामान कमरे में रखते हुए उन्होंने कहा, "ये क्या दिन के बारह बजे तक सोए हुए हो।"

"थोड़ा थक गया था भैया, रत्नेश ने टाला। आप दोनों आराम कर लें बस एक-दो दिन में यहाँ से निकल पड़ेंगे।" 
"हाँ छोटे, वर्षों की भागदौड़ से हम दोनों थक गए हैं। तेरी भाभी को कई दिनों से कोई सरप्राइज़ नहीं दिया। आठ दिन बाद ही उसका जन्मदिन है, इस बार सब मिलकर पार्टी करेंगे," वे उस सुख की कल्पना से ही हँस दिए।
"अरे वाह, सच खूब मजा रहेगा," मंगला ने कहा और तुरंत जा अपना सामान टटोल लिया। बहुओं के यहाँ से कुछ ना कुछ आता ही रहता था।

संक्रांत पास आ रही थी, लेबर फिर छुट्टी कर देगी जान बच्चों ने हँसमुख को हड़काया, "संक्रांति पर पूजा राखी छे काम पूरूं करीने आपो।"  

संक्रांति को लेकर उन सबकी अपनी-अपनी स्मृतियाँ थीं। सुबह से खाना ले छत पर पहुँचना, दिनभर पतंगबाजी, दूसरे की कटती डोर की खुशी। फिर शाम लाइन में लग पोंक, पोंक के भजिए उड़ाना। गुजरात में पले-बड़े भाइयों की स्मृतियों में ना जाने कितनी आकृतियाँ झूम रही थीं, उन रंगीन यादों की मिठास भाई के चेहरे पर बिखरी पड़ी थी। आज सुबह से ही भाई संक्रांति को लेकर बेहद उत्साहित थे। वर्षों बाद की ‘फ्रीडम’ ने उन्हें बच्चा बना दिया था। क्या-क्या बनेगा आज सुनकर रजत और हेतल ने एक दूसरे को देखा। वे तो त्योहारों पर बाहर चले जाते हैं या आर्डर कर कुछ मंगा लेते हैं। 

मंगला ने अवसर भाँपा और खिचड़ी चढ़ा दी। तुरंत रत्नेश ने फाफड़ा-कढ़ी, ऊंधियाँ, खीचू बाजार से आर्डर कर दिया। 

तो सुमंत ने तुरंत पैसे उनके हाथ धर दिए, "आज मेरी तरफ से। चलो रत्नेश सब लोग छत पर पतंग उड़ाते हैं। वहीं नाश्ता करेंगे।"

"भैया मकान पर जाना है, काम खत्म होने को है, वो बोला। पेंटर्स को तो आप जानते हैं, निगाहें चूकी कि... आज तो मंगला को भी ले जाना होगा, कुछ सामान एडजस्ट करना है।" 

"तो क्या आज त्यौहार के दिन दोनों चले जाओगे?" उन्होंने पत्नी को देखा, वे दोनों निराश हो गए। 

चलो रजत अपन ही चलते हैं, उनकी यादों को ज्वार-भाटे पड़े थे। यादें जोश मार रही थीं, जवानी में तब आसपास की खचाखच भरी छतों पर कितनी रंगीनियाँ, कितनी कल्पनाएँ उगती थीं। खून नीचे से ऊपर चेहरे तक दौड़ गया।

रजत ने ढ़ीले-ढ़ाले मन से सामान उठाया, कुछ देर उनको छत पर बहलाया और मेहनत की आदत ना होने से थोड़ी ही देर में छत से पसीना-पसीना नीचे आ गया, "ताऊजी एक नक्शा फायनल करना है आज, आप ताई जी को ले जाइये।"

"कोई बात नहीं, चलो सब रत्नेश के पास चलते हैं। वहीं छत पर खाना खाएंगे।" उनके अंदर का बच्चा सोने का नाम नहीं ले रहा था, उधर वे सब अपनी-अपनी व्यस्तताओं में व्यस्त।

"ताऊ जी, आप पापा को फोन कर लो कहाँ हैं, तब तक मैं और हेतल बाजार हो आते हैं, कुछ जरूरी सामान खरीदना है।"

"रत्नेश, कहाँ हो भाई? हम लोग आ रहे हैं, उन्होंने फोन लगाया। नहीं-नहीं भाई मैं पहुँचता हूँ, फिर छककर पतंग उड़ाएंगे और जलेबी खाएंगे।" बैठते-उठते, लेटते दोपहर हो गई। हर उठती-गिरती साँस के साथ दिल की धड़कन बढ़ती गई, पर न रत्नेश आया न बच्चे। पति-पत्नी ने बेमन थोड़ा-थोड़ा थाली में लिया। चलो थोड़ा आराम कर लेते हैं, पत्नी ने संभाला। शाम से रात हो गई। पूरा परिवार साथ ही घर में दाखिल हुआ। 

"देर हो गई भाई। आपकी तरफ से एक शेन्डिलियर पसंद किया है," उनकी उदासी को ‘इग्नोर’ करते हुए रत्नेश ने कहा।

मंगला ने बताया, "भाभी सोनल की मम्मी आ गई थीं वहाँ, परसों सोनल की भाभी का बर्थडे है। बहुत कम लोगों को बुलाया है, डबल ट्री बाय हिल्टन में पार्टी है।"

"अरे वाह, वह तो सुपर प्रॉपर्टी है। आई लव देयर फूड।" उनके अंदर का बच्चा फिर मचल गया। 

सब चुप।

हँसमुख कह रहा था कम से कम छह दिन और लगेंगे। रत्नेश ने बताया। सुनकर बेटे बहू का चेहरा उतर गया। 
अगले दिन तक सुमंत और सरिता को महसूस करा दिया गया कि अब उन्हें वापस चले जाना चाहिए। मंगला ने सुबह होते ही चाय पकड़ाई, पराठे डालें और दोनों निकल पड़े, कपड़े लाने हैं भाभी, एक बार घर तैयार हो जाए। 
अब वे स्थितियाँ स्पष्ट समझ रहे थे, व्यस्तता के बहाने शरीर ना हिलाने की उनकी मंशा। रात दोनों पति-पत्नी ने तय किया, सुबह निकल पड़ना है अब। परिवार को सूचित किया तो रुकने का ठंडा आग्रह आया। उनके मना करते ही सबके माथे के बल ढीले पड़ गए। 
***

आज पाँचवा दिन था यहाँ से वापसी का रास्ता पार कर रहे थे। सुमंत सोच रहे हैं, दुख हो या सुख हमेशा छोटे का साथ दिया। दौड़-दौड़ के भले ही नहीं आए पर अपनी एक धड़कन हमेशा उसकी नब्ज पर रखी। रिश्तों के एकतरफा प्रवाह पर कई बार ताने सुना चुकी पत्नी को उसके साथ जिए बचपन की मासूमियत फिर स्मृतियों की परतों में दबी पड़ी कठोर यादें दिखा न सके।

छोटा भाई कैसे बचपन से ही आत्म केंद्रित रहा। अपने रिश्तों में सेंध न लगने देता दूसरों के बनाए में सुरंग डाल देता। सोचा था उम् के साथ यह निर्लिप्तता कम हुई होगी, पर उसने तो दुख-सुख पूछने दो मिनट का समय तक ना निकाला। उनकी अपनी दो बेटियाँ, दोनों विदेश में सेटल, एक बार पति-पत्नी ने यह ना पूछा भाई आप लोग ठीक तो हो? अकेलापन तो नहीं? पत्नी से जो आजीवन छुपाना चाहा वो ऐसी बेहूदगी से उजागर हो गया। 
***

चलो कहीं चाय नाश्ते को रूकते हैं। पत्नी ने आवाज दी। हाँ-हाँ कह कर उन्होंने गाड़ी धीमी कर दी। 

गुजरात अभी छूटा ना था, दोनों ने टुकड़े-टुकड़े नहीं मन भरकर जलपान किया, पैर सीधे किए और फिर चल पड़े। सरिता सोच रही है, रत्नेश, मंगला, बच्चे तो साल में एक दो चक्कर लगाते ही रहे। जब भी वे आते, नौकरी से वापस आकर थके होने पर भी दौड़-दौड़ कर उनकी आवभगत की है। हर अवसर-बेअवसर रुपयों का टीका किया है। अहमदाबाद के बाजार के तो दूर-दूर तक चर्चे हैं, एक सलवार सूट ही दिलवा देते। कुछ नहीं तो किलो-आधा-किलो नमकीन मीठा ही साथ रख देते। उसे याद आया सास के नहीं रहने पर पति कठिन तपस्या साधे बैठे थे। तेरह दिन कोई प्याज-लहसुन, अला-तला नहीं। देवर की बैचेनी और मांग समझ, धीरे से उन दिनों भी उसने देवर की जिह्वा पूजा की थी।

पति से कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। उनकी ऐसी हालत कि एक शब्द कहा तो भरभरा कर ढ़ह जाऐं। गोरा चेहरा यात्रा की ऐसी दुखद समाप्ति से काला पड़ा हुआ था। रोहन और रजत ऐसे निकलेंगे सोचा ना था, आखिर सुमंत ने चुप्पी तोड़ी! चलो तुम्हारा जन्मदिन हम अच्छी जगह मनाएंगे। 

"रोहन, रजत को क्या बोलते हो? तुम्हारे हमउम् नहीं जो साथ-साथ दौड़े, यह दायित्व तो रतन और मंगला का था।"
 
"तो क्या रोहन, रजत से कोई रिश्ता नहीं, भाई के बेटे हैं वे। अपनी ससुराल वालों से इतने भी रिश्ते नहीं, कि हम लोगों को ‘इनवाईट’ करवा लेते, ऐसा कितना खा लेते हम दोनों?"

"कोई सीक्रेट होगा जिसे शायद हमारे सामने उजागर होने देना नहीं चाहते वे," सरिता ने कहा, "चलो छोड़ो।" दोनों ने दिल पर पत्थर रखा।

सरिता को याद आ रहा है, हर साल पति, कितने भी व्यस्त हों संक्रांति पर मचल जाते। बवाल मचता, क्या-क्या बनेगा? मावा आ गया? तिल्ली धोकर सुखा दी थी? मूंगफली कहाँ से मंगाई? उनके चेहरे पर दिनभर स्मृतियों के रंग उतराते। उनके अंदर के बच्चे को यूँ मरता देख उसे अच्छा नहीं लगा। यह छोटी-छोटी खुशियाँ ही तो इंसान को जिलाए रखती हैं। संक्रांति का यूँ ठंडा हो जाना उसे बिल्कुल ना भाया। फेसबुक, व्हाट्सएप पर जुमलेबाजी, फोटो बाजी करते रिष्तें कितने फीके हो गए हैं आज।

घर करीब आ रहा था। रास्ते से ब्रेड-बटर ले वे जब तक घर पहुँचे अंधेरा हो चुका था। घर खुला था, लक्ष्मण ने दौड़कर सामान उठाया, "चलिए आप लोग फ्रेश हो जायें, तब तक मैं गरम रोटी उतारता हूँ।" हमारा घर उसके भरोसे चलता था।

अपने घर की महक भर ने दोनों को रीचार्ज कर दिया था। सुबह उठकर थोड़ा बगीचे को देख, दोनों ने ‘पेपर’ उठा लिये। समूचे पेपर को, एक-एक लाइन पढ़े बिना ना छोड़ने वाले सुमंत ने अचानक पेपर मोड़ कर रख दिया। सरिता समझ गई, वे भूल नहीं पा रहे।

लोग कहते हैं खून के रिश्ते समय पर दम मारते हैं वह समय कब, कितने बजे आता है, कौन बताएगा? 
***

फोन की बजती घंटी से दोनों की तंद्रा टूटी। बड़ी बेटी थी, "मम्मा-पापा हम लोग अपने नए घर में शिफ्ट करेंगे। वीडियो कॉल पर उसने तुरंत हमें अपने नए घर का वर्चुअल दूर लगवा दिया। दोनों बेटियाँ मिलकर घर जमा रही थीं, वे एक दूसरे से कुछ ही दूरी पर रहती हैं। और हाँ, अब पैकिंग शुरू कीजिए। यू बोथ आर नॉट स्टेइंग अलोन। यहाँ म्यूजिक है, थियेटर है, गार्डन्स हैं, लाइब्रेरीज है। यू पीपल कैन पिक अप एनी हॉबी ऑफ योर्स।"

"प्लीज डेड," छोटी इमोशनल हो आई, "हम चारों ने मिलकर दोनों घरों में आप लोगों के लिए रूम क्रिएट किया है। जितने दिन जहाँ अच्छा लगे, नो रिस्ट्रिक्शन। बस फटाफट वीजा के लिए एप्लाई कीजिए।"

"लो वो समय आ गया, जिसका तुम जिक्र कर रहे थे" कहकर सरिता हँस पड़ी, उसकी बात पर सुमंत भी खिलखिला पड़े।

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