घुमक्कड़ी मेरे जीवन की मूल पूँजी है - राजकिशन नैन

राजकिशन नैन
अशोक बैरागी:
आदरणीय नैन साहिब, आपकी रचनाओं में जहाँ माटी की सोंधी गंध है वहीं फोटोग्राफी भी ग्रामीण परिवेश की सरलता, निश्छलता और सहजता से ओतप्रोत है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि आप इस क्षेत्र में किस प्रेरणा के वशीभूत आए?

 राजकिशन नैन: प्रिय भाई देखिए, लोक में कलाओं का सिलसिला अनंत है। किसी भी कला में पारंगत होने के पीछे कोई न कोई प्रेरणा अवश्य रहती है। हरियाणा के ग्रामीण जीवन और प्रकृति के नजारे मुझे बालपन से ही रुचते रहे हैं। मुझे लगता है कि मेरे लेखन और छायांकन के पीछे भी कोई ईश्वरीय प्रेरणा या पूर्वजन्मों के संस्कार अवश्य रहे होंगे, जिसके कारण यह पुनीत कार्य मेरे बिरसे आ गया है। मैं यह भी मानता हूँ कि विद्या की देवी सरस्वती का मुझ पर कुछ ज्यादा ही अनुग्रह रहा है।

श्रेष्ठ रचनाकार बनने के लिए मैंने बचपन से ही सुख-सुविधा की डगर छोड़कर कंटकाकीर्ण, संकरी एवं कंटीली-पथरीली पगडंडियों पर चलना तय किया। मैंने गँवई अनुभूतियों की ऊष्मा, आत्मिक जिज्ञासा, चिंतन की गहनता, अनुभवों की व्यापकता, कर्म की साधना और सृजनात्मक ऊँचाई के बल पर अपने लेखन और छायांकन को हमेशा एक उदात्त श्रेण्यता प्रदान करने का जतन किया है। दिन-रात की दौड़-धूप भी मेरे लिए खिड़की से आकाश देखने में सहायक सिद्ध हुई है।

गाँव देहात की अक्षय थाती को मैंने बहुत करीब से देखा है। गाँव की अभिभूत करने वाली नैसर्गिक सुषमा की असंख्य सुनहरी यादें आज भी मेरे भीतर जीवित हैं। गाँव की अमराइयों में हर साल उतरती बसंत की उजरी आभा और अमरकुँज में रह-रहकर गूँजती कोयल की कूक को मैं कदापि नहीं भूल पाऊँगा।


अशोक बैरागी
अशोक बैरागी:
नैन जी, आप बड़भागी हैं कि वर्षों तक गाँव को आपने बड़ी शिद्दत से जिया है।

राजकिशन नैन: चलो भाई, तुम ऐसा कहते हो तो ठीक ही होगा। क्या क्या बताऊँ... लालड़ी गन्ने की मिठास और बैल के कोल्हू में पके ताते गुड़ का स्वाद अभी भी मेरी रसना में अक्षुण्य है। मेरी भाभी लीलो, धन्नो और मनभरी के विमल हास-परिहास आज भी मेरे हृदय में शिलालेख की भाँति गड़े हैं। आलतू-फालतू चीजों की फजीहत से बचने के लिए मैंने अपने आप को प्रकृति से जोड़ रखा है। प्रकृति के आँगन में रोजाना पाँच-सात घंटे विचरे बिना मुझे ‘चौ' नहीं पड़ती। यायावरी मेरे खून में रम चुकी है। अभी कल-परसों ही मैं दस दिन तक पुष्कर (अजमेर - राजस्थान) के आसपास के गाँवों की खाक छानकर घर लौटा हूँ।

सच कहूँ तो मेरी दृष्टि में जो गाँव से जुड़ा है, वहीं भारतमाता ग्रामवासिनी का सच्चा सपूत है।


अशोक बैरागी: एक तरफ प्रकृति का खुला एवं विराट आँगन है दूसरी तरफ, क्षितिज के उस पार तक पसरी रंग बिरंगी सम्मोहक दुनिया है। आपको कौन सी चीज ज्यादा खींचती है?

राजकिशन नैन: मुझे प्रकृति का अदना-सा सेवक कह लीजिए। उसी की अनुकंपा से दुनिया में मेरा ठौर-ठिकाना है। प्रकृति के जितने भी आयाम हैं, उन पर लेखन अथवा उनका छायांकन करके मैं अपने को प्रकृति के निकट पाता हूँ। प्रकृति का ओज और माधुर्य मुझे माँ की घुट्टी में मिला है। प्रकृति मेरी आराध्य देवी तो है ही, वह मेरी शिक्षक और सहचरी भी है। इसी कारण मैं दिन-रात उसकी उपासना करता हूँ। प्रकृति की विलक्षण एवं बहुरंगी छटाओं के चित्र उतारने की खातिर ही मैंने कैमरे को कलेजे से लगा रखा है। पंद्रह वर्ष की किशोरावस्था से ही मैंने ग्रामांचलों के सोहन चित्र उतारने शुरू कर दिए थे।


अशोक बैरागी: किसी विषय को कैमरे में पकड़ने के लिए आप कैसी तैयारी और कितना श्रम करते हैं?

राजकिशन नैन: प्रिय भाई, चित्र उतारते समय मेरे शरीर के तीन अंग एक साथ कार्य करते हैं। मेरे हाथ कैमरे का शटर (बटन) दबाते हैं, मेरी आँखें उसकी स्थिति का सही आकलन करती हैं, और हृदय विषय के प्रति आत्मीयता रखता है। इन तीनों की एक लय हो जाने पर ही अच्छा चित्र संभव हो पाता है। अच्छे और कलात्मक चित्रों के लिए मैं सुख-दुख, लाभ-हानि, स्नान-ध्यान, भूख-प्यास, दिन-रात उदय-अस्त और घर-बार की रत्तीभर परवाह किए बगैर प्रकृति के गलियारों में मारा-मारा फिरता हूँ। घुमक्कड़ी मेरे जीवन की मूल पूँजी है।


अशोक बैरागी: नैन साहिब आपने अपने कैमरे के जरिए लोक व्यापी कार्य-कलापों और प्रकृति की अनेक बहुरंगी छवियों को अनेक कोणों से पकड़ा है। क्या कोई ऐसी चीज बाकी है, जिसे आप पकड़ न पाए हों? या आपने प्रकृति की कोई ऐसी खास चीज पकड़ी हो जिसे देखकर आपको स्वयं पर गर्व होता हो?

राजकिशन नैन: देखो भाई, आदमी की सारी इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होती। छायांकन का सिलसिला क्योंकि अनंत और अछोर है। सो बहुत सारी ऐसी चीजें हैं, जिन तक मैं अभी नहीं पहुँच पाया हूँ। मैं आज भी उनकी तलाश में हूँ। नित्य नया सूरज निकलता है और उसकी लाली को देखकर मैं खिल उठता हूँ। कैमरे का चाकर होने के कारण मैं नित्य प्रकृति में विचरता हूँ। मुझ जैसे प्रकृति में रमने वालों को जो दौलत मिलती है, उसकी कीमत कुबेर के खजाने से कहीं बढ़कर है।

यूँ तो समूची प्रकृति अनचिन्हित वैभव से ठसाठस भरी है। प्रकृति के जो विविध आयामी चित्र मैंने उतारे हैं उनमें पक्षियों पर मेरा खास फोकस रहा है। पक्षियों में मेरी आधी जान बसी है। एक-दो नहीं अपितु सैकड़ों पक्षियों की जो खूबसूरत तस्वीरें मैंने अपनी जान जोखिम में डालकर उतारी हैं, वैसी जानदार और शानदार तस्वीरें किसी अन्य पक्षी प्रेमी को भी बड़ी मुश्किल से मिलती हैं। पक्षियों की दैन्दिनी चर्या में बगैर हस्तक्षेप किए उनकी जो सहज स्वाभाविक छवियाँ मैंने पकड़ी हैं, उनसे मुझे अपार सुख मिलता है।   


अशोक बैरागी: नैन साहिब, मैंने आपकी ‘लोक में ऋतु' नामक निबंधात्मक पुस्तक पढ़ी है, जिसमें आपने विभिन्न ऋतुओं के माध्यम से प्रकृति की दिव्यता, भव्यता, उदारता और असीम सौंदर्य को बड़े ही भावपूर्ण ढंग से कलमबद्ध किया है। परंतु आज प्रकृति से जुड़ी तमाम चीजों का स्वरूप कुछ बदला-बदला-सा दिखता है। इसकी क्या वजह है?

 राजकिशन नैन: (हट्टाका लगाते हुए..) हमारे बड़े-बुजुर्ग प्रकृति को पूजते थे, उसके सेवक थे और हमसे सबसे बड़ा अपराध यह हुआ कि हमने उसी प्रकृति की सबसे ज्यादा अवहेलना की है। इस तरह हम खुद अपनी तबाही को न्योत रहे हैं। विज्ञान के शिखर को छूने के बावजूद भी मौसम का मिजाज दिन-ब-दिन बदमजा हो रहा है। तात्कालिक लाभ के लिए हम जिस तीव्रता से प्रकृति को रौंद रहे हैं, प्राकृतिक आपदाएँ उससे कई गुना तेज गति से हमारा विनाश कर रही हैं। प्रकृति को सताकर हम अपने मुख पर कालिख पोत रहे हैं और चाहते हैं कि नित्य फलें-फूलें और सौ शरद देखें। प्रकृति की आत्मा को दुख पहुँचाकर हम सौ बरस भला क्योंकर जिएंगे?

हमारी संस्कृति में क्षणिक लाभ के लिए प्रकृति के दोहन को अधर्म कहा गया है, किंतु हमने पुरखों की सीख को ताक पर रख दिया है। प्रकृति हम पर अब भी सदय है, पर हम उसे मटियामेट करने पर तुले हैं। हमारे पतन की इससे बुरी इंतहा और क्या होगी? मेरे ख्याल से अब हमारा कोई भी प्रयास प्रकृति के विनाश को रोक नहीं सकता। फिर भी हमें प्रकृति का पालन-पोषण सबसे ज्यादा करना चाहिए। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति के बचे- खुचे सौंदर्य का आनंद ले सकें। और उसके आँगन में विचर सकें। अन्यथा बेड़ा तो गरक हो ही चुका है।


अशोक बैरागी: वर्तमान में हमारे आसपास सब तरह की सुख-सुविधाएँ मौजूद हैं। पर एक समय था जब इन सुख-सुविधाओं को जुटाने में सारा जीवन बीत जाता था। आप दोनों समयों में से किसे ठीक समझते हैं?

राजकिशन नैन: (ओ हो...एक लंबी सांस छोड़ते हुए..) देखो, ज्यादा अच्छा तो पुराना समय ही था। जिसमें लालसा का लेश नहीं था और थोड़े में भी सुख था। आज के युग में तो धन-द्रव्य हथियाने के लिए ही सारी आपाधापी है, जिसका कोई अच्छा परिणाम सामने आने वाला नहीं है। मेरे एक मित्र थे- प्राण भाटिया, जो रोहतक से थे, वे पोर्ट्रेट फोटोग्राफी के माहिर थे। वे धन के बारे में यूँ कहा करते कि- “ खूबी ए किस्मत से गर पैसे को कोई खुदा समझे, मैं उसे ठीकरी समझूँ, मुझे ऐसी कनायत दे।" तो मेरा धन से दूर का भी नाता नहीं है। मैं कानी-कौडी के बराबर भी धन की परवाह नहीं करता। मैं समाजहित के काम शिद्दत से कर पाऊँ, यही मेरे लिए बड़ी बात है।

हमारे बड़े-बुजुर्ग ऋतुओं के साथ हिलमिलकर रहते थे इसलिए वे हमसे ज्यादा सुखी थे। वे प्रकृति अथवा ऋतु की उपासना परमतत्व के रूप में करते थे। तथा जीव व प्रकृति को एक समझते थे। प्रकृति से आत्मिक सहचर्य होने के कारण वे हमसे ज्यादा बलिष्ठ और दीर्घजीवी थे। ऋतु विज्ञान और ऋतुचर्या में हमसे बढ़े-चढ़े थे। हमारी ऋतु परंपरा के बारहमासे उन्हीं की देन हैं। अशोक तुम्हीं बताओ, कि सागर, वन, नदी, पर्वत और तारों भरी रात का स्मरण कितनों को है? मेघों संग चपला की आँख मिचोली और सद्य: स्नाता भोर का नूतन उज्ज्वल रूप कितने लोग निहारते हैं? सब खत्म हो गया! अफसोस कि वे चीजें हमारे बड़ों के साथ ही चली गई। वे भूखे-प्यासे रहकर भी खुशहाल थे। उनकी भलमनसाहत के जितने गीत गाए जाएँ, कम हैं। 


अशोक बैरागी: आज के कंप्यूटरीकृत युग में हमारा ऋतु संबंधी ज्ञान अथवा परंपराएँ कितनी सार्थक हैं?

राजकिशन नैन: देखिए, ऋतुएँ प्रासंगिक तो हैं। कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी के अपने फायदे हैं और उनके अपने आयाम हैं। ऋतु संबंधी हमारे रीति-रिवाज उनसे अलग हैं। प्रकृति इनमें कभी दखल नहीं देती। प्रकृति बचेगी तभी तो ये सारी चीजें और दुनिया रहेंगी। क्योंकि जिस तरह की भारी-भरकम मशीनों और तकनीकों का विकास हुआ है, उनने प्रकृति को तबाह कर दिया है। प्रौद्योगिकी की तेज गति ने प्रकृति के फलने-फूलने के सारे स्रोत सुखा दिए हैं। तीव्र प्रौद्योगिक गतिविधियों से और देशज ऊर्जा स्रोतों के अंधाधुंध दोहन से हवा में बढ़ रही कार्बनडाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों से हमारा वायुमंडल तीव्रता से गर्म हो रहा है। हमारे पर्यावरण को बचाने वाले जीवन मूल्य ध्वस्त हो गए हैं। यानी वैश्विक ताप वृद्धि ने गर्मी के रूप में जिन विकट समस्याओं का जखीरा हमें सौंपा है, उनके परिणाम अंततः हमें ही भुगतने पड़ेंगे।

कहने का आशय यह है कि हमारे बडगरों के जो ठेठ देशज रीति-रिवाज थे, वे कुदरती संतुलन बनाकर रखते थे। उन्होंने भौतिक विकास के ऐसे तरीके ईजाद किए थे, जो प्रकृति के अनुकूल थे।


अशोक बैरागी: नैन साहिब, हमारे बड़े-बुजुर्गों के समय खेती-बाड़ी, मौसम और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े अनेक लोकविश्वास रहे हैं। (जैसी आप के दादा इंद्राज, साढ़ के महीने में ‘सोण' लेते थे।) वे सत्य की कसौटी पर खरे उतरते थे। मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि उनके पास ऐसी कौन सी दैवीय शक्ति, प्रतिभा, आध्यात्मिक ज्ञान या फिर अनुभवजन्य कल्पनाएँ थी, जिससे वे इतनी सार्थक और सटीक भविष्यवाणी कर लेते थे?

राजकिशन नैन: एक तो वे माटी से जुड़े हुए लोग थे। वे सीधे सरल परंपरागत तरीके से खेती करते थे और निस्वार्थ भाव से प्रकृति में रमे रहते थे। वे ईश्वर के गीत गाते और सादा खाना खाते थे, परंतु उनके विचार बहुत ऊँचे थे। उनमें कोई अळ-छळ नहीं था। वे अंगूठाटेक होते हुए भी हवा की दिशा, पशु-पक्षियों का व्यवहार और अंबर का रंग देखकर साल भर के मौसम का मिजाज समय रहते ताड़ लेते थे। उनका यह ज्ञान यांत्रिक उपकरणों की बजाय आत्मिक अनुभवों और भीतरी संवेदनाओं से उपजा था। वे चेतना के स्तर पर प्रकट हुए ज्ञान को ही ज्यादा गहन, निर्मल और सूक्ष्म मानते थे। हमारे बड़ों ने प्रकृति में रमकर उससे भली-भांति तादात्मय स्थापित करके यह ज्ञान बटोरा था। इसलिए हमारा आर्ष ऋतु विज्ञान आज भी अधिक समर्थ जीवंत और सुखकर है। हमारे आचार्यों ने दत्तचित्त होकर अपूर्व आंतरिक सिद्धियाँ अर्जित की थी। बड़ों के पास इतना सब कुछ होने के बावजूद भी हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम अपनी ऋतुओं और उसकी निधियों को मटियामेट करने पर आमादा हैं। (ओह!... दुख की गहरी सांस छोड़ते हुए...) पता नहीं भाई, क्या होने वाला है?


अशोक बैरागी: हमारे पूर्वज सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के प्रति एक रागात्मक और आत्मीय संबंध रखते आए हैं। वे चींटी से लेकर हाथी तक और सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, नदी, पहाड़, जंगल आदि के प्रति स्नेह एवं संरक्षण का भाव रखते रहे हैं, जिसे हम ‘वसुधैव कुटुंबकम्' के रूप में जानते हैं। दूसरी ओर, आज सारा विश्व नई तकनीकों और प्रौद्योगिकी के कारण सिमटकर एक गाँव में तब्दील हो गया है, जिसे आज के तथाकथित विद्वान ‘ग्लोबल विलेज' कहते हैं। क्या ये दोनों अवधारणाएँ एक समान हैं या भिन्न-भिन्न?

राजकिशन नैन: इन दोनों अवधारणाओं में दिन-रात का अंतर है। आज सूचना प्रमुख हो गई है। जब सूचना नहीं थी, तब भी समाज यही था। देखिए, मेरे विचार से वैश्विकता ने नुकसान ही किया है। हमारे ऋषि-मुनियों के ‘वसुधैव कुटुंबकम्' के भाव को हमारे बड़े-बुजुर्ग ही समझते थे। वे ही जीते-भोगते और इसे बनाए रखने में सक्षम थे। लेकिन आज समाज में जाति-धर्म और अपने अस्तित्व को लेकर लड़ाई-झगड़े ही बढ़े हैं। (चिंतित होते हैं, फिर...) अब कोरोना को ले लीजिए, यह चीन की देन है, सारी दुनिया इससे उलट-पुलट हो गई। अगर हम ‘वसुधैव कुटुंबकम्' की बात पर कायम रहते तो क्या यह महामारी पूरी दुनिया में फैलती?... कभी नहीं!


अशोक बैरागी: लेकिन नैन साहिब, सुनामी या करोना जैसी घटनाएँ होती हैं तो हम सहायता के लिए तो दौड़ते ही हैं।

राजकिशन नैन: (हल्के से उत्तेजित होकर...) तुम्हारी बात तो ठीक है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आग लगने पर कुआँ खोदने से क्या फायदा? सहयोग और एकीकरण की इस भावना का तभी फायदा है जब ऐसी घटनाएँ घटें ही नहीं।


अशोक बैरागी: आपने सही कहा कि दोनों धारणाएँ अलग-अलग हैं।

राजकिशन नैन: बिल्कुल अलग हैं। वैश्वीकरण की अवधारणा केवल चीजों को बाजारू बनाने तक सीमित है। इसी के चलते आज सारा विश्व एक बाजार बन गया है और सारे देश अपना-अपना माल बेचने को लालायित हैं। दरअसल हम जिस विकासवादी बाजारू अर्थव्यवस्था का अनुसरण आँख मीचकर कर रहे हैं, वह प्रकृति विरोधी है। इसमें प्रकृति की गरिमा और मानवीय महिमा के लिए कोई स्थान नहीं है। हमारे जीवन की डोर अब बाजारू निजाम के पंजों तले है। देशज परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों का सत्यानाश इस वैश्वीकरण ने ही किया है। समाज या भाई-चारे के कल्याण से उसका दूर का भी संबंध नहीं है। इस बाजारू भेड़ चाल ने हमारे तन, मन, प्राण और जीवन को नीरस बना दिया है।


अशोक बैरागी: नैन साहिब, वैश्वीकरण का यह दौर लोकभाषाओं, साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है या इनके विनाश का रास्ता तैयार कर रहा है। यानी आप की निगाह में इन सब का भविष्य क्या है?

राजकिशन नैन: सच बताऊँ, इस वैश्वीकरण ने लोकभाषाओं, साहित्य, समाज कलाओं और देशज धंधों का बेड़ा गरक कर दिया है। राम जाने इसने इन सारी चीजों को कहाँ रसातल में धकेल दिया है। सदियों से गाँव में सब तरह की छोटी-बड़ी कलाएँ और उद्योग धंधे सुचारू थे। गाँव के आदमी को शहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी, उल्टे शहरवासियों को ही गाँव की ज्यादा जरूरत थी। अब हमारी वह ठेठ देशज पहचान खो गई है, हमारे तमाम देशज धंधे खत्म हो गए हैं और हमारा पर्यावरण बिगड़ गया है। इससे बेरोजगारी और दूसरी समस्याएँ बढ़ी हैं। और हमारी लोकभाषाएँ तो रोज मर रही हैं, इन्हें बनाने और बचाने वाले हमारे देशज लोग ही थे। अब उनकी कोई जात नहीं पूछता। संस्कृति या भाषा ही क्यों? किसी भी मामले में गँवई लोगों की कोई बात-जात नहीं पूछी जाती। अब तो अंग्रेजी हम सब पर थोपी जा रही है। हमारे यहाँ अंग्रेजी भाषा की जरूरत ही क्या थी? आज अंग्रेजी से ज्यादा खतरनाक अंग्रेजी मानसिकता है।

पुराने लोग सही कहते थे कि, 'अंग्रेज तो चले गए, अंग्रेजियत छोड़ गए।' अंग्रेजियत के इस मोह ने हमारी लोकभाषाओं, साहित्य व संस्कृति का मटियामेट किया है। जब से हमने कुओं को भुलाया है, तभी से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बोतलबंद पानी का धंधा शुरू कर दिया। बिसलेरी के रूप में पानी का बाजारीकरण हो गया। मशीनी पानी के फेर में हमने घरु कुम्हारों द्वारा निर्मित परंपरिक बर्तनों को भुला दिया। मटके के पानी का स्वाद अमृत तुल्य होता था। इसी कारण कुम्हारों का पुश्तैनी धंधा संकट में पड़ गया है। कुल मिलाकर, हम अपनी उन सब चीजों को पीछे धकेलते जा रहे हैं, जो हमारी स्वस्थ परंपराओं और आदर्श जीवनशैली का अंग थी। यह रवैया किसी भी हालत में उचित नहीं है।


अशोक बैरागी: आजकल हमारे युवा और बच्चे सभी हताश-निराश, दबे-दबे और घुटे-घुटे से रहते हैं। बचपन की जो एक बेफिक्री और अल्हड़ मौज-मस्ती उनके चेहरे पर होती थी, वह अब नहीं दिखती। वे एक यंत्र की भांति एक ही साँचे में ढल कर बस अपने दिन काट रहे हैं। इसके पीछे आप कौन-कौन से कारण मानते हैं?

राजकिशन नैन: उनके बचपन को सुखद बनाने वाली वे सारी चीजें जो उनके आसपास थी, वह सब हमने खत्म कर दी, वे तमाम आयोजन जो उनके जीवन में खिलखिलाहट पैदा करते थे, वे सब उनसे छीन लिए। अब हम नन्हें-नन्हें मासूम बच्चों की पीठ पर बड़ा-सा थैला लादकर उन्हें नर्सरी में भेज देते हैं। जिस उम्र में उन्हें माँ की गोद चाहिए, दादा-दादी का लाड़-प्यार चाहिए, वह उम्र उनकी शहर की भीड़ भरी गलियों में गुम हो गई है। (अत्यंत दुखी होकर...) गई भाई! दादी-नानी की कहानियाँ गई! कितने प्रफुल्लित होते थे बच्चे, उनको सुनकर। उन बेचारों की तो साइत ही चढ़ गई है। अब गलियों में वैसा रेत नहीं रहा, जोहड़-तालाबों में निर्मल पानी नहीं रहा, खेतों में सरसों नहीं फूलती। बच्चों के सारे खेल उनकी पढ़ाई ने छीन लिए हैं। बच्चों को हम राम का रूप कहते हैं, पर हमने उन्हें 'बनिया' बनाने के चक्कर में उनके जीवन को ही दाँव पर लगा दिया है।


अशोक बैरागी: आज आधुनिकता के लोभ में अपनी लोक संस्कृति से विमुख हो रही युवा पीढ़ी को क्या संस्कारित बना जा सकता?   

राजकिशन नैन: (जोर का हट्ठाका लगाते हुए...) देखिए भाई, समाज को आगे बढ़ाने वाले जितने भी संस्कृतिक उपादान थे, हमने उन सबकी तरफ से आँखें मूंद ली हैं। ऐसे में बेचारे युवा क्या करेंगे? वे कहाँ से सीखें-समझेंगे? पश्चिम की देखा-देखी हमने संस्कृति की जड़ें ही काट दी, तो हम उसके फलने -फूलने के सपने क्योंकर देख सकते हैं।


अशोक बैरागी: मतलब, जड़ से उखड़े हुए पौधों को रोकने वाली बात है?

राजकिशन नैन: (उसी लय में बोलते हुए...) हाँ, बिल्कुल। यह हमारा अपराध है। जब हमने अपने आपको अपनी संस्कृति, से प्रकृति से, और परंपराओं तक से अलग कर लिया है तो नई तांदी को हम क्या सिखाएंगे?


अशोक बैरागी: नैन साहिब, अपनी संस्कृति बहुत ही जीवंत और समृद्ध रही है, फिर भी हरियाणवी परिवेश से जुड़ी कोई धमाकेदार फिल्म नहीं आ रही। मेरे कहने का मतलब यह है कि, 'हरफूल जाट जुलानी वाला', 'चंद्रावल' और 'सांझी' सरीखी फिल्में अब नहीं बनती।

राजकिशन नैन: अशोक भाई, सच तो यह है कि हरियाणा में कला फिल्मों को श्रेय चढ़ाने की परंपरा ही नहीं बनी। अभाग्य से हरियाणा में किसी निर्माता ने ऐसी फिल्म बनाने की नहीं सोची, जैसी सत्यजीत रे ने बंगाली लोगों को लेकर बनाई। रे साहिब ने बंगाली समाज के उस ठेठ अक्स को उभारा, जो अब तक अछूता था। हरियाणा में फिल्मों के नाम पर फूहड़ता ज्यादा परोसी गई है। इनका कथानक वास्तविकता से परे है। गीत भी अश्लीलता से भरे हैं, जिन्हें परिवार के सब सदस्य एक साथ बैठकर नहीं देख सकते।


अशोक बैरागी: मैं यही पूछ रहा हूँ कि अपने यहाँ सार्थक सिनेमा क्यों नहीं फल-फूल पाया और देवी शंकर प्रभाकर जी के प्रयासों के विषय में आप क्या कहेंगे?

राजकिशन नैन: हाँ, प्रभाकर जी ने प्रयास करके 'चंद्रावल' फिल्म बढ़िया बनाई थी। बेशक उसका कथानक राजस्थान के गाडिया लुहारों पर केंद्रित था। हरियाणा और उसकी संस्कृति के संबंध में प्रभाकर जी के विचार निश्चय ही श्रेष्ठ और सकारात्मक थे। प्रभाकर जी को हम 'हरियाणवी संस्कृति का पुरोधा' कह सकते हैं। लेकिन अफसोस, उसके बाद सिनेमा से जुड़े लोगों ने उनके विचारों को गंभीरता से नहीं लिया।


अशोक बैरागी: आजकल गली-गली में चवन्नी छाप गायक कलाकार हरियाणवी भाषा व संस्कृति के नाम पर फूहड़ता परोसकर अपराधीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। इनके बारे में आपका क्या कहना है?

राजकिशन नैन: प्रिय भाई, अपने यहाँ गायिकी की ठेठ परंपरा बड़ी ऊँची और निराली थी। लोग दिनभर खेतों में काम करते थे। कोई लामणी करता, कोई हल चलाता और कोई पशु चराता। यानी सबके अपने-अपने धंधे थे। शाम को जब थके-हारे लोग चौपालों और पोळी-दरवाजों में आते तो रात को गीत-संगीत की महफिल जमाते थे। हरियाणा में बांसुरी, सारंगी, बैंजू, घड़वा, डफ, बीन और ढोलक आदि के एक से एक बड़े उस्ताद थे। उनकी गायिकी में मनोरंजन तो था ही, ईश्वर भक्ति से जुड़ी चीजें भी खूब थी। फूहड़ता का उनमें लेश तक नहीं था। आजकल का ये जो नया तामझाम है, सब उधार का है।

आज कोई भी हरियाणवी भूलकर भी चैती, कजरी, टेसू और फगुआ नहीं गाता। “वह किसान मेरे मन को भाए, ईख पीड़कर फगुआ गाए।” जैसे मधुर गीत अब कहीं सुनाई नहीं देते। हमारे पारंपरिक लोकवाद्य कभी के प्रचलन से बाहर हो गए हैं। लाखों की भीड़ में अपनी आबरू को ताक पर रखकर सरेआम ढूँगे मटकाने वाली दो धेल्ले की गायिकाओं ने नोट बटोरने और सस्ती लोकप्रियता पाने के चक्कर में लोक गायिकी की देशज परंपराओं को मिट्टी में मिला दिया है, इसकी जितनी भर्त्सना की जाए, थोड़ी है।


अशोक बैरागी: नैन जी, मैंने कई अन्य लोगों (आजकल के गायकों से) इस बारे में बात की तो उनने कहा कि वे हरियाणवी संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं और समय की मांग यही है।

राजकिशन नैन: (व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए...) अरे! ये कल के रींगटे, जो गीत-संगीत का क.ख.ग. तक नहीं जानते, ये क्या संस्कृति को बढ़ावा देंगे? गायिकी के घर तो अशोक भाई, बहुत दूर हैं। सुरों को साधना ये क्या जाने? ये तो बची-कुची संस्कृति का भी विनाश करने पर तुले हैं। संस्कृति को तो हमारे भजनीक जानते थे। सुबह उठकर प्रभात फेरी लगाई जाती थी। इसमें ईश्वर के भजन गाए जाते थे, फागुन के महीने में हमारी बहू-बेटियाँ नाच-गान करते हुए ऋतुगीत गाया करती थी। हास्य, श्रृंगार और अल्हड़ मस्ती भरे फागुनोत्सव के उस उल्लास के आगे स्वर्ग के सुख नगण्य थे। संस्कृति के नाम पर शरीर को उखाड़ना, औरतों को 'चीज' या 'कबूतर' बताना और रिश्तो की शुचिता खत्म करना सरीखी चीजें हमारी संस्कृति में कब रही हैं? इन सब चीजों को तत्क्षण बंद कर देना चाहिए।


अशोक बैरागी: नैन साहिब, कई बार हमारी खाप पंचायतें खौफ पंचायतें हो जाती हैं और यह लड़कियों की शिक्षा, पहनावे और उनकी जीवनशैली को लेकर कई तरह की बयानबाजी करती हैं। आज के आधुनिक दौर में ये चीजें कितनी सही या गलत हैं?

राजकिशन नैन: देखिए, हमारी खाप पंचायतों का अच्छा और असल स्वरूप दुनिया ने सदियों तक देखा है। एक दौर था जब ये खाप पंचायतें अपने गाँव और देश को विदेशी हमलावरों से बचाती थी। क्योंकि ये हमलावर हरियाणा और पंजाब के रास्ते देश पर धावा बोलते थे। लेकिन पंचायतों का वह पुराना स्वरूप अब बीते जमाने की बात हो गई। दूसरा, समाज में परोपकारी एवं संतवृत्ति वाले समदर्शी लोग नहीं रहे। जो नए लोग खाप पंचायतों से जुड़े हैं उन्हें अपनी पुराने रीति-रिवाजों और सद्परंपराओं का ज्ञान नहीं है। इन्हें खाप शब्द के मायने तक नहीं पता।

पचास के दशक तक बिना वोट के सर्वसम्मति से पूरी पंचायत चुनी जाती थी, लेकिन जब से वोट की राजनीति हावी हुई है, अच्छे कार्यों की गुंजाइश खत्म हो गई है। जब बीस-तीस लाख रुपए खर्च करके गाँव में जो पंचायती निजाम खड़ा होगा तो उसने गाँव के भले की उपेक्षा हम कैसे कर सकते हैं? जहाँ तक विवाह की बात है, अपने ही गाँव में शादी करना सरासर गलत है। हमारे यहाँ गाँव-गवांड की लड़की पूरे गाँव की बेटी मानी जाती है। नई पीढ़ी के युवक-युवतियों को इन पारिवारिक परंपराओं का पालन करना चाहिए। ऐसे मामलों में खाप पंचायतों की भूमिका सकारात्मक ही होनी चाहिए ताकि समाज का कुछ भला हो सके। 


अशोक बैरागी: साहित्य को विमर्शों में बाँटना कितना सही है?

राजकिशन नैन: देखिए, साहित्य को किसी भी तरीके से और किसी भी विमर्श में बाँटना बिल्कुल गलत है। इससे सृजन की संभावनाएँ घटती है। इसकी सामूहिकता या समग्रता से ही समाजहित सधता आया है। प्राचीन साहित्य का कोई भी उदाहरण ले लें, अगर इस तरह के वर्गीकरण से साहित्य का कुछ भला होना होता तो हमारे बड़ों ने इसे उसी समय वर्गीकृत कर दिया होता। वे लोग हमसे ज्यादा ज्ञानवान और व्यावहारिक थे। ऋषि-मुनि, संत और आध्यात्मिक पुरुष यद्यपि हर बात की समझ रखते थे, पर उन्होंने साहित्य के कोई खाने नहीं बनाए। साहित्य को उन्हीं निराश लोगों ने वर्गों में बाँटा है, जो न तो अच्छा साहित्य रचना जानते और न ही साहित्य का व्यापक अर्थ समझते हैं। यह विभाजन कुंठित दिमाग वालों की उपज है, मैं तो यही मानता हूँ। 


अशोक बैरागी: नैन साहिब, आपने अपने कैमरे द्वारा सैकड़ों कालजयी चित्र उतारे हैं। आपके नाम से तीन आर्ट गैलरियाँ (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक और हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला) स्थापित हैं। आपका ये कला कौशल जन-जन तक पहुँचे और युवा पीढ़ी भी इस दिशा में प्रेरित हो, उसके लिए आपके पास कोई विचार-योजना हो तो कृपया बताएँ?

राजकिशन नैन: (व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए...) कलाओं के उत्थान को लेकर सरकारी अमले से उम्मीद रखना बेमानी है। विभिन्न कलाओं, कलाकारों और हुनरमंद लोगों के लिए सरकारों के पास कोई योजना नहीं है। यदि होती तो अब तक हरियाणा में कई कला संग्रहालय बन चुके होते। कला से जुड़े हुनरमंद लोग फटेहाल जीवन जीने को विवश हैं। उनका कोई माँ-बाप नहीं। बेरोजगारी ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। वे ताउम्र स्टेज पर एड़ियाँ रगड़-रगड़ कर खप जाते हैं, पर उनकी जात पूछने वाला कोई नहीं है। उनके लिए पेंशन की सुविधा भी नहीं है। कला और कलाकारों का संरक्षण सरकार की सूची में शामिल नहीं है। यही कारण है कि हमारी लोक कलाएँ एक-एक करके लुप्त होती जा रही हैं।


अशोक बैरागी: आपने हरियाणा के बड़े-बड़े गाँव का इतिहास लिखा है, उसके इसके लिए आप गाँव-गाँव घूमे हैं। इस दौरान आपने अनेक कुएँ, तालाब, मंदिर, भवन आदि देखे होंगे, जिनका संबंध किसी न किसी रूप में महाभारतकाल से रहा होगा, लेकिन कई बार यह सुनने में आता है कि इन स्मारकों का निर्माण बहुत बाद में किया गया है। और महाभारत भी महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित एक काल्पनिक महाकाव्य है। इसकी असलियत के बारे में कुछ मार्गदर्शन करें?

राजकिशन नैन: ऐसा है, अतीत के बारे में बहुत सटीक तो कुछ नहीं कहा जा सकता।लेकिन हरियाणा में पुराकाल के जितने भी स्मारक हैं उनका कोई न कोई संबंध महाभारत से अवश्य रहा होगा। काल्पनिक काव्य के आधार पर इतने स्मारक, तीर्थ, तालाब, मंदिर और कुएँ आदि नहीं खड़े किये जा सकते। अगर महाभारत न होती तो गीता का जन्म कैसे होता है? इतनी जगहों के नाम और इतनी कथाएँ कैसे प्रचलित होती? महाभारत को अगर मैं अपना ‘जातीय महाकाव्य' कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हाँ, यह जरूर हो सकता है कि महाभारत के मूल कथानक को जिस रूप में ग्रहण किया गया है, वह वास्तविक महाभारत से कुछ कम या ज्यादा हो सकता है।


अशोक बैरागी: मतलब यह कि महाभारत सत्य और पूर्वघटित कथानक पर आधारित महाकाव्य है?

राजकिशन नैन: जी हाँ, यह ध्रुव सत्य है। महाभारत के प्रमाण हरियाणा में कदम-कदम पर बिखरे पड़े हैं। महाभारत को हम नकार नहीं सकते। यह सत्याधारित महाकाव्य है।


अशोक बैरागी: आप परिश्रम और भाग्य में किसे ज्यादा महत्व देते हैं?

राजकिशन नैन: परिश्रम से ही भाग्य बनता और बदलता है। परिश्रम के बिना भाग्य का कोई औचित्य नहीं है। परिश्रमी लोग भाग्य को ठोकर की ताक पर रखते हैं। भील बालक एकलव्य, अंगराज कर्ण, राजा हरिश्चंद्र और नल दमयंती की कथाएँ भाग्य की बजाय पुरुषार्थ के महत्व को प्रामाणित करती हैं।

किसी ने कहा भी है -“कुछ लोग बस हरदम दुखों के गीत गाते हैं। कि होली हो या दिवाली, सदा मातम मनाते हैं। मगर दुनिया उन्हीं की रागनी पर झूमती देखी। कि जो जलती चिता पर बैठकर वीणा बजाते हैं।"


अशोक बैरागी: नैन जी, आप अपने लेखन और छायांकन को किस रूप में देखते हैं?

राजकिशन नैन: भाई, मैं “बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय" के आदर्श को हमेशा अपने समक्ष रखता हूँ। मेरी इतनी-सी इच्छा है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए दो-चार ढंग के चित्र और एकाध पुस्तक अवश्य छोड़ जाऊँ। मैं बड़भागी हूँ कि लोग मेरे खींचे हुए चित्रों को पसंद करते हैं और मेरे लेखन को भी हर्ष विभोर होकर पढ़ते हैं।
 सच कहूँ तो उनका प्रेम ही मेरे लिए सबसे बड़ा संबल है। उनके इसी अनुराग के कारण मैं अपने कैमरे की आँख से दुनिया को देखता हूँ। और उन्हीं की प्रेरणा से मैं लेखनी के साथ भी निबाह कर रहा हूँ। उनने स्नेह और दयानतदारी का जो अक्षय कोष मुझ जैसे गँवई व्यक्ति पर लुटाया है, उसके लिए मैं उनका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।


अशोक बैरागी: जीवन में सफलता का सूत्र क्या है?

राजकिशन नैन: हमारे जीवन की सफलता हमारे हाथ में है। सफलता सदैव श्रम की अपेक्षी होती है। जीवन में सफल होने के लिए तप करना पड़ता है, स्वयं को साधना पड़ता है। आत्म-निरीक्षण और श्रम के सिवाय सफलता का कोई उपाय नहीं है। पत्नी विद्योत्तमा की फटकार सुनकर अपने भीतर छुपी शक्तियों का ज्ञान होने पर कालिदास एक मूर्ख व्यक्ति से संस्कृत के महाकवि बन गए। किसी ने कहा भी है- “जिंदगी की उसी को थाह मिली, जिसको मंजिल मिली, न राह मिली।"


अशोक बैरागी: बहुत खूब! आप अपने युवा और बाल पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

राजकिशन नैन: (मंद मंद मुस्कुराते हुए...) संदेश देने का मेरा बूता नहीं है भाई! मैं बच्चों और युवाओं से यही विनय करूँगा कि उन्हें अपने सामर्थ्य पर विश्वास रखना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे अपने भाग्य के दास नहीं अपितु उसके स्वामी बनकर जिएँ क्योंकि परिश्रम ही व्यक्ति के भाग्य का निर्माण करता है। हितोपदेश में स्पष्ट लिखा है कि- “उद्यमेन हि.... प्रविशन्ति मुखे मृगा:।"
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परिचय: राजकिशन नैन

वरिष्ठ लेखक और देहाती दुनिया के मूर्धन्य छायाकार राजकिशन नैन का जन्म 27 अक्टूबर 1956 को जिला रोहतक (हरियाणा) के गाँव अजायब में एक कर्मठ किसान रिसाल सिंह के घर हुआ। आठवीं तक की शिक्षा इनने गाँव अजायब के मिडिल स्कूल से पूरी की और दसवीं कक्षा राजकीय उच्च विद्यालय, मदीना से पास की। तदुपरांत पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पोस्टग्रेजुएट करने के बाद इनने पं. भगवत दयाल शर्मा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, रोहतक में पच्चीस साल तक फोटो आर्टिस्ट के तौर पर काम किया तथा मार्च 2007 में इनने नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।

 नैन साहिब ने गँवई संस्कृति के विविध विषयों पर चेतनावादी नवदृष्टि से लिखा है। यात्रावृतांत, ग्राम इतिहास, सांस्कृतिक निधि, निबंध, कहानी, गीत, कविता एवं समीक्षा सरीखी विधाओं में समान रूप से लिखने वाले राजकिशन नैन ने ‘कादंबिनी’ जैसी पत्रिका में 32 वर्ष तक सचित्र लेखन किया है। इसके अलावा ‘धर्मयुग', ‘सारिका', ‘वामा', ‘भू भारती', ‘नवनीत', ‘मनोरमा' और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान' आदि में जनजीवन, कृषि परंपरा, गाँव के पुश्तैनी धंधों, प्रकृति, पर्यावरण और लोक साहित्य से जुड़े इनके उत्कृष्ट लेख और मुँह बोलते चित्र छपते रहे हैं।

इनकी प्रकाशित कृतियों में- ‘हरियाणवी लघुकथाएँ' , ‘लोक में ऋतु' और ‘हरियाणा की लोककथाएँ' चर्चित रही हैं।
राजकिशन नैन देश की ऐसे अकेले और विशिष्ट छायाकार हैं, जिनकी लगन, निपुणता, एकाग्रता, श्रम और फक्कड़ फितरत ने इन्हें फोटोकारी की दुनिया में अनन्य एवं अतुलनीय प्रतिष्ठा प्रदान की है। फोटोग्राफी के प्रति गहन जुनून के चलते नैन साहिब ने फोटोकारी के क्षेत्र में जो महारत एवं मुकाम हासिल किया है उससे इनके समकालीन और पूर्ववर्ती दिग्गज सदैव वंचित रहे हैं। गँवई-गाँव के छायांकन में इनका कोई सानी नहीं है। देहाती-दुनिया का इतना विरल बहुआयामी और बहुरंगी छायांकन आज तक देश के किसी अन्य छायाकार ने नहीं किया है। नैन साहिब पिछले 50 साल से गँवई अस्मिता से जुड़ी देशज थाती का बड़ी शिद्दत से छायांकन कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर के हिंदी-अंग्रेजी के तमाम पत्र-पत्रिकाओं में इनके अनगिनत छायाचित्र और फोटो फीचर बरसों-बरस छपते रहे हैं। इनके ग्राम्य जीवन के विविध आयामों से जुड़े कलात्मक चित्रों की सुवास ‘नंदन', ‘पराग', ‘बालभारती', ‘नन्हें तारे' और ‘बालहंस' आदि पत्र-पत्रिकाओं में आज भी महसूस की जा सकती है। घुमक्कड़ी इनके जीवन की मूल पूँजी है।

नैन जी को सन् 1971 में राष्ट्रपति वी.वी. गिरी द्वारा बेस्ट प्रेजिडेंट स्काउट सम्मान, सन् 2006-07 में हीफा ( हरियाणा इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट ) द्वारा कर्मयोगी सम्मान, 2007-08 के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता के लिए बाबू बालमुकुंद गुप्त सम्मान, 2012 में हरियाणा सरकार द्वारा मंजीत बावा अवार्ड तथा 2017 में आस्था साहित्य संस्थान, अलवर (राज.) द्वारा इन्हें प्रथम नारायणी सम्मान दिया गया।

राजकिशन नैन देश के नाम पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के धरोहर संग्रहालय, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के टैगोर ऑडिटोरियम और हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला के परिसर भवन में हरियाणवी लोकजीवन से संबंधित स्थाई चित्रदीर्घाएँ स्थापित की गई हैं।

बांगरू भाषा, साहित्य, कला, इतिहास, प्रकृति, और संस्कृति राजकिशन नैन के रोम-रोम में रमी है। आज भी नैन साहिब इनके अन्वेषण और संरक्षण कार्य में जी-जान से जुटे हैं।
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साक्षात्कारकर्ता परिचय: अशोक बैरागी

जन्म तिथि: 6 मई 1979
स्थान: ढुराना (सोनीपत) हरियाणा
शिक्षा: एम. ए. हिन्दी, बी. एड, प्रभाकर, नेट/ जेआरएफ - जून 2007।
पी. एच. डी.: "हिन्दी पत्रकारिता को अज्ञेय का अवदान" विषय पर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
 प्रकाशन: 'साहित्य के पथ प्रदर्शक' (साक्षात्कार- हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित) 
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथाएंँ, समीक्षा, संस्मरण, आलेख, पत्र और साक्षात्कार प्रकाशित।
पता: ग्राम व डाकघर ढुराना, तहसील -गोहाना, जिला सोनीपत - 131306 हरियाणा

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