व्यंग्य: महादेश की चमकीली जाजम के नीचे

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

अमेरिकी नेशनल राइफल एसोसिएशन दिवालिया हो गयी, चैन मिला कि अमेरिका की गन लॉबी खत्म होने के कगार पर है। पर वर्तमान अमेरिकी संस्कृति बंदूकों में रची-बसी लगती है। स्कूल हो या रेल्वे के ‘सबवे’, ‘शूटिंग’ होती रहती है। शूटिंग हेडलाइन्स न बने तो फिर अमेरिका क्या महान! सुपर देश है, महान व्यापारी है। हथियारों की सबसे बड़ी मंडी है। छोटे-बड़े देश हथियार खरीदें तो समझ आता है, पर यहाँ के नागरिक भी मौत का सामान धड़ल्ले से खरीदते हैं। बंदूकें (इनमें रिवाल्वर व पिस्तौलें शामिल हैं) खिलौनों की तरह बिकती हैं। जिसमें दम हो वो खरीद ले। सिरफिरा खरीदे तो और अच्छा। जो अंधाधुंध गोलियाँ चला सके वो हीरो। कारतूस बिकें तो अमेरिका की जीडीपी ऊपर उठ जाए। थके-हारे अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से लौट कर आराम कर रहे हैं। पर जब बच्चे ‘स्कूल शूटिंग’ के कीर्तिमान बना रहे हों, तो भला वयस्क क्यों पीछे रहें। महादेश को इसी में गर्व लगता हो शायद।

सन दो हजार की मिशीगन की घटना याद आ रही है। छः साल के बच्चे ने अपनी हमउम्र सहपाठिन को गोली दाग कर मार दिया। मैं मास्टर्स कर के भी बंदूक नहीं पकड़ पाया, पर वह अमेरिकी लड़का पहली कक्षा में ही यह कौशल सीख गया। दुनिया के श्रेष्ठ सभ्य समाज का यह विद्रूप है। आज भी है। उस बच्चे के हिंसक बनने की वजहें, अमीर देश में पसरी ‘गरीबी’ रही। उसके पिता को चोरी और ड्रग्स बेचने के अपराध में सज़ा मिली थी। जेल में चाल-चलन ठीक रहा होगा तो वह परोल पर छूट गया। उसे लगा कई बड़े लोग जेल से बाहर आकर ऐश करते हैं तो वह भी कर ले। वह परोल की शर्तों का पालन नहीं कर पाया तो फिर से जेल के सींखचों मे चला गया। इस बीच, बच्चे की माँ के पास किराया देने के लिए पैसे नहीं थे। वह दो जगह नौकरी करके भी थोड़े-से पैसे कमा पाती थी। माँ और बच्चे बेघर कर दिए गए। वैश्विक छवि चमकाने के लिए दुनिया भर में खैरात बाँटने वाले देश के नागरिक बेघर पड़े थे। माँ-बच्चों को आसरा मिला पर वह जगह बंदूकों और ड्रग्स की अफरा-तफरी का अड्डा थी। आरोपी बच्चा और उसका भाई वहाँ एक सोफे पर सो जाते थे। एक दिन वह छोटा-सा बच्चा हत्यारा बन गया। जो ढंग से पेन नहीं पकड़ सकता था, बोल-लिख नहीं सकता था, उसने एक महाधनी देश के गोरे चेहरे के पीछे छुपी कालिख सामने ला दी।

मिशीगन की इस घटना से अमेरिकी समाज ने कोई बड़ा सबक नहीं सीखा। अमेरिका की दुनिया में अपना वर्चस्व कायम रखने में रुचि ज्यादा रही। वह बच्चा भूखा स्कूल आता था, किसी सहपाठी से ले कर कुछ खा लेता किसी से कुछ। जिसने उसे अचार नहीं दिया उसे उसने मारा। वह अपनी सहपाठी को चूमना चाहता था पर झगड़ा ही कर सका। भूख में अबोध बच्चे का प्रेम भी हिंसक हो जाता है। महादेश चाँद और मंगल पर जीवन खोजने में खरबों डॉलर लुटा सकता है पर अपनी बुनियादी स्कूलों में नहीं। कुछ नाश्ता क्लबों और थोड़ी-सी जगहों पर मुफ्त या सस्ता लंच देने से गरीबी और भूख नहीं मिट जाती। जो देश अमीर होते हैं उनकी नींव गरीबों की हड्डियों पर खड़ी होती है।

जब बड़े गोलीकांड होते हैं, कामकाज में उलझी जनता कुछ घंटों के लिए जाग जाती है। ‘गन कंट्रोल’ के नारे उछलने लगते हैं। किसी भी अमेरिकी राजनीतिक दल का व्यक्ति राष्ट्रपति बने, ‘गन चरित्र’ सुधर नहीं पाता। उल्टे कुछ राजनेता तो गन लॉबी के घोषित गुलाम बन जाते हैं। अमेरिकी, बंदूक को अपनी हैसियत समझते हैं। एक घर में जितने लोग, उतनी बंदूकें। अमेरिकन पत्नी एक रखेगा पर बंदूकें दो। किसी घर में बीस-पच्चीस बंदूकें निकल आएँ तो आश्चर्य मत करिएगा। भारत में जैसे रुपयों से भरे बोरे मिलते हैं, वैसे ही यहाँ घरों में छुपी बंदूकें। मैं लास वेगास की सन दो हजार सत्रह की एक घटना बताता हूँ। यहाँ एक संगीत संध्या में एक जुआरी ने अपने होटल के कमरे से एक हजार बुलेट दागे। साठ लोगों की जान ले ली और साढ़े आठ सौ से अधिक लोगों को जख्मी कर दिया। फिर उसने आत्महत्या कर ली। उसके कमरे से पच्चीस राइफलें और एक रिवाल्वर मिला। कोई अमेरिकन बंदूक ताने तो आप यह न समझें कि वह भारतीयों की बारात में हवाई फायर करने आया है। किसी राजनेता की जीत का जश्न मनाने में भी वह गोली बर्बाद नहीं करेगा। आम अमेरिकन साल में बीस-तीस बुलेट खरीदता है पर चलाता एक-दो ही है, वह भी हाथ साफ करने के लिए। पर बंदूकें और कारें अपना स्टेटस बताने का तरीका है। एक अमेरिकन दूसरों को जानने की इच्छा नहीं रखता, जब तक उसके पास बढ़िया बंदूक और कार न हो! अमीर लोग भारत जैसे देशों में हीरे-जवाहरात खरीदते हैं तो अमेरिका में बंदूकें। धन आता है तो बुद्धि हर लेता है और संबंधों को खोखला कर देता है। बंदूक संस्कृति में पले-बढ़े अमेरिकन बंदूकें ऐसे थाम लेते हैं जैसे वे कॉमिक बुक्स के नायक, खलनायक हों। ध्यान रखिएगा कि अमेरिकन बंदूक तानता है तो चलाने के लिए तानता है, यह बात अलग है कि उसका निशाना चूक जाए।

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