वैश्विक त्रासदी का बयान : कोरोना कालम्

समीक्षक: अरुण कुमार निषाद

पुस्तक: कोरोना कालम् (काव्य संग्रह)
प्रथम संस्करण 2020
लेखक: विजय शंकर मिश्र ‘भास्कर’
प्रकाशन: अवधी प्रकाशन रानेपुर पलियागोलपुर सुल्तानपुर
मूल्य: ₹ 100.00
पृष्ठ संख्या: 441



एक वैश्विक महामारी जिसने सम्पूर्ण विश्व को देखते-देखते अपने आगोश में ले लिया। संसार की बड़ी-बड़ी महाशक्तियाँ भी इसके सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो गई।  ऐसे में कलमकारों की लेखनी अपने वश में रह नहीं पाई और उन्होंने अपने दिल की बात कलम द्वारा कागज पर उतार ही दिया। इन्हीं भावों से ओतप्रोत है विजय शंकर मिश्र ‘भास्कर’ का काव्य संग्रह “कोरोना कालम् ”।

अपनी पहली कविता घरै में रहा’ में कवि लोगों से आग्रह करता है कि यदि लोग इस महामारी में सुरक्षित रहना चाहते हैं तो अपने घरों में रहें। यह कविता अवधी में है पर कविता का शीर्षक हिन्‍दी अवधी मिश्रित कविता का शीर्षक अवधी में ‘घरै मा रहा’ होना चाहिए था।

विजय शंकर मिश्र 'भास्कर'
एहि काल में बा दुनिया बदहाल इ सोचि विचारि घरै में रहा। पृष्ठ 1

‘जीवन दृष्टि बदलना होगा’ कविता में भास्कर जी कहते हैं कि 
हमें अब जीवित रहने के लिए अपनी दिनचर्या में परिवर्तन करना होगा। 
गले लिपटना हाथ मिलाना आलिंगन तजना होगा। पृष्ठ 3

जो लोग गाँव छोड़कर शहर कमाने के लिए गये थे वे किस प्रकार अपनी जान बचाकर महानगरों से अपने गाँव लौट रहे हैं।

गाँव को छोड़कर जो गये थे भागकर लौट आने लगे हैं। पृष्ठ 5
×                    ×                   ×
अथक नंगे पाँव चलते गाँव के लम्बे सफर पर। पृष्ठ 7 
×                            ×               ×
इतनी बड़ी ये भीड़ औ इतना बड़ा पलायन 
संग छोटे-छोटे बच्चे, कोई न पास साधन। पृष्ठ 13 
×                    ×                      ×          
जिन गाँवों को छोड़ चले थे रोजी रोटी  पहले
आज उन्हीं हालातों में फिर वापस आना मजबूरी है। पृष्ठ 14 

डॉ. अरुण कुमार निषाद
कोरोना योद्धाओं के कार्यों की सराहना करते हुए कवि कहता है। 
डाक्टर हैं लड़ रहे, वीर बन उमड़ रहे
नर्स आसपास हैं, कर रहीं प्रयास हैं 
हैं पुलिस जवान संग, स्फुरित हैं अंग अंग 
डट गये जो आन पर और स्वाभिमान पर ॥ पृष्ठ 8 
×                      ×                        × 
आपको बचा सकें, लड़ रही हैं टोलियाँ
नर्स की ये टोलियाँ डाक्टर की टोलियाँ। पृष्ठ 10
×                       ×                   ×
लड़ रहे जो अस्पतालों में सजग योद्धा हमारे 
या पुलिसकर्मी प्रशासक वीरवर नररत्न सारे
जान की बाजी लगाकर अपने अपने कार्य में
हैं जुटे निर्भीक होकर देश हित सत्कार्य में। पृष्ठ 17 
×                    ×                         ×
धन्य हैं जवानियाँ जो देश को बचा सकें। 
विघ्न के समक्ष जो कभी न हिचकिचा सकें ॥ पृष्ठ 20 
  
इस संग्रह की लगभग सभी कविताएँ (जैसे अश्रु निर्झर बह रहा है, प्रैक्टिकल परीक्षा, विश्व को बचाइए, गमछा दूर न कीजिए, आया कोरोना आदि) कोरोना से बचाव का संदेश देती हुई परिलक्षित हैं। बीच-बीच में हास्य रचनाओं (जैसे-फूलत पेट जू बात पचै ना पृष्ठ 7, बाल मनुहार पृष्ठ 15, सर्वश्रेष्ठ उपहार पृष्ठ 33, चूहा अपनी घात में पृष्ठ 36 आदि) को अनायास ही रख दिया गया है। जो शीर्षक के हिसाब से फिट नहीं बैठती हैं। कुछ वर्तनी की त्रुटियाँ भी दिखाई देती हैं (जैसे- पृष्ठ 3 पर वैग्यानिक, पृष्ठ 40 गम्छा)। छन्दों के प्रयोग में भी कहीं-कहीं शिथिलता दिखलाई देती है। एक ही कविता में दो-दो तीन-तीन छ्न्‍द एक ही साथ प्रयोग कर दिये गये हैं। कुल मिलाकर लेखक का प्रयास सराहनीय है भविष्य की रचनाओं के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।