मानवीय सरोकारों का बिंबनः “शत-प्रतिशत”

समीक्षक: नयना डेलीवाला


'शत प्रतिशत' (कहानी संग्रह)

लेखिका: हंसा दीप
प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी-322201
मूल्य: 250/-रुपए, पृष्ठ-172, वर्ष 2020 ई. 



        कन्हैयालाल नंदन के एक सवाल के जवाब में अज्ञेय ने कहा था कि ‘यों  अच्छा कवि, वास्तव में ऐसा दहला देनेवाला कवि दस-बीस साल में एकाध होता है। उपन्यासकार भी पीढ़ी में एकाध हो तो काफी मानना चाहिए। तो फिर कहानी? कहानी साहित्य की सत्ता में बड़ी ताकत नहीं रही, चूंकि सबसे अधिक पाठक कहानी के ही होते हैं। आज हम देख रहे हैं कि अधिकतम् पत्रिकाएँ कहानी के दम पर ही तो चल रही हैं। अखबार में भी जो जगह कहानी के लिए है वह कविता के लिए नहीं।’ बहरहाल यह बात इसलिए कि जब कहानी की बहुतायत है तो कहानी की समीक्षा के सामने अधिक परेशानी भी तो है। अब कहानी सारी बातें भली-भांति बताने के लिए तो लिखी नहीं जाती, जीवन के संकट हैं इसलिए कहानी भी है।

डॉ. हंसा दीप
   किसी भी कहानी को पसंद करने के तीन कारण होते हैं। प्रथम—कहानी की पठनीयता, भाषा और थोड़ी-बहुत नाटकीयता, तथा एक सूत्र, जो जोड़े रखता है। ये कहानियां पढ़कर तत्काल भूल जाते हैं। दूसरा--- कहानी पढ़ते वक्त उसका शिल्प, घटनाओं को देखने का रचनाकार का नज़रिया, जो पाठक को चौंघियाता है, परंतु इस तरह की कहानियों का प्रभाव भी स्थायी नहीं होता। तीसरा--- महत्वपूर्ण पक्ष है—पढ़ी गई कहानी बाहर की दुनिया के समानांतर भीतर की दुनिया भी दिखा रही हो, जो कहानी में कहा गया है, उससे अधिक महत्वपूर्ण अनकहा हो, जिसे पाठक सुनने की कोशिश करें, मतलब कहानी सार्वभौमिक हो। कहानी की आयु केवल दस-बीस साल न होकर, जब भी पढ़ी जाए नये अर्थ देनेवाली हो। कहानी बाह्य घटनाओं पर आधारित न होकर, आंतरिक दुनिया को चित्रित करती हो। प्रसिद्ध हिंदी एवं विदेशी कहानियों की खास बात यह होती है कि आप रचनाकार का नाम भूल जाएं, पर कहानी आपको याद रहेगी ही। संभव है कहानियों के नाम आप भूल जाएँ, लेकिन कहानी में है क्या यह पाठक नहीं भूल सकता। इसलिए कहानी की उम्र लेखक से बड़ी होनी चाहिए।

नयना डेलीवाला
   21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में यह कहना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि दुनिया बदल रही है या बदल गई है। इसके पीछे सीधा कारण यही है कि हम पोस्ट-ट्रुथ की दुनिया में जी रहे हैं या तो जीने के आदी होते जा रहे हैं। इस प्रकार वर्चुअल होती जा रही दुनिया में जहाँ पर बहुत अलग ही ओज, तात्कालिक त्वरा में सब घटनाएं घट रही हैं, वहां इतिहास के आईने में ऐसी तस्वीर शब्दों के माध्यम से एक रचनाकार दर्ज करता है, जो आपको घटनाओं के देश काल व परिस्थिति समझने में सहायक सिद्ध हो सकता है। ऐसी प्रसिद्ध रचनाकारा जिनका निवास कैनेडा में है और जन्म है भारतीय संस्कृति एवं परिवेश में, बहुत अनोखे नाम से देश-विदेश में प्रसिद्धि का परचम लहरा रहीं है- डॉ. हंसा दीप। उनके दो कहानी संकलन- ‘चश्मे अपने-अपने’, ‘प्रवास में आस-पास’ प्रकाशित हो चुके हैं। तीसरा ‘शत-प्रतिशत’ कहानी संकलन 2020 में प्रकाशित हुआ है। इनके लेखन में गंभीर चिंतन के साथ समसामयिक समस्याओं और चुनौतियों के दर्शन होते हैं। घटनाओं के अनूठे चित्रण से समाज को नई दिशा देने का भी प्रयास दिखाई देता है। इनकी कहानियाँ पढ़ने पर उसमें चित्रित पात्र सजीव होकर मनो-मस्तिष्क में उतर जाते है। यही तो है उनकी सबसे बड़ी सफलता।

   डॉ. हंसादीप  की कलम की विशेषता यह है कि वे बिंबों से कथा को गूंथने का उपक्रम कर रही हैं। अपनी बात पाठकों के सामने रखती हैं, थोपती नहीं। उनकी कहानी के चरित्र सजीव होते हैं। चरित्र के क्रियाकलाप को सतर्कता से वे पेश करती हैं। उनमें भारतीय संस्कार एवं संस्कृति आकंठ भरी हुई है भले ही वे रहती हैं विदेश में। इसी परिवेश के रहते उनकी कहानियों में हमें दोनों संस्कृतियों के, परिवेश, चरित्र, घटना के साथ गुंफित होते नज़र आते हैं।

  शत-प्रतिशत --- कहानी का प्रारंभ नौजवान साशा के जन्मदिन की खुशी के समय के साथ पीड़ा से प्रारंभ
होकर, जीवन की धूप-छाँव को उकेरता है। वर्तमान में लगी चोट के अंतर्गत साशा भूतकालीन वेदनाग्रस्त हादसों में डूबने लगता है, सरकता रहता है, जो पीड़ा बेतहाशा उसने आकंठ झेली है। उसके मानसपट से वे स्मृतियां धूंधली तक होने का नाम नहीं लेती।

   एक कप दूध के ढूलने-गिर जाने से पिता द्वारा पीटे जाने पर मन में जो धृणा का सैलाब उछलने लगता है, असीम है। पिता की मार-हिंसा की हद तक पहुँची है, रचनाकारा ने चोटदार तरीके से स्थान-स्थान पर इसे उद्घाटित किया है— “पशुओं की हिंसा तो पेट की भूख से जुड़ी होती है जबकि मनुष्य की हिंसा की भूख तो कई तरह की होती है अहं की, नशे की तथा खीज से भी जुड़ी होती है। यह दानवीयता मानवीयता को लीलकर अच्छे खासे इन्सान को हैवान बना देती है, दरिंदा–सा जीवन जीने को मजबूर कर देती है।” शत-प्रतिशत शीर्षक के रुप में लेखिका ने एक नयी दिशा का आगाज़ किया है। मनोविज्ञान का सिद्धांत है कि अकल मन में पड़ी-दबी हुई अच्छी-बुरी, घातक भावनाएं कभी भी, कहीं भी प्रबल वेग से उभर कर बदले की आग में परिवर्तित होती हैं। यहां भी साशा का बाल मन जिन अत्याचारों का भोग बना हुआ है, अपने 30वें जन्मदिन पर प्रतिरोध की आग के साथ बदले की मनसा लेकर अग्रसर होता है।
  चूंकि पालक माता-पिता जोएना-कीथ के सौहार्द्र और प्यार को नहीं समझ पाता। परिवर्तित परिस्थितियों का स्वीकार भी नहीं कर पाता परंतु सरल एवं समझदारीपूर्ण व्यवहार करता है। मन में जो गहरे उतर कर जड़ीभूत हो गई बदले की भावना को छोड़ नहीं पाता, उससे मुक्त नहीं हो पाता। मन में ठान लिया है उसे करने पर तुल जाता है।
   आज जन्मदिन पर वह भाड़े का ट्रक लेकर मन में भरे विष और विध्वंस को फैलाने की महेच्छा से आगे बढ़ता है। संयोगवश बाल सखी लीसा से भेट होती है, वह कॉफी पीने का प्रस्ताव रखती है, साशा अस्वीकार नहीं करता पर छूट कर मन की चाह पूरी करने के लिए सोचता रहता है, लीसा के प्यार भरे व्यवहार को भी अनमना कर देता है। तभी कोई और उसी के विचार को अंजाम दे देता है, ट्रक को फूटपाथ पर चढ़ा कर अनगिनत लोगों को कुचल देता है, लहू के फव्वारे, जख्मी लोगों को जब साशा देखता है तो आँखो देखी यह गमख्वार घटना से उसका मन पसीजने लगता है। उसका मन पीड़ा, लोगों का अफाट रुदन, मदद की भीख यह सब देखकर आक्रांत हो जाता है। असह्य पीड़ा उसके मन को उद्वेलित कर देती है।

   उन जख्मी लोगों को, जो उसके कोई नहीं लगते, हर प्रकार से मदद करता है, एंब्युलंस में रखवाता है, लोगों की स्थिति को देखते हुए उसका दिमाग सुन्न हो जाता है। अंत तक उसका हृदय परिवर्तित हो जाता है और लीसा की बाहों में वह उष्मा के आगोश में सिमट जाता है।

   हम देख सकते है कि मनोविज्ञान भी मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं के सामने फ़ीका पड़ जाता है। संवेदना ही मनुष्य को जीवन देती है, जीवन सँवारती, मानव को पशु से इंसान बनाती है।

  गरम भुट्टा -- एक अच्छा समझदार-सलीकेदार व्यक्ति जब जीवन में किसी भी रुप में साथ निभाता है वहाँ रिश्ते का, संबंध का कोई नाम नहीं होता। ऐसे रिश्ते एक ऊंचाई के होते हैं जहाँ भावना प्रमुख होती है।

   इसी प्रकार का एक दिव्य, निर्व्याज प्रेम सेठानी-मालकिन और नौकर के बीच का तितरिया और भग्गु के बीच का लेखिका ने चित्रित किया है। कहानी के प्रारंभ में खूंखार दिखनेवाली भग्गु अंत तक भाव विभोर हो जाती है। कहानी में एक अनन्य सखी रेशम ने बेनमुन व्यवहार का निर्वाह किया है, सच्ची दोस्त बनकर कहती है--- “मैं तुझे पागल नहीं कर रही हूँ। तू तो पहले से ही पागल है। एक बार हाथ बढ़ा कर तो देख वह तेरी बाँहों में होगा।“

  गरम भुट्टा शीर्षक प्रतीकात्मक रुप में प्रयुक्त हुआ है, जो भग्गु और तितरिया के रिश्ते को दर्शाता है।
कहानी के अंत में रेशम खुद का हाथ सखी के हाथ में देकर उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए तृप्ति के साथ देह त्याग के उम्दा कार्य का निर्वाह करती है।

  यहाँ हमें उदात्त मानवीय गरिमा के दर्शन मालकिन—नौकर-सखी के भावनमात्क त्रिवेणी संगम में दृष्टिगत होते हैं।

  पन्ने जो नहीं पढ़े --- इसमें निम्मी जो एक भारतीय नारी के संस्कारों से आभूषित है। पति अध्यापक है, यह सर्व सामान्य बात है, प्राध्यापक में ज्ञान और संस्कृति का समन्वय होता है। 
 
  प्रोफेसर को उनके पास आनेवाले छात्रों के साथ पत्नी भी सर कहकर बुलाती है। रश्मि जो विनम्र और सुंदर छात्रा है, ज्ञान पिपासा की पूर्ति हेतु सर के पास आती रहती है। उसकी मां नहीं है, पिता कारोबार के कारण अधिकतर शहर से बाहर रहते है, अटूट विश्वास से बेटी को निम्मी के घर छोड़ जाते हैं, ताकि बेटी का अभ्यास बर्बाद न हो।

    एक रात्रि को निम्मी अचानक प्यास लगने पर पानी के लिए आती है तो क्या देख रही है—रश्मि एवं सर को जिस अप्राकृत स्थिति में देखती है तो निम्मी का मोहभंग हो जाता है। अपने बेटे के लिए रश्मि को बहू बनाने का जो सपना था वह चूर-चूर हो जाता है। बेटा विदेश चला जाता है और किसी विदेशी मेम से शादी रचा लेता है। मोहभंग के बाद निम्मी ‘सर’ से अलग गाँव में रहकर अपना जीवन बसर करती है।

   अंत बड़े सलीके से किया है—जीवन चाहे कैसे भी बसर हो परंतु ‘सर’ को गुरू दक्षिणा देकर रश्मि अपनी राह पकड़ लेती है। निम्मी को जब पता चलता है तो कहती है- ‘सर’ ने वाकई में वे पन्ने नहीं पढ़े जो जीवन के सार्थक पन्ने कहे जाते हैं।

 रचनाकार ने फ्लैशबेक शैली में भयावह, थ्रिलर फिल्म की भांति कहानी का प्रारंभ करके टूटी-बिखरी-प्रताडित-आहत स्त्री की पीड़ा का मर्मांतक चित्रण किया है।

   विदेशी संस्कृति में वर्तमान जीवनयापन कर रहीं हंसाजी में भारतीय संस्कार आकंठ भरे हुए है, इसका साक्ष्य बनकर कहानी उभर कर आयी है। वरना विदेशी परिवेश में तो रश्मि-सर-निम्मी आदि की घटनाएं आम बात होती है—रात गई, सो बात गई वाला मामला भी रहता है, खैर।

   हाँ रश्मि में हमें उस युवा वृत्ति के भी दर्शन होते हैं, जब वह शादी करके अपना जीवन संवार लेती है, सरल-सुगम शब्दों में, कहीं पर आतुरवृत्ति के साथ अपढ़ पन्ने को उजागर किया है- “एक रिश्ता टूटता है तो सब कुछ बिखर जाता है, पन्ने अपढ़ ही रह जाते है।“

  अक्स --- अक्स का अर्थ होता है परछाई या प्रतिछाया। इस कहानी का प्रारंभ ही लेखिका ने अनूठे ढंग से
किया है। तीन पीढ़ियों के संबंधो से गूंथी गई यह कहानी में ‘नातिन को प्रोब्लेम चाइल्ड  कहते है, पर मैं हूँ नहीं, प्रोब्लेम नानी’ है।

   नानी का नातिन के प्रति निर्व्याज प्रेम बहुत अच्छा लगता है और सुहाता भी है, और नानी से विविध प्रकार की सेवाएं और लगातार ध्यान भी नातिन चाहती है, और मीठा गुस्सा भी करती है। गुस्से के बावजूद नानी उसे प्यार करें यह भी चाहती है, उसके लिए नानी को मजबूर करती है।

   चूंकि माता-पिता को अपना बच्चा अति प्यार-दुलार में पलकर बड़ा हो ये नहीं भी चाहते, पसंद नहीं करते परंतु बेबस हैं नाना-नानी, दादा-दादी के प्यार के सामने।

  अंत में याद आता है वह सनातन वाक्य - “जब तक भुगतो नहीं तब तक पता नहीं चलता कि कौन सा संवेदन-लगाव? यही नातिन जब मां बनती है, रोका-टोकी करती है तब महसूस होता है कि मैं भी नानी बनूँगी तो शायद “प्रोब्लेम.......।“

  पूर्ण विराम से पहले ---- “मेरे जंगलीपन को इंसानीयत के घेरे में संजोकर वह मेरी अनर्गल सोच पर
पूर्णविराम लगा गयी थीं।“ इस कथन को कहनेवाली महिला ने यह साबित कर दिया कि वहशियत और संशय किस हद तक मनुष्य को कचोटकर मानसिक रुप से नदारद कर देता है।

कथा कथक ने भी जीवन में विसंगत स्थितियों का सामना किया है। शिक्षक शब्द ही अपने आप में विशेष महान, चरित्रवान, दया-करूणा को लिए हुए है। चूंकि समय के साथ शब्दार्थ और व्यवहार में परिवर्तन अवश्य दृष्टिगत होता ही है। परंतु गुरू की वह छवि मिट नहीं पाती है, कभी-कभार संयोग उसे धुंधला कर दें, मिट नहीं सकती, इस तथ्य को एक साधारण महिला ड्राइवर ने सिद्ध कर दिखाया है। यही कहानी का चरम है जहां से आगे चलना कठिन-दुष्कर लगता है।

    एक साधारण घटना कि संस्थान तक जाने के लिए टिकट न लेना या बिना टिकट सफर करना, यह कार्य कितनी हद तक जाकर विविध आयामों में कथाकथक के मनोवेगों में डूबती-उतराती है। कभी सौंदर्य का अतिरेक तो कभी सतही-छिछली सोच, एक शिक्षक हीन दशा तक पहुँच जाता है, पर क्या कभी सोच भी सकता है कि वह किसी के लिए आदर्श चरित्र, उम्दा पात्र, हीरो भी तो हो सकता है? 

  मानवीय दुर्बलताएँ किसी भी स्थिति में सही पथप्रदर्शन नहीं कर सकतीं, यह बात इस कहानी में स्पष्ट रुप से झलकती है। अंततोगत्वा जब ज्वाला धधकने लगती है और प्रश्नों की जड़ी के उत्तर मिलते हैं तो कथाकथक अवाक्–सा हो जाता है, शब्द नहीं फूटते। खुद कहते हैं- “मेरा मान-स्वाभिमान सब कुछ अभिमान के तले दब गया है।“

   एक ही सीख लेनी है– किसीके उपकार को कभी अपकार न समझें क्योंकि हमें पता नहीं होता कौन  साधारण व्यक्ति भी हमें बडा महत्वपूर्ण बोध पाठ सीखा जाए।

  इलायची ----- शीर्षक की संज्ञा से ही महमहाती सुगंध का पता चल जाता है। बेशक इस कहानी का अंत 
अति रोचक लगता है —  “एक घोषित संत था, दूसरा अघोषित संत, बिलकुल इलायची की तरह मानवीयता की खुशबू से ओत-प्रोत, अंतर्मन के हर दाने में भी और छिलके में भी।“ यह एक सनातन सत्य है कि दो आत्माओं के बीच जब दिव्य प्रेम होता है तब  मनुष्य मानवीय गरिमा-गौरव को पा जाता है और उत्कृष्टता पूर्ण जीवन को सार्थक कर जाता है।

   कितना मशहूर नाम है शौकत मियाँ, जो अनेक बुरी आदतों के बावजूद भी इनसानियत को ओढ़े हुए है। व्यवसाय है कसाई का पर दिल का साफ़ होने से पिछले दरवाजे से मटन बेचने का व्यवसाय करते थे। उनकी जान तो बसी थी सामने रहती पडोसन रजनी-रज्जोबीबी में। प्यार से रजिया कहकर बुलाते थे। ठेठ गाँव था अतः लोग नगर में बस गये, कमाई हेतु। एक दिन रजनी का परिवार भी हिज़रत कर जाता है।

  बहुत सारी एब के बावजूद शौकतमियाँ का प्यार आवृत एवं शुद्ध था। अचानक एक दिन धूप के चश्मे लगाकर एक महिला शौकतमियाँ के घर के सामने कार से उतरती है, और उनके सामने आती है। मियाँ उसे नहीं पहचान पाते पर आवाज़ सुनते ही सोया हुआ प्यार तल्खी से अंगडाई लेकर रजनी को निहारता है। 

  भूतकाल पूरा का पूरा आँखों के सामने तादृश्य होता है। यही अमर-दिव्य प्रेम के कारण रजनी की शर्त मानकर अघोषित संत का जीवन ग्रहण कर आमूलचूल परिवर्तन कर लेता है और इलायची की अस्खलित खुशबू से माहौल को सुगंधित और जीवंत बना देता है।

   अर्क यही है कि अगर सच्चे दिल से निर्व्य़ाज स्नेह करते हो तो इनसानियत सर चढ़कर गाती है। संवाद एवं प्रवाहता के कारण कहानी सजीव बन गई है। गुमटी, कूड़ादान आदि शब्दों का प्रयोग करके गाँव के परिवेश में कहानी को पिरोया है।

  कूकडूँ कूँ ---- सामाजिकता की घीसी-पीटी घरड़ को उजागर करती है। शीत बेटे को ममा बॉय नहीं बनाना
चाहती, वाकई में पिकनिक के दौरान गोलू और आलिया के क्रियाकलाप को देखते है तो हैरान रह जाते हैं। माही की मां का अक्स उसे कहता है- ‘वह कूकडूँ कूँ है बेटू, उसे कोई सिखाता नहीं पर वे सब अपने आप सीख लेते हैं।’ इसमें भी एक करारा व्यंग्य है। सांप्रत सामाजिक स्थिति का वर्णन है, जो आम बात हो गई है। परिवार-समाज-बहू मात्र को यह स्वीकार करना ही है और जीना है।

  विशेष अभी शेष है -----  कहानी का अंतिम वाक्य- ‘जो बुढ़ापे में शेष है वही विशेष है।’ अर्थात्
जीवन में व्यक्ति हारता है तब थककर मायूस हो जाता है। बीमारी घेरने लगती है, बेटे-बहू निजी होने पर भी कतराने लगते हैं, यही है वर्तमान समाज की नियति। जिसे प्रत्येक परिवार की विडम्बना के रुप में समाज में सर्वत्र दृष्टिगत हो रहा है।

  विदेश में निवासित आदेशबाबू की पत्नी नहीं रही। वह अपने मर्ज और खस्ता हालत के साथ मजबूर होकर दिन गुजार रहे थे। एक दिन अचानक तबीयत खराब होने पर एक जो आज दोस्त है, ने अस्पताल पहुँचाया था और साथ ही उसे जीने का पथप्रदर्शन भी किया था। तब से आदेशबाबू के जीवन की राह बदल गयी थी।

वह उन जिंदादिल बूढों के समूह के साथ जुड़ गये थे। समूह की वयस्क महिला एलिजाबेथ के गहरे दोस्त भी बन चुके थे। जीवन जीने की जिजीविषा ने उसे तरोताज़ा कर दिया था अंत: वह कह उठे- “सच अलग रुप में सामने था अब। बुढ़ापे में भी बहुत कुछ शेष था और जो शेष था वह बहुत विशेष था।”

  बांध के कंधों पर नदी ---- प्रायः हम देखते हैं कि नदी के दो किनारे होते हैं जो इसके प्रवाह को बाँधते 
हैं। इस कहानी का शीर्षक इसी रुप में प्रतीकात्मक कहा जा सकता है। पूजा रुपी सरिता परेश और अंशुमान रुपी तटों के बीच बहती है, पर क्या यह बहाव स्थायी है, नहीं यह तो भावना रुपी जलप्रवाह का उफ़ान है, फिर से नदी प्रवाह संयत कर लेती है।

  हाँ रचनाकार ने इस प्रवाह को बहते रहने अवश्य दिया है पर अंत तक आते-आते उसमें कंकड डालने का प्रयास इस तरह किया है कि दोनों की संतानों को इश्क के सूत्र में पिरो दिया है।

  कह सकते हैं कि सरिता के प्रवाहमान स्रोत में बहुत कुछ आता है कंकड-पत्थर-पोखर-अंतरीप, पर क्या बहना कभी रुक पाया है, नहीं न! जीवन का भी यही सत्य है- बस चलते ही जाना है—रुकना नहीं।

  बहुत ही साधारण घटना को विशेष बाँध के साथ जोड़कर जीवन को समझने की तथा समाजगत रस्म के निर्वाह की बात की है। इससे पता चलता है कि लेखिका में भारतीय संस्कार गहरे जड़ीभूत है। शब्द हैं- “मन के रसीलेपन को विराम मिला, एक स्वयं परिस्थिति ने स्थिति को संभाल लिया।” यही वह संस्कार की गूँज है।

  एक टुकड़ा समय का ---- कहानी का यह शीर्षक भिन्न स्थितियों में विविध अर्थ और परिवेश में गूंथा
गया है। निशा का वैधव्य, मां-बाप के घर से अवमानना, बच्चियों का निर्वाह, देह की भूखी-नंगी आँखों से स्व सुरक्षा। यह समय का टुकडा निशा को लगातार जीवन के द्वंद्व में फंसाता है।

  तीन बेटियों के पिता, जिनकी उम्र 55 की है, शादी करके महारानी बन जाती, सुख संपत्ति, ऐश्वर्य में आलोडित होती रहती। परंतु दिन के बाद आनेवाली रात्रि में भावहीन, शून्य होता तन-मन काष्ठ
बन जाता है। देवा को न सह पाना। दमित कुंठाओं के कारण मनोवेगों की परस्पर टकराहट।

  एक टुकड़ा यह भी जहाँ तोषी के साथ भावात्मक तो खैर, पर दैहिक आग की संतृप्ति के लिए बाहुपाश में बंधते ही, देवा की छवि देखकर मनोवेगों को नियंत्रित कर लेना और तोषी को कहीं का न रखना, ढ़केल देना।

  स्पष्ट रुप से यहाँ देख सकते है कि भिन्न-भिन्न समयावेग में समय का टुकड़ा कैसे जीवन की विषमताओं से टकराकर चरित्र को आदर्शोन्मुखता की ओर ले जा रहा है। यह एक भारतीय नारी की मनः स्थिति ही कर पाती है।

  वे पाँच मिनट --- “पाँच मिनट का अंतर था जन्म में, सिर्फ पाँच मिनट बहुत होते हैं।“  इस कहानी में
जुड़वा भाइयों में भी कितना द्वेष, ईर्ष्या और असुख की कुंठा ने छोटे भाई को निराशा, फ्रस्टेशन के गर्त में ढ़केल दिया, यहाँ तक की मां-बाप को भी बड़े भाई चिराग के सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता था।

  कई बार हम देखते हैं ऐसी धूत्कार भरी जिंदगी से लोग मर जाना, खुद को खत्म कर देना बेहतर समझते हैं। एक प्रश्न यह था कि विदेश से आते ही बड़े भाई से द्वेष? मानव मात्र की प्रकृति है कि ‘मैं’ ही सब कुछ कर सकता हूँ। प्रयाग, छोटा भाई, मुझे वाह-वाही और अधिक सम्मान मुझे मिलना चाहिए, क्योंकि मुझ में भी तो सब कुछ है। यही ‘मैं’ का अभिमान, गर्व कइ बार जीवन को नष्टप्राय-सा बहुत बड़ा करतब करता है। जो छोटे भाई में नज़र आता है।

   अंततः पिता की चिता को अग्नि देकर अपने आपको सार्थक साबित करता है, अनुभूत करता है कि आजीवन जो कोफ़्त, पीड़ा, धूत्कार, निराशा को भुगता है, उन सबका बदला ले लिया, सुख की अनुभूति करता है। पर मेरा प्रश्न है- बदला किससे, भाई से कि अपने आपसे?

   समाज रचना में ये सब विवाद होते रहते हैं, क्योंकि ‘मैं’ कभी मानव को मुक्त नहीं होने देता, अतः लीला वस्तु कैवल्यम् की भाँति संसार की लीलाओं में से गुजरना है तो भुगतना ही पड़ता है। यही तो जीवन है।

  रायता ---- भोजन को स्वादिष्ट बनानेवाला एक व्यंजन। जो प्रवाही तथापि मधुर लगनेवाला। भोजन में जो
स्वाद की कमी रह गई हो तो उसकी पूर्ति करता है। अघन होन से फैल जाता है, दही और अन्य सामग्री से बना होता है। यहाँ फैलने, बिखरने के अर्थ में ‘रायता’ प्रयुक्त हुआ है।

  यह कहानी कोई विशेष प्रभाव नहीं डालती है, हाँ समाज में उच्चवर्गीय-संपन्न लोगों से मध्यवर्गीय का रिश्ता एक उम्र के बाद जुड़ता है तो लोगों में आश्चर्य, उत्कंठा और आतुरता के भाव सीमा पार करते हुए बहकने लगते हैं। यही बात भूमि के एंगेजमेंट की घटना में बिंबित होती दिखाई देती है।

  अंततोगत्वा सारी की सारी हवा ही निकल जाती है, जब पता चलता है कि अंगूठी हीरे की नहीं कांच के    टुकड़े की थी। वर्तमान समाज में देख-दिखाव ‘वेलऑफ’ की जो मानसिकता प्रवर्तमान है वही मटीयामेट करती है। यही उत्स है।

  उसकी मुस्कान ---- बैसाखी रुपी  उदात्त एवं दिव्यप्रेम की कहानी में एक तरफ पिता का प्रेम है तो दूसरी
ओर है मन से माने हुए सर्वस्व पति के प्रति अनन्य स्नेह बुलबुल को अपने दायित्व से मुकरने नहीं देता। पाश्चात्य परिवेश के शब्द हैं ‘लिव इन रिलेशनशीप’ जिसे भारत ने भी ओढ़ लिया है, पर है वह दुविधापूर्ण।

 रचनाकारा जन्मगत तो भारतीय संस्कारों से आवृत है, इसी परिवेश में पली भी तो है, अतः बुलबुल ने जब जिगरी दोस्त स्वीकार किया है तो अपने विशेष चरित्र के आधार पर ही। अंत तक पिता की भावनाओं का समादर करती हुई, उन्हें समझाती हुई, बचपन से पिता ने उसे विशेष रुप से पाला है, उसका हवाला देते हुए एक बार उन्हें (वृद्ध) मन से पति स्वीकार कर लिया है, तो आज उनकी शारीरिक-मानसिक कैसी भी स्थिति या अवस्था हो, दिल से उसे निभाना, उसका निर्वाह करना हमारी संस्कृति के संस्कार हैं।

   बुलबुल ने एक बार तन-मन-धन से अपने आप से वादा किया है तो अवश्य निर्वाह करना ही है। अंततः सत्यवान की सावित्री बनी हुई बेटी को पिता, अनेक तर्कों को खारिज करके उस संबंध को स्वीकार कर ही लेते हैं। परंतु मन में एक सवाल तो कचोटता ही है कि दोनों का परिचय, मिलन कब कहाँ, कैसे हुआ होगा? यही तो अंत है। दिव्य एवं उदात्त प्रेम की दास्तां।

  प्रोफेसर --- इस शब्द के साथ हमेशा से जुड़ा रहता है हरफन मौला और भुलक्कड व्यक्ति, हाँ धुन
विशेषण भी लग सकता है। कहानी में मूल प्रश्न है अधिकार-हक और कर्तव्य-फ़र्ज। दादा-पोती के संवाद से प्रारंभ हो रही कहानी दो शब्दों के अर्थ पोती दादा से समझना चाहती है। उसके दादाजी प्रोफ़ेसर तो हैं पर राजनीतिशास्त्र के।

   प्रश्नोत्तर के लिए केवल तीस मिनट का समय है तथा साथ है सालों कॉलेज में सहकर्मियों के साथ गुजारा हुआ लंबा अंतराल और उसकी विशेषता पूर्ण स्मृतियाँ। शिक्षा के कर्तव्य के प्रति घोर घृणा आदि घटनाएं प्रोफ़ेसर के ज़ेहन में है ही, उसे तादृश्य करते हुए वे सफ़र करते हैं।

   दिवास्वप्न से झिंझोड़कर बच्ची जब दादाजी को जगाती है तब दोनों शब्दों के अर्थ एवं व्याख्या करते हुए अपनी कॉलेज काल को साध लेते हैं, उसी समय नींद की गोद में बच्ची सरक जाती है।

   कह सकते हैं कि अतिशयता हमेशा नुकसानदेह ही साबित होता है। जहाँ पढ़ाना है वहाँ कतराते हैं, छात्रों को किसी भी बहाने से टाल देते हैं। बच्ची के सामने सरल समझ देने की अपेक्षा भाषण में बहने लगते हैं।

   स्थान-स्तर-परिवेश को देखते हुए कार्य करना सही प्रोफ़ेसर का कर्तव्य है, न कि शिक्षण-चोरी।

  पाँचवीं दीवार ---- कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक है। कमरे, मकान कहीं पर भी हमें पांचवी दीवार नज़र
नहीं आती। पर यह पांचवी दीवार समता-सुमन रुपी है जो राजनीतिक पार्टी को जीताकर सर्वे-सर्वा हासिल करना चाहती है। एक बार तो शिक्षिका का मन दुबक जाता है। पीछे हटने के बावजूद खुद से ही प्रश्नोत्तर करके, हिम्मत एकत्रित करके कूद पड़ती है। विद्यालय की भांति यहाँ पर भी अनुशासन एवं नियंत्रण करके देश को सुचारु रुप से गठित करने का उसका सपना है। इसी प्रकार सशक्त पाँचवीं दीवार साबित होना चाहती है। औरत क्या नहीं कर पाती, इसी प्रश्न को समताजी कड़ा निर्णय लेकर खारिज़ कर देती है, अधिक आशावान भी है।

  चाय में डूबा बिस्कुट ----- एक साधारण–सी आदत शीर्षक में निहित है पर इसके परिपार्श्व में बहुत अच्छी बोधप्रद घटना आवृत है। मांगिया जिसका जीवन बचपन से ही अस्त-व्यस्त, मां, बेबसी-भूख की आग में तड़पकर जान गँवा बैठी। बचपन से ही जो मांगता रहा इसलिए नाम हो गया था मांगिया।

   ‘गरीब की जोरू सबकी भाभी’ की भांति मांगिया हरेक घर में नौकर का काम करता था एवज में भूख की पूर्ति करता था। पर हाँ दादी उसे माँ की तरह बेशुमार प्यार करती और काम भी उससे करवाती थी।

  जब उसे पुलिस ससुराल माने जेल में ले जाकर बेकसूर होने पर भी बंद कर देती तो वहाँ भी पेट भरने के लिए पड़ा रहता, क्योंकि यहाँ एवज में कुछ काम तो नहीं करना पड़ता। जब ससुराल से बाहर निकलता तो दादी के प्यार और खाने के लिए लालायित होकर दौड़ता हुआ पल्लू से बंध जाता।

   अचानक एक दिन झीतरी से मुलाकात हुई, उसके पेट भरने का उम्दा, उत्तम कार्य करते-करते उनके बीच प्यार की भावना परस्पर पनपती है।

   इस बार जब पुलिस पकड़कर ले जाती है तब मांगिया का तेवर बदला-बदला नज़र आता है। थाने में अंदर बैठा अधिकारी पकड़कर लाये मांगिया और हवालदार के संवाद सुनते हैं, और बाहर आकर झीतरी के साथ मांगिया को भी छोड़ देता है, जाने देता है। फिर मांगिया-झीतरी के साथ संसार में रस-बस जाता है। आगे हम क्या देखते हैं? --  मांगिया का बेटा थानेदार के पद पर बैठा है अपनी टेबल पर (मांगिया) पिता की फोटो रखी हुई है, और गौरव मना रहा है, गर्व भी करता है।

   कहानी से दो बातें उभरकर सामने आती है- 1. इन्सान किसी भी स्थिति में मजदूरी करे तो पेट तो पाल ही लेता है। उसे चोरी करने की आवश्यकता नहीं रहती। 2. अगर मनुष्य सही मायने में दिलोजान से किसी से भी प्रेम करता है, तो एक स्त्री ही है जो उसका आमूलचूल परिवर्तन कर देती है, चाहे फिर वह झीतरी ही क्यों न हो?

   तभी तो उन दोनों की संतान एक मंजिल को पाकर गर्व और गौरव दोनों के साथ खुश दिखाई देती है, क्योंकि चाय में डूबकर भी बिस्कुट गिरने का नाम नहीं लेता।

  खिलखिलाती धूप ----  आई हैं चारों बहनें मातम मनाने एक ही एक भाई की अंतिम बिदाई के लिए।
हाँ, सहजकर रखे हुए सामान से हीरे-जवाहरात की अपेक्षा के साथ। बक्सा खोला गया तो कागज़ में लिपटी युवावस्था की एक फ़ोटो मिली, चारों बहनें अपने सुहाने अतीत में ऐसे खो गयी मानों भैंसों की तरह जुगाली करते हुए बौरां रही हों, वह भी पागलपन की सीमा तक।

  अपने अतीत में जो कारनामे किए थे, उसका मजा लेना तो चारों में से एक भी नहीं छोड़ पा रही थी। वर्तमान के गम के बावजूद भी वे खिलखिला रही थीं।

   तात्पर्य यह है कि कैसा भी माहौल हो, पर जब व्यक्ति गुदगुदानेवाले अतीत की पर्तों में डूबने लगता है, तो वर्तमान के विसंगत पलों को भूल जाता है। यथार्थ का सामना करने की हिम्मत नहीं होती, अतीत में खिलखिलाने से बाज़ नहीं आते, कितनी भी कड़ी धूप क्यों न हो?

  शत-प्रतिशत संकलन की कहानियों में अनेक प्रकार की रंग छटाएं दृष्टिगत होती हैं। कहीं निर्व्याज स्नेह के शेड्झ तो कहीं मानवीय सरोकारों की छवियाँ स्पष्ट रुप से झलकती हैं। हाँ कहानियों में विसंगतियाँ, विडम्बनाएँ, पीड़ा, आक्रंद भी मिलता है तो दिव्य प्रेम के भी दर्शन हुए बिना नहीं रहता। स्थितियों के परिपार्श्व में कहीं दृढ़ सकारात्मकता है तो कहीं ठेठ का रंज भी नज़र आता है। कहानियों में चरित्र मनोग्रंथियों से जूझते हैं, लड़ते हैं और सफलता भी प्राप्त करते हैं। वे लड़ाई के उपरांत अपने ध्येय को सिद्ध करते हैं, उसमें उनकी जिजीविषा हमें आश्चर्यविमूढ़ भी कर देती है।

भाषा प्रांजल, सरल, सहज, प्रवाही है जो कथा को भी अपने स्रोत में बहा ले जाती है। कथा में घटनाओं को बखूबी गूंथा है। चोटदार फिर भी सार्थक मुहावरों का प्रयोग हुआ है। चरित्र भी अपनी भाषा, मनोवेगों में सही उतरते हैं। कहीं-कहीं वाक्यांत में सर्वनाम का प्रयोग डॉ. हंसादीप की विशेषता रही है। कहानी के प्रतिपाद्य भी समाज की समस्याओं, मनःस्थितियों, परिवेश को मुखर करता है। हाँ, संवाद में भी यथार्थ झलकता है। ये कहानियाँ अपनी सामाजिक संरचना और समय के वर्तमान दूषित परिवेश में अधिकार चेतना के प्रति मुखर हैं।
 
 अप्रवासी रचनाकारा ने विविध कहानी के प्लॉट यहाँ से और वहाँ से भी लिए हैं और सुघड़ता से कहानियों का गठन किया है। प्रतिपाद्य को बहुत अच्छे से सरलता से प्रस्तुत किया है। अपनी जमीं की सुगंध- परिवेश एवं संस्कृति और संस्कार से मुक्त होकर वे रचनाएं नहीं करतीं, इस अर्थ में वे अप्रवासी ही हैं। उस जमीं की घटना परिवेश से भी मुक्त नहीं हो पाती, यह भी स्पष्ट दृष्टिगत होता है।
    

संदर्भ: सेतु पत्रिका, जून 2012, अंक-12
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डॉ. नयना डेलीवाला, 
पता: 15, नीलगगन टावर, नेहरू पार्क, बोडकदेव रोड, वस्त्रापुर, अहमदाबाद - 380015 
चलभाष: 9327064948, 9016478282


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