जागता हुआ कस्बा : इतिहास के साये में अक्षुण्ण संवेदनाएँ

समीक्षक : कान्ता रॉय 


पुस्तक: जागता हुआ कस्बा
लेखक: विजय मनोहर तिवारी
संस्करण: 2022
मूल्य: 295/-
आईएसबीएन: 978-93-90700-79-0
प्रकाशक: इंद्रा पब्लिशिंग हाउस

मानव सभ्यता और मानवीय पहलुओं पर ऐतिहासिक दृष्टि डालने के लिए पुरानी इमारतों की ईंटों और उसकी जोड़ों से झड़ते सुर्खी-चूने से बात करनी होती है। बीते हुए कल पर आज जो तरक्की की इमारत खड़ी है उसे भव्यता प्रदान करता है उसका इतिहास।

लेखक विजय मनोहर तिवारी ऐतिहासिक घटनाओं को वर्तमान परिप्रेक्ष्य से जोड़कर अपने पाठकों के समक्ष रुचि पूर्ण ढंग से रखते हैं। वे इस पुस्तक ‘जागता हुआ कस्बा में’ एक टैगलाइन जोड़ते हैं कि- इतिहास से पीछा मत छुड़ाइये, इतिहास कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ता है। मूल्यहीनता के इस दौर में यह सही भी है कि इतिहास से भला कोई कैसे पीछा छुड़ा सकता है! इतिहास जीवित बुजुर्ग माता-पिता जैसा कमजोर भी तो नहीं है कि किसी वृद्धा आश्रम में छोड़कर कर्तव्यों से इतिश्री कर ली जाए! इतिहास विरासत की ऐसी पूंजी है जो मानव सभ्यता को सभ्य बनाए रखने में मदद करती है। सच तो यही है कि भाषा, विचार, चैतन्यबोध एवं मानवीय संवेदनाएँ इतिहास के साये में अक्षुण्ण बनी हुई है। ‘जागता हुआ कस्बा’ जैसा कि नाम से मालूम पड़ता है कि यह उदयपुर की कथा तो है लेकिन इसमें राजस्थान के राज-रजवाड़े कहीं नहीं है। चौंक गए! चौंकिए नहीं, यह भारत के हृदय प्रदेश के एक अंचल की कथा है। मध्यप्रदेश में ऐसे अनेकों अतीत अंचलों, कस्बों में उसाँसें भर रहें हैं। लेखक अक्सर अपने आलेखों के जरिये इनसे हुए संवाद को बाहर लेकर आते रहें हैं, इस बार जागते हुए कस्बे के माध्यम से कथा उदयपुर तलाश लाए हैं। लेखक तांक-झांक कर रहे हैं घनी झाड़ियों में छुपी नई जगहों की। दबी हुई पुरानी जगहों के नयेपन की बानगी तो देखिये! मध्यप्रदेश के राजधानी से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर भोपाल से एक कस्बे की कहानी जिसमें सोनारी गाँव और गायसी की गढ़ी भी शामिल है। मंदिर के अवशेषों, खंडहरों की जुबानी कहानी उदयपुर की इस पुस्तक के केंद्र में है।

पुस्तक उदयपुर की कच्ची सड़कों, गलियों में सुलगती जागृति किस तरह से करवट बदलती है, से परिचय कराता है। जीवंत आँखों देखी एवं वहाँ के शिलालेखों, स्थानीय लोगों के जीवन से उपजी लेखक की चिंता सोए हुए भारत के उस बेखबर समाज की है जो अतीत से मुँह छुपाए अपनी ही मौज में जी रहा है। दरअसल लेखक समाज से बात करना चाहता है, घटनाओं के पीछे का सच माध्यम बना है कि उसे भारत के कस्बों में पल रहे अंतर्द्वंद को करीब से दिखाते हुए यह समझाए कि अगर हमारा अतीत जागृति की अवस्था में लौट आता है तो आने वाला कल भारत का स्वर्णिम इतिहास रच सकता है। राजा भोज की नगर रचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उदयपुर, सोए हुए प्रशासन और इतिहास के प्रति उदासीन जनप्रतिनिधि के अनदेखेपन से अपने अस्त होने के कगार पर है। राजा भोज, रानी कमलापति, परमारों की विरासत और ढाई हजार साल के इतिहास में वर्तमान किस तरह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर है, इसकी दास्तान है जागता हुआ कस्बा। रोचकता के साथ कथा दर कथा संकरी गलियों की टोह लेती पुस्तक अपनी उपादेयता सिद्ध करने में पूरी तरह सफल है। निश्चित ही पाठक एवं विद्यार्थी इस पुस्तक को अपने शोध का विषय बनाएंगे ताकि इस कस्बे के ही नहीं वरन देश के तमाम उन सभी कस्बों की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सचेत हों।

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